नए साल की शुरुआत के साथ यह सही वक्त है कि देश भर में उच्च शिक्षा में हुए बदलावों पर नज़र डाली जाए. यह आकलन इसलिए और अहम हो जाता है क्योंकि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020, जिसे आम तौर पर एनईपी कहा जाता है, को लागू हुए पांच साल पूरे हो चुके हैं. इस नीति को देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था की पुरानी समस्याओं के समाधान के रूप में देखा गया था.
एनईपी की ज़रूरत
एनईपी ऐसे समय आई, जब भारतीय विश्वविद्यालय और उच्च शिक्षा संस्थान लगातार दुनिया के शीर्ष 200 विश्वविद्यालयों में जगह बनाने में नाकाम रहे थे. भले ही इन रैंकिंग्स की अपनी सीमाएं हों, लेकिन बार-बार ऐसा होना व्यवस्था की गहरी समस्याओं की ओर इशारा करता है.
एक बड़ी चिंता यह थी कि अलग-अलग विषयों से पढ़कर निकलने वाले ज्यादातर छात्र नौकरी के लायक नहीं बन पा रहे थे. इसे समझने के लिए बस इतना काफी था कि किसी भी बड़े विश्वविद्यालय में गणित, संस्कृत और इतिहास जैसे विषयों में दाखिले के आंकड़े देख लिए जाएं. इनमें पढ़ने वाले ज्यादातर छात्रों को अपने विषय से जुड़ा कोई ठोस काम नहीं मिल पाता था और वे अक्सर ऐसे काम करने को मजबूर हो जाते थे जिनका उनकी पढ़ाई से कोई खास मतलब नहीं होता था.
इसके अलावा, भारत के उच्च शिक्षा संस्थान समाज की ज़रूरतों और चुनौतियों का सही तरीके से समाधान नहीं कर पा रहे थे. शैक्षणिक कार्यक्रमों में उद्यमिता यानी उद्यम शुरू करने की सोच की साफ कमी थी, खासकर जब इसकी तुलना विदेशों के संस्थानों से की जाती है. उदाहरण के लिए 2012 में स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी से जुड़े उद्यमिता इकोसिस्टम की कीमत करीब 3 ट्रिलियन डॉलर आंकी गई थी, जबकि भारत की स्थिति इससे बिल्कुल अलग थी. कोविड-19 के दौरान यूनिवर्सिटी ऑफ ह्यूस्टन ने शहर की अर्थव्यवस्था में करीब 6 अरब डॉलर का योगदान दिया. इसकी तुलना आप हमारे किसी भी उच्च शिक्षा संस्थान से कर सकते हैं.
एनईपी का विज़न और इसके स्तंभ
एनईपी को इन समस्याओं को दूर करने के लिए एक साफ और व्यावहारिक रोडमैप के साथ तैयार किया गया था, जिसमें भविष्य की सोच शामिल थी. यह नीति पांच अहम स्तंभों पर टिकी है:
कोर्स डिज़ाइन: कोर्स को इस तरह तैयार किया जाना चाहिए कि वह देश और समाज की ज़रूरतों को पूरा करे. इसमें ‘कम लेकिन बेहतर’ के सिद्धांत को अपनाया जाए, ताकि छात्रों पर ज़रूरत से ज्यादा बोझ न पड़े.
प्रोजेक्ट आधारित पढ़ाई: छात्रों को समूह में प्रोजेक्ट करने चाहिए, जिससे वे व्यावहारिक रूप से समस्याओं को हल करना सीखें और अनुभव के ज़रिये ज्ञान हासिल करें.
ट्रांसडिसिप्लिनरी तरीका: शिक्षा को पारंपरिक विषयों की सीमाओं से बाहर निकालकर व्यापक और अर्थपूर्ण बनाया जाना चाहिए.
उद्यमिता पर जोर: पढ़ाई के कार्यक्रमों में उद्यमिता से जुड़े कौशल शामिल किए जाने चाहिए, ताकि नवाचार और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिले.
कौशल विकास: संचार कौशल, आलोचनात्मक सोच, डेटा विश्लेषण, सूचना तकनीक और प्रोजेक्ट प्रबंधन जैसे कौशल शुरू से ही सिखाए जाने चाहिए. खासतौर पर ग्रेजुएशन लेवल की शिक्षा पर जोर दिया जाए, जिसे भारत में लंबे समय तक नजरअंदाज किया गया है.
