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Saturday, 11 July, 2026
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दिलजीत दोसांझ की ‘सतलुज’ बनी पंजाब का सबसे बड़ा विवाद, यहां तक कैसे पहुंचा मामला

केंद्र सरकार की तीखी राजनीतिक आलोचना करने के साथ-साथ, AAP सरकार ने पूरे पंजाब में 'सतलुज' की कम्युनिटी स्क्रीनिंग को लेकर हुए विवाद से खुद को दूर रखने की भी कोशिश की.

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हाल के समय में शायद ही किसी फिल्म ने पंजाब में दिलजीत दोसांझ की ‘सतलुज’ जितनी राजनीतिक, कानूनी और सार्वजनिक बहस छेड़ी हो. मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर बनी इस फिल्म की रिलीज का लंबे समय से इंतिजार था, लेकिन अब यह पंजाब का सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गई है.

असल में, ‘सतलुज’ को OTT प्लेटफॉर्म ZEE5 से रिलीज के करीब 48 घंटे के भीतर हटाए जाने के बाद विवाद और बढ़ गया. इसके बाद अलग-अलग जगहों पर लोगों ने मिलकर फिल्म की कम्युनिटी स्क्रीनिंग शुरू कर दी, जिससे सेंसरशिप और अभिव्यक्ति की आजादी पर बहस को एक नया मोड़ मिल गया.

यही वजह है कि ‘सतलुज’ विवाद दिप्रिंट का न्यूज़मेकर ऑफ दि वीक है.

OTT से हटाए जाने के बाद फिल्म की पहुंच कम होने के बजाय एक नया विकल्प सामने आया. पंजाब के गांवों के चौकों और गुरुद्वारों के आंगनों तक फिल्म पहुंचाने के लिए स्वयंसेवकों का एक नेटवर्क बन गया.

हालांकि कम्युनिटी स्क्रीनिंग की शुरुआत राजस्थान के एक गांव में हुई पहली स्क्रीनिंग से प्रेरित थी, लेकिन अब राजनीतिक दल भी इसे बढ़ावा दे रहे हैं. शिरोमणि अकाली दल ने घोषणा की है कि वह पंजाब के सभी गांवों में फिल्म की स्क्रीनिंग का खर्च उठाएगा. वहीं पंजाब विधानसभा के स्पीकर और आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ विधायक कुलतार सिंह संधवां ने भी कहा है कि उनके विधानसभा क्षेत्र में समुदाय स्तर पर फिल्म दिखाई जाएगी.

फिल्म का सफर बिल्कुल सामान्य नहीं रहा. हनी त्रेहन के निर्देशन में बनी और दिलजीत दोसांझ अभिनीत ‘सतलुज’, जिसका मूल नाम ‘पंजाब ’95’ था, जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित है. खालड़ा ने पंजाब में उग्रवाद के दौर में कथित अवैध अंतिम संस्कारों और लोगों के गायब होने के मामलों को उजागर किया था. बाद में 1995 में उनका अपहरण कर हत्या कर दी गई थी. फिल्म कई साल तक अटकी रही क्योंकि केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) ने इसमें कई बड़े बदलाव मांगे थे, जिनमें फिल्म का नाम और यहां तक कि खालड़ा का नाम बदलना भी शामिल था. निर्माताओं ने कहानी में बदलाव से इनकार कर दिया, जिसके कारण प्रमाणन को लेकर लंबी कानूनी लड़ाई चली और फिल्म की रिलीज करीब चार साल तक टल गई.

जब 3 जुलाई को फिल्म आखिरकार ZEE5 पर रिलीज हुई तो लोगों को लगा कि लंबे इंतजार का अंत हो गया. लेकिन इसके बजाय नया विवाद शुरू हो गया. दो दिन के भीतर भारत में दर्शकों के लिए फिल्म उपलब्ध नहीं रही. ZEE5 ने कहा कि मौजूदा घटनाक्रम को देखते हुए और कानूनी विकल्पों पर विचार करते हुए यह फैसला लिया गया है. बाद में सरकारी सूत्रों ने संकेत दिया कि केंद्र ने सुरक्षा संबंधी चिंताओं का हवाला देते हुए फिल्म हटाने को कहा था और मामले की आगे जांच के लिए इसे सूचना प्रौद्योगिकी नियम, 2021 के तहत बनी अंतर-विभागीय समिति को भेजने की योजना बनाई है.

