राजस्थान में पुष्कर के ब्रम्हा मंदिर में पूजा करते कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी. (फोटो: पीटीआई)
Text Size:
  • 2.2K
    Shares

राहुल गांधी ब्राह्मण पहचान को कंधे पर टंगे जनेऊ से लेकर भाषणों तक के सहारे ज़ाहिर कर रहे हैं. कभी जनेऊ दिखा रहे हैं तो कभी अपनी जाति और अपना गोत्र बता रहे हैं. वे बनियान उतारकर मंदिर-मंदिर घूम रहे हैं और खुद को कौल ब्राह्मण बता रहे हैं. भारतीय राजनीति के आदि पंडितजी यानी पंडित जवाहरलाल नेहरू की चौथी पीढ़ी फिर से पंडितजी कहलाना चाहती है.

वैसे तो राहुल गांधी की एक कॉस्मोपोलिटन, ग्लोबल पहचान है. वे एक साथ कई आइडेंटिटी रखते हैं. वैसे ही जैसे कि हम सब की कई आईडेंटिटी हैं. हमारी आईडेंटिटी हमारा धर्म है, भाषा है, जाति है, पेशा है, विचारधारा है, चमड़े का रंग है, सेक्स है, सेक्स ओरिएंटेशन है, राजनीतिक दल की सदस्यता है, ग्रामीण या शहरीपना है, नागरिकता है, हम किसी संस्था से पढ़े हैं, हम और भी बहुत कुछ हैं. हम इन सबसे मिलकर बनते हैं. लेकिन इनमें से कुछ पहचान प्राथमिक है तो कुछ सेकेंडरी. कई बार हम चुनते हैं कि हम किसी खास समय में किस पहचान को प्राथमिक रखें और किसे सेकेंडरी और किस पहचान को छिपा लें.

राहुल इस समय अपने ब्राह्मण होने को प्राइमरी पहचान के तौर पर पेश कर रहे हैं. चूंकि समय चुनाव का है तो निश्चित रूप से ब्राह्मण कहलाने में राहुल गांधी को कुछ या बहुत फायदा नजर आ रहा होगा.

क्या ब्राह्मण होना या कहलाना फायदे की बात है? क्या यह कोई प्रिविलेज है? आइए इसकी जांच करते हैं.

सोशल प्रिविलेज होता क्या है? सामाजिक न्याय की सारी बहस आम तौर पर वंचितों और पीछे रह गए समुदायों के आसपास होती है कि उन्हें किस तरह दबाया गया और उनकी भलाई के लिए क्या करना है. सामाजिक न्याय की एक काल्पनिक लाइन की कल्पना करें और पूरे समाज को दो हिस्सों – सवर्ण और बहुजन – में बांटे तो चर्चा सामाजिक न्याय की लाइन के नीचे के लोगों यानी एसी-एसटी-ओबीसी-माइनॉरिटी की पीड़ा और उनकी वंचना की होती है. इस बात पर कम ही बात होती है कि सोशल जस्टिस की लाइन के ऊपर यानी सवर्ण परिवार में जन्म होने की वजह से क्या किसी व्यक्ति को कुछ विशेषाधिकार मिल जाते हैं? क्या सवर्णों में भी सबसे श्रेष्ठ ब्राह्मण जाति में पैदा होना कुछ स्पेशल प्रिविलेज लेकर आता है?


यह भी पढ़ें: लालू यादव ने वंचित जनता को स्वर्ग नहीं, लेकिन स्वर ज़रूर दिया


डॉ. पेगी मैकिन्टोस ने ऐसी ही एक थीसिस 1989 में प्रकाशित की थी, जिसका शीर्षक था “ह्वाइट प्रिविलेज: अनपैकिंग द इनविजिबल नैपसैक”. जिसका हिंदी अनुवाद होगा- श्वेत विशेषाधिकार: एक अदृश्य पोटली को खोलकर देखना.

डॉ. मैकिंन्टोस का जन्म श्वेत परिवार में हुआ और उनकी पीएचडी हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से हुई. ड़ॉ. मैकिन्टोस फेमिनिस्ट हैं और इसी विषय पर उनका ज़्यादा काम है. वेलिस्ली सेंटर में काम करते हुए उनकी अश्वेत सहकर्मियों ने जब ये कहा कि उन्हें श्वेत महिलाओं के उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है तो उन्होंने इस बारे में सोचना शुरू किया कि क्या सिर्फ श्वेत परिवार में पैदा होने की वजह से उन्हें कुछ ऐसा हासिल है, जो अश्वेतों को नहीं मिलता.

