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Saturday, 24 January, 2026
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तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक में राज्यपाल–सरकार टकराव खुलकर सामने आया

क्षेत्रीय दल संसद में एकजुट विपक्ष पेश करने में जूझ रहे हैं और दिल्ली में कोई ऐसा नेता नहीं है जो बीच-बचाव कर सके. ऐसे में केंद्र-राज्य तनाव अब खुले टकराव के रूप में सामने आ रहा है.

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तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक के राज्यपाल इस साल विधानसभा सत्र की शुरुआत के दिनों में सुर्खियों में रहे, जब उन्हें नए विधायी वर्ष के पहले सत्र को संबोधित करना था. विपक्ष का वॉकआउट करना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन जब राज्यपाल, जो राज्यों के संवैधानिक प्रमुख होते हैं—खुद व्यवधान पैदा करें या उसमें भूमिका निभाएं, तो मामला अलग हो जाता है.

तीनों राज्यों में इंडिया गठबंधन का हिस्सा रही पार्टियों की सरकार है और ये पार्टियां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राजनीतिक रूप से विरोध में हैं. केरल और कर्नाटक के राज्यपाल आरएसएस-बीजेपी से जुड़े माने जाते हैं, जबकि तमिलनाडु के राज्यपाल पर डीएमके और उसके सहयोगी अक्सर बीजेपी-आरएसएस के “प्रवक्ता” की तरह काम करने का आरोप लगाते हैं.

इन राज्यों में मुख्यमंत्री और राज्यपालों के रिश्ते काफी समय से तनावपूर्ण रहे हैं. केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन कई बार स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर होने वाले राज्यपालों के ‘एट होम’ कार्यक्रमों का बहिष्कार कर चुके हैं. मुख्यमंत्रियों और राज्यपालों के बीच सीधा संवाद बहुत कम है और लोक भवन तथा निर्वाचित सरकारों के बीच तो और भी कम.

समय भी राजनीतिक रूप से संवेदनशील है. केरल और तमिलनाडु चुनावी दौर की ओर बढ़ रहे हैं. इससे भी अहम यह है कि तीनों राज्यों की सरकारें सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा चुकी हैं. उनका कहना है कि राज्यपाल अपने अधिकारों से आगे बढ़ रहे हैं—खासतौर पर विधानसभा से पारित विधेयकों पर मंजूरी देने में देरी करने और कुलपतियों सहित कई नियुक्तियों को रोकने को लेकर.

कर्नाटक में वरिष्ठ भाजपा नेता और राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने विधानसभा को परंपरागत संबोधन नहीं दिया. वजह थी सिद्धारमैया सरकार द्वारा तैयार भाषण के मसौदे को लेकर मतभेद. उन्होंने उन कुछ अनुच्छेदों पर आपत्ति जताई, जिनमें नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार की आलोचना थी. इससे एक अभूतपूर्व स्थिति बनी, जिसे सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी ने संवैधानिक मर्यादा के खिलाफ बताया.

तमिलनाडु में राज्यपाल आरएन रवि ने मंगलवार को भाषण पढ़ने से इनकार कर दिया. उन्होंने राष्ट्रीय गान के अपमान का आरोप लगाया और कहा कि स्टालिन सरकार के भाषण में दलितों पर अत्याचार, दलित महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा और बढ़ती आत्महत्याओं का ज़िक्र नहीं है. लोक भवन के बयान में कहा गया कि इन कारणों से राज्य को “भारत की आत्महत्या राजधानी” कहा जा रहा है. डीएमके ने इन बातों पर कड़ा विरोध जताया और इसे राजनीतिक मकसद से प्रेरित बताया.

केरल में राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर विधानसभा में पहुंचे और सरकार द्वारा तैयार भाषण पढ़ा, लेकिन उन्होंने कई अनुच्छेद छोड़ दिए, जिन हिस्सों को नहीं पढ़ा गया, उनमें केंद्र की वित्तीय नीतियों की कड़ी आलोचना और विधानसभा से पारित विधेयकों को लंबे समय तक लंबित रखने के मामले में राज्य द्वारा सुप्रीम कोर्ट जाने का ज़िक्र शामिल था.

मौजूदा टकराव से भी पुराना एक पैटर्न

राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच टकराव, वैचारिक मतभेद और सार्वजनिक बयानबाज़ी भारतीय संघीय राजनीति में कोई नई बात नहीं है. आज बीजेपी जो कर रही है, वह बहुत हद तक वही है जो कांग्रेस ने दशकों तक तब किया, जब केंद्र में उसका वर्चस्व था.

2011 में, जब गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने सद्भावना (सांप्रदायिक सौहार्द) मिशन शुरू किया और तीन दिन का सार्वजनिक उपवास रखा, तब की राज्यपाल कमला बेनीवाल ने राज्य सरकार द्वारा किए गए खर्च का ऑडिट कराने की मांग की. उन्होंने एक वरिष्ठ अधिकारी को पत्र लिखते हुए विषय पंक्ति में लिखा था—“सार्वजनिक खजाने से खर्च और बीजेपी के मुख्यमंत्री नरेंद्रभाई मोदी की वित्तीय अनियमितताओं से संबंधित.” यह उसी तरह की परेशानियां थीं, जिनका सामना बीजेपी की सरकारों को कांग्रेस-नियुक्त राज्यपालों के हाथों करना पड़ा.

