Thursday, 30 June, 2022
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हुसैन शाही की कृष्ण भक्ति और मुगलों का मथुरा से संबंध– मुस्लिम शासकों से जुड़े अनजान तथ्य

अयोध्या में 5 अगस्त को राम मंदिर के भूमि पूजन के बाद दक्षिणपंथी टीकाकारों ने दावा किया कि मंदिर का ‘पुनर्निर्माण अपने पूर्वजों के प्रति भारतीयों की सभ्यातागत जिम्मेदारी है’. इससे अधिक दकियानूसी बात और कुछ नहीं हो सकती.

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जन्माष्टमी के अवसर पर, जब अयोध्या भूमि पूजन के बाद काशी-मथुरा पर बहस तेज़ हो रही है, ये अहम है कि हम महज जीत और हार पर ही केंद्रित ना रहकर सहअस्तित्व पर भी विचार करें. इस बारे में लोगों को अधिक पता नहीं है कि कैसे इस्लामी शासकों ने साहित्यिक और प्रशासनिक दोनों ही दृष्टि से सहअस्तित्व की भावना को संरक्षण दिया था.

महाभारत और कृष्ण चरितों को हुसैन शाही संरक्षण

बंगाल का हुसैन शाही राजवंश (1493-1538) कृष्ण भक्ति से जुड़े साहित्य का महान संरक्षक था और उन्होंने बांग्ला भाषा का संभवत: पहला महाभारत भी तैयार कराया था जिसके बारे में ज़्यादा लोग नहीं जानते. वास्तव में बांग्ला महाभारत अलाउद्दीन हुसैन शाह के मुख्य सेनापति परगल खान द्वारा चटगांव जीते जाने के तुरंत बाद रची गई थी. विजेता परगल खान की जब महाभारत की कथा में रुचि पैदा हुई तो उसने कवींद्र परमेश्वर से महाकाव्य का सटीक बांग्ला पाठ रचने का आग्रह किया. उसकी इस भूमिका के कारण परमेश्वर के बांग्ला महाभारत का आरंभ बंगाल के शांतिपूर्ण और मंगलमयी हुसैन शाही शासन की लंबी प्रशस्ति से होता है. सुल्तान को ना सिर्फ ‘एक बहादुर योद्धा’ और ‘एक प्रसिद्ध शासक’ बल्कि गौड़ का ईश्वर तक कहा गया है और उसकी तुलना कृष्ण से की गई है. (सेन 1911, पृ. 202)

अधिक संभावना यही है कि महाभारत का बांग्ला पाठ छुट्टी खान (छोटो यानि जूनियर) के शासन में पूरा हुआ, जो अपने पिता की तरह एक महान संरक्षक था. उसने इस कार्य में श्रीकाम नंदी की सेवाएं ली थी. हालांकि कई विद्वानों का कहना है कि परगल खान और छुट्टी खान की महाभारतों में वास्तव में अलग-अलग आख्यान थे. नंदी ने हुसैन शाही शासन की समृद्धि की तुलना रामराज्य से की थी और साम-दाम-दंड-भेद की हिंदू नीति के अनुपालन के लिए उनकी प्रशंसा की थी.

नसरतशाहतात अति महाराजा
रामबत नित्य पाले शोब प्रजा
नरपति हुसैनशाह है क्षितिपती
सामदामदंड भेदे पाले बसुमति (सेन 1911, पृ. 204)

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महाभारत का संरक्षक

शाही दरबारों में महाकाव्य के सस्वर पाठ को बढ़ावा दिया जाता था, जिसे दरबारी ध्यान से सुनते थे. वास्तव में नंदी ने इस बात का उल्लेख भी किया है कि छुट्टी खान को महाकाव्य के बांग्ला संस्करण की रचना की प्रेरणा अपने दरबार में संक्षिप्त जैमिनी महाभारत– जैमिनीभारत– का संस्कृत पाठ सुनकर मिली थी. इतिहासकार सुकुमार सेन के अनुसार पाल राजवंश के विघटन के बाद दरबारों में काव्य पाठ की प्रथा समाप्त हो गई थी जिसे हुसैन शाही काल में दोबारा आरंभ किया गया.