डॉ. मैकिन्टोस कहती हैं कि जो श्वेत लोग सज्जन हैं वे भी ह्वाइट प्रिविलेज का लाभ जाने-अनजाने लेते हैं. ये प्रिवेलेज उन्हें अपने आप मिलते हैं. इससे पूरी तरह बचा भी नहीं जा सकता. इस प्रिविलेज को पाने वाले नहीं मानते कि उन्हें कोई प्रिविलेज मिल रहा है. कई बार उन्हें सचमुच पता नहीं होता कि चमड़े के रंग के कारण वे प्रिविलेज्ड हैं.


यह भी पढ़ें: ओबीसी नरेंद्र मोदी ने ‘ओबीसी’ के लिए क्या किया?


राहुल गांधी के ब्राह्मण दिखने की होड़ के बीच, हम भारत के संदर्भ में जानने की कोशिश करते हैं कि भारत में ब्राह्मण होने का क्या मतलब है और क्या उन्हें भी वैसे ही प्रिविलेज हासिल हैं, जैसे प्रिविलेज श्वेत लोगों को अमरिका, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया में मिलते हैं.

अमेरिका में ह्वाइट प्रिविलेज की थीसिस एक श्वेत महिला ने लिखी. भारत में कोई ब्राह्मण चूंकि ब्राह्मण प्रिविलेज पर बात नहीं कर रहा है, इसलिए ये काम मुझे करना पड़ रहा है. भारत में ब्राह्मण तो ये मानने को भी तैयार नहीं है कि उसे कोई प्रिविलेज मिलता है. बल्कि उसका तर्क है कि उसे जो ऊंचा स्थान हासिल है वह उसकी मेरिट की वजह से है. बेहतर होता कि ये थीसिस कोई ब्राह्मण लिखता, जिसे अपने समाज का बेहतर अनुभव है.

ब्राह्मण प्रिविलेज क्या है?

1) अगर मैं ब्राह्मण हूं तो समाज में मुझे आदर मिलेगा और मेरे नाम के साथ जी या पंडित जोड़ा जाएगा

2) अगर मैं ब्राह्मण हूं तो मुझे देश की किसी भी हाउसिंग सोसायटी में घर मिलने में दिक्कत नहीं होगी.

3) सारे पब्लिक स्पेसेस मेरे लिए खुले होंगे.

4) देश भर में हर जगह मेरी सांस्कृतिक अभिरुचि का भोजन परोसने वाले रेस्टोरेंट मिल जाएंगे

5) अगर मेरे पड़ोसी या को-ट्रेवलर को अचानक मेरी जाति का पता चल जाए तो इसकी वजह से वह मुझसे नफरत नहीं करेगा/करेगी या न ही मुझे नीची निगाह से देखेगा/देखेगी.

6) अगर मैं ब्राह्मण हूं तो ब्राह्मण मेट्रिमोनी डॉट क़ॉम में अपनी या अपनी बेटी या बेटा की प्रोफाइल डालने के बावजूद मुझे जातिवादी नहीं माना जाएगा.

7) अगर मैं ब्राह्मण हूं तो इस बात के काफी मौके हैं कि यूनिवर्सिटी में एडमिशन के लिए होने वाले इंटरव्यू बोर्ड में मेरी जाति के लोग ज़रूर होंगे.

8) अगर मैं ब्राह्मण हूं और गरीब हूं तो भी मेरी इज़्ज़त समाज में बनी रहेगी, “एक गांव का एक गरीब ब्राह्मण” कहानियों में ब्राह्मण को हमेशा विद्वान और नीतिवान माना जाता है.

9) अगर मैं ब्राह्मण हूं तो मेरे बच्चों के सिलेबस में जो कहानियां या किताबें पढ़ने को दी जाएंगी, उनमें से ज़्यादातर के लेखक मेरी जाति के होंगे.

10) जब भारतीय संस्कृति या हिंदू संस्कृति या सभ्यता की बात होगी तो मुझे मालूम होगा कि इसका निर्माण मेरी जाति के लोगों ने किया है और मेरी जाति इसके शिखर पर है.

11) मैं देश के किसी भी तीर्थ स्थान पर जाऊंगा तो वहां मेरे ठहरने की व्यवस्था हो जाएगी.

12) अगर मैं विदेश जाऊं तो वहां के भारतीय डायस्पोरा में मेरी जाति के लोग बहुसंख्यक होंगे और उन्हें डायवर्सिटी के सिद्धांत के तहत एशियन कटेगरी में होने का लाभ मिल रहा होगा.

13) अमेरिका या यूरोप में डायवर्सिटी प्रोग्राम के कारण काम मिलने के बावजूद मुझे कम टैलेंटेड नहीं माना जाएगा, न ही मैं खुद को कम टैलेंटेड मानूंगा.