राजनीतिक जंग

फिल्म हटाए जाने के बाद राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप भी तेज हो गए. अलग-अलग विचारधाराओं के नेताओं ने इस फैसले की आलोचना तो की, लेकिन इसके लिए जिम्मेदार कौन है और यह विवाद क्या दर्शाता है, इस पर उनके विचार अलग-अलग रहे.

शिरोमणि अकाली दल सबसे पहले इस फैसले के खिलाफ सामने आया. पार्टी ने इसे अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला बताया और सवाल उठाया कि जो फिल्म पहले ही दर्शकों तक पहुंच चुकी थी, उसे वापस क्यों लिया गया. शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) ने भी फिल्म का समर्थन करते हुए कहा कि खालड़ा की कहानी लोगों तक पहुंचनी चाहिए.

सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी ने इस विवाद को बीजेपी और कांग्रेस दोनों पर राजनीतिक हमला करने का मौका बनाया. पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने आरोप लगाया कि फिल्म हटाना पंजाब के सबसे काले अध्यायों में से एक को मिटाने की कोशिश है. उन्होंने कहा कि दोनों पार्टियां नई पीढ़ी को उग्रवाद के दौर और मानवाधिकार उल्लंघन के आरोपों के बारे में जानने से रोकना चाहती हैं.

केंद्र पर राजनीतिक हमला तेज करने के साथ-साथ AAP सरकार ने पंजाब में हो रही कम्युनिटी स्क्रीनिंग के विवाद से खुद को अलग रखने की भी कोशिश की. पंजाब AAP अध्यक्ष अमन अरोड़ा ने कहा कि राज्य सरकार नागरिकों द्वारा आयोजित निजी स्क्रीनिंग में हस्तक्षेप नहीं करेगी. उन्होंने कहा कि फिल्म की आधिकारिक उपलब्धता का फैसला केंद्र सरकार के हाथ में है.

उधर बीजेपी खुद को एक जटिल राजनीतिक स्थिति में पाती दिखी. पंजाब बीजेपी अध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों ने कहा कि उन्होंने यह मामला केंद्र सरकार के सामने उठाया, जिसके बाद सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने फिल्म हटाए जाने की परिस्थितियों की समीक्षा के लिए तीन सदस्यीय समिति बनाई. पंजाब बीजेपी ने इसे इस बात का संकेत बताया कि केंद्र विवाद को और बढ़ने देने के बजाय संस्थागत प्रक्रिया के जरिए दोबारा देखने को तैयार है.

फिल्म की कहानी ने पंजाब में उग्रवाद के दौर में पुलिस की भूमिका पर भी बहस फिर से छेड़ दी. एक पक्ष ने दशकों तक चले हिंसा और आतंकवाद को खत्म करने में पंजाब पुलिस की क्षमता और बहादुरी पर जोर देते हुए कहा कि फिल्म एकतरफा और बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया नजरिया दिखाती है. वहीं दूसरे पक्ष ने उस दौर में पुलिस द्वारा “25,000” कथित फर्जी मुठभेड़ों और न्यायेतर हत्याओं की कहानी को समर्थन दिया.

केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू, जिनके दादा और पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की 1995 में सिख उग्रवादियों ने हत्या कर दी थी, ने कहा कि उन्हें फिल्म के विषय से कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन यह उस दौर की “एकतरफा कहानी” दिखाती है. उन्होंने दिलजीत दोसांझ को “इम्पोस्टर” कहा और आरोप लगाया कि वह पैसे कमाने के लिए पंजाब के लोगों को गुमराह कर रहे हैं. बिट्टू ने दोसांझ और हनी त्रेहन को चुनौती दी कि वे उस दौर में उग्रवादियों द्वारा पुलिस अधिकारियों की हत्या पर भी फिल्म बनाएं. उन्होंने गुरुवार को लुधियाना में पत्रकारों से कहा, “ये लोग पंजाब का शांतिपूर्ण माहौल खराब करने की कोशिश कर रहे हैं.”