इस काल की एक और खासियत थी कृष्ण चरितों की रचना. हुसैन शाह के पूर्ववर्ती रुक्नुद्दीन बरबक शाह द्वारा गुणराज खान की उपाधि से नवाजे गए मालाधर बसु ने अत्यंत लोकप्रिय श्रीकृष्ण विजय की रचना की थी, जो श्रीमदभागवत के आखिरी सर्गों का बांग्ला पाठ है. पूरे पाठ में उसने अपना उल्लेख गुणराज खान के रूप में किया है. उदाहरण के लिए आरंभिक दोहों में से एक का भावार्थ इस प्रकार है:

हरिपद का मनन करते हुए, गुणराज खान ने की
श्रीकृष्णविजय की रचना, आओ सब मिलकर सुनें

यशोराज खान के नाम से ज्ञात दामोदर सेन ने भी हुसैन शाही शासन के संरक्षण में इसी तरह के कथाकाव्य श्रीकृष्णमंगला की रचना की थी (सुकुमार सेन 1960, पृ. 70). दुर्भाग्य से यह रचना अब उपलब्ध नहीं है लेकिन 17वीं शताब्दी के उत्तरार्ध की कई रचनाओं में उल्लेख के कारण उससे संबंधित अहम जानकारियां उपलब्ध हैं.


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वृंदावन से मुगल संबंध

उत्तर भारत में 1500-1800 ईस्वी का काल एक बड़े राजनीतिक बदलाव का था जब मुगल साम्राज्य का विस्तार हो रहा था और उसी के साथ वैष्णव भक्तिवाद की लोकप्रियता भी बढ़ गई थी. कई विद्वानों ने विस्तार से चर्चा की है कि मध्यकालीन उत्तर भारत में वैष्णव भक्ति का प्रसार शिव-शक्ति की उपासना की कीमत पर हुआ था (वॉडविल 1976, पॉवेल्स 2009, 2010, ऑरसिनि और शेख 2014). हालांकि हमारी रुचि मुख्यतया इस बात में है कि मध्यकाल में मुगल संरक्षण ने कैसे वैष्णव केंद्रों को लाभांवित किया.

अकबर वैष्णव परंपरा का संरक्षक था और अपने दानों-अनुदानों के लिए प्रसिद्ध था– सबसे पहला उल्लेख 1565 में गोविंददेव मंदिर के पुजारी को दिए अनुदान का मिलता है (बर्चेट 2019, पृ. 118). अकबर अपने शासन के अंतिम वर्षों तक मंदिरों को अनुदान में भूमि देता रहा था. उसके 4 और 19 शाहरीवार 43 इलाही वर्ष (27 अगस्त और 11 सितंबर 1598) के फरमानों से स्पष्ट है कि कैसे उसने मथुरा क्षेत्र में मंदिरों और पुजारियों को दिए जाने वाले अनुदानों को बढ़ाया और समेकित किया. फरमानों में मथुरा, वृंदावन और आसपास के 35 मंदिरों को कुल 1,000 बीघा ज़मीन के अनुदान का उल्लेख है (मुखर्जी और हबीब 1988, पृ. 287-300).

यहां पूजा स्थलों में हिंदू-मुस्लिम समन्वय का प्रदर्शन भी उल्लेखनीय है जैसा कि पिका घोष ने वर्णन किया है, ‘शुरुआती पांच मंदिरों (मदनमोहन, गोपीनाथ, राधावल्लभ, जुगलकिशोर और गोविंददेव)… में लाल बलुआ पत्थरों का खुलकर इस्तेमाल हुआ है जिसकी ख्याति निश्चय ही उसके ठीक पहले अकबर की राजधानी फतेहपुर सीकरी में उपयोग किए जाने के कारण थी’ (घोष 2002, पृ. 205). अन्य प्रमाणों से पता चलता है कि ‘मथुरा-वृंदावन में मौजूद विभिन्न संप्रदायों से संबद्ध वैष्णव– जिनमें चैतन्य संप्रदाय के बंगाली भी शामिल थे– अपनी शिकायतों के निपटरे और साथ ही भूमि और अन्य वस्तुओं के अनुदान के लिए नियमित रूप से शाही दरबार में अर्जी देते थे और पैरवी करते थे’ (चटर्जी 2009, पृ. 156).