14) भारत में डायवर्सिटी और अफरमेटिव एक्शन का मैं विरोध करूंगा और इसके बावजूद मुझे जातिवादी नहीं माना जाएगा.

15) भारतीय शास्त्रीय संगीत के नाम पर जो कुछ सुना जा रहा है, उसमें से ज़्यादातर मेरी जाति से संबंधित होगा.

16) मुझे मंदिरों में पुजारी होने का शत प्रतिशत आरक्षण प्राप्त होने के बावजूद मैं आसानी से संवैधानिक आरक्षण का विरोध कर सकता हूं.

17) जब मैं बोलूंगा तो लोग मेरे सरनेम के कारण डिफॉल्ट के तौर पर मान लेंगे कि मैं ज्ञान की बात कर रहा हूं. बेशक उस विषय पर मेरा ज्ञान शून्य होगा.

18) मुझे देश की 85 प्रतिशत बहुजन आबादी के बारे में कुछ भी नहीं पता हो तो भी मुझे पूरे भारतीय समाज का जानकार माना जाएगा.

19) मेरी देशभक्ति स्वयंसिद्ध है और मेरी जाति के लोगों के विदेश का जासूस होने को मेरी जाति से जोड़कर नहीं देखा जाएगा.

20) राष्ट्र की मुख्यधारा का मैं जन्मना सदस्य हूं.

21) प्राइवेट सेक्टर, विशेषकर आईटी सेक्टर में मुझे नौकरी आसानी से मिल जाएगी, क्योंकि मेरी जाति के लोग वहां के ज़्यादातर शीर्ष पदों पर मौजूद हैं. लेकिन ऐसा होने के बावजूद मैं खुद को जातिवादी नहीं मानूंगा.

22) मैं पिछड़ी और दलित जातियों के हक में बोलूंगा तो मुझे मानवतावादी और लोकतांत्रिक माना जाएगा. लेकिन यही काम पिछड़ी और दलित जाति का कोई आदमी करे तो उसे जातिवादी करार दिया जाएगा.

23) मैं जब न्यूज़ चैनल खोलूंगा तो स्क्रीन पर खबर पढ़ने वाली या वाला और विशेषज्ञों में ज़्यादातर लोग मेरी जाति के होंगे. किसी भी विषय पर बहस में ऐसा समय शायद ही कभी होगा, जब स्क्रीन पर मेरी जाति का कोई सदस्य न हो.

24) अखबारों में ज़्यादातार लेख मेरी जाति के लोगों द्वारा लिखे हुए होंगे.

25) यूनिवर्सिटी लाइब्रेरी की सेल्फ मेरी जाति के लोगों की लिखी किताबों से भरी होगी.

26) मैं बेवकूफी भरी हरकत कर सकता/सकती हूं और इसके लिए मेरी जाति को ज़िम्मेदार नहीं माना जाएगा.

27) मैं इस बात के लिए खुद को महान मान सकता हूं कि मैंने दलित के साथ खाना शेयर किया है या मैं किसी दलित की शादी में गया था. इस बात को मैं अपने जातिवादी न होने के प्रमाण के तौर पर पेश कर सकता हूं.

28) अगर ह़ॉस्टल में मेरा/मेरी रुममेट दलित या ओबीसी है, तो इसे मैं अपने जातिवादी न होने के सबूत के तौर पर पेश कर सकता हूं.

29) अगर मैं ब्राह्मण हूं और मैंने कोई अपराध किया है, तो इस बात के चांस हैं कि उच्च न्यायपालिका में मेरा केस मेरी ही जाति का कोई जज सुन रहा होगा.

30) अगर मैं अपराधी हूं तो इस वजह से मेरी जाति को अपराधी नहीं कहा जाएगा. न ही मेरे अपराध से मेरी जाति को जोड़कर देखा जाएगा.

31) मैं अगर ब्राह्मण हूं तो ब्राह्मण प्रिविलेज पर लिखी मेरी थीसिस छप जाएगी और उस रिसर्च जर्नल के संपादक बोर्ड में कई सदस्य मेरी जाति के होंगे.

इन प्रिविलेज में कोई बुरी बात नहीं है. बुरा अगर है तो सिर्फ यह कि ये समाज में दूसरी जातियों को उपलब्ध नहीं है. राहुल गांधी ब्राह्मण प्रिविलेज के बारे में जानते हैं. इसलिए वे ब्राह्मण पहचान को बताने में जुटे हैं.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)


  • 2.2K
    Shares
Share Your Views

कोई जवाब दें

Please enter your comment!
Please enter your name here