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Sunday, 4 January, 2026
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प्रधानमंत्री मोदी अपने 12वें साल में अपने ब्रांड को कैसे फिर से स्थापित करना चाहते हैं

पवित्र लेकिन बोझिल ‘विश्वगुरु’ की छवि ट्रंप की जल्दबाजी से प्रभावित हुई है. पड़ोसी देशों में हुए घटनाक्रम भी कोई राहत नहीं देते.

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चलिए एक छोटा सा क्विज़ से शुरू करते हैं. अनुमान लगाइए, ये बातें किसने कही:

1. “मैं भारत के लोगों का प्रथम सेवक हूं.”

2. “अगर कोई परमाणु बम के खतरे से भारत को झुकाना चाहे, तो हमारा देश कभी झुकेगा नहीं.”

3. “हमारा प्रयास है कि चाहे वह सीमेंट फैक्ट्री हो, कपड़ा बनाने की मशीन हो, स्टील प्लांट हो या उर्वरक मशीन, हम उन्हें अपने देश में बनाएं ताकि लंबे समय तक दूसरों पर निर्भर न रहें.”

4. “आप जानते हैं हमारे देश की आर्थिक स्थिति कैसी है. हम इसे सुधार सकते हैं अगर हम स्वदेशी का इस्तेमाल करें…स्वदेशी का मतलब यह नहीं कि हम बाहर से सामान नहीं लेना चाहते; इसका मतलब यह भी है कि हम बचत करें.”

कुछ लोग मुस्कुरा रहे होंगे—बहुत आसान है, है ना? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह सब बातें कही होंगी, नहीं? मेरा जवाब होगा: हां और नहीं.

पहली बात 1947 में जवाहरलाल नेहरू ने कही थी. दूसरी और तीसरी बातें 1964 और 1965 में लाल बहादुर शास्त्री ने कही और आखिरी वाली 1966 में इंदिरा गांधी ने कही. उनके “हम बचत करें” वाले आह्वान की झलक पीएम मोदी के रविवार को राष्ट्र संबोधन में “बचत उत्सव” संदर्भ में भी दिखी. ये सभी बातें उन्होंने स्वतंत्रता दिवस पर लाल किला से प्रधानमंत्री के रूप में कही थीं.

हालांकि, पीएम मोदी ने भी ये सारी बातें—अच्छी तरह से मिलती-जुलती लाल किला से कही हैं. लाल किला से दिए गए भाषणों में जो बातें पिछले प्रधानमंत्रियों ने कही थीं, उनमें से कई बातें मोदी के भाषणों में भी हैं. जैसे नेहरू ने खुद को “प्रथम सेवक” कहा, मोदी ने खुद को “प्रधान सेवक” कहा. 1947 में नेहरू ने कहा कि देश के सही संचालन के लिए “सभी तरह के झगड़े तुरंत बंद होने चाहिए.” 2014 में मोदी ने लोगों से कहा कि सांप्रदायिक, जातिगत और वर्गीय संघर्षों पर 10 साल की रोक रखें ताकि अच्छे परिणाम दिखें. 1979 में स्वतंत्रता दिवस पर चौधरी चरण सिंह ने एम.के. गांधी का हवाला देकर कहा कि अधिकारों के साथ कर्तव्य आते हैं. मोदी ने अपने कई पूर्ववर्तियों के विचारों को दोहराया है.

इवेंट मैनेजमेंट या ब्रांडिंग?

तो, मैं यहां किस तरफ इशारा कर रहा हूं? नेहरू से लेकर मोदी तक विचारों और सिद्धांतों की निरंतरता को देखना अच्छी बात है, लेकिन यह निराशाजनक है कि पीएम मोदी को अब भी वही दोहराना पड़ता है जो गांधी ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान कहा, जो शास्त्री ने 60 साल पहले कहा और जो इंदिरा ने 1966 में कहा: मेक इन इंडिया, स्वदेशी और आत्मनिर्भरता. प्रधानमंत्री ने 21 सितंबर के अपने संबोधन में इन विचारों को 11 साल में कईवीं बार दोहराया. फिर भी, मेक इन इंडिया पहल 2013-14 के बाद से उत्पादन क्षेत्र के जीडीपी में हिस्सेदारी बढ़ाने में असफल रही है.

ये बातें नेताओं के भाषणों में तब और जोर से सुनाई देती हैं जब कोई बाहरी संकट होता है. जून 2020 में गलवान झड़प के बाद भारत-चीन रिश्तों में तनाव के कुछ हफ्तों बाद, पीएम मोदी ने लाल किले से आत्मनिर्भर भारत पर जोरदार भाषण दिया, आयात कम करने और निर्यात बढ़ाने का आह्वान किया. उन्होंने भारत को ग्लोबल प्रोडक्ट हब बनाने का अपना दृष्टिकोण साझा किया.

लेकिन तब से चीनी आयात केवल बढ़े हैं. 2025 में उनके लाल किले के भाषण में भी ऐसे ही आह्वान हुए, इस बार अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ विवाद के संदर्भ में.

इस बैकग्राउंड में पीएम मोदी के आलोचक उनके रविवार के संबोधन को केवल इवेंट मैनेजमेंट का उदाहरण मान सकते हैं. यह भाषण ट्रंप के एच-1बी वीज़ा वाले फैसले के बाद आया, जिसने महत्वाकांक्षी मध्यवर्ग—जो मोदी का आधार है को हैरान किया. पीएम का भारत की समृद्धि के लिए स्वदेशी सामान खरीदने का आह्वान कई अर्थशास्त्रियों को पसंद नहीं आएगा, जो कहेंगे कि घरेलू निर्माताओं की रक्षा के लिए प्रतिस्पर्धा को खत्म करना दक्षता और नवाचार को मारने जैसा है और घरेलू उपभोक्ताओं के विकल्पों को सीमित करता है. विचार यह होना चाहिए कि उन्हें वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाना और निर्यात बढ़ाना.

