ग्राफ़िक: सोहम सेन के द्वारा । दिप्रिंट
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कुछ दशक पहले की बात होती तो किसी देवता को दलितों का बताने से दलित खुश हो जाते. नीचे की और मझौली जातियों ने एक समय में ढेर सारे देवता आपस में बांट भी लिए थे. यादवों ने कृष्ण को ले लिया और कृष्ण को यदुवंशी घोषित कर दिया, तो कुशवाहा ने कुश से संबंध जोड़ लिया, कुर्मियों ने लव को पकड़ लिया तो कहारों ने जरासंघ को अपना पूर्वज बताया. लोहारों ने विश्वकर्मा के साथ संबंध जोड़ा. दलितों की एक जाति ने वाल्मीकि से अपना नाता जोड़ा वहीं कुम्हारों का संबंध ब्रह्मा से बना. तमाम जातियों को कोई न कोई देवता या कुलदेवता या ऋषि पूर्वज के तौर पर मिल गए. सदियों की वंचना और अपमान से छुटकारा पाने का ये जातियों का अपना तरीका था. शूद्र और अतिशूद्र होने के अपमान से मुक्ति पाने के लिए ऐसा किया गया. ये जाति व्यवस्था से विद्रोह भी था और ऊंची जातियों की तरह बनने की लालसा भी, जिसे एन.एन. श्रीनिवास संस्कृतिकरण कहते हैं.

लेकिन राजस्थान की एक चुनावी सभा में जब यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हनुमान को दलित कहा तो दलित समाज में इसकी अलग ही प्रतिक्रिया हुई. सोशल मीडिया पर इसका जमकर मज़ाक उड़ाया गया. दलितों के व्हाट्सऐप ग्रुप में ऐसे मैसेज खूब चले जिसमें हनुमान को जय भीम बोलते या सीना चीरकर अंदर बाबा साहेब आंबेडकर भी तस्वीर दिखाते दर्शाया गया. लेकिन सबसे अलग प्रतिक्रिया आगरा और लखनऊ से आई, जहां दलितों ने हनुमान मंदिर पर कब्ज़ा कर लिया और खुद पुजारी बन गए और दक्षिणा पर दावा ठोक दिया. भीम आर्मी से लेकर ऑल इंडिया आंबेडकर महासभा जैसे संगठनों ने मांग उठाई कि सभी हनुमान मंदिर दलितों को सौंप दिए जाएं, उन्हें पुजारी बनाया जाए और दक्षिणा की रकम भी उन्हें ही दी जाए.

इसे लेकर आंबेडकरवादियों के एक खेमे से ये प्रतिक्रिया आई कि ये दलित आंदोलन का भटकाव है. दलितों को शिक्षा पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए और संगठित होकर लोकतांत्रिक संस्थाओं और संसद पर कब्जा करने की कोशिश करनी चाहिए. ऐसे लोगों का कहना है कि मंदिरों के चक्कर में दलितों को नहीं पड़ना चाहिए क्योंकि आखिरकार इससे धर्म की ही सत्ता मजबूत होती है, जो जातिवाद का स्रोत है.


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जबकि दूसरे पक्ष का कहना है कि राजनीतिक सत्ता, अर्थसत्ता और ज्ञान की सत्ता के साथ धर्म की भी एक सत्ता होती है. धर्म की सत्ता में न सिर्फ ढेर सारा पैसा और रोजगार है, बल्कि धर्म संस्था के संचालकों की समाज में बहुत ज्यादा प्रतिष्ठा भी है. वे एक तरह से समाज में विचारों के नियंता भी हैं. दलितों के चाहने भर से धर्म और उसकी सत्ता के केंद्र खत्म नहीं हो जाएंगे. इसलिए ज़रूरी है कि उनके संचालन में विविधता यानी डायवर्सिटी हो. इसलिए दलितों की लंबे समय से मांग रही है कि उन्हें भी पुजारी बनाया जाए. दक्षिण भारत के कुछ मंदिरों में टोकनिज़्म के तौर पर ये हुआ भी है. पटना के प्रसिद्ध महावीर मंदिर में दलित पुजारी बनाए गए. हालांकि इन दलित पुजारियों के पास कोई सत्ता नहीं होती और न ही उन्हें वो आदर और सम्मान हासिल होता है, जो अन्य पुजारियों को जन्म के संयोग की वजह से अपने आप मिल जाता है.

इस विवाद के बीच ये जान लेना उपयोगी होगा कि संविधान की ड्राफ्टिंग कमेटी के चेयरमैन और देश के पहले कानून मंत्री बाबा साहेब भीम राव आंबेडकर मंदिरों में पुजारियों की नियुक्ति के बारे में क्या कहते हैं.


