भारत-अमेरिका व्यापार समझौता भारत के लिए फायदे का है, या यह अमेरिकी दबाव में हुआ सौदा है जिसे भारत ने मजबूरी में मान लिया है? आलोचकों का कहना है कि अमेरिका को इससे बहुत फायदा होगा, जबकि बदले में भारत को बहुत कम मिलेगा. फिर भी, ट्रंप की ताकत से डरकर भारत ने इस समझौते पर दस्तखत कर दिए.
व्यापार समझौतों को आमतौर पर आर्थिक फायदे के आधार पर परखा जाता है, लेकिन यह सिर्फ आर्थिक मामला नहीं होता, खासकर बदलते हुए वैश्विक हालात में. कोई भी व्यापार समझौता केवल आर्थिक सवाल नहीं उठाता, बल्कि राजनीति से जुड़े मुद्दे भी सामने लाता है. इसलिए राजनीतिक नज़रिए से देखना भी ज़रूरी है.
सबसे अहम राजनीतिक बात यह है कि 1945 के बाद जो वैश्विक व्यवस्था बनी थी, वह अब बिखरने के कगार पर है. 1945 के बाद बनी व्यवस्था के दो मुख्य पहलू थे — सुरक्षा और अर्थव्यवस्था.
सुरक्षा उस समय की वैश्विक व्यवस्था की बुनियाद थी. सिर्फ तीन दशकों में दो भयानक विश्वयुद्ध होने के बाद, युद्ध को रोकना अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की सबसे बड़ी प्राथमिकता बन गया था. इसका मतलब था कि ‘महाशक्तियों’ के बीच युद्ध न हो. भारत, पाकिस्तान, चीन, कंबोडिया, वियतनाम, मलेशिया, इंडोनेशिया, उत्तर और दक्षिण कोरिया जैसे छोटे देश आपस में या कभी-कभी बड़ी शक्तियों की ओर से लड़ सकते थे, लेकिन यूरोप में या सोवियत संघ और अमेरिका के बीच, या जापान और अमेरिका के बीच युद्ध नहीं होना चाहिए. इस व्यवस्था को बनाए रखने के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद, नेटो (नॉर्थ एटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन) और पूर्वी एशिया में अमेरिका के रणनीतिक वादे अहम थे.
उस समय एक ग्लोबल इकोनॉमी सिस्टम भी बना, लेकिन वह सुरक्षा व्यवस्था के मुकाबले कम महत्वपूर्ण था. इसके मुख्य आधार थे—‘जनरल एग्रीमेंट ऑन टैरिफ एंड ट्रेड’ (गैट), जो बाद में विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) बन गया; डॉलर, जो अंतरराष्ट्रीय रिजर्व मुद्रा बन गया और मुख्य रूप से अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के जरिए आर्थिक संतुलन को संभालना. 1914 से 1945 के बीच अर्थव्यवस्थाएं भारी टैरिफ (शुल्क) पर आधारित थीं और मुक्त व्यापार से बचा जाता था. उस समय कोई अंतरराष्ट्रीय रिजर्व मुद्रा भी नहीं थी.
शक्ति संतुलन
भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को समझने से पहले यह छोटी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि बताना क्यों ज़रूरी है? क्या भारत इससे दूर नहीं था?
ऐसा नहीं था. अमेरिका सुरक्षा और आर्थिक—दोनों व्यवस्थाओं का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा था. उसकी मौजूदा सरकार की बदलती नीतियों से साफ है कि वह क्या करना चाहती है. इससे यह भी साफ होता है कि भारत के पास असली विकल्प क्या हैं. भारत इस समय बदलती अंतरराष्ट्रीय राजनीति के दबाव में है.
डॉनल्ड ट्रंप का अमेरिका ‘नाटो’ को निशाना बनाकर 1945 के बाद बनी सुरक्षा व्यवस्था को कमजोर करना चाहता है और दुनिया भर में टैरिफ लगाकर वह पुरानी आर्थिक व्यवस्था को बदलना चाहता है. टैरिफ का इस्तेमाल अब सिर्फ आर्थिक नीति के रूप में नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक हथियार के रूप में भी हो रहा है. ट्रंप का कहना है कि दूसरे विश्वयुद्ध के बाद इन व्यवस्थाओं से अमेरिका को जो भी फायदा हुआ हो, आज ये अमेरिकी हितों को नुकसान पहुंचा रही हैं. अगर अमेरिका को नुकसान हो रहा है तो वह क्यों झेले? उनका ‘मागा’ (मेक अमेरिका ग्रेट अगेन) समर्थक वर्ग इससे सहमत है.
मुद्दा यह नहीं है कि यह सही है या गलत. कोई भी तर्क दे सकता है कि अमेरिकी नीति में यह बदलाव गलत है, लेकिन जब तक ट्रंप सत्ता में हैं, इन नई भू-राजनीतिक और आर्थिक सच्चाइयों को नजरअंदाज करना जोखिम भरा होगा.
इसके अलावा, जब गठबंधन आधारित सुरक्षा व्यवस्था कमज़ोर होती है, तब ‘शक्ति संतुलन’ का सिद्धांत ज्यादा अहम हो जाता है. 1945 से पहले ताकतवर देश इसी सिद्धांत पर दुनिया चलाते थे. आज के बदलाव को प्राचीन यूनानी इतिहासकार थुसीडाइड्स के शब्दों में समझा जा सकता है: “ताकतवर वही करते हैं जो वे अपनी ताकत से कर सकते हैं और कमज़ोर वही मानते हैं जो उन्हें मानना पड़ता है.” ट्रंप का अमेरिका इसी सोच में विश्वास करता है.