जैसा कि जाने-माने कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी और तनय सुनवाल ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखा, चीन सबसे ज्यादा कृषि सामान आयात करने वाला देश है. अमेरिका, जो सबसे बड़ा कृषि सामान निर्यातक है, वह भी बड़ी मात्रा में कृषि सामान आयात करता है.

उन्होंने लिखा, “भारत को अपनी ताकत पहचानकर उसी चीज़ का उत्पादन करना चाहिए जिसमें हम सबसे अच्छे हैं और जो चीज़ें दूसरे देश ज़्यादा कुशलता से बना सकते हैं, उन्हें हमें आयात करना चाहिए, जो नेता बार-बार कहते हैं कि ‘आयात गलत है’, वे दरअसल वैश्विक व्यापार के मूल सिद्धांत को नज़रअंदाज़ करते हैं.” यही बात गैर-कृषि उत्पादों पर भी लागू होती है.

अर्थशास्त्र मेरा विषय नहीं है, इसलिए मैं राजनीति पर ही ध्यान दूंगा. जो बात ज्यादा सामने नहीं आई है, वह यह है कि पीएम मोदी साफ तौर पर तीसरी बार सत्ता में आने के बाद खुद को बड़े सुधारक के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहे हैं. वे खुद को ऐसे नेता के रूप में दिखा रहे हैं जो तूफान के बीच भी जहाज़ को सुरक्षित दिशा में ले जा सकते हैं. जीएसटी सुधार और अमित शाह व राजनाथ सिंह के तहत बने दो अनौपचारिक मंत्रियों के समूह भले ही अर्थव्यवस्था से जुड़े हों, लेकिन इनका असर राजनीति पर भी उतना ही है.

विश्वगुरु का सहारा भी गया

मोदी की जिस ब्रांडिंग ने 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले उन्हें पहचान दिलाई थी, उसमें अब दरारें दिखने लगी हैं. उस वक्त वे ‘हिंदू हृदय सम्राट’ कहे जाते थे. शायद अब भी हैं, लेकिन यह ताकत अब उतनी असरदार नहीं रही कि बड़े पैमाने पर वोट दिला सके. किसने सोचा था कि अयोध्या में राम मंदिर बनवाने के बावजूद भाजपा बहुमत से पीछे रह जाएगी?

ब्रांड मोदी की एक और बड़ी पहचान थी मज़बूत और निर्णायक नेतृत्व, खासकर राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर. यह छवि अब भी है, लेकिन लगता है मतदाताओं की उम्मीदें बढ़ गई हैं. देखिए, ऑपरेशन सिंदूर पर लोगों की प्रतिक्रिया बहुत फीकी रही. पीएम मोदी अब भी बैठकों में इसका ज़िक्र करते हैं, लेकिन जनता का उत्साह खास नहीं दिख रहा. योजनाओं, मुफ्त सुविधाओं और बड़े-बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को लोग सराहते तो हैं, लेकिन 11 साल बाद इन्हें अब सामान्य ही मान लिया गया है.

‘विश्वगुरु’ की छवि को अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के बेतुके रवैये ने चोट पहुंचाई है. मान लीजिए आगे चलकर वह नरम भी पड़ें, लेकिन जो नुकसान होना था, वह कर ही चुके हैं और दक्षिणपंथी हलके के लिए जिसने 2017 के डोकलाम विवाद और फिर गलवान झड़पों के बाद चीनी सामान के बहिष्कार की आवाज़ उठाई थी, चीन में आयोजित एससीओ शिखर सम्मेलन में पीएम मोदी को शी जिनपिंग संग हंसते-बतियाते देखना कतई सुखद नहीं रहा होगा. पड़ोसी देशों की हाल की घटनाओं ने भी कोई राहत नहीं दी. यानी ‘विश्वगुरु’ का सहारा भी जाता रहा.

मोदी के समर्थक 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद हुए विधानसभा चुनावों की ओर इशारा कर सकते हैं. हरियाणा और महाराष्ट्र में भाजपा ने अच्छा प्रदर्शन किया, लेकिन वहां पीएम मोदी के नाम पर वोट नहीं मांगे गए थे. झारखंड में मांगे गए, पर पार्टी हार गई. दिल्ली में ज़रूर ‘मोदी की गारंटी’ का नारा काम कर गया, लेकिन मोदी को इससे संतुष्ट होने वाले नहीं है. जनता की नब्ज़ उनसे बेहतर कोई नहीं पहचानता. वे जानते हैं कि उन्हें अपनी इमेज में नई चीज़ें जोड़नी पड़ेंगी. उन्होंने सुधारों पर काफ बल देना शुरू किया. उम्मीद कीजिए कि अमित शाह और राजनाथ सिंह, जिनको सुधार पर अनौपचारिक मंत्रियों के समूहों का प्रमुख बनाया गया है बड़े सुधारों का प्रस्ताव देंगे और इस बार मोदी भी उसे लागू करने से पीछे नहीं हटेंगे. कम से कम आशा तो कर ही सकते हैं. बहरहाल, बिहार के नतीजे बेहद अहम होंगे.

(डीके सिंह दिप्रिंट के पॉलिटिकल एडिटर हैं. उनका एक्स हैंडल @dksingh73 है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.)

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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