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Tuesday, 13 January, 2026
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‘सत्य के प्रयोग’ के भीतर का गांधी: आत्मकथा, काम-भाव और व्यक्तित्व के अंतर्विरोध

1925 में प्रकाशित गांधी की आत्मकथा बचपन से सार्वजनिक जीवन तक की कथा कहती है, लेकिन स्त्री-संसर्ग, ब्रह्मचर्य और नैतिक संघर्षों पर उनके आत्मस्वीकार एक अलग, असहज गांधी को सामने लाते हैं.

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महात्मा गांधी की आत्मकथा रोचक किताब है. यह पहली बार दिसंबर 1925 में प्रकाशित हुई. इस में दस-वर्षीय गांधी के जीवन की घटनाओं से 55-वर्ष की आयु होने तक, यानी लगभग 45 वर्षों के विवरण हैं. एक अर्थ में गांधी के संपूर्ण व्यक्तित्व की झलक इस में मिल जाती है. आत्मकथा लिखने के बाद के गांधी के जीवन व कार्य समझने के लिए भी इस में पर्याप्त संकेत है.

पुस्तक के पहले और दूसरे भाग के आधे हिस्से तक साहित्य पढ़ने सा आनंद मिलता है. यह बचपन से लेकर युवाववस्था, व इंग्लैंड जाकर सामाजिक कार्यों में संलग्न होने तक के अंश हैं. आगे जैसे-जैसे गांधी वैचारिक-राजनीतिक प्रस्थापनाएं करने में डूबने लगते हैं, वैसे-वैसे पुस्तक की सरसता घटती हुई काम-काजी लेख व प्रवचन का सा रूप ले लेती है.

आरंभ से ही गांधी की स्वभावगत विशिष्टताएं इस में दिखती हैं. सत्यनिष्ठा, आत्मसम्मान, सेवा-भाव और सुधारक होने का शौक बल्कि नशा – यह चार गुण गांधी में आरंभ से थे. गांधी की स्कूली और औपचारिक शिक्षा बड़ी कमज़ोर थी, किंतु उन्हें अपने संयुक्त, परंपरावादी हिंदू परिवार और परिवेश से वह शिक्षा मिली, जिसे नैतिक शिक्षा कह सकते हैं. गांधी ताउम्र इसी शिक्षा को अधिक महत्व देते रहे. औपचारिक शिक्षा, यहां तक कि अक्षर-ज्ञान तक को वे दोयम दर्जे का ही समझते थे. उन की माता धर्मपरायण हिंदू महिला थीं और उन का गांधी पर गहरा प्रभाव था. पुस्तक के पहले भाग के पहले ही अध्याय में उन का सुंदर विवरण है.

तीसरे अध्याय में गांधी अपने विवाह का वर्णन करते हैं, जो 13-वर्ष की आयु में उसी आयु की कस्तूरबाई से हुआ था. जब तक काम-भावना उदित नहीं हुई, तब तक बालक गांधी का पत्नी के साथ बालपन का खेल संबंध जैसा रहा. हालांकि, पति का अधिकार जताना गांधी ने तभी से आरंभ कर दिया था. जब काम-भोग की वृत्ति आई, तब से गांधी भारी कामी भी रहे. इतने भयंकर कि यदि साथ ही उन में कर्तव्यपरायणता न होती, तो गांधी अपने ही शब्दों में, ‘रोग का शिकार’ बन सकते थे. (मो.क. गांधी, ‘सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा’, अनु. – महावीर प्रसाद पोद्दार, नई दिल्लीः सस्ता साहित्य मंडल प्रकाशन, 1970, पृ. 21, 23 और आगे).