भारत के लिए आगे के अवसर
भारत अफ्रीका जैसा कमज़ोर नहीं है, लेकिन अमेरिका के मुकाबले उसकी स्थिति क्या है? अमेरिका का जीडीपी 30 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा है, जबकि भारत का करीब 4 ट्रिलियन डॉलर है. अमेरिका में प्रति व्यक्ति आय 85,000 डॉलर है, जबकि भारत में यह 3,000 डॉलर से भी कम है. कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के शब्दों में, भारत को ज्यादा से ज्यादा एक मध्यम शक्ति कहा जा सकता है.
भारत जल्द ही दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है, यह सही है, पर भ्रमकारी भी हो सकता है. अमेरिका की अर्थव्यवस्था भारत से करीब आठ गुना बड़ी है और प्रति व्यक्ति आय के मामले में 28 गुना ज्यादा है. सिर्फ 3,000 डॉलर प्रति व्यक्ति आय वाला देश ‘विश्वगुरु’ नहीं बन सकता. यही वह जगह है जहां भारत और चीन के बीच बड़ा फर्क दिखता है. 1990 के दशक तक चीन भी भारत जितना गरीब था, लेकिन आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसकी सौदेबाजी की ताकत भारत से कहीं ज्यादा है. वजह साफ है—उसका जीडीपी और प्रति व्यक्ति आय दोनों भारत से लगभग पांच गुना ज्यादा हैं. साफ शब्दों में, भारत के आधिकारिक दावों से लगता है कि उसकी सौदेबाजी की ताकत बहुत मजबूत है, लेकिन भारत के पास ज्यादा विकल्प नहीं हैं.
अगर भारत अमेरिका से दूरी बनाता है, तो यह बड़ा शक्ति अंतर उसके फैसलों की सीमाएं तय करेगा, लेकिन निकट भविष्य में अमेरिका से दूरी बनाना संभव नहीं है क्योंकि अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है. भारत का 20 फीसदी निर्यात अमेरिका जाता है. भारत की सॉफ्टवेयर क्रांति भी काफी हद तक अमेरिकी बाज़ार पर टिकी रही है. 1966-1971 के बीच इंदिरा गांधी के समय भारत अमेरिका से दूर जाने की स्थिति में था, क्योंकि उस समय भारतीय अर्थव्यवस्था ज्यादा बंद थी और व्यापार पर कम निर्भर थी. व्यापार फायदा भी देता है और कुछ हद तक निर्भर भी बना देता है.
एक और पहलू है, जिस पर कम ध्यान दिया जाता है. यह ‘चाइना प्लस वन’ रणनीति से जुड़ा है, यानी चीन के अलावा किसी और देश में निवेश करना. चीन और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव के कारण कई कंपनियां चीन के बाहर निवेश पर विचार कर रही हैं, लेकिन वे बड़ी संख्या में भारत आएंगी, यह साफ नहीं है. अगर अमेरिका निर्यात पर भारी टैरिफ लगाता है, तो ‘मेड इन इंडिया’ या ‘असेंबल्ड इन इंडिया’ उत्पादों के लिए अमेरिकी बाजार में जगह बनाना बहुत वमुश्किल होगा.
सार यह है कि नई वैश्विक सच्चाइयों के कारण यह व्यापार समझौता अमेरिका के ज्यादा पक्ष में होना तय था. बराबरी के फायदे की उम्मीद करना शक्ति के असंतुलन को नज़रअंदाज़ करना होगा. भारत के लिए सबसे अच्छे विकल्प ये हो सकते थे: रूस से जुड़े कारणों से लगने वाले 25 फीसदी टैरिफ से बचना; अपने मुख्य कृषि हितों की रक्षा करना और चीन, बांग्लादेश, वियतनाम, थाइलैंड और कुछ हद तक पाकिस्तान जैसे प्रतियोगियों के मुकाबले कम टैरिफ दर सुनिश्चित करना. यह व्यापार समझौता भारत और अमेरिका के बीच बड़े शक्ति अंतर को दिखाता है.
फिर भी, एक सवाल उठता है—क्या आज की सीमाओं को भविष्य के मौके में बदला जा सकता है? अमेरिका, यूरोपीय संघ और ब्रिटेन का कुल जीडीपी दुनिया के कुल जीडीपी का 43-44 फीसदी है. भारत के इन तीनों के साथ व्यापार समझौते हो चुके हैं. कनाडा के साथ भी समझौता दूर नहीं है. इसलिए आर्थिक ताकत बढ़ाने का मौका बन सकता है. अगर श्रम आधारित सेक्टरों को सही समर्थन मिले, तो क्या भारत इस मौके का उपयोग रोजगार बढ़ाने वाली मैन्युफैक्चरिंग के लिए कर सकता है?
यह सब इस उम्मीद पर है कि ट्रंप भारत के मामले में अपना रुख नहीं बदलेंगे. ऐसा ज़रूरी नहीं है. फिर भी, इस व्यापार समझौते से अगर भारत को अमेरिकी बाज़ार में पहुंच मिलती है, तो उसे साथ ही अपनी अर्थव्यवस्था को विविध बनाते रहने की कोशिश भी करनी होगी.
आशुतोष वार्ष्णेय इंटरनेशनल स्टडीज़ और सोशल साइंसेज़ के सोल गोल्डमैन प्रोफेसर और ब्राउन यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल साइंस के प्रोफेसर हैं. व्यक्त विचार निजी हैं.
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