पियलीडिजाईन के द्वारा चित्रण
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भारत के विकास की बड़ी तस्वीर जीडीपी के आंकड़ों जितनी चमकदार नहीं लेकिन इसे सामने लानेवाला कोई नहीं

कल घरेलू उत्पाद या ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट (जीडीपी) में बढ़त को लेकर सरकार द्वारा ही गठित एक कमेटी द्वारा दिए कुछ नए आंकड़ों से जिस तरह से देश की दोनों मुख्य पार्टियाँ परेशानी में पड़ी हैं, उससे कुछ बातें खुलकर सामने आ रही हैं। कांग्रेस की खुशी का ठिकाना नहीं था क्योंकि उसके शासन के दौरान हुई वृद्धि को पहले बताए गए आंकड़े से आधा प्रतिशत अंक तक अधिक पाया गया। सरकार ने जवाब में इस वृद्धि के पीछे लगी कीमत की ओर ध्यान आकर्षित कराया।

ऐसा लगता है मानो आर्थिक वृद्धि दर किसी भी सरकार के लिये अपनी मर्दानगी साबित करने का सबसे अच्छा ज़रिया बन चुकी है और इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि जीडीपी के आंकड़े अंततः किसी के विचार हैं, पूर्णतया तथ्य नहीं। यह प्रक्रिया हद से अधिक जटिल है और निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए हर प्रकार के (कभी कभी तो मनमाने) अनुमान लगाए जाते हैं। खासकर भारत जैसी अर्थव्यवस्था में, जहां असंगठित क्षेत्र कहीं बड़ा है, जो भी जीडीपी दर बताई जाए, वह एक अनुमान ही रहेगी। इसलिए 7.5 प्रतिशत असल में 7 प्रतिशत भी हो सकती है और इसका उल्टा भी संभव है। इन दशमलव अंकों को लेकर राजनैतिक गाली गलौज की हद तक उतर जाना मूर्खता के अलावा कुछ नहीं है, खासकर तब जब असल मुद्दा यह है कि यह दर पहले क्या रही थी। दूसरा कांग्रेस गठबंधन पहले सी तेजी बरकरार नहीं रख पाया और दूसरा भाजपा गठबंधन इस दर को बढ़ाने में असफल रहा है।

उन दशकों में जब भारत की वृद्धि दर कम थी, तब अन्य अर्थव्यवस्थाओं के स्तर तक पहुंचने के लिए इस दर को ऊंचा उठाना ज़रूरी था। गरीबी की सबसे अच्छी दवा विकास ही है, जैसा तीव्र वृद्धि के वर्षों के दौरान गरीबी में आई कमी से साफ जाहिर होता है। लेकिन लगातार तीव्र वृद्धि बनाये रखने के बावजूद ( हालांकि बहुत तेज़ भी नहीं) यह मानने का समय आ गया है कि जीडीपी दरअसल प्रदर्शन नापने का एक तरीका मात्र है। कई और मानक भी हैं- जैसे कि राष्ट्रीय संपदा के साथ क्या होता आ रहा है? जैसे एक कंपनी के इनकम/एक्सपेंडिचर स्टेटमेंट को उसकी एसेट्स एवं लायबिलिटी की सूची के साथ पढ़ा जाना चाहिए, ठीक वैसा ही अर्थव्यवस्था के साथ भी होना चाहिए।

केरल की बाढ़ के बाद के हफ्ते में यह बताने की ज़रूरत नहीं कि देश में जल एवं जंगल जैसी प्राकृतिक संपदा का सही इस्तेमाल नहीं हो रहा। आप सीमित संसाधनों के इस्तेमाल से आय तो बढ़ा सकते हैं (जैसा भारत करता आया है) लेकिन यह थोड़े समय ही चलेगा, हमेशा नहीं। भारत का पानी ख़त्म हो रहा है, जंगल जैसे अन्य संसाधन तो खत्म हो ही रहे हैं। सरकार के आंकड़े राष्ट्रीय आय बताने के साथ साथ अर्थव्यवस्था की बैलेंस शीट में हुए इन परिवर्तनों के बारे में चुप क्यों हैं?

इसके अलावा अन्य चीज़ें भी हैं, जैसे मानव पूंजी या प्रातिष्ठानिक पूंजी। शिक्षा एवं स्वास्थ्य के क्षेत्र में कैसा प्रदर्शन है? आम राय की मानें तो जी डी पी की तुलना में कहीं बुरा। जहां तक प्रातिष्ठानिक पूंजी की बात है, और जो कुछ मामलों में सबसे महत्वपूर्ण भी है, अधिकांश लोग मानेंगे कि कुछ मुख्य प्रतिष्ठानों की सामाजिक पूंजी में लगातार कमी आ रही है : न्यायालय में भ्रष्टाचार, जांच एजेंसियों का सरकार का गुलाम बन जाना, विश्वविद्यालयों में हुई नियुक्तियों का स्तर एवं उनकी ऑटोनोमी का मामला, प्रेस की स्वतंत्रता और भी बहुत कुछ।

उसके बाद आती है बराबरी, या फिर इसकी कमी। जैसे-जैसे अमीरों एवं गरीबों के बीच की दूरी बढ़ती है वैसे-वैसे समाज की दरारों पर दबाव और भी बढ़ जाता है। भौगोलिक गैर- बराबरी ख़ास्तर साफ दिखती है : बिहार की प्रति व्यक्ति आय दक्षिणी राज्यों का चौथाई हिस्सा है जबकि उत्तर प्रदेश की आय के लिए तिहाई भर। क्या ऐसे काम चल सकता है? क्या आय एवं अवसर में असंगतता की वजह से कुछ “बीमारू” राज्यों में कानून की अनदेखी हो रही हो, ऐसा संभव नहीं है? क्या सामाजिक जुड़ाव में आ रही कमी किसी तरह की वित्तीय गड़बड़ी नहीं पैदा करेगी?

भारत की बड़ी तस्वीर जी डी पी के आंकड़ों जितनी नहीं चमकती। लेकिन इस बड़ी तस्वीर को खींचकर जनता के सामने कोई लानेवाला नहीं है कि आखिर इन आंकड़ों पर सवाल भी उठाए जा सकें। अगर इस कथानक को आय में वृद्धि के रूखे सूखे आंकड़ों से बढ़कर कुछ और प्रस्तुत करना हो तो उसके लिए देश के बैलेंस शीट पर ध्यान देने की ज़रूरत है और आय में परिवर्तन के साथ इन संसाधनों पर भी नज़र रखने की ज़रूरत है।

Read in English: GDP numbers have become phallic symbols for Congress & BJP


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