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Monday, 15 July, 2024
होममत-विमतकांग्रेस ने 2002 में मोदी के खिलाफ ‘धर्मनिरपेक्ष vs सांप्रदायिक’ लड़ाई छेड़ी थी, 2024 में वह हार गई

कांग्रेस ने 2002 में मोदी के खिलाफ ‘धर्मनिरपेक्ष vs सांप्रदायिक’ लड़ाई छेड़ी थी, 2024 में वह हार गई

राम मंदिर का उद्घाटन कांग्रेस की ‘धर्मनिरपेक्ष’ राजनीति के ब्रांड के लिए सबसे बड़ा झटका है. मोदी ने जनता को अपने पक्ष में करने के लिए अपनी वैचारिक लड़ाई के नियम और शर्तें नहीं बदलीं.

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22 जनवरी को नवनिर्मित राम मंदिर में भगवान राम की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा किसी और के नहीं बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा किया जाना अयोध्या में ऐतिहासिक जन आंदोलन का अविश्वसनीय चरमोत्कर्ष है. यह हमें बताता है कि सार्वजनिक क्षेत्र में राज्य को धर्म से अलग रखने की नेहरूवादी परियोजना अपने अंतिम चरण में है.

जब 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद को ध्वस्त किया गया था, तो बहुत कम लोगों ने सोचा होगा कि कभी इतना भव्य मंदिर बनाया जाएगा.

संघ के सहयोगियों द्वारा मंदिर के निर्माण और उद्घाटन के साथ मोदी की स्पष्ट पहचान और लोगों का भारी समर्थन — ये मोदी और संघ परिवार के खिलाफ कांग्रेस की सत्ता-राजनीति की कठोर राजनीतिक हार हैं.

यह हमें 2002-2024 की कांग्रेस बनाम मोदी लड़ाई की शुरुआत में ले जाता है.

2002 में तत्कालीन अध्यक्ष सोनिया गांधी के नेतृत्व में और अहमद पटेल और अन्य दिग्गजों द्वारा संचालित कांग्रेस पार्टी ने तत्कालीन गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ मजबूत राजनीतिक लड़ाई शुरू की थी, जो भाजपा के सबसे होनहार नेता के रूप में तेज़ी से उभर रहे थे.

अब, पीछे मुड़कर देखने पर, हम बेहतर समझ सकते हैं कि भारत के राजनीतिक इतिहास में वह कितना महत्वपूर्ण मोड़ था.

कांग्रेस ने नई दिल्ली में जिसे हम आमतौर पर “धर्मनिरपेक्ष बनाम सांप्रदायिक” लड़ाई कहा जाता है, उसे लेकर मोदी को उनके मैदान पर चुनौती दी.

2002 का गुजरात विधानसभा चुनाव पहला राज्यव्यापी चुनाव था, जहां संघ परिवार के शीर्ष नेता हिंदुत्व विचारधारा के बारे में खुलकर बात करने से नहीं हिचकिचा रहे थे.

गोधरा कांड ने उन्हें एक बहाना दे दिया था.

जब मोदी 2002 की चुनावी राजनीति के माध्यम से राजनीतिक सत्ता बरकरार रखने के लिए अपनी राजनीतिक शतरंज की बिसात बिछा रहे थे, तब उन्होंने चुनाव अभियानों में “विकृत बिनसांप्रदायिकता” के खिलाफ जोरदार ढंग से बात की थी. वे हिंदुत्व विचारधारा के मुद्दों को अगले स्तर पर ले जाने से भी नहीं हिचकिचाए, जहां लालकृष्ण आडवाणी और अटल बिहारी वाजपेयी ने भी जोखिम उठाने की हिम्मत नहीं की थी. उस चुनाव में उन्होंने राजनीतिक संदेश और राजनीतिक प्रतीकवाद का एक नया चलन शुरू किया, जिसे चुनावी राजनीति में हराना मुश्किल था.

दिसंबर 2002 में प्रचार अभियान के दौरान मुझे दिए गए एक संक्षिप्त इंटरव्यू में मोदी ने आतंकवाद से लड़ने के अपने चुनावी मुद्दे के बारे में बात की थी. उन्होंने कहा, “मैं लोगों की सुरक्षा का मुद्दा उठा रहा हूं. मैं आतंकवाद के बारे में बात नहीं कर रहा हूं. कल रात असारवा निर्वाचन क्षेत्र में मैंने मतदाताओं से कहा कि अगर आपके पास ज़िंदगी की सर्वोत्तम सुख-सुविधाएं हैं, लेकिन आपके बेटे शाम को सुरक्षित घर नहीं लौटते हैं, तो इसका क्या फायदा? लोगों ने मेरी बात को समझा था.”