साथ ही उन्होंने एकपत्नी-व्रत का पालन करना अपना कर्तव्य माना था. साथ ही, यह भी ज़रूरी समझा कि पत्नी को भी एकपति-व्रत का पालन करना चाहिए: “इस विचार ने मुझे ईर्ष्यालु पति बना दिया. मैं ‘पालन करना चाहिए’ से ‘पालन करवाना चाहिए’ पर जा पहुंचा और पालन करवाना है तो मुझे खबरदारी करनी चाहिए. मेरे लिए पत्नी की पवित्रता में पवित्रता में शंका करने का कोई कारण नहीं था. पर जलन कारण ढूंढने कब बैठती है?” (पृ. 23). गांधी पत्नी के कहीं आने-जाने, मिलने-जुलने पर निगाह रखते थे और टोका-टोकी करते रहते थे. यह कस्तूरबाई को बुरा लगता था और गांधी की अनुचित मनाहियों की वे पूरी अनदखी करती थी. पत्नी के प्रति भारी कामीपन तथा ‘ईष्यालु, संशयी स्वभाव’ गांधी में लंबे समय तक रहा. इंग्लैंड से बैरिस्टर बन कर लौटने के बाद भी, 1892 ई. के लगभग, उन्होंने पत्नी के साथ पुनः उसी विषय पर वही व्यवहार पुनः दोहराया. (पृ. 96).

गांधी ने स्वयं को ‘घमंडी पति’ (पृ. 29) भी कहा है, जो अपनी बुद्धि के सामने पत्नी के विचार, सलाह को कोई महत्व नहीं देता था. एक बुरे मित्र की कुसंगति के संदर्भ में गांधी ने यह लिखा है. गांधी उसे सुधारना चाहते थे और इस के लिए स्वयं कुकर्म में फंस गए. यहां तक कि पत्नी को बहुतेरे कष्ट भी दिए (पृ. 35). बाद में उन्हें अपनी भूल महसूस हुई. किंतु दूसरों को सुधारने की झक उन में ताउम्र वैसी ही उग्र और अज्ञान भरी रही.

किशोरावस्था में ही उस मित्र को सुधारने के चक्कर में गांधी स्वयं वेश्या-गमन तक पहुंच गए. मित्र उन्हें चकले में ले गया और एक वेश्या के कमरे में जाकर भी गांधी बिना कुछ किए लौट आए, लेकिन उन्हें व्यभिचार करने में लज्जा के बजाए व्यभिचार में विफल रहने की लज्जा महसूस हुईः “मेरी मर्दानगी को बट्टा लग गया और जी चाहा कि धरती फट जाए तो मैं उस में समा जाऊं.” (पृ. 34). उस पाप से बचने के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हुए गांधी यह भी जोड़ते हैं कि उन के जीवन में उस के बाद भी तीन और ऐसे अवसर आए, जब वे ‘संयोग’ से बच गए. यानी, वे किसी वेश्या या वैसी स्त्री के पास आगे भी गए, वर्षों बाद भी.

आत्मकथा में ही फिर एक प्रसंग 1890 का है जब गांधी इंगलैंड के पोर्टस्मिथ में “परस्त्री को देखकर विकारवश होने और उस के साथ रंगरलियां करने की इच्छा” (पृ. 79) में पड़ गए थे. इस के बाद 1893 में दक्षिण अफ्रीका के जंजीबार में दलाल की मदद से पुनः किसी वेश्या के यहां गए. यहां भी “मेरी रक्षा मेरे पुरुषार्थ ने नहीं की”, बल्कि भावनात्मक दुर्बलता और भगवान ने ही की. (पृ. 108-09).

आगे आत्मकथा में किसी स्त्री-प्रसंग पर नहीं लिखा है. किंतु राजमोहन गांधी की पुस्तक ‘मोहनदास’ से पता चलता है कि फिर 1919-20 में गांधी एक विवाहिता स्त्री सरला देवी चौधरानी पर लट्टू हो गए थे. जिन से अपना ‘आध्यात्मिक विवाह’ जैसा तक घोषित किया. राजमोहन के अनुसार, “सन् 1920 वाले दशक के उन कुछ आरंभिक महीनों में गांधी सरलादेवी पर भारी मुग्ध हो गए थे. हालांकि, उन्होंने संबंध तोड़ लिया. उस संबंध में सौंदर्यबोध का तत्व था और यहां तक कि हल्का सा कामुक तत्व भी. उस संबंध में भावनात्मक तत्व भी था. किंतु गांधी द्वारा स्वयं उस पर पुनर्विचार, अपने बेटे (मेरे पिता) और सचिव महादेव की कड़ी बातें तथा अपने भवितव्य समधी सी. राजगोपालाचारी द्वारा लिखे एक कड़े पत्र से गांधी ने महसूस किया कि वे गलत राह पर हैं. उन्होंने संबंध तोड़ लिया.”

