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Sunday, 13 September, 2026
होममत-विमतमक्का समझौता कितना मजबूत? सऊदी पर हूती हमलों के बीच पाकिस्तान की चुप्पी ने उठाए सवाल

मक्का समझौता कितना मजबूत? सऊदी पर हूती हमलों के बीच पाकिस्तान की चुप्पी ने उठाए सवाल

सऊदी अरब पर हूती हमलों ने मक्का समझौते की एक बुनियादी कमज़ोरी को उजागर कर दिया है: इसके सदस्य भले ही एक ही आस्था रखते हों, लेकिन ज़रूरी नहीं कि वे खतरों को लेकर एक जैसी सोच रखते हों.

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ईरान समर्थित हूती 8 सितंबर से सऊदी अरब के दक्षिणी शहरों पर लगातार हमले कर रहे हैं. इन हमलों की क्षेत्रीय स्तर पर निंदा की जा रही है. पड़ोसी देश बहरीन, कुवैत, कतर, संयुक्त अरब अमीरात, ओमान, मिस्र, जॉर्डन, यमन, लेबनान, सूडान और सीरिया, तुर्किये, भारत और पाकिस्तान के साथ-साथ यूरोप के प्रमुख साझेदारों. फ्रांस, स्पेन, जर्मनी और यूनाइटेड किंगडम. ने इन हमलों पर चिंता जताई है.

दिलचस्प बात यह है कि अमेरिका ने अभी तक इस बारे में कोई बड़ी प्रतिक्रिया नहीं दी है कि वह सीधे तौर पर इसमें शामिल होगा या नहीं. शायद वॉशिंगटन डीसी, ईरान के साथ चल रहे संघर्ष के बीच एक और मोर्चा खोलने को तैयार नहीं है.

इस बीच, सऊदी अरब ने लाल सागर में हूती के ठिकानों पर हवाई हमले करके जवाब दिया है. इससे भी ज्यादा हैरानी की बात पाकिस्तान जैसे देशों की प्रतिक्रिया है. पहला, पाकिस्तान सऊदी अरब का क्षेत्रीय सहयोगी है और सऊदी की मदद और वहां से मिलने वाले पैसे पर निर्भर है. दूसरा और ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि वह 7 अगस्त 2026 को सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान के बीच हुए बहुचर्चित मक्का समझौते का हस्ताक्षरकर्ता है. इस समझौते को सबसे महत्वपूर्ण ‘सुरक्षा’ गठबंधन माना जा रहा है, हालांकि इसकी जानकारी अभी सार्वजनिक नहीं की गई है. लेकिन मध्य पूर्व में संकट की स्थिति और तीनों देशों की अपनी-अपनी क्षमताओं. सऊदी की आर्थिक ताकत, तुर्किये की सैन्य ताकत और पाकिस्तान की परमाणु क्षमता. से सबसे मजबूत “किसी भी आक्रामकता के खिलाफ रोक” पैदा होने की उम्मीद थी.

लेकिन अब जब सऊदी अरब पर हमला हो रहा है और संकट सामने है, तो क्या मक्का समझौता अपनी पहली बड़ी परीक्षा में पास हुआ है, या यह सिर्फ बातें थीं?

पाकिस्तान कहता है कि यह रक्षा गठबंधन नहीं है, लेकिन क्यों?

हूती हमलों के तुरंत बाद सवाल उठने लगे कि क्या मक्का समझौता अब लागू होगा और क्या पाकिस्तान और तुर्किये एक साथ मिलकर इसमें शामिल होंगे.

48 घंटे के अंदर इस्लामाबाद ने कथित तौर पर जवाब दिया, “अभी ऐसी कोई बात चर्चा में नहीं है. जब समय आएगा, हम समझौते के तहत कार्रवाई करेंगे.”

इससे मक्का समझौते को लेकर आशावादी लोगों को निराशा हुई होगी, लेकिन दिल्ली के लिए यह हैरान करने वाली बात नहीं थी. साथ ही, यह इस्लामाबाद या रावलपिंडी की सबसे सीधी या अंतिम प्रतिक्रिया नहीं हो सकती है. फिर भी कई मायनों में यह ज्यादा साफ है. कम से कम इससे मीडिया में चल रही चर्चा तो रुक जाती है.