इस विवाद ने जसवंत सिंह खालड़ा के अपहरण और हत्या के मामले को भी फिर से चर्चा में ला दिया है. इस मामले में दोषी ठहराए गए एक पुलिस अधिकारी को लेकर भी राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है. अकाली नेता बिक्रम सिंह मजीठिया ने खालड़ा हत्याकांड में दोषी पंजाब पुलिस के पूर्व डिप्टी कमिश्नर ऑफ पुलिस (DCP) जसपाल सिंह को 2023 में जमानत मिलने की परिस्थितियों पर सवाल उठाए. मजीठिया ने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री भगवंत मान के नेतृत्व वाली AAP सरकार ने केंद्र से उसकी सजा कम करने की सिफारिश की थी.

मजीठिया ने उन खबरों पर भी सवाल उठाए जिनमें कहा गया था कि अंतरिम जमानत के दौरान जेल रिकॉर्ड में दर्ज पते पर दोषी का पता नहीं चल सका. उन्होंने कहा कि यह निगरानी और जवाबदेही में गंभीर चूक को दिखाता है.

AAP ने इन आरोपों को खारिज किया. पार्टी के पंजाब महासचिव बलतेज पन्नू ने कहा कि मजीठिया इस मुद्दे का राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि CBI के मामलों में समय से पहले रिहाई की किसी भी अर्जी पर फैसला गृह मंत्रालय करता है, पंजाब सरकार नहीं.

धर्म और कानूनी पहलू

इस मुद्दे का एक मजबूत धार्मिक पहलू भी है. श्री अकाल तख्त साहिब सचिवालय ने कड़ा बयान जारी करते हुए जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गर्गज ने ‘सतलुज’ पर रोक की निंदा की. उन्होंने इसे अभिव्यक्ति की आजादी दबाने और उग्रवाद के दौर में सिखों पर हुए कथित अत्याचारों की सच्चाई लोगों तक पहुंचने से रोकने की कोशिश बताया.

जसवंत सिंह खालड़ा द्वारा कथित अवैध अंतिम संस्कारों और फर्जी मुठभेड़ों के मामलों का जिक्र करते हुए जत्थेदार ने कहा कि सच्चाई को हमेशा के लिए दबाया नहीं जा सकता. उन्होंने कहा कि अगर दूसरे समुदायों के दर्द पर बनी फिल्में खुलकर दिखाई जा सकती हैं, तो सिखों के साथ जो हुआ उसे दिखाने वाली फिल्म पर रोक लगाने का कोई औचित्य नहीं है. उन्होंने मोहाली की CBI अदालत द्वारा फर्जी मुठभेड़ मामलों में सुनाई गई सजाओं का भी जिक्र किया और सरकार से उस दौर के पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए ज्यादा ईमानदार रुख अपनाने की अपील की. शुक्रवार को SGPC ने फिल्म रिलीज करने की मांग को लेकर अमृतसर में स्वर्ण मंदिर से डिप्टी कमिश्नर कार्यालय तक विरोध मार्च निकाला.

यह विवाद अब राजनीति से निकलकर अदालत तक भी पहुंच गया है. बुधवार को पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई, जिसमें OTT प्लेटफॉर्म पर फिल्म को फिर से उपलब्ध कराने की मांग की गई. याचिका में कहा गया है कि रिलीज के बाद फिल्म हटाना संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत मिले अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार का उल्लंघन है. साथ ही यह भी सवाल उठाया गया है कि इस फैसले का कानूनी आधार सार्वजनिक रूप से क्यों नहीं बताया गया.

विचार निजी हैं. 

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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