प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव के कार्यकाल में एम. चेन्ना रेड्डी को तमिलनाडु का राज्यपाल नियुक्त किया गया. इसे व्यापक रूप से तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता के साथ टकराव पैदा करने की कोशिश के रूप में देखा गया. बाद में रेड्डी ने उनके खिलाफ मुकदमा चलाने की मंजूरी दी, जिससे उन्हें पद छोड़ना पड़ा और इसका राजनीतिक फायदा डीएमके को हुआ.

इसके विपरीत, जब कोदरदास कालीदास शाह राज्यपाल थे और एम. करुणानिधि डीएमके के मुख्यमंत्री, तब रिश्ते सौहार्दपूर्ण रहे. करुणानिधि ने सार्वजनिक रूप से शाह की तारीफ भी की थी और मशहूर तौर पर कहा था कि दोनों के नाम के शुरुआती अक्षर “K K” एक जैसे हैं. अगर वही राज्यपाल बाद में राज्य सरकार के खिलाफ रुख अपनाते, तो डीएमके सी. एन. अन्नादुरई की राज्यपाल पद पर की गई तीखी टिप्पणी का हवाला देता: “बकरी को दाढ़ी क्यों चाहिए और राज्य को राज्यपाल क्यों?” (तमिल में: ஆட்டுக்குத் தாடி எதற்கு? நாட்டுக்கு கவர்னர் எதற்கு? Aatukku thaadi edharkku? Nattukku governor edharkku?)

आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के पूर्व राज्यपाल ईएसएल नरसिम्हन ने एक बार इस स्तंभकार से कहा था कि उन्हें भी अपने कार्यकाल में ऐसी ही समस्याओं का सामना करना पड़ा. उनका तरीका, उनके मुताबिक, सरल था—मुख्यमंत्री को चाय या दोपहर के भोजन पर बुलाना, संवैधानिक चिंताओं को समझाना और भाषण में स्वीकार्य बदलावों पर सहमति बनाना. उन्होंने कहा कि चंद्रबाबू नायडू, वाईएस जगन मोहन रेड्डी या के. चंद्रशेखर राव जैसे निर्वाचित नेताओं के साथ उनका कभी गंभीर टकराव नहीं हुआ.

इसी समय के आसपास, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने राज्यपालों के सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा था कि संस्थानों का सुचारु कामकाज जनकल्याण और विकास के लिए जरूरी है. उन्होंने राज्यपाल की भूमिका को केंद्र और राज्यों के बीच सेतु बताया और समन्वय व संवाद के जरिए सहकारी संघवाद को मजबूत करने पर जोर दिया. उन्होंने कहा कि राज्यपालों को अपने आचरण से उदाहरण पेश करना चाहिए.

विधानसभा के उद्घाटन सत्र को संबोधित करना एक संवैधानिक आवश्यकता है, लेकिन नरेंद्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व में मजबूत केंद्रीय सत्ता वाले राजनीतिक माहौल में, राज्यपालों को अक्सर ज्यादा राजनीतिक समर्थन मिलता हुआ देखा जाता है और कभी-कभी निर्वाचित राज्य सरकारों को चुनौती देने के लिए अनौपचारिक प्रोत्साहन भी मिलता है. यही आरोप दक्षिणी राज्यों द्वारा लगाया जा रहा है.

क्या तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक के मुख्यमंत्री बार-बार की निराशाओं, जिसमें अब तक सुप्रीम कोर्ट के फैसलों से सीमित राहत भी शामिल है, के बाद ज़रूरत से ज्यादा प्रतिक्रिया दे रहे हैं? क्या इन राज्यों में राज्यपालों और मुख्यमंत्रियों के बीच कोई प्रभावी संवाद चैनल है? ईमानदार जवाब है—नहीं. दोनों पक्षों ने राष्ट्रपति के हस्तक्षेप या राज्यपालों को वापस बुलाने की मांग करते हुए विधानसभा में प्रस्ताव पारित करने का रास्ता अपनाया है.

कोई भी पक्ष लिया जाए, बड़ी तस्वीर चिंताजनक है. क्षेत्रीय दल संसद में केंद्र-राज्य तनाव को सामने रखने के लिए एक मजबूत, एकजुट विपक्षी नेतृत्व पेश करने में जूझ रहे हैं. वहीं, आज नई दिल्ली में ऐसा कोई प्रभावशाली नेता नहीं है, जो लोक भवनों और राज्य सचिवालयों में बैठे टकराव में उलझे लोगों को राज्यों के निर्वाचित प्रमुखों के साथ बातचीत के लिए मना सके.

(लेखक का एक्स हैंडल @RAJAGOPALAN1951 है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.)

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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