हालांकि वैष्णववाद का समर्थन करने वाला अकबर अपने परिवार का अकेला सदस्य नहीं था. उसकी मां हमीदा बानो ने खासकर वल्लभ संप्रदाय को मदद दी थी. उसने 1581 में दो टूक शब्दों में आदेश दिया था कि ‘विठलेश्वर की गायें जहां चाहे चर सकती हैं तथा खलीसा और जागीर के किसी भी व्यक्ति को उन्हें तंग नहीं करना चाहिए या उन्हें रोकना नहीं चाहिए. इन गायों को चरने दिया जाना चाहिए और उपरोक्त व्यक्तियों को इसको लेकर पूरी तरह सहज होना चाहिए’ (इडिक्ट्स फ्रॉम मुगल हरम 2009, पृ. 4).

जहांगीर ने ना सिर्फ अकबर के अनुदानों को जारी रखा बल्कि उसमें खासा इजाफा भी किया. उसने ‘मदनमोहन मंदिर के पुजारी के रूप में गोपालदास के उत्तराधिकारी श्रीचंद के हित में’ टोडरमल के 1584 ईस्वी के 100 बीघा के अनुदान को स्थाई शाही अनुदान में तब्दील कर दिया. ‘यानि जागीरदार अब इसका अपने लिए उपयोग नहीं कर सकते थे’ (मुखर्जी, हबीब, पृ. 288). उसने दो मंदिरों– एक वृंदावन और एक मथुरा में– के निर्माण के लिए भी धन दिया और प्रभावशाली गुरुओं के लिए बहुत से अनुदान जारी किए- 1612 में कामदेव आचार्य और उनके पुत्रों को 24 बीघा, नारायण दास और उसके पुत्रों को 12 बीघा, वृंदावन दास और नंदलाल को 50 बीघा, 1613 में स्वामीदास को 20 बीघा और 1615 में श्यामकृष्ण को 15 बीघा ज़मीन अनुदान में दी गई (मुखर्जी, हबीब, पृ. 288). शाहजहां अपने घटते खजाने के कारण मंदिरों को अनुदान देने के लिहाज से अपने पूर्ववर्तियों जितना उदार नहीं था, पर उसने भी पहले के अनुदानों को जारी रखा (मुखर्जी, हबीब, पृ. 288).


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अतीत का अवलोकन

वैष्णव रचनाओं और स्थलों को इस्लामी संरक्षण की क्या मजबूरी थी? क्या ऐसा व्यक्तिगत रुझानों के कारण था? क्या ऐसा वैष्णव संप्रदायों के प्रमुखों के प्रभाव के कारण था (चटर्जी 2009)? क्या इसके पीछे वैवाहिक संबंधों की भूमिका थी (बर्चेट 2019)? या इसके पीछे प्रशासनिक कारण थे (राणा 2006)? इतने कारण हैं कि यहां उनका वर्णन संभव नहीं है. फिर भी उपलब्ध सामग्रियों का संक्षिप्त उल्लेख मात्र भी भारतीय उपमहाद्वीप में मध्यकालीन धार्मिक इतिहास की जटिलता और अंतरसंबद्धता को उजागर करने के लिए पर्याप्त है.

अयोध्या में 5 अगस्त को राम मंदिर के भूमि पूजन के बाद अनेक दक्षिणपंथी बुद्धिजीवियों ने दावा किया था कि मंदिर का ‘पुनर्निर्माण अपने पूर्वजों के प्रति भारतीयों की सभ्यातागत जिम्मेदारी है’. इससे अधिक दकियानूसी बात और कुछ नहीं हो सकती. जैसा कि स्पष्ट है, हमारी जिम्मेदारी पुनर्निर्माण की नहीं बल्कि हमारे संयुक्त प्रयासों और भारत के बहुसांस्कृतिक एवं विविध धार्मिक इतिहास के संरक्षण की है जिन्हें हम लोकलुभावन और शब्दाडंबरपूर्ण अतिशयोक्तियों के चक्कर में भूल जाते हैं. इस संबंध में प्रेरणा के लिए हमें अपने समन्वयपूर्ण अतीत, जिसे निरंतर बदनाम किया जा रहा है, में भी झांकना चाहिए.

(लेखकद्वय मैकगिल यूनिवर्सिटी और यूनिवर्सिटी ऑफ विस्कॉन्सिन-मैडिसन में इतिहास एवं कला-इतिहास के छात्र हैं. व्यक्त विचार निजी हैं)

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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