आरएसएस के किसी शीर्ष नेता या वरिष्ठ बीजेपी नेता के बजाय मोदी को सीधे निशाने पर लेकर कांग्रेस ने मोदी की राजनीतिक ताकत बढ़ाने में योगदान दिया, जिसकी उन्हें उस समय ज़रूरत थी.

मोदी ने कांग्रेस को अपना और अपनी पार्टी का प्रमुख प्रतिद्वंद्वी करार देने का कोई मौका नहीं गंवाया.


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कांग्रेस की बड़ी लड़ाई

कांग्रेस ने बड़ी लड़ाई लड़ी, सीएम मोदी को “फर्जी मुठभेड़ों” के आपराधिक मामलों में घसीटने की पूरी कोशिश की, मामलों को आगे बढ़ाने के लिए सीबीआई और सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल किया, मोदी के राज्य नीति मामलों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में पूरी ताकत से लड़ाई लड़ी. पी.चिदंबरम, कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी जैसे कानूनी दिग्गजों की सलाह लेकर कानून व्यवस्था का संचालन किया.

लेकिन, मोदी और संघ परिवार के खिलाफ अपनी विचारधारा-आधारित राजनीतिक लड़ाई में कांग्रेस का ऊपर से नीचे का दृष्टिकोण पार्टी के भविष्य के लिए घातक साबित हुआ.

तब, कांग्रेस ने दिल्ली स्थित मीडिया को चतुराई से संभाला, लेकिन अगले 20 साल तक उसने मोदी को सही ढंग से “पढ़ना” कभी नहीं सीखा.

2002 में दिल्ली की मुख्यधारा मीडिया पर नज़र रखते हुए, मोदी ने मुझसे कहा था, “मुझे लगता है कि हम केवल मीडिया में कांग्रेस पार्टी से लड़ रहे हैं. ज़मीन पर मुझे कोई लड़ाई नहीं दिखती. हम चुनौती रहित बने हुए हैं.”

2002 के बाद के गुजरात में मोदी की मौलिक अपील पारिवारिक सुरक्षा के बारे में थी. भारत में पारिवारिक सुरक्षा हर किसी के जीवन का केंद्रीय बिंदु है. इससे एक नया निर्वाचन क्षेत्र बना. यह दृष्टिकोण उत्तर प्रदेश में अद्भुत काम कर रहा है.

अपने पहले राज्य चुनाव में मोदी ने “हिंदुत्व-प्लस” भाजपा की शुरुआत की, जिसने 182 में से 127 सीटें जीतीं. भाजपा नेता 2002 से तर्क दे रहे हैं कि हिंदुत्व और विकास एक ही सिक्के के दो पहलू हैं (हिंदुत्व ही विकास है). 2024 के लोकसभा चुनाव अभियान में वे इसे फिर दोहराएंगे.

यह चौंकाने वाली बात है कि कांग्रेस, जिसके पास ऐतिहासिक विरासत है, सीएम मोदी के खिलाफ कई राजनीतिक लड़ाइयां हार चुकी है, जब उसके पास नई दिल्ली (2004-2014) में पूर्ण शक्ति थी, उसके पास संसाधन थे, दशकों के अनुभव वाले विचारशील नेता थे और लोगों की राय और समर्थन थे जिसने उसे एक दशक तक सत्ता में बनाए रखा.

हालांकि, मोदी को मुख्यमंत्री बनने से बहुत पहले ही कांग्रेस के खिलाफ अपनी लड़ाई का “चरित्र” पता था. नवंबर 1990 में सत्ता की राजनीति में शामिल होने से 11 साल पहले, मोदी भाजपा के राज्य महासचिव थे.

फिर, उन्होंने अभियान (मेरे द्वारा स्थापित और संपादित एक पत्रिका) को एक इंटरव्यू दिया. संवाददाता विक्रम वकील ने मोदी से पूछा, “क्या राम मंदिर निर्माण के लिए आडवाणी की रथयात्रा बीजेपी को राजनीतिक फायदा पहुंचाएगी?”