रोचक यह कि इतने बड़े प्रसंग को गांधी अपनी आत्मकथा में गोल कर गए हैं! यद्यपि सरला देवी और उन के पति रामभज दत्त का उल्लेख वे करते हैं (पृ. 433-34). संभवतः ‘सत्य के प्रयोग’ में भी गांधी को उस कठिन सत्य के उल्लेख का साहस न हुआ, जब राजमोहन के शब्दों में ‘‘वे दो वर्ष कस्तूरबा के लिए बहुत यंत्रणादायक रहे थे’’.

उपर्युक्त सभी प्रसंग एकपत्नी-व्रती होने के निश्चय और पाप-पुण्य के बोध के बावजूद स्त्री-संसर्ग मामले में गांधी को सदैव दुर्बल दिखाता है. ऐसी घटनाएं 1884 ई. से लेकर 1920, और आगे भी 1937, 1947 ई. तक होती रहीं. धर्म-चेतना, बाद में ली गई ब्रह्मचर्य की प्रतिज्ञा, सार्वजनिक जीवन की नाजुक मर्यादा और वयोवृद्ध आयु भी गांधी के काम-भाव को नियंत्रित रखने में कठिनाई महसूस करती थी.

आत्मकथा में अपनी धर्म-शिक्षा के लिए गांधी अपने परिवार की बुजुर्ग नौकरानी, दाई रंभा को कृतज्ञता से याद करते हैं. राम-नाम से प्रेम उस ने ही जोड़ा था, जिसे बाद में गांधी अमोघ शक्ति मानने लगे. (पृ. 41) जब गांधी 1888 में वकालत पढ़ने के लिए इंग्लैंड जा रहे थे तब माता ने उन से तीन प्रतिज्ञाएं करवाईः मांस, मदिरा और स्त्री-संसर्ग से दूर रहना (पृ. 48). पहली दो चीज़ें गांधी को स्वतः नापसंद थीं. तीसरी प्रतिज्ञा पर गांधी को प्रयास करना पड़ा. इंग्लैंड में वे अपने को अविवाहित बता कर अंग्रेज़ कुमारियों के साथ घूमते थे (पृ. 72-75). पर प्रतिज्ञा नहीं टूटी. झूठ बोलने से असहजता महसूस करने के कारण गांधी ने जल्द ही अविवाहित वाले ढोंग से मुक्ति पा ली.

इंग्लैंड में गांधी की भेंट थियोसॉफी की संस्थापक मादाम ब्लावात्स्की और एनी बेसेंट से भी हुई. यह 1889 की बात होगी. ब्लावात्स्की की पुस्तक पढ़कर उन्हें हिंदू धर्म की पुस्तकें पढ़ने की इच्छा हुई, जिस के बाद क्रिश्चयन पादरियों के प्रचार से बना हुआ भ्रम दूर‌ हो गया (पृ. 76). चूंकि गांधी ने पहले हिंदू पुस्तकें नहीं पढ़ी थी, इसलिए मादाम ब्लावात्स्की को भी इस का श्रेय है कि गांधी जी की हिंदू धर्म में आस्था बनी रही.

परिवारजन संबधी विवरणों में माता-पिता के सिवा किसी के प्रति गांधी किसी लगाव या भावना का संकेत नहीं देते. पत्नी, भाई, पुत्र, आदि के उल्लेख चलते-चलाते मिलते हैं. वे भी प्रायः कर्तव्य भाव के प्रसंग हैं. उदाहरण के लिए, पहले बेटे का उल्लेख उस के चार बरस के होने पर आता है, वह भी संयुक्त परिवार के सभी बच्चों की शिक्षा आदि की चिंता के संबंध में. यही स्थिति पत्नी के लिए. अपने जीवन के विवरण देते हुए कहीं-कहीं किसी दूसरे विषय के प्रसंग में ही पत्नी आती हैं. वह स्वयं कभी विषय बनती भी है, तो गांधी के किसी अपने मुद्दे के संदर्भ में. अधिकांश विवरण गांधी के सामाजिक कार्यों से ही ओत-प्रोत हैं. अपनी पत्नी और बच्चों के बारे में गांधी कहीं विशेष चर्चा शायद ही करते हैं. जबकि अपने मित्रों, सहकर्मियों में कई के बारे में गांधी अनेक गुणात्मक, भावात्मक वर्णन करते मिलते हैं.