लेकिन सवाल उठता है कि क्या सऊदी अरब पाकिस्तान को शामिल करके ऐसा समझौता, या कहें कि तथाकथित सैन्य समझौता. मक्का समझौता. करता, जबकि उसे पता है कि पाकिस्तान की भारत के साथ सक्रिय सीमा है और दिल्ली रियाद के प्रमुख व्यापारिक साझेदारों में शामिल है. 2024-25 में दोनों देशों के बीच कुल द्विपक्षीय व्यापार 41 अरब डॉलर से ज्यादा हो चुका है? नहीं. क्योंकि दिल्ली एक मजबूत आर्थिक साझेदारी देती है. इसमें निवेश और तेल का व्यापार सबसे महत्वपूर्ण हैं. और रियाद किसी ऐसे समझौते में शामिल होने से पहले अपने रणनीतिक हितों का हिसाब जरूर लगाएगा, जो भारत के साथ उसके संबंधों के लिए नुकसानदायक हो सकता है.

इसके अलावा, अगर इस समझौते को इस्लामी एकता के नजरिए से देखा जाना था, तो एक साझा दुश्मन. ईरान. के खिलाफ लड़ना भी इस्लामी सोच के हिसाब से सही बैठता था. तथाकथित “मक्का समझौते” के भीतर मौजूद ये तीखे विरोधाभास इसे कम परखा हुआ और ज्यादा शब्दों वाला समझौता बनाते हैं. रियाद को शायद इसकी सीमाओं का पता था.

इस बीच, अगस्त में सुरक्षा के मुद्दे पर अगर दिल्ली में भारतीय मीडिया में किसी एक क्षेत्रीय खबर ने सबसे ज्यादा जगह बनाई, तो वह मक्का समझौता था. न्यूज़रूम में मुख्य सवाल थे. क्या यह भारत के खिलाफ गठबंधन है, जिसमें पाकिस्तान और तुर्किये प्रमुख सदस्य हैं? क्या यह सैन्य गठबंधन है? क्या इसमें नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन (NATO) जैसी सामूहिक सुरक्षा की व्यवस्था है? कुछ लोग तो यहां तक कहने लगे कि मक्का समझौते में NATO के आर्टिकल 5 जैसी धाराएं हैं, जिनमें “सामूहिक रक्षा” की बात है. NATO के पूरे इतिहास में इस प्रावधान का इस्तेमाल सिर्फ एक बार हुआ है. वह भी अमेरिका पर 11 सितंबर के हमलों के बाद.

ऐसे सवालों के जवाब देने की शुरुआत पाकिस्तान ने समझौते पर जारी एक प्रेस रिलीज के जरिए की. इसका शीर्षक था, “संयुक्त रक्षा के लिए मक्का अल-मुकर्रमा शिखर सम्मेलन”. इसमें कहा गया, “इस समझौते का उद्देश्य किसी भी आक्रामक कार्रवाई के खिलाफ सामूहिक रोक को मजबूत करना है और इसमें कहा गया है कि तीनों में से किसी एक देश पर कोई भी सशस्त्र हमला, तीनों देशों पर हमला माना जाएगा.”

इस बयान के बाद यह भी जानकारी दी गई कि समझौता “तीनों देशों के बीच रक्षा सहयोग के सभी पहलुओं को बढ़ाने की व्यवस्था भी करता है.”

इसमें कोई शक नहीं कि दिल्ली की अपनी चिंताएं थीं. भारत के विदेश मंत्रालय (MEA) के प्रवक्ता ने 11 अगस्त को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था, “हम राष्ट्रीय सुरक्षा के नजरिए से और क्षेत्रीय शांति और स्थिरता को ध्यान में रखते हुए इसके प्रभावों की जांच कर रहे हैं. भारत अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने और इस दिशा में जरूरी कदम उठाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है.” लेकिन भारत ने लगता है बात को वहीं छोड़ दिया. या शायद नहीं.

लेकिन कम से कम दिल्ली एक बात साफ तौर पर जानती है. अगर पाकिस्तान को उसकी परमाणु क्षमता की वजह से सबसे मजबूत स्तंभ माना जा रहा है, तो वह सबसे अविश्वसनीय और अस्थिर भी है. इसकी वजह वे चुनौतियां हैं, जिनका सामना इस्लामाबाद ने अपने देश के अंदर किया है और अमेरिका तथा चीन के साथ अपने मामलों को लेकर वह जो भ्रम पैदा करता है.

क्या बांग्लादेश अभी भी दिलचस्पी रखता है?

बांग्लादेश उन शुरुआती कुछ देशों में शामिल था, जिन्होंने सऊदी अरब पर हमला करने के लिए हूतियों की निंदा की थी. ढाका ने 8 सितंबर को यानी हमलों के पहले दिन एक बयान में कहा, “बांग्लादेश सरकार और इस भाईचारे वाले देश के लोगों के साथ पूरी एकजुटता जताता है. बांग्लादेश सऊदी अरब की संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता और सुरक्षा के लिए अपने अटूट समर्थन को फिर से दोहराता है.”

