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Thursday, 13 June, 2024
होममत-विमतमैं 36 सालों तक IAS अधिकारी रहा, यह कभी निराशाजनक नहीं था; संजीव सान्याल ने सिविल सेवा को गलत तरीके से समझा

मैं 36 सालों तक IAS अधिकारी रहा, यह कभी निराशाजनक नहीं था; संजीव सान्याल ने सिविल सेवा को गलत तरीके से समझा

मैं ऐसे किसी भी व्यक्ति को चुनौती दूंगा जो दावा करता है कि सिविल सेवाएं विकास और इनोवेशन के लिए अवसर प्रदान नहीं करती हैं.

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सबसे पहले, मुझे कहना होगा कि मुझसे अलग सरनेम वाले मेरे एक हमनाम संजीव सान्याल ने हमारे इतिहास को देखने के तरीके में महत्वपूर्ण योगदान दिया है. उनकी किताबें, द लैंड ऑफ द सेवेन रीवर्स और द ओशन ऑफ चर्न, साथ ही हाल-फिलहाल की उनकी किताब, रिवोल्यूशनरीज़ से पता लगता है कि इसे काफी गहरे रिसर्च के साथ लिखा गया है और इसमें काफी जानकारी छिपी हुई है. मैं स्वीकार करता हूं कि मैंने उनकी अन्य पुस्तकें नहीं पढ़ी हैं, लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि इन किताबों को भी उसी रिसर्च और उन्हीं मानदंडों के साथ लिखा गया होगा.

इसलिए यह थोड़ा निराशाजनक है कि प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य संजीव सान्याल को उद्यमी और यूट्यूबर सिद्धार्थ अहलूवालिया के प्रोग्राम नियॉन शो में यूपीएससी को “समय की बर्बादी” कहा. इसके लिए उन्हें ज्यादा प्रभावशाली और वास्तविक तथ्यों के साथ आलोचना करनी चाहिए थी. सैकड़ों-हजारों युवा महिलाएं और पुरुष सरकार का हिस्सा बनने के लिए यूपीएससी परीक्षा पास करने की कोशिश करते हैं और इसकी तैयारी में सालों बिता देते हैं. सान्याल के विचार में, युवा लोगों की ऊर्जा को स्टार्ट-अप और उद्यमिता में लगाया जाना चाहिए. उन्होंने कहा, “यदि आपको सपने देखने हैं, तो निश्चित रूप से आपको एलन मस्क या मुकेश अंबानी बनने का सपना देखना चाहिए. आप संयुक्त सचिव बनने का सपना क्यों देखते हैं?”

सिविल सेवक बनने का सपना देखने वाले उम्मीदवारों के सपनों को चकनाचूर करने की कोशिश करने वाले सान्याल अकेले नहीं हैं, जिनमें से अधिकांश टियर II/III जैसे छोटे शहरों से आते हैं. फिल्म 12वीं फेल के हीरो की तरह, कई लोग ऐसे परिवारों से आते हैं जिनके पास न तो उतने संसाधन ही होते हैं और न ही उनके पास उतनी सामाजिक पूंजी ही होती है – जैसी कि सान्याल और मेरे जैसे भाग्यशाली लोगों को जन्म से ही मिली होती है.

सान्याल की इस आलोचना के पीछे कई कारण हैं – अगर बिल्कुल सटीक कहा जाए तो ऐसे पांच कारण हैं. पहला, बड़ी संख्या में लोग हैं जो यूपीएससी में सफल होने की कोशिश कर रहे हैं. दूसरा उम्मीदवारों द्वारा किए गए प्रयासों या अटेंप्ट की संख्या. तीसरा परीक्षा की ‘सामान्य प्रकृति’, जो राजनयिक योग्यता के लिए चुने जाने वाले और ऑडिट व लेखा सेवा तक के लिए चुने जाने वाले कैंडीडेट्स के लिए एक ही तरह की परीक्षा लेता है. चौथा यह दावा है कि देश की संपत्ति बढ़ाने के लिए ‘तेज़ दिमाग वाले लोगों या मेधावी लोगों’ को ‘उद्यमी’ बनना चाहिए ताकि देश का भला हो सके. पांचवां, और सबसे खराब, यह दावा कि सरकारी क्षेत्र की नौकरियां पर्याप्त चुनौतीपूर्ण नहीं हैं – यहां तक कि संयुक्त सचिव भी केवल ‘फाइलें आगे बढ़ाते हैं’ और गवर्नेंस की दशा और दिशा को बदलने के लिए किसी सृजनात्मक प्रक्रिया में भाग नहीं लेते हैं.