दिसंबर 1896 में दूसरी बार दक्षिण अफ्रीका जाते हुए गांधी अपनी पत्नी, बच्चों को साथ ले जाते हैं. फिर, 1901 से गांधी पत्नी के साथ ब्रह्मचर्य व्यवहार रखने पर सोचने लगे हैं. अर्थात् सहशय्या एवं शारीरिक संबंध छोड़ देना. यद्यपि वह फैसला 1906 में लिया. यह कुछ पुस्तकों को पढ़ने तथा रायचंद भाई के प्रभाव में हुआ. “व्रत लेने के समय तक मैंने धर्मपत्नी से सलाह नहीं ली थी; पर लेते समय की. उस की ओर से कोई विरोध नहीं हुआ” (पृ. 200).

गांधी को पत्नी के साथ संसर्ग अपने समाज-सेवा कार्य के लिए बाधा लगता था: “अगर भोग-विलास में, बच्चे पैदा करने और पालन में लगा रहूं तो मुझसे पूरी सेवा नहीं बन सकती. दो घोड़ों की सवारी कैसे हो सकती है.” (पृ. 298). परंतु काम-भाव गांधी पर सदैव दबाव बनाए रहा. आत्मकथा लिखते समय, 1925 में भी वे लिखते हैं कि “आज (आयु के) छप्पन वर्ष पूरे हो चुके हैं फिर भी कठिनता का अनुभव तो होता ही है.” (पृ. 201)

गांधी द्वारा 1946-47 में किए गए अपने ‘ब्रह्मचर्य प्रयोग’ के विवरण, उस पर निकट संबंधियों, मित्रों, सहकर्मियों से हुई तीखी तकरार, तथा स्वयं गांधी की अपनी वेदना, त्रास, आदि जो उन के विविध पत्रों में मिलते हैं – सब यही बताते हैं कि गांधी कामदेव से अंत तक त्रस्त रहे. गांधी की 1924 में स्थिति यह है: “मुझे कायिक ब्रह्मचर्य के पालन में महाकष्ट उठाना पड़ा है…पर अपने विचारों पर जो विजय मिलनी चाहिए थी, वह मुझे नहीं मिली….कहां से और कैसे हमारे अनचाहे विचार हम पर चढ़ाई करते हैं, यह मैं अब तक नहीं जान पाया हूं.” (पृ. 299). गांधी के जीवन बिलकुल अंतिम वर्ष का हाल भी यही दिखाता है.

पत्नी के साथ दो तीन झगड़ों का प्रसंग भी आत्मकथा में है. इन में कस्तूरबा के विचार, चरित्र और गांधी के साथ उन के संबंध की कुछ झलक मिलती है. पहला झगड़ा 1901 में दक्षिण अफ्रीका से आते समय स्थानीय भारतीयों द्वारा मिली भेंट लेने-ठुकराने को लेकर हुआ. झगड़े के विवरण में दिखता है कि अपने सामाजिक कार्य के जुनून में गांधी कस्तूरबा से उन की इच्छा के विरुद्ध अनेक काम करवाते रहे थे. कस्तूरबा के शब्दों में, “जानती हूं आपको. मेरे गहने भी ले लिए, वही तो आप हैं न! मुझे सुख से नहीं पहनने दिए, सो वही अब आप मेरी बहुओं के लिए लाएंगे?…मुझ से रात-दिन जो मजदूरी करवाई क्या वह मेरी सेवा में नहीं गिनी जाएगी? मुझको रुलाकर भी जिस-तिस को घर में टिका रखा और उसकी चाकरी कराई वह क्या थी?” (पृ. 213)

दूसरा बड़ा झगड़ा भी डरबन का ही है, वर्ष 1898 का. किसी निम्न-जाति के कर्मचारी के जूठे बर्तन साफ करने में कस्तूरबा के उत्साह न दिखाने पर गांधी उन्हें घर से निकालने पर उतारू हो गए. कस्तूरबा वह जूठे बर्तन साफ कर रही थीं, मगर गांधी की मांग थी कि हंसते हुए करो, वरना ‘मेरे घर में’ यह नहीं चलेगा. (पृ. 261). यह बात कस्तूरबा को मर्मांतक लगी. निःशब्द सेवा करने पर कृतज्ञता के बदले कड़वी बात सुन वह भड़क उठीं. तब गांधी ने कस्तूरबा को, “उस असहाय अबला को पकड़कर दरवाजे तक खींच ले गया. दरवाजा आधा खोला. कस्तूरबाई की आंखों से गंगा-जमुना बह रही थी. वह बोलीं: ‘तुम को शर्म नहीं है; मुझ को है. ज़रा तो शरमाओ. मैं बाहर निकल कर कहां जाऊं? यहां मां-बाप भी नहीं हैं कि उन के यहां चली जाऊं. मैं औरत जात ठहरी, इसलिए मुझे तुम्हारी धौंस सहनी ही होगी.’” (पृ. 261) कस्तूरबा से दाल और नमक खाना छुड़वाने का प्रसंग भी इसी तरह जोर-जबर्दस्ती दिखाता है. (पृ. 307-08)

