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Saturday, 14 February, 2026
होममत-विमतहिमंता सरमा की बंदूक वाली तस्वीर: क्या हम अब हिंसा को सामान्य मानने लगे हैं?

हिमंता सरमा की बंदूक वाली तस्वीर: क्या हम अब हिंसा को सामान्य मानने लगे हैं?

एआई हमारी पहले से मौजूद सोच और पक्षपात को और बढ़ा देता है. यह हमें वही कंटेंट दिखाता है जिस पर हम पहले से यकीन करते हैं. यह गुस्से को तेज़ करता है, चरम विचारों को बढ़ावा देता है और संतुलित सोच को पीछे कर देता है.

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असम एक बार फिर विवाद के केंद्र में आ गया है और एक बार फिर वजह कोई नीति, शासन या विकास नहीं, बल्कि एक चुनावी वीडियो है. इस बार विवाद एक एआई से बने वीडियो को लेकर हुआ, जिसे भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के एक पदाधिकारी ने शेयर किया था. इस वीडियो में मुख्यमंत्री हिमंता बिस्व सरमा मुसलमानों की तस्वीर पर बंदूक चलाते हुए दिख रहे थे और कैप्शन था “point blank shot.”

इस वीडियो पर तेज़ी से नाराज़गी फैली और यह मामला राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंच गया. विपक्ष ने राज्य की सत्ताधारी पार्टी पर तीखा हमला किया और इसे नरसंहार का संकेत देने वाला बताया. कुछ ही समय बाद वीडियो हटा दिया गया, और खबर आई कि असम भाजपा ने इसे पोस्ट करने वाले अपने सोशल मीडिया टीम के एक सह-संयोजक को हटा दिया है.

लेकिन सवाल सिर्फ वीडियो हटाने और कार्रवाई तक सीमित नहीं है. आज के दौर में, जब राजनीतिक संदेश बहुत सोच-समझकर बनाए जाते हैं और जानबूझकर फैलाए जाते हैं, तो ऐसा कंटेंट अचानक कहीं से नहीं आ जाता. भले ही बाद में आधिकारिक तौर पर इससे दूरी बना ली जाए, लेकिन यह उस माहौल के बारे में बहुत कुछ बताता है जहां ऐसा कंटेंट तैयार होता है—जहां कुछ तरह का मजाक, आक्रामकता और प्रतीक स्वीकार्य माने जाते हैं.

तस्वीरें एआई ने बनाई होंगी, लेकिन जिस भावना को दिखाया गया, वह असली थी. यही बात इसे असहज बनाती है. जब राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में किसी समुदाय के खिलाफ हिंसा को सामान्य दिखाने वाली तस्वीरें इस्तेमाल होने लगती हैं, भले ही प्रतीक के रूप में ही क्यों न हों, तो यह तय करता है कि अब किस तरह की भाषा स्वीकार्य मानी जाएगी.

एक सोशल मीडिया पदाधिकारी को हटाने से फिलहाल मामला शांत हो सकता है, लेकिन बड़ा सवाल बना रहता है: हम धीरे-धीरे किस तरह की राजनीति के आदी हो रहे हैं? क्योंकि गुस्सा जल्दी खत्म हो जाता है. स्क्रीनशॉट नहीं मिटते और न ही वे विचार मिटते हैं जो वे हमारे मन में बो देते हैं.

और यह पहली बार भी नहीं है. कुछ समय पहले असम भाजपा के सोशल मीडिया हैंडल ने “Assam without BJP” नाम से एक और एआई वीडियो साझा किया था. उसमें एक ऐसा भविष्य दिखाया गया था जहां मुसलमानों ने राज्य पर “कब्ज़ा” कर लिया है. उस समय सफाई दी गई थी कि यह मुसलमानों के बारे में नहीं, बल्कि अवैध प्रवासियों के बारे में है; यह असम की सुरक्षा के बारे में है; यह जनसंख्या संतुलन बचाने के बारे में है और शायद असली सवाल यहीं से शुरू होता है.


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मानव गरिमा पर कोई समझौता नहीं

हम इंसानों को एक दृश्य खतरे की तरह दिखाने में इतने सहज कब हो गए?

भले ही राजनीतिक बहस अवैध प्रवासन जैसे मुद्दे पर हो, जो किसी भी संप्रभु देश में एक वैध नीति का सवाल है, लेकिन तस्वीरें अमानवीय क्यों हो जाती हैं? क्यों पूरे समुदाय को ऐसा दिखाया जाता है जैसे उन पर गोली चलानी है, उन्हें मिटा देना है या उनसे डरना है? कानून अवैध काम के खिलाफ कार्रवाई कर सकता है. राज्य सीमाओं को लागू कर सकता है और करना भी चाहिए. सरकारों के पास लोगों को निर्वासित करने, हिरासत में लेने और राज्य के मामलों को नियंत्रित करने का अधिकार है, लेकिन इनमें से किसी भी चीज़ के लिए लोगों की गरिमा छीनना ज़रूरी नहीं है.

जिन लोगों के पास कानूनी दर्जा नहीं है, वे भी इंसान ही हैं और जब सत्ता में बैठे लोग ऐसे अमानवीय संकेत देते हैं या इस तरह की भाषा बोलते हैं, तो समाज के लिए क्या सामान्य है, यह बदलने लगता है. शायद हम यह ठीक से समझ नहीं पा रहे कि अमानवीयता को सामान्य बना देना कितना खतरनाक है. इतिहास ने, अलग-अलग देशों और महाद्वीपों में, हमें दिखाया है कि जब किसी समूह को इंसान की जगह खतरे के रूप में दिखाया जाता है, तो उनके खिलाफ कुछ भी सही ठहराना आसान हो जाता है.

