Thursday, 2 February, 2023
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वजन कम करना हो तो सेहतमंद भोजन ही करें, डाइट कल्चर बिगाड़ रहा है आपका शरीर

डाइट कल्चर पर आधारित वेट लॉस इंडस्ट्री हार मानने को तैयार नहीं है और बिना किसी वैज्ञानिक समर्थन के नए, ट्रेंडी डाइट के साथ आती रहती है.

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‘डाइट कल्चर’ हमारे चारों ओर मौजूद है और हम सभी पर इसका असर पड़ता है. आम धारणा ये है कि यह सिर्फ अपने वजन पर नजर रखने वालों को प्रभावित करती है, लेकिन ऐसा नहीं है. डाइट कल्चर सामान्य लोगों पर भी असर डालती है. हाई बॉडी मास इंडेक्स वाले लोगों को अक्सर ट्रोल किया जाता है, चिढ़ाया जाता है और उनका मजाक बनाया जाता है. स्कूल से लेकर कॉलेज तक ज्यादा वजन वाले लोगों को ‘मोटा’ बता देना एक आम बात है. इस तरह के कमेंट से न जाने कितने लोगों का आत्मविश्वास डगमगा जाता होगा.

शरीर का मन मुताबिक न होना या फिर कहे कि मोटापा किसी के भी भावनात्मक और शारीरिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर डालने के लिए काफी है. एंटी-डाइट: रिक्लेम योर टाइम, मनी, वेल-बीइंग, एंड हैप्पीनेस थ्रू इंट्यूएटिव ईटिंग’ की लेखिका क्रिस्टी हैरिसन लिखती हैं ‘डाइट कल्चर एक ऐसा बिलीफ सिस्टम है, जहां पतले होने की पूजा की जाती है और इसे सेहत और अच्छी आदतों के साथ जोड़कर देखा जाता है’ इसकी सबसे बड़ी ‘खासियत’ ये हैं कि यह लोगों को तेजी से वजन घटाने की ओर ले जाता है.

अगर समाज में बेहतर दिखना है तो शरीर के वजन को कम बनाए रखने का सुझाव, इस डाइट कल्चर की ही देन है. यह कल्चर कुछ खाद्य पदार्थों और खाने के स्टाइल को सही नहीं मानता है तो कुछ को बेहतर बताता है. जो लोग इसकी उम्मीदों पर खरे नहीं उतरते या कहें कि डाइट कल्चर द्वारा कायम ‘सेहत’ की भ्रामक छवि से मेल नहीं खाते, उनका सम्मान नहीं किया जाता है.


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डाइट कल्चर फूड की इमेज को खराब कर रहा है

डाइट कल्चर खाने को ईंधन के रूप में देखता है. खाने में मौजूद मैक्रोन्यूट्रिएंट सामग्री के आधार पर ही उन्हें ‘अच्छा’ या ‘बुरा’ का दर्जा दिया जाता है. लेकिन भोजन एनर्जी के स्रोत से कहीं अधिक है. यह प्राचीन काल से उत्सव और संस्कृति का एक अभिन्न अंग रहा है. सिर्फ खाने के जरिए हम महत्वपूर्ण पोषक तत्व -विटामिन, खनिज, जरूरी वसा, एंटी ऑक्सिडेंट, फाइटोन्यूट्रिएंट्स, प्रोटीन और फाइबर पा सकते हैं. पौष्टिकता से भरपूर तरह-तरह का खाना हमारी अच्छी सेहत के लिए जरूरी है और यह बीमारियों को दूर करता है. शरीर को होने वाला नुकसान, पोषण की कमी, डिसऑर्डर ईटिंग- यह सब ‘लो-कैलोरी’ लेने के चक्कर में न्यूट्रिशन फूड से परहेज करने का नतीजा है.