यह सब गांधी के क्रोधी, असंयमित स्वभाव का भी एक प्रमाण है. निकट के लोगों, गांधी पर निर्भर, अथवा प्रेमी-जनों के ऊपर वह घमंडी एवं तानाशाही व्यवहार रखते थे. ऐसे विवरण गांधी वाङमय में बाद में भी मिलते हैं. इस में गांधी सामान्य हिंदुओं से भिन्न नहीं, बल्कि कहीं-कहीं नीचे ही दिखते हैं.

आत्मकथा में एक प्रसंग भगिनी निवेदिता (मार्ग्रेट नोबल) का भी है. सन् 1901-02 में जब गांधी भारत में थे और प्रसिद्ध नहीं हुए थे. तब कलकत्ते में स्वामी विवेकानंद के दर्शन करने गए, किंतु नहीं हो सका. तब वे भगिनी निवेदिता के दर्शन करने गए. “उन का तेज़ देखकर मैं सहम गया. बताचीत में भी हमारा मेल अधिक नहीं जमा. मैंने यह बात गोखले से कही. वह बोले – ‘मैं समझता हूं कि यह देवी बहुत तेज़ है, अतः उस से तुम्हारा मेल नहीं बैठ सकता’.” (पृ. 228) निवेदिता से गांधी की एक बार और भेंट हुई, जिस का उल्लेख करते हुए भी गांधी दोहराते हैं कि “हमारा मेल न बैठते हुए भी मैं देखता था कि हिंदू धर्म के प्रति भगिनी का प्रेम छलक रहा था.”

यह तब की बात है जब गांधी ‘महात्मा’ नहीं हुए थे. बाद में भी तेजस्वी, स्वतंत्र-चेता व्यक्तियों से उन की दूरी ही रही. एनी बेसेंट, रवीन्द्रनाथ टैगोर, श्रीअरविंद, निराला इस के उदाहरण हैं. यहां तक कि सहयोगियों में भी, भिन्न, स्वतंत्र-विचार रखने वालों से गांधी कटते थे. जैसे, मीरा बेन (मैडेलीन स्लेड), जब उन्होंने किसी मुद्दे पर गांधी के विचार और तरीकों से असहमति दिखाई. तब गांधी ने क्रोध पूर्वक उन्हें मीराबेन के बदले औपचारिक अंग्रेज़ी नाम से संबोधित करना आरंभ कर दिया. यह बचकाना सा लगता है, किंतु गांधी ऐसे ही थे.

काम, क्रोध, मोह, अहंकार – जो अज्ञान के ही रूप कहे गए हैं, उन पर गांधी को पूरी विजय नहीं मिल सकी. फिर 1920 तक भारतीय राजनीति में प्रमुख हो जाने के बाद, उन में काफी अहंकार भी आ गया. तब से वे केवल वैसे ही लोगों के साथ उठना-बैठना पसंद करने लगे, जो उन्हें पहले से महान, महात्मा, अनुकरणीय मान कर चलते हों. डॉ. आंबेडकर के अनुसार गांधी की इस प्रवृत्ति ने भारतीय राजनीति को भारी क्षति पहुंचाई. अपने ऊपर बेतरह आत्मविश्वास और दूसरों को झुकाने, सुधारने का शौक, बल्कि ज़िद्द गांधी में शुरू से थी. जब यह राजनीति में रूपांतरित हुई तो उस की परिणति कुछ अनिवार्य हानियों में होनी ही थी.

लेखक हिंदी के कॉलमनिस्ट और पॉलिटिकल साइंस के प्रोफेसर हैं. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.


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