मोदी सरकार के एक शीर्ष सूत्र ने कहा, “यह हफ्ता चल रहे युद्ध के लिए सबसे अहम हफ्ता है. देखना होगा कि अमेरिका लड़ाई को और तेज करने का फैसला लेता है या नहीं.”
जैसे-जैसे युद्ध का निर्णायक मोड़ करीब आ रहा है, मोदी सरकार अपने विकल्पों पर विचार कर रही है और अलग-अलग देशों तथा अलग समुद्री रास्तों से तेल और गैस खरीदने के चल रहे प्रयासों की समीक्षा कर रही है.
विदेश मंत्री एस. जयशंकर और पेट्रोलियम मंत्री हरदीप पुरी उन देशों से संपर्क कर रहे हैं, जो भारतीय अर्थव्यवस्था पर युद्ध के असर को कम कर सकते हैं. सोमवार को संसद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भाषण भी “भारत के लिए अभूतपूर्व चुनौतियों” को स्वीकार करने जैसा था. उन्होंने कहा कि भारत को हर चुनौती का सामना धैर्य, संयम और शांत मन से करना चाहिए.
ट्रंप और उनकी धमकी की राजनीति
भारतीय हितों के नज़रिए से युद्ध को देखते हुए सरकारी सूत्र ने कहा, “पश्चिम एशिया का युद्ध दिखाता है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ वैश्विक अर्थव्यवस्था को अस्थिर करने की ताकत रखता है. इसमें कोई संदेह नहीं कि युद्ध का केंद्र अब होर्मुज के आसपास सिमट गया है.”
जब पूछा गया कि नई दिल्ली पश्चिम एशिया के इस युद्ध को कैसे देख रही है और यह कब खत्म हो सकता है, तो जवाब में सावधानी और उम्मीद दोनों नज़र आईं.
इस हफ्ते अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ से “सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने” पर फैसला ले सकते हैं. तब तक नई दिल्ली और दुनिया की अन्य राजधानियों को इंतज़ार करना होगा.
सरकारी सूत्रों के मुताबिक भारत घरेलू बाज़ार में तेल की आपूर्ति सुनिश्चित करने को लेकर आश्वस्त है, लेकिन संबंधित मंत्रालय गैस खरीद के नए विकल्प तलाशने पर ध्यान दे रहे हैं. अगर युद्ध लंबा चला या और बढ़ा, तो गैस की व्यवस्था बड़ी चुनौती बन सकती है.
अमेरिकी मीडिया में ऐसी रिपोर्टें भी हैं कि ट्रंप प्रशासन एक ऐसे कदम पर विचार कर रहा है, जिससे ईरान युद्ध खत्म भी हो सकता है या और बढ़ सकता है.
एक रिपोर्ट के अनुसार, “फारस की खाड़ी में, ईरान के तट से करीब 20 मील दूर एक छोटा चट्टानी द्वीप है, जिसका नाम खार्ग है. यह द्वीप ट्रंप प्रशासन के लिए इस युद्ध में जीत की कुंजी बन सकता है, लेकिन यह अमेरिका के लिए मुश्किल भी पैदा कर सकता है.”
इन अनिश्चितताओं के बीच 21 मार्च को प्रधानमंत्री मोदी ने कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) की बैठक की, जिसमें वैश्विक स्थिति की समीक्षा की गई. इस बैठक में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, गृह मंत्री अमित शाह, विदेश मंत्री जयशंकर समेत कई वरिष्ठ मंत्री मौजूद थे.
यह बैठक उस समय हुई जब अमेरिकी नौसेना के जहाज जापान के पास प्रशांत महासागर से पश्चिम एशिया की ओर बढ़ रहे थे. दुनिया की अन्य राजधानियों की तरह भारत भी ट्रंप के सोशल मीडिया पोस्ट पर लगातार नजर रख रहा है और उनका मतलब समझने की कोशिश कर रहा है.
23 मार्च को ट्रंप ने सोशल ट्रुथ पर पोस्ट किया, “PEACE THROUGH STRENGTH, TO PUT IT MILDLY!!!”
एक दिन पहले ट्रंप ने लिखा था, “अगर ईरान 48 घंटे के अंदर बिना किसी खतरे के स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ पूरी तरह नहीं खोलता है, तो अमेरिका उसके कई पावर प्लांट पर हमला करेगा, जिसकी शुरुआत सबसे बड़े प्लांट से होगी.”
जहां ट्रंप एक ओर ईरान युद्ध को “कम करने” की बात कर रहे थे, वहीं अमेरिकी नौसेना एफ-35 लड़ाकू विमान से लैस जहाज़ ईरान की ओर बढ़ा रही थी.
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ को लेकर ट्रंप ने कहा कि इसकी सुरक्षा और निगरानी उन देशों को करनी चाहिए, जो इसका इस्तेमाल करते हैं, “अमेरिका को नहीं.”
हालांकि, अगले ही दिन अमेरिकी मरीन द्वारा खार्ग द्वीप पर कब्ज़ा करने की चर्चा तेज़ हो गई.
‘भारत जानता है उसका हित कहां है’
भारतीय नीति निर्माता इस अस्थिर स्थिति पर लगातार नज़र रख रहे हैं.
भारत में मोदी सरकार के आलोचक काफी तीखे हैं, लेकिन दक्षिणपंथी झुकाव वाली सरकार इन आलोचनाओं से परेशान नहीं दिख रही है.