त्यौहारों या छुट्टियों के बाद ‘डिटॉक्सिफाइंग’ और ‘क्लींजिंग’ का बढ़ता चलन, खाने को सिर्फ कैलोरी की तराजू में तोले जाने का सबसे बेहतर उदाहरण है. दावत में खाए गए ‘हाई फैट’, ‘हाई कैलोरी’ वाले खाने को अव्यवस्थित भोजन के रूप में रखा जाता है. दरअसल, यह शरीर और मन पर बुरे प्रभाव के साथ-साथ के साथ एक अवैज्ञानिक और खतरनाक प्रक्रिया है. सेहतमंद बने रहने के लिए सिर्फ कुछ खास तरह के खाने पर ध्यान देने का मतलब है एनोरेक्सिया और बुलिमिया जैसे इटिंग डिसऑर्डर को बुलावा देना. ठीक इसी तरह से सिर्फ कैलोरी बर्न करने या पसंदीदा खाने तक ‘सिमट’ कर रह जाना इस डाइट कल्चर का एक खराब परिणाम है.

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डाइट कल्चर का मनोवैज्ञानिक और सामाजिक प्रभाव

यहां यह समझना बेहद जरूरी है कि मोटापा और बढ़ा हुआ वजन जटिल चिकित्सा स्थितियां हैं जो हमेशा अनियमित कैलोरी या फिजिकल एक्टिविटी न करने का परिणाम नहीं होती हैं. आपका वजन कई कारणों से बढ़ सकता है, मसलन जेनेटिक प्रवृत्ति, हार्मोनल असंतुलन या फिर दवाएं. लेकिन डाइट कल्चर मोटापे के पीछे के इस विज्ञान पर विचार नहीं करता है. यह सिर्फ पतले शरीर को अच्छी सेहत का शिखर मानकर उसे बढ़ावा देता रहता है.

एक व्यक्ति जो इन मानकों को पूरा नहीं करता है, उसे सेहतमंद नहीं माना जाता है. उसके शरीर को लेकर एक निगेटिव इमेज बना दी जाती है. ऐसे में अपने शरीर से या खुद से प्रेम करने का उसका सफर मुश्किल हो जाता है. ऐसे लोगों के लिए वजन घटाना उनकी खुशी, सेहतमंद बनने और लोगों द्वारा अपनाने का एकमात्र रास्ता है. मोटे दिखने वाले ये लोग अपना वजन कम करने वाली डाइट लेते हैं, लेकिन खाने की अच्छी आदतें नहीं अपनाते.

जो लोग थोड़े मोटे हैं या जो अपने शरीर से खुश नहीं हैं, वह अपने शरीर की तुलना ‘जीरो-फिगर’ वाली मशहूर हस्तियों से करते हैं. वो हस्तियां, जो यह बताए बिना वजन घटाने वाली डाइट को बढ़ावा देती हैं कि यह वैज्ञानिक रूप से सही, सुरक्षित या टिकाऊ है या नहीं. दुर्भाग्य से, जो लोग डाइट कल्चर को अपनाते हैं उनमें आत्मविश्वास और सेहतमंद बने रहने के विज्ञान की समझ की कमी होती है. उन्हें यह स्वीकार करना मुश्किल लगता है कि वे कैसे दिख रहे हैं, उनका अपनी सेहत से कोई लेना-देना नहीं होता है. जबकि खराब डाइट, अस्वास्थ्यकारक लाइफस्टाइल और शरीर के आकार की परवाह किए बिना कम शारीरिक गतिविधियां से स्वास्थ्य जोखिम बढ़ जाते हैं.

इंटूटिव ईटिंग (intuitive eating) की आदत डालें

2019 में वजन घटाने और वेट मैनेजमेंट मार्केट की वैल्यू 192.2 बिलियन डॉलर थी. 2027 में इसके 295.3 बिलियन डॉलर तक पहुंच जाने का अनुमान है. दशकों के शोध से पता चलता है कि डाइट लंबे समय तक काम नहीं करती है. जहां से शुरुआत की थी फिर से वहीं पहुंचने की संभावनाएं और निराशा यहां हमेशा मौजूद रहती है. हालांकि, ‘डाइट कल्चर’ पर आधारित वजन घटाने वाली इंडस्ट्री हार मानने को तैयार नहीं है और वैज्ञानिक समर्थन के बिना नई-नई ट्रेंडी डाइट लेकर आती रहती है.