मोदी ने जवाब दिया, “इस रथयात्रा से तीन चीज़ें होंगी. 1) राम जन्मभूमि पर राम मंदिर ज़रूर बनेगा. 2) देश में ऐसे बहुत से लोग हैं जो अपनी मनोकामना (मंदिर बनाने की) पूरी नहीं होने से बेहद दुखी हैं. राम मंदिर बनने के बाद इसकी सकारात्मक ऊर्जा (सद्शक्ति) सक्रिय हो जाएगी. 3) रथयात्रा से आडवाणी जी का नेतृत्व स्थापित होगा. भाजपा ने राजनीतिक लाभ के लिए राम मंदिर आंदोलन की योजना नहीं बनाई है. यह अश्लील धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ ज़िहाद है. भले ही इस ज़िहाद से भाजपा को नुकसान हो, हम राजनीतिक नुकसान उठाने के लिए तैयार हैं.”

80 के दशक के उत्तरार्ध से मोदी गुजरात में राम जन्मभूमि आंदोलन की रणनीति बना रहे हैं और उसे चला रहे हैं. भाजपा के संगठन महासचिव के रूप में उन्होंने चुपचाप, लेकिन दृढ़ता से रामशिलाओं को अयोध्या भेजने के लिए कई मिशनों का नेतृत्व, शुभारंभ और पर्यवेक्षण किया और कार सेवकों की बड़ी टुकड़ी को अयोध्या जाने के लिए प्रेरित किया. मोदी की देखरेख में गुजरात ने 90 के दशक की शुरुआत में सबसे ज्यादा रामशिलाएं अयोध्या भेजीं.


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विचारधारा को जन-जन तक पहुंचाया

कांग्रेस के विपरीत मोदी ने आरएसएस की विचारधारा को गुजरात की गलियों और उपनगरों में लोगों तक पहुंचाया और तीन चुनाव जीतने के बाद दिल्ली आए.

बेशक, दोनों राष्ट्रीय दल राजनीतिक लाभ के लिए विचारधारा की बात करते रहे हैं, लेकिन कांग्रेस हिंदू समाज के वाम-परिभाषित दृष्टिकोण के भंवर में फंस गई और तेज़ी से पश्चिमी विद्वानों द्वारा परिभाषित धर्मनिरपेक्षता की समझ पर निर्भर हो गई. कांग्रेस पार्टी ने 1990 के दशक की शुरुआत से ही अपने शक्तिशाली ज़मीनी नेताओं के विचारों को नज़रअंदाज करना शुरू कर दिया था.

राम मंदिर के लिए समर्थन की मौजूदा लहर यह साबित करती है कि सामाजिक विज्ञान पर पकड़ रखने में मोदी कांग्रेस के दिग्गज नेताओं से कई गुना बेहतर साबित हुए हैं. दोबारा से सोचिए. मोदी की मंदिर राजनीति बहुत सरल रही है क्योंकि यह भारतीय मानस में धर्म की गहरी जड़ों और लोगों के दैनिक सार्वजनिक और निजी जीवन में सर्वव्यापी भगवान की समझ पर आधारित है.

भारतीय मूल रूप से संस्कृति में विश्वास रखते हैं, लेकिन बहुलता के प्रति वास्तविक सम्मान ने उनके गहरे धार्मिक और भावनात्मक अस्तित्व को प्रभावित नहीं किया है.

पिछले दस साल में मोदी और अमित शाह को वैचारिक मोर्चे पर उनकी कल्पना से कहीं अधिक बड़ी सफलता मिली है. संघ परिवार 1930 के दशक से जितनी कोशिशें कर रहा था, उसे उससे कहीं अधिक सफलता मिली है. फिलहाल भारत के कई हिस्सों में राम मंदिर के लिए समर्थन बीजेपी की उम्मीदों से भी कहीं ज्यादा और गहरा है.

मोदी की तरह कई क्षेत्रीय दलों में कई भारतीय नेता हैं जो समझ गए हैं कि भारतीय अपने समुदायों के भीतर विरोधाभासी भावनाओं को बनाए रखने में माहिर हैं.

वे अच्छी तरह से जानते हैं कि कई हिंदू मतदाता जो राम मंदिर समर्थक हैं, निश्चित रूप से “मुस्लिम विरोधी” नहीं हैं और कई रूढ़िवादी धर्मनिष्ठ मुसलमान हैं जो राम मंदिर निर्माण का समर्थन कर रहे हैं, खासकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद.

