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Sunday, 16 June, 2024
होममत-विमतनेशनल इंट्रेस्टएक वायरस ने सबको बांट दिया है- ऐसा क्यों लग रहा कि महामारी पर भारत में कोई कंट्रोल में नहीं

एक वायरस ने सबको बांट दिया है- ऐसा क्यों लग रहा कि महामारी पर भारत में कोई कंट्रोल में नहीं

कोरोना महामारी पर सारी बहस वैचारिक खेमों के हिसाब से बंटी दिखाई देती है, भाजपा के बड़े नेता अपने संकीर्ण राजनीतिक हित साधने के लिए इस विभाजन का फायदा उठा रहे हैं, और कुल मिलाकर यही लग रहा है की हालात किसी के काबू में नहीं है.

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क्या वायरस का कोई धर्म भी होता है? क्या महामारी की कोई विचारधारा होती है? और क्या हाइड्रोक्सिक्लोरोक्वीन जैसी मामूली दवा के साथ कोई राजनीति जुड़ी हो सकती है?

बदकिस्मती से इन तीनों सवाल का जवाब ‘हां’ है. यह बताता है कि आज के हमारे समय में जहर कितना घुल चुका है. और यह भी बताता है कि इस कोरोना महामारी के खिलाफ लड़ाई में पूरी दुनिया में, और अब भारत में भी इतनी अराजकता क्यों है. जो लड़ाई एक सख्त, सम्पूर्ण लॉकडाउन से शुरू हुई थी और जिसमें हर कोई शामिल था, उसका हश्र सत्ता पक्ष और विपक्ष, केंद्र सरकार और गैर-भाजपा दलों द्वारा शासित राज्यों के बीच सियासी तू-तू-मैं-मैं के रूप में निकला है.

इससे भी निराशाजनक बात यह है कि हमारी अधिकतर सार्वजनिक बहसों का हश्र यही होता है, चाहे मसला जीवन-मरण का सवाल खड़ा कर देने वाले ऐसे संकट का ही क्यों ना हो, जबकि हमें इसके बहाने अपनी दलगत भावनाओं, अंधभक्ति, घोर नफरत, आशंकाओं या कल्पनाओं में ना उलझकर इससे निपटने पर ध्यान देना चाहिए था.

हमारे देश में वायरस को बहुत पहले ही मजहब के साथ जोड़ दिया गया, जब इसके फैलाव के लिए तबलीग़ी जमात वालों को जिम्मेदार ठहरा दिया गया. यहां तक कि गुजरात के मुख्यमंत्री ने अभी दो सप्ताह पहले कहा कि उनके राज्य में वायरस तभी फैला जब जमात वाले वहां लौट आए. गौरतलब है कि उनका अपना राज्य देश में इस महामारी से सबसे ज्यादा प्रभावित तीन राज्यों में शामिल है. जमात का जमावड़ा मार्च के मध्य में हुआ था. तीन महीने किसी भी वायरस की ज़िंदगी के लिए बहुत लंबा समय होता है. इस वायरस के कारण मौतों का जो आंकड़ा आज है वह मध्य-मार्च में इनके आंकड़े से 20 गुना ज्यादा है, और आज कोई जमात को याद नहीं कर रहा.


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इस बीच दूसरी खबरें भी आईं. महाराष्ट्र के नांदेड़ से लौटे सिख तीर्थयात्रियों द्वारा भी वायरस को फैलाने की बात उठी. वायरस का किसी धर्म से लगाव नहीं होता, बेशक धार्मिक जमावड़े से जरूर होता है. दरअसल, दुष्टता करने के मामले में वायरस काफी धर्मनिरपेक्ष है लेकिन हमारे बेईमानी भरे तर्कों के लिए उसे किसी एक धर्म से जोड़ना बहुत मुफीद लगता है.

इस महामारी के बारे में लॉकडाउन से लेकर इसके इलाज-उपचार, संक्रमण और मौतों तक तमाम मुद्दों पर बहस विचारधारा के आधार पर बंटी हुई रही है. अगर आप नरेंद्र मोदी, डोनाल्ड ट्रंप, या बोरिस जॉनसन को पसंद करते हैं, तो आप यही मानेंगे कि उन्होंने कुछ भी गलत नहीं किया है. अगर आप उन्हें नापसंद करते हैं तो उन्हें आप लाखों लोगों की मौत का जिम्मेदार बताएंगे. अगर आप उन्हें पसंद करते हैं तो आप उन महामारी विशेषज्ञों को भी पसंद करेंगे, जो भविष्य की आशावादी तस्वीर पेश कर रहे हैं, कि यह महामारी अप्रैल से सितंबर के बीच खत्म हो जाएगी. अगर आप इन लोगों को नापसंद करते हैं तो उन लोगों पर यकीन करेंगे, जो भारत समेत पूरी दुनिया में करोड़ों लोगों के मरने की आशंका जता रहे हैं. वैसे, मई का उनका पहला ‘डेडलाइन’ तो गुजर गया है.