यहां तक कि हम यह जानने के बाद भी कि नई डाइट लंबे समय तक चलने वाली नहीं है, इसका पालन करना बेहद मुश्किल है, इसमें जरूरी पोषक तत्वों की कमी भी है और फिर से शरीर का वजन बढ़ भी सकता है, हम अपने आपको गलत ठहराना बंद नहीं करते हैं. हमें यही लगता रहता है कि हमने सही ढंग से डाइट को नहीं अपनाया है. यह दुष्चक्र जारी रहता है. कहने की जरूरत नहीं है, इसका नतीजा शर्म और अपराध बोध के तौर पर सामने आता है.

अपने शरीर के आधार पर खाने का सहज तरीका और व्यवहार में बदलाव, डाइट कल्चर के दुष्प्रभावों से निपटने में मदद कर सकता है. इस कल्चर से बचने के लिए, हेल्थ इन्फ्लूएंसर्स, अवैज्ञानिक खबरों और वजन पर नजर बनाए रखने वाले ग्रुप से बचें. जरूरी फिजियोलॉजिकल फंक्शन, न्यूट्रिशन और बैलेंस डाइट से कैसे हम सेहतमंद बने रह सकते हैं, इसके जानकार बनें. नई डाइट अपनाने से पहले उसके अच्छे और बुरे दोनों पहलुओं पर रिसर्च करें. डाइट इंडस्ट्री के जाल से बाहर निकलने के लिए सहज भोजन के कुछ प्रमुख सिद्धांतों को अपनाने का प्रयास करें.

ये सिद्धांत आपको डाइट की मानसिकता से बाहर आने, भूख को पहचानने और न्यूट्रिशन खाना खाने की तरफ ले जाने में मदद करते हैं. ये सिद्धांत आपसे अपने फूड के साथ शांति से सेहतमंद संबंध बनाने का आग्रह करते हैं, यह उस व्यक्ति को चुनौती देते हैं जो खाने को ‘अच्छा’ या ‘बुरे’ की कैटेगरी में रखते हैं, पेट भर जाए तो खाने के लिए मना करते हैं, आपके संतुष्टि के स्तर को समझते हैं, तनाव का सामना करते हैं. और सबसे बड़ी बात यह कि अपने शरीर का सम्मान करने की बात करते हैं.

डाइट कल्चर से बचना मुश्किल हो सकता है, खासकर ऐसे समय में जहां सेहत की मार्केटिंग इससे जुड़े विशेषज्ञों द्वारा नहीं की जाती है, बल्कि इसका जिम्मा विज्ञापनों, मशहूर हस्तियों और इन्फ्लूएंसर्स ने ले रखा है. हर शख्स को अपनी सेहत की जिम्मेदारी खुद से लेनी चाहिए और खाने से परहेज़ के प्रतिकूल प्रभावों को समझना चाहिए. वजन कम करना और इसके लिए कुछ चीजों पर बिल्कुल रोक लगा देना अच्छे स्वास्थ्य की गारंटी नहीं है. यह काम तो आपकी जीवनशैली का है. अगर आप या आपका कोई जानने वाला डिसऑर्डर ईटिंग या अपने शरीर को लेकर शर्मिंदगी से जूझ रहा है तो किसी योग्य हेल्थ केयर प्रोवाइडर से सलाह लें.

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

(अनुवाद : संघप्रिया मौर्या)

(संपादन: इन्द्रजीत)

(सुभाश्री रे डॉक्टरल स्कॉलर (केटोजेनिक डाइट), सर्टिफाइड डायबटीज शिक्षक, और एक क्लीनिकल ​​और सार्वजनिक स्वास्थ्य पोषण विशेषज्ञ हैं. वह @DrSubhasree हैंडल से ट्वीट करती हैं. विचार निजी हैं.)


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