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बाबा साहेब ने इस बारे में अपनी किताब एनिहिलेशन ऑफ कास्ट यानी जाति का विनाश ( अनुवादक – राजकिशोर, प्रकाशक – फारवर्ड प्रेस बुक्स) किताब में लिखा है. ये दरअसल किताब नहीं, बाबा साहेब का लाहौर में जाति-पाति तोड़क मंडल की 1936 की सभा में देने के लिए लिखा गया भाषण है, जो उन्हें देने नहीं दिया गया. इसकी वजह ये थी कि जाति-पाति तोड़क मंडल के लोग इस भाषण में संशोधन चाहते थे और खासकर वेद के बारे में कही गई बातों को हटवाना चाहते थे. बाबा साहेब इसके लिए तैयार नहीं हुए और उनका लाहौर जाकर भाषण देने का प्लान कैंसिल हो गया. इसी भाषण को बाबा साहेब ने मुंबई में प्रकाशित करवा लिया.

बहरहाल इस भाषण में बाबा साहेब पुजारी संस्था और उसमें नियुक्तियों के बारे में लिखते हैं कि –

1. बेहतर होगा अगर हिंदुओं में पुजारीगीरी को समाप्त कर दिया जाए. लेकिन चूंकि यह असंभव होगा, इसलिए पुजारीगीरी कम से कम पैतृक आधार पर न हो.

2. प्रत्येक व्यक्ति को जो खुद को हिंदू घोषित करता है, उसे खुद को पुजारी बनने पात्र मानना चाहिए.

3. ऐसा कानून होना चाहिए कि जब तक कोई हिंदू, सरकार द्वारा पुजारी बनने के लिए निर्धारित परीक्षा पास न कर ले और राज्य उसे लिखित तौर पर पर ऐसा करने की अनुमति न दे दे, तब तक कोई व्यक्ति पुजारी न बन पाए.

4. जिसके पास सरकार का आदेश न हो, उनके द्वारा किए गए धार्मिक कर्मकांड और अनुष्ठान वैध नहीं होंगे और ऐसे व्यक्ति के पुजारी बनने और अनुष्ठान कराने को दंडनीय अपराध बना दिया जाए.

5. इस तरह परीक्षा के बाद नियुक्त पुजारी को सरकार का कर्मचारी होना चाहिए और उन पर वे सभी कानून उसी तरह लागू होने चाहिए, जैसे कि वे बाकी लोगों पर लागू होते हैं.

6. जिस तरह से देश में आईएएस अधिकारियों की संख्या तय होती है, उसी तरह पुजारियों की संख्या भी तय होनी चाहिए.

बाबा साहेब लिखते हैं कि कुछ लोगों को ये नियम कड़े लग सकते हैं. लेकिन जब हर पेशे के लिए कायदे कानून हैं तो पुजारियों के लिए क्यों नहीं. पुजारी ही एकमात्र ऐसा व्यवसाय है जिसके लिए किसी योग्यता की जरूरत नहीं होती और जिसके लिए कोई नैतिक नियम भी नहीं हैं. एक पुजारी मूर्ख हो सकता है, शारीरिक रूप से किसी गंदे रोग का शिकार हो सकता है, नैतिक रूप से पतित हो सकता है, फिर भी वह मंदिर के गर्भ गृह में प्रवेश का अधिकारी होता है. यह सब इसलिए संभव है क्योंकि पुजारी बनने के लिए पुजारी की जाति में पैदा होना काफी है.

इसलिए बाबा साहेब चाहते हैं कि पुजारियों को नियम कानून के दायरे में लाया जाए और उनके कर्तव्य निर्धारित किए जाएं. उनकी स्पष्ट राय है कि पुजारी का व्यवसाय सभी लोगों के लिए खुलने से इस संस्था का लोकतांत्रीकरण होगा और इससे ब्राह्मणवाद और जाति संस्था का अंत करने में मदद मिलेगी. बाबा साहेब ने ये भाषण उच्च जाति के हिंदुओं की सभा मे देने के लिए तैयार किया था. वे इस भाषण में आगे लिखते हैं कि इस सुधार का विरोध नही किया जाना चाहिए क्योंकि ब्राह्मणवाद वो जहर है जिसने हिंदू धर्म को बर्बाद कर दिया है.

अब जबकि दलित समुदाय और संगठन हनुमान मंदिरों में या बाकी मंदिरों में पुजारी बनना चाहते हैं तो वे पुजारी संस्था के लोकतांत्रीकरण के बाबा साहेब की योजना के पक्ष में काम कर रहे हैं.


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क्या सरकार कानून बनाकर देश के तमाम मंदिरों में दलित और पिछड़ी जाति के लोगों और अब्राह्मण सवर्णों तथा तमाम जातियों की महिलाओं को पुजारी बनाएगी? क्या अखिल भारतीय या राज्य स्तर पर पुजारी नियुक्ति परीक्षा आयोजित की जाएगी और इसमें आरक्षण भी लागू किया जाएगा?

क्या बीजेपी बाबा साहेब के इस सपने को पूरा करने के लिए तैयार है? या फिर वह बाबा साहेब के नाम पर तीर्थ बनाकर और उन्हें फूलमाला चढ़ाकर काम चला लेना चाहेगी?

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)


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