भारत में हमें ऐसी राजनीतिक संस्कृति की ज़रूरत है, जहां मानव गरिमा पर कोई समझौता न हो और असली बात यही है — सिर्फ यह नहीं कि कोई वीडियो हटाया गया या नहीं, बल्कि यह कि क्या हम एक समाज के रूप में अब भी असहज महसूस करते हैं जब इंसानों को, भले ही प्रतीक के रूप में, निशाना बनाया जाता है.

असहज करने वाली सच्चाई यह है: कुछ समय के लिए अनियमित प्रवासियों को भूल जाइए, यहां तक कि उन लोगों को भी जो अपराध कर चुके हैं. हम एक समाज के रूप में अब भी साधारण इंसान की बुनियादी गरिमा को समझने में संघर्ष कर रहे हैं.

अगर हम अपने बीच के सबसे साधारण लोगों — जो अनजान हैं, जिनके पास ताकत नहीं है, जो असुविधाजनक लगते हैं — उनकी गरिमा की रक्षा नहीं कर सकते, तो फिर प्रवासियों, अल्पसंख्यकों या कानून-व्यवस्था पर बहस सिर्फ ऊपर-ऊपर की बात है. असली समस्या कहीं गहरी है. एक ऐसा समाज जो लोगों को सिर्फ उनकी उपयोगिता, पहचान या दर्जे से मापता है, वह हमेशा अगला शिकार ढूंढ लेता है.

हमें याद रखना चाहिए कि मानव गरिमा कोई पश्चिमी विचार नहीं है. यह कोई कानूनी तकनीकी बात भी नहीं है. यह किसी भी स्वस्थ समाज की बुनियाद है. जब लोगों को लगता है कि उन्हें सम्मान मिलता है, उन्हें देखा और सुरक्षित महसूस कराया जाता है, तो वे भी उस व्यवस्था में भरोसा और योगदान देते हैं, लेकिन जब उन्हें अपमानित या बेकार समझा जाता है, तो अंदर ही अंदर नाराज़गी पनपती है और यह नाराज़गी समय के साथ भरोसे को खोखला कर देती है.

सवाल सिर्फ यह नहीं है कि हम “दूसरों” के साथ कैसा व्यवहार करते हैं. सवाल यह है कि क्या हम समझते हैं कि गरिमा ही वह चीज़ है जो समाज को धीरे-धीरे क्रूर बनने से बचाती है और जब क्रूरता सामान्य हो जाती है, तो वह सीमित नहीं रहती.

और फिर एक और पहलू है — हम खुद एआई के बारे में बहुत कम बात कर रहे हैं.

असम में जो हुआ, वह सिर्फ एक राजनीतिक गलती नहीं थी. यह इस बात की झलक है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता को कितनी आसानी से हथियार बनाया जा सकता है. जिस तेजी से ऐसा कंटेंट फैलता है, वह डराने वाला है. जब तक उसे हटाया जाता है, तब तक वह अक्सर अपना नुकसान कर चुका होता है.

भरोसा और लोकतंत्र साथ-साथ चलते हैं

यह सिर्फ किसी एक पार्टी या किसी एक देश की समस्या नहीं है. दुनिया भर में एआई का इस्तेमाल गुस्सा पैदा करने, महिलाओं के खिलाफ नफरत बढ़ाने, समुदायों के बीच डर फैलाने और सच्चाई को तोड़-मरोड़ने के लिए किया जा रहा है. नकली वीडियो, बदली हुई आवाज़, डीपफेक—ये सिर्फ गलत जानकारी नहीं फैलाते. ये कुछ और ज़रूरी चीज़ों को कमज़ोर कर देते हैं: भरोसा. संस्थाओं पर भरोसा. मीडिया पर भरोसा. जो हम अपनी आंखों से देखते हैं उस पर भरोसा.

और जब भरोसा टूटता है, तो लोकतंत्र हिलने लगता है.

लोकतंत्र साझा तथ्यों पर टिका होता है, भले ही हम मूल्य या विचारों में असहमत हों. यह इस बात पर निर्भर करता है कि नागरिक नीति पर ईमानदारी से बहस कर सकें, न कि इस बात पर कि कोई वीडियो असली है या नकली. अगर तकनीक सच को विवादास्पद बना देती है, अगर हर तस्वीर को नकली कहा जा सकता है और हर नकली को असली दिखाया जा सकता है, तो जवाबदेही लगभग असंभव हो जाती है.

एआई हमारी पहले से मौजूद सोच और पूर्वाग्रह को भी बढ़ा देता है. यह हमें वही कंटेंट दिखाता है जिस पर हम पहले से यकीन करते हैं. यह गुस्से को तेज़ करता है, चरम विचारों को बढ़ावा देता है और संतुलित सोच को पीछे कर देता है. ऐसे समाजों में जो पहले से धर्म, जाति या जातीय आधार पर बंटे हुए हैं, यह बहुत खतरनाक हो सकता है.

सवाल तब असम या किसी एक विवाद से बड़ा है. लोकतांत्रिक समाज ऐसे शक्तिशाली तकनीक को कैसे नियंत्रित, समझ और नैतिक रूप से इस्तेमाल करेंगे, जो हमारी सोच और धारणाओं को बदल सकती है? क्योंकि अगर हम इसका जवाब नहीं दे पाए, तो जल्द ही चुनाव तो होंगे, बहसें तो होंगी, लेकिन उनकी नींव खोखली हो जाएगी.

आमना बेगम अंसारी एक स्तंभकार और टीवी समाचार पैनलिस्ट हैं. वह ‘इंडिया दिस वीक बाय आमना एंड खालिद’ नाम से एक साप्ताहिक यूट्यूब शो चलाती हैं. उनका एक्स हैंडल @Amana_Ansari है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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