इस कॉलम का उद्देश्य मेरे हमनाम की हर बात का खंडन करना नहीं है. जो अनुभवजन्य है उस पर विवाद नहीं किया जा सकता. हालांकि, लगभग 36 वर्षों तक एक आईएएस अधिकारी के रूप में काम करने और अपने निजी अनुभवों की वजह से मैं इससे जुड़े कुछ आम धारणाओं को चुनौती ज़रूर दूंगा.

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परीक्षा प्रणाली को ठीक करना

मैं पहले दो बिंदुओं पर एक साथ चर्चा करना चाहूंगा. सरकारी पदों की मांग और आपूर्ति के बीच निश्चित रूप से बड़ा अंतर है. भले ही आने वाले वर्षों में मांग स्थिर हो जाए, लेकिन जब तक प्रयासों की संख्या पर प्रतिबंध नहीं लगाया जाता है, तब तक उम्मीदवारों की संख्या में कमी नहीं आ सकती है.

मेरे विचार में, इसका मुकाबला दो-आयामी दृष्टिकोण का उपयोग करके किया जा सकता है – पहला, प्रारंभिक परीक्षा के अंकों की वैधता को दो साल की अवधि के लिए बढ़ाना, और दूसरा सामान्य वर्ग के परीक्षार्थियों के लिए अधिकतम दो अटेंप्ट और विशेष श्रेणी के परीक्षार्थियों के लिए तीन अटेंप्ट्स की व्यवस्था करना. इससे उम्मीदवार मुख्य परीक्षा पर ध्यान केंद्रित कर सकेंगे, जिससे उनकी तैयारी के स्तर में सुधार होगा. इसके अलावा, यदि कोई उम्मीदवार लगातार दो या तीन प्रीलिम्स (जैसा भी मामला हो) में सफल नहीं हो पाता है, तो उसे दूसरे करियर के लिए प्रयास करने की सलाह दी जा सकती है.

परीक्षा की सामान्य प्रकृति के संबंध में, मेरा सुझाव है कि सामान्य अध्ययन के पेपर को और ज्यादा व्यापक बनाया जाना चाहिए, एथिक्स और निबंध के प्रश्न पत्रों को मिलाकर एक प्रश्न पत्र बनाने और आठवीं अनुसूची में 22 भाषाओं में से किसी एक भाषा के पेपर के अंकों को मुख्य परीक्षा में जोड़ा जाना चाहिए. इसके अलावा मेरा सुझाव है कि वैकल्पिक विषय के पेपर को पूरी तरह से हटा दिया जाए, और इसकी जगह पर चार अलग-अलग क्षेत्रों के पेपर्स लाए जाने चाहिए – आईएएस के लिए संवैधानिक कानून और राजनीतिक अर्थव्यवस्था; आईपीएस के लिए कानून और आपराधिक न्याय प्रशासन; विदेश सेवा के लिए विदेश नीति और अंतर्राष्ट्रीय संबंध; और राजस्व व लेखा संबंधी सेवाओं के लिए वित्त, लेखांकन और सार्वजनिक नीति से जुड़े पेपर होने चाहिए. उम्मीदवारों को इनमें से किसी भी दो डोमेन के पेपर को चुनने की अनुमति दी जा सकती है. इससे यह भी सुनिश्चित होगा कि उम्मीदवार अपनी पसंद और विकल्पों का सावधानीपूर्वक उपयोग करना शुरू कर देंगे.


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उद्यमिता ही सब कुछ नहीं है

क्या हर कोई उद्यमी बनने की ख्वाहिश रख सकता है? सच है, पारंपरिक रूप से बिजनेस से जुड़े परिवारों के बीच उद्यमशीलता को लेकर एक माहौल है, विशेष रूप से महाराष्ट्र, गुजरात, पंजाब और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में, और उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड और अन्य राज्यों की तुलना में इन राज्यों से कम अभ्यर्थी सिविल सेवा परीक्षा में भाग लेने के इच्छुक दिखते हैं.

लेकिन अधिकांश कृषि प्रधान समाजों के लिए, किसी के लिए मन में बिजनेस करके सफल होने का विश्वास जमना आसान नहीं होता. जब परिवारों के प्रति जिम्मेदारियां होती हैं – बूढ़े या वृद्ध माता-पिता, भाई-बहन जो अभी भी पढ़ाई कर रहे हैं – तो जोखिम लेने की क्षमता काफी सीमित हो जाती है.