लेकिन इस महामारी को जब तक इस अनश्वर-से दिख रहे वायरस का सहारा हासिल है तब तक तो यह विचारधारा आदि की परवाह करने से रहा लेकिन इसने जो कर डाला है उसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते थे. इसने महामारी विशेषज्ञों को भी विचारधारा के आधार पर बांट दिया है. हमारा तो यही मानना है कि महामारीशास्त्र एक सम्पूर्ण विज्ञान है, जिसकी परंपरा सदियों पुरानी है. लेकिन 2020 में यह भी शिकार बन गई है.

करीब सात दशकों से मलेरिया से लड़ रही पुरानी, सस्ती दवा हाइड्रोक्सिक्लोरोक्वीन या एचसीक्यू के बारे में बहुत कुछ लिखा जा चुका है. लेकिन ट्रंप ने पूरी दुनिया को इस दवा की सिफ़ारिश एक ‘गेमचेंजर’ (बिना किसी वैज्ञानिक प्रमाण के) के तौर पर बताकर क्या की और मोदी ने इसे भेजना क्या शुरू किया, यह सियासी फुटबॉल बन गई. एक पक्ष ने इसे कोरोनावायरस के लिए भगवान का पहले ही भेजा वरदान घोषित कर दिया, तो दूसरे पक्ष ने ना केवल इसे इस महामारी के लिए निष्प्रभावी बता दिया बल्कि चूहे मारने वाले जहर जैसा खतरनाक घोषित कर दिया.

मजा यह कि इन तमाम दावों का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है. इसका नतीजा, जैसा कि ‘ब्लूमबर्ग’ की यह खबर स्पष्ट करती है, यह हुआ कि हाल के दौर में इस दवा पर सबसे ज्यादा शोध शुरू हो गया. लेकिन ये शोध काफी जल्दबाज़ी में भी हो रहे हैं और दोनों पक्ष अपनी सियासत चमकाने के लिए प्रमाणों का इंतजार कर रहे हैं.

इसका इतना राजनीतिकरण हो गया कि ‘द लैंसेट’ जैसा गंभीर मेडिकल जर्नल भी जाल में उलझ गया और उसने आपाधापी में इस दवा को खारिज करने वाला एक ऐसा शोध प्रकाशित कर दिया जिसे कोई सब-एडिटर भी इसलिए खारिज कर देता कि यह अस्पष्ट आंकड़ों पर आधारित है. आंकड़े जुटाने वाली ‘सर्जिस्फेयर’ कंपनी के बारे में गूगल सर्च जैसी प्रारंभिक सावधानी भी बरती गई होती तो उसे एहसास हो जाता कि वह एक बारूदी सुरंग में कदम रख रहा है. ‘द गार्जियन’ की रिपोर्टर मेलिस डेवी ने अपनी शानदार खोज में यही स्पष्ट किया है.

इस संकट पर ‘हिंदू’ अखबार का एक संपादकीय मुझे खास तौर से पसंद आया, और मैं सोचने लगा कि काश मैं भी इतना अच्छा वाक्य लिख पाता. मैं उसे उद्धृत कर रहा हूं— ‘कोविड के बाद की दुनिया दहशत में काम करने वाली दुनिया हो गई है और कोई भी संस्था, कोई भी मूल्यांकन प्रक्रिया इससे अछूती नहीं रह गई है.’ आगे यह लिखा है— ‘इसका मुख्य सबक यह है कि किसी वैज्ञानिक प्रक्रिया को सत्ता, विशेषाधिकार, पैसे और सियासत के प्रभावों से अछूता मानना एक गलती होगी.’ इस स्तम्भ के इस लेख का श्रेय इस प्रखर संपादकीय को ही जाता है.

लेकिन इस सबका क्या महत्व है? क्या इन दिनों हर चीज़ का राजनीतीकरण, ध्रुवीकरण नहीं हो गया है, हर चीज में कड़वाहट नहीं घोल दी गई है? तो फिर एक महामारी इससे क्यों अछूती रहे?