चल रहे युद्ध में ईरान की परमाणु क्षमता और हमास, हिज्बुल्लाह, हूती तथा अन्य कट्टरपंथी संगठनों को उसका समर्थन कई दशकों से भारत की चिंता का विषय रहा है.
सरकार के एक नीति निर्माता ने कहा, “भारत जानता है उसका हित कहां है.” कई सूत्रों का कहना है कि मौजूदा स्थिति से निपटने के लिए सरकार के भीतर वैचारिक या नीतिगत स्तर पर कोई भ्रम नहीं है.
28 फरवरी को शुरू हुए युद्ध से ठीक पहले 25 और 26 फरवरी को प्रधानमंत्री मोदी की इज़रायल यात्रा के समय को लेकर आलोचना हो रही है. लंबे समय तक इस बात पर चर्चा होती रहेगी कि भारत ने इज़रायल से दूरी क्यों नहीं बनाई, जबकि इज़रायल ईरान के खिलाफ युद्ध की तैयारी कर रहा था.
सरकारी सूत्र एक सवाल पूछ रहे हैं, “क्या आपको 28 फरवरी को तेहरान के डाउनटाउन में आयतुल्लाह के आवास पर हुई उस बैठक की जानकारी थी, जिसके बाद अमेरिकी और इज़रायली रक्षा बलों ने उस जगह पर हमला किया, जहां खुद आयतुल्लाह खामेनेई मौजूद थे?”
28 फरवरी को युद्ध की शुरुआत ईरान सरकार के शीर्ष नेताओं की बैठक के कारण हुई, जिस पर तेल अवीव की नज़र थी.
एक और मुद्दा, जिस पर भारतीय विश्लेषकों में मतभेद है, वह 28 फरवरी 2026 को ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामेनेई की मौत पर भारत की ओर से शोक संदेश देने में देरी है.
विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने आधिकारिक शोक संदेश पांच दिन बाद शोक-पुस्तिका पर हस्ताक्षर कर व्यक्त किया. इन दोनों मुद्दों पर आगे भी बहस होती रहेगी, लेकिन फिलहाल सरकार आर्थिक प्रभाव पर ध्यान दे रही है और युद्ध क्षेत्र में मौजूद भारतीयों की सुरक्षा को लेकर चिंतित है.
“टीम मोदी” के एक वरिष्ठ सदस्य ने कहा कि भारत तेल की खरीद और आपूर्ति को बेहतर तरीके से संभाल रहा है. गैस की खरीद और आयात को लेकर पूछे जाने पर सूत्र ने कहा, “इस सप्ताह के अंत तक हमें वैश्विक गैस बाजार की स्थिति का पता चल जाएगा.”
वैश्विक और भारतीय मीडिया में कही जा रही इस बात से असहमति जताते हुए कि इस युद्ध में इजराइल फैसले ले रहा है, नई दिल्ली के एक सूत्र ने कहा, “इस युद्ध का भविष्य केवल अमेरिका और ईरान के बीच द्विपक्षीय रूप से तय होगा.”
अब तक ईरान ने भारत के साथ बातचीत में युद्ध जल्द खत्म करने का कोई संकेत नहीं दिया है.
‘ईरान ने इस युद्ध में अपनी ताकत दिखाई’
दुनिया की अन्य राजधानियों की तरह भारत भी इस बात से हैरान है कि पिछले चार दशकों में तेल और गैस से हुई कमाई को ईरान ने समझदारी से रक्षा उपकरणों और अपनी सैन्य ताकत बढ़ाने में निवेश किया है.
सरकार के एक सूत्र ने कहा कि प्रतिबंधों के बावजूद “ईरान कोई गरीब देश नहीं था” और उसने इस युद्ध में अपने संसाधनों की क्षमता दिखाई है.
दिलचस्प बात यह है कि एक सूत्र ने भारत का आकलन साझा किया कि युद्ध खत्म होने के बाद खाड़ी देशों के शेख और राजा इस युद्ध और उसके प्रभाव को व्यावहारिक नजरिए से देखेंगे, क्योंकि सुरक्षा व्यवस्था को तुरंत बड़े स्तर पर बदलने के लिए उनके पास कोई ठोस विकल्प नहीं है.
यह भारत के लिए बेहद अहम विषय है.
खाड़ी देशों द्वारा मौजूदा सुरक्षा व्यवस्था, अंतरराष्ट्रीय गठबंधन और सहयोगियों में बड़े बदलाव किए जाने की संभावना बहुत कम है. ऐसा इसलिए क्योंकि उन्हें अपने-अपने क्षेत्रों के विकास और अपनी सत्ता की स्थिरता बनाए रखने के लिए इन व्यवस्थाओं की जरूरत है. यूएई और सऊदी अरब को इस युद्ध को लेकर कोई भ्रम नहीं है. वे चाहते हैं कि क्षेत्र में ईरान का प्रभाव कम हो.
ऐसी स्थिति में मोदी सरकार भारतीयों से “हर चुनौती का सामना करने” के लिए तैयार रहने को कह रही है.
शीला भट्ट दिल्ली स्थित सीनियर पत्रकार हैं. उनका एक्स हैंडल @sheela2010 है. लेख उनके निजी विचार हैं.
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