प्रगति और जारी चुनौतियां
इन अच्छी तरह सोची गई रणनीतियों के बावजूद, एनईपी लागू होने के बाद उच्च शिक्षा में बदलाव की रफ्तार सीमित रही है. कुछ सकारात्मक संकेत ज़रूर दिखे हैं, लेकिन कुल मिलाकर असर अभी भी कम है.
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) जैसी एजेंसियां, जिनकी मंशा भले ही अच्छी हो, कई बार एनईपी के प्रभावी क्रियान्वयन में रुकावट बन गई हैं. उदाहरण के तौर पर, यूजीसी की हालिया एडवाइजरी, जैसे कैंपस में आवारा कुत्तों के प्रबंधन से जुड़े निर्देश, ऐसे संचालन संबंधी मुद्दों पर ध्यान दिखाती हैं, जिन्हें संस्थानों को खुद ही संभालना चाहिए.
शिक्षकों की भर्ती व्यवस्था में सुधार और उद्योग तथा अकादमिक जगत के बीच सहयोग जैसे ज्यादा जरूरी मुद्दों पर अभी और ध्यान देने की जरूरत है.
ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था में भारतीय विश्वविद्यालयों का योगदान अब भी कम है, खासकर जब इसकी तुलना एमआईटी और इम्पीरियल कॉलेज जैसे संस्थानों से की जाती है, जिनके शोध और नवाचार से सीधे उनकी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को फायदा हुआ है. कोविड-19 महामारी के दौरान ऑक्सफोर्ड और इम्पीरियल कॉलेज जैसे वैश्विक संस्थानों ने संकट से निपटने में अहम भूमिका निभाई, जबकि भारतीय विश्वविद्यालयों की ओर से ऐसे प्रयास लगभग नदारद रहे. यह स्थिति नियामक संस्थाओं से आत्ममंथन और सक्रिय नेतृत्व की मांग करती है.
जम्मू-कश्मीर का उदाहरण
इन चुनौतियों के बीच कुछ सकारात्मक पहल भी सामने आई हैं, जो एनईपी के उद्देश्यों के अनुरूप हैं.
जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश के विश्वविद्यालयों ने उच्च शिक्षा परिषद के तहत ‘डिज़ाइन योर डिग्री’ नाम से चार साल का एक नया ग्रेजुएशन प्रोग्राम शुरू किया है.
यह कार्यक्रम एनईपी की भावना को पूरी तरह दर्शाता है. इसमें छात्र प्रोजेक्ट आधारित पढ़ाई के ज़रिये समाज और देश की ज़रूरतों से जुड़े मुद्दों पर काम करते हैं. कोर्स में छात्रों को अपनी रुचि के अनुसार वैकल्पिक विषय चुनने की आज़ादी मिलती है, जिससे आत्म-खोज और विशेषज्ञता को बढ़ावा मिलता है. ये वैकल्पिक विषय उद्यमिता से लेकर रोबोटिक्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और क्रिएटिव राइटिंग तक फैले हुए हैं, और छात्रों का मूल्यांकन मुख्य रूप से प्रोजेक्ट के आधार पर होता है.
आगे की राह
जैसे-जैसे भारत विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक की तैयारी कर रहा है, यह ज़रूरी है कि उच्च शिक्षा के लिए बनने वाली नई शीर्ष संस्था यहां उठाई गई चिंताओं पर ध्यान दे.
देश को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स, न्यूक्लियर फ्यूजन, डेटा साइंस और साइबर सुरक्षा में हो रही प्रगति से मिलने वाले अवसरों का लाभ उठाने के लिए खुद को तैयार करना होगा.
भारत के युवाओं में अपार कच्ची प्रतिभा है, जिसे उच्च शिक्षा संस्थानों के ज़रिये तराशने और संवारने की ज़रूरत है. आने वाले सालों में शिक्षा के क्षेत्र में बड़े बदलाव देखने को मिलेंगे, जो एआई और ह्यूमनॉइड जैसी तकनीकों से संचालित होंगे. इन अवसरों को भुनाने के लिए सक्रिय सुधार और दूरदर्शी नेतृत्व बेहद ज़रूरी है.
(दिनेश सिंह, दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति और अमेरिका के टेक्सास स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ ह्यूस्टन में गणित के एडजंक्ट प्रोफेसर हैं. उनका एक्स हैंडल @DineshSinghEDU है. ये उनके निजी विचार हैं.)
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