इस सवाल का जवाब एक सवाल ही है. अगर आपका देश (इस मामले में पूरी दुनिया) अगर इसी बात के लिए लड़ पड़ा हो कि दुश्मन की परिभाषा क्या है, तब सवाल यह उठता है कि किससे लड़ें और किस हथियार से लड़ें?

राजनीति कभी बंद नहीं होती, लेकिन आप पक्षपात को कुछ समय के लिए स्थगित कर सकते हैं और मसले को विशेषज्ञों और योद्धाओं के भरोसे छोड़ सकते हैं. उनका उपहास उड़ाने से कुछ हासिल नहीं होगा, जैसा कि नई दिल्ली में मीडिया की ब्रीफिंग करने वाले कोविड टास्क फोर्स के बड़े अधिकारियों का उड़ाया जाता है. बेशक, वे हमें पूरी जानकारी नहीं देते. मैं भी इसकी शिकायत कर चुका हूं. लेकिन हमेशा, खासकर सोशल मीडिया पर उनका मज़ाक उड़ाने से कुछ नहीं मिलेगा.

अगली बार जब उन्हें, खासकर आईसीएमआर के सौम्य महानिदेशक डॉ. बलराम भार्गव को, पर्दे पर देखें तो उनकी आंखों के चारों ओर उभर आए काले धब्बों पर भी ध्यान दें. दूसरों का भी यही हाल है. यही एक टीम इस ज़िम्मेदारी को तीन महीने से निभा रही है, जिसके लिए कोई उन्हें शुक्रिया नहीं कहने वाला. यह काफी दबाव वाला काम है.

हमें मालूम है कि वायरस से बीमार पड़ने वालों, गंभीर रूप से बीमार पड़ने वालों में भी स्वस्थ होने वालों का अनुपात बड़ा रहने वाला है. यह अनुपात और बढ़ सकता है बशर्ते हमारा सारा ध्यान वहां रहे जहां होना चाहिए— लोगों के जल्दी टेस्ट कराने, बीमार व्यक्ति को जरूरत हो तो बिना देर किए ऑक्सीज़न देने, और जिन्हें सचमुच जरूरी है उन्हें अस्पताल में बिस्तर उपलब्ध कराने पर.


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मुंबई के आंकड़े (दुर्भाग्य से ऐसे आंकड़े दिल्ली में नहीं मिलते) बताते हैं कि ज़्यादातर मौतें रोग का पता लगने के चार दिन के अंदर होती हैं. इसका अर्थ है कि रोगियों का पता लगाने और इलाज करने में देर हो रही है. सिर्फ ऑक्सीज़न (वेंटिलेटर नहीं) उपलब्ध कराने से भी कई लोगों की जान बचाई जा सकती है. इसलिए, संक्रमण के फैलाव और मौतों को लेकर राजनीति करने की जगह ऐसी चीजों की मांग करने और उन्हें उपलब्ध कराने की जरूरत है.

आपको समझना होगा कि इन दिनों महीन, गूढ़ बातें करना ख़ुदकुशी करने जैसा ही है (तर्क करने वालों के लिए, स्तम्भ लिखने वालों के लिए नहीं). यह सबक मुझे मेरे पिछले सप्ताह के इस स्तम्भ पर मिली कुछ प्रतिक्रियाओं से फिर मिला, जिसमें मैंने यह बताने की कोशिश की थी कि मोदी सरकार आर्थिक सुधारों को लागू करने में पिछड़ क्यों रही है.

इसलिए इस बार मैं पहले ही सावधानी बरत रहा हूं ताकि यह बवाल ना खड़ा हो जाए कि मैं लोगों से मोदी सरकार पर कोई सवाल उठाने से रोक रहा हूं. मोदी के नंबर दो, अमित शाह समेत तमाम भाजपा नेता अगर इस महामारी का इस्तेमाल करके राज्यों में विपक्षी दलों की सरकारों को निशाना बनाते हैं या उन्हें गिराने की कोशिश करते हैं तो यह अपने टुच्चे राजनीतिक स्वार्थ के लिए एक गंभीर संकट का बेजा फायदा उठाना ही माना जाएगा. इस टकराव के चलते एक-दूसरे को काटने वाले जो काम और गाली-गलौज हो रही है उसके नतीजे सामने आ रहे हैं. और फिलहाल ऐसा ही लगता है कि कोविड संकट किसी के काबू में नहीं आ रहा है.

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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