क्या ढाका ने यह बयान अपनी बताई जा रही “मक्का समझौते” की महत्वाकांक्षाओं को ध्यान में रखकर दिया था? खैर, बांग्लादेश ने मक्का समझौते पर कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है, इसलिए फिलहाल इसे यहीं छोड़ते हैं. शुरुआत में साफ है कि बांग्लादेश सऊदी अरब को एक महत्वपूर्ण आर्थिक साझेदार मानता है. इसमें बांग्लादेशी प्रवासियों से आने वाला पैसा सबसे मजबूत कड़ी है. प्रधानमंत्री तारिक रहमान को सऊदी क्राउन प्रिंस और प्रधानमंत्री मोहम्मद बिन सलमान ने रियाद आने का न्योता दिया है, लेकिन इस यात्रा पर अभी चर्चा चल रही है और क्षेत्र में चल रहे संघर्ष को देखते हुए शायद यह सही समय नहीं है.

अब मक्का समझौते पर वापस आते हैं. ढाका को ऐसे समूह में शामिल होने के लिए मजबूत कारणों की जरूरत होगी, जिसमें पाकिस्तान जैसा ऐतिहासिक प्रतिद्वंद्वी देश शामिल है. वही देश, जिससे बांग्लादेश ने 1971 में खुद को आजाद कराया था.

लेकिन क्या दिल्ली के साथ ढाका के बिगड़ते संबंधों को बांग्लादेश के मक्का समझौते में शामिल होने की वजह माना जा सकता है? इस्लामाबाद में कई लोग इससे सहमत होंगे, क्योंकि पाकिस्तान खुद को ढाका के लिए एक भरोसेमंद इस्लामी दुनिया के साझेदार के रूप में पेश करता है. इतना जरूर कहा जा सकता है कि अगर ढाका का राजनीतिक नेतृत्व इस्लामाबाद के साथ बेहद खास और सबसे गहरा सैन्य गठबंधन भी बना ले, तब भी बांग्लादेश के लोग पाकिस्तान को 1971 के मुक्ति संग्राम और उस समय के पूर्वी पाकिस्तान के लोगों पर पाकिस्तानी सेना द्वारा की गई क्रूरता के नजरिए से ही देखेंगे.

ढाका और इस्लामाबाद के बीच भरोसे की कमी ऐतिहासिक है, साबित हो चुकी है और सात दशकों से बनी हुई है. जो भी बात इसके उलट संकेत देती है, उसके पीछे साझा हित होना जरूरी है. और अगर भारत उनमें से एक होता, तो ढाका के सामने कई बातों पर विचार करने के कारण होते. इनमें सबसे प्रमुख हैं साझा संस्कृति, समाज और आर्थिक संबंध.

निष्कर्ष के तौर पर, मक्का समझौता बराबर ताकत वाले देशों का गठबंधन नहीं है. इसमें खतरे को लेकर कोई साझा आधार नहीं है, सदस्य देश जातीय रूप से बहुत अलग हैं, सदस्यों के बीच आर्थिक समानता नहीं है और हर सदस्य इस्लाम के अलग-अलग रूपों को मानता है, जो इस्लामी एकता की बात के उलट है. इसलिए सऊदी अरब पर हूती हमलों को तीनों समझौता सदस्य देशों के खिलाफ खतरा मानने पर पाकिस्तान की चुप्पी को ऐसे गठबंधनों की बड़ी वास्तविकता के रूप में देखा जाना चाहिए.

इसके उलट, बांग्लादेश के इसमें शामिल होने को लेकर चल रही चर्चा ठोस वजहों पर आधारित होनी चाहिए. लेकिन अगर ढाका मक्का समझौते में शामिल होता है, तो इसकी मुख्य वजह मान्यता हासिल करना और देश के अंदर राजनीतिक संदेश देना होगी. ऐसा इसलिए क्योंकि तारिक रहमान की सरकार को संसद में जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाले 11 दलों के विपक्ष की ओर से जुलाई चार्टर में सुधारों को लेकर कड़े विरोध का सामना करना पड़ रहा है.

ऋषि गुप्ता ग्लोबल स्ट्रैटेजिक अफेयर्स के एक्सपर्ट हैं. इस लेख में व्यक्त विचार पूरी तरह लेखक के अपने हैं और किसी भी रूप में उनके वर्तमान या पूर्व संस्थानों के विचारों का प्रतिनिधित्व नहीं करते.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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