फिर व्यक्तिगत पसंद का भी मामला आता है. यदि मेरा जीवन एक अलग दिशा में चलता, तो मैं मीडिया और/या शिक्षा के क्षेत्र में अपना करियर चुनता- क्योंकि मुझे विचारों और शब्दों से जुड़े काम करना पसंद है. क्या इससे राष्ट्र के प्रति मेरा योगदान कम हो गया होता? हो सकता है अन्य लोग अलग-अलग पेशे जैसे- कानून, आर्किटेक्चर, सॉफ्टवेयर इत्यादि को अपनाना चाहें. फिर ‘संपत्ति सृजन’ या ज्यादा से ज्यादा संपत्ति पैदा करने और शेयर होल्डर्स के वैल्यू को बढ़ाने का इतना जुनून क्यों? और राजनीति के बारे में कैसा रहेगा? क्या इस क्षेत्र की तरफ मेधावी युवाओं और युवतियों को आकर्षित नहीं होना चाहिए?

संयुक्त सचिव बनने का ‘सपना’

अंत में, मैं ऐसे किसी भी व्यक्ति को चुनौती दूंगा जो दावा करता है कि सिविल सेवाएं विकास और इनोवेशन के लिए अवसर प्रदान नहीं करती हैं.

सक्रिय राजनीति के अलावा, ऐसा कोई अन्य पेशा नहीं है जो किसी युवा व्यक्ति को न्यूट्रिशन से लेकर शिक्षा, वित्तीय समावेशन से लेकर अधिकारों के प्रवर्तन तक, गवर्नेंस के सभी स्तरों पर काम करने का इतना अवसर देता हो. जिला प्रशासन, चुनाव करवाने से लेकर पल्स पोलियो अभियान चलाने और फसल बीमा योजनाओं के प्रबंधन तक, यथासंभव हर क्षेत्र में काम करने का व्यापक अवसर देता है. ऐसा तब होता है जब अधिकारी आमतौर पर तीसवें साल के दशक में होता है.

बाद में, संयुक्त सचिव के रूप में केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर भारत सरकार में शामिल होने पर, प्रोफ़ाइल और भी बेहतर हो जाती है. इनकी जिम्मेदारियों में संसदीय सवालों का जवाब देना, कैबिनेट ज्ञापन तैयार करना, द्विपक्षीय और बहुपक्षीय वार्ता में देश का प्रतिनिधित्व करना, अंतर्राज्यीय समन्वय के मुद्दों को संबोधित करना, केंद्रीय कानून को लागू करना और अदालतों में सरकार द्वारा उठाए गए कदमों का बचाव करना शामिल है.

संयुक्त सचिव के रूप में मेरे पांच साल के कार्यकाल में, कभी भी कोई ऐसा क्षण नहीं आया जब सुस्ती महसूस हुई हो: यदि कुछ हुआ, तो वीकेंड पर भी बराबर व्यस्तता रही.

एक संयुक्त सचिव के लिए चुनौती प्रोफेशनल फ्रंट पर नहीं है, बल्कि काम और व्यक्तिगत जीवन में संतुलन बनाए रखने की है. आपके द्वारा किए गए कार्य से असीम संतुष्टि भी मिलती है – मेरे मामले में, इसमें उच्च कीमत वाली फसलों के लिए वैल्यू चेन और एग्रीकल्चर लॉजिस्टिक की स्थापना, दालों की खरीद और EXIM नीति में बदलाव करके प्याज की कीमत को स्थिर करने के (कभी-कभी सफल) प्रयास शामिल थे.

कई संयुक्त सचिव निगमों और शीर्ष सहकारी समितियों के बोर्ड्स में भी बैठते हैं, जहां वे न केवल नीति निर्माण में बल्कि उन निर्णयों के कार्यान्वयन में भी योगदान देते हैं जिनका लाखों लोगों के जीवन पर सीधा और गहरा प्रभाव पड़ता है. इसलिए, चाहे वह व्यवसाय करने में आसानी यानि ईज़ ऑफ डूइंग बिजनेस (ईओडीबी) हो, या जीवन जीने में आसानी यानि ईज़ ऑफ लिविंग (ईओएल) हो, या भारत को 2047 में शीर्ष स्थिति तक पहुंचने में मदद करना हो, सिविल सेवक से बेहतर कोई करियर नहीं है. सिविल सर्विसेज जिंदाबाद! भारत जिंदाबाद!

(संजीव चोपड़ा एक पूर्व आईएएस अधिकारी और वैली ऑफ वर्ड्स के महोत्सव निदेशक हैं. हाल तक, वह लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी के निदेशक थे. उनका एक्स हैंडल @ChopraSanjeev है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.)

(संपादनः शिव पाण्डेय)
(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)\


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