22 जनवरी का प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम कांग्रेस की “धर्मनिरपेक्ष” राजनीति के ब्रांड के लिए सबसे बड़े झटके में से एक है. ऐसा इसलिए भी क्योंकि मोदी ने जनता को अपने पक्ष में करने के लिए वैचारिक लड़ाई के नियम और शर्तें नहीं बदले.

कांग्रेस के खिलाफ लड़ते हुए मोदी कभी स्थिर नहीं रहे. अगर कोई इसकी तुलना सीएम मोदी से करे तो पीएम मोदी की पब्लिक इमेज में काफी परिवर्तन आया है.

कोई भी प्रतिद्वंद्वी या कांग्रेस भारत के प्रधानमंत्री के खिलाफ राजनीतिक लड़ाई कैसे लड़ सकती है जो वर्तमान में #ShriRamBhajan से हर दिन एक राम भजन लॉन्च करते हों?


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भारत बदल गया है

लगभग दस साल बाद मोदी का व्यक्तित्व पंथ राजनीतिक परिदृश्य पर हावी नहीं होगा, लेकिन यह बिल्कुल स्पष्ट है कि धार्मिक उद्देश्यों के लिए लोगों का समर्थन प्राप्त करने का संघ परिवार का मिशन फीका नहीं पड़ेगा.

जिन्होंने 1986 में राजीव गांधी सरकार द्वारा रामलला की पूजा की अनुमति देने के लिए बाबरी मस्जिद के ताले खोलने, आडवाणी की रथयात्रा, अयोध्या में मंदिर बनाने के लिए ईंटें भेजने के लिए रामशिला आंदोलन, कारसेवकों के लिए चलो अयोध्या आंदोलन, दुर्भाग्यपूर्ण विध्वंस की खबरें दी हैं. बाबरी मस्जिद, लंबी अदालती लड़ाई, इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला और अंततः सुप्रीम कोर्ट का फैसला, जिसने ज़मीन हिंदू वादियों को दे दी, से समझ आ जाएगा कि कांग्रेस की विफलता और मोदी की जीत कितनी ऐतिहासिक है. अयोध्या में राम मंदिर के साथ, भारतीय राजनीति में पश्चिमी और वामपंथी प्रभाव को प्रतिशोध की भावना से उखाड़ फेंका जा रहा है.

जो लोग संघ के राम जन्मभूमि आंदोलन का समर्थन या विरोध कर रहे थे, वे जानते थे कि मामला अयोध्या की 2.7 एकड़ ज़मीन का नहीं है. इसमें सामाजिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, कानूनी, नैतिक और राजनीतिक प्रश्न भी शामिल थे. कांग्रेस से उम्मीद की गई थी कि वह इन सभी मोर्चों पर दृढ़ विश्वास और दृढ़ संकल्प के साथ लड़ेगी, लेकिन, अपने समर्थकों से अधिक, इसकी आंतरिक गतिशीलता ने कांग्रेस को विफल कर दिया है.

राम मंदिर के समर्थन में भारत के कई हिस्सों में व्याप्त इस ऊर्जा से भरे माहौल से पता चलता है कि कांग्रेस अब मोदी और उनकी पार्टी के खिलाफ अपनी लड़ाई में एक पीढ़ी पीछे है.

बाबरी विध्वंस का दुख कभी दूर नहीं होगा और भारतीय लोकतंत्र में बेहतर प्रतिनिधित्व के लिए मुस्लिम समुदाय की लड़ाई जारी रहेगी. आने वाले दशकों में बुद्धिजीवी वर्ग, धर्मनिरपेक्ष-उदारवादी विचारक और कई भारतीय अल्पसंख्यक संघ की विचारधारा के खिलाफ मजबूती से अपनी लड़ाई जारी रखेंगे, लेकिन कांग्रेस को अपनी विफल राजनीति के मलबे को हटाने और इसके भवन में “प्राण” को फिर से स्थापित करने में लंबा समय लगेगा.

मोदी ने राम मंदिर की अपनी रामायण इस तरह लिखी है कि 22 जनवरी की घटना को 2024 के लोकसभा चुनाव की तुलना में इतिहास की किताबों में अधिक जगह मिलने की संभावना है क्योंकि मोदी के तहत भारत बदल गया है.

आखिरकार मोदी खुद कई और इतिहास रचने के मुहाने पर आ पहुंचे हैं.

भव्य राम मंदिर का उद्घाटन उन्हें कई भारतीयों के बीच की खाई को पाटने का एक अकल्पनीय सभ्यतागत अवसर देगा.

(शीला भट्ट दिल्ली स्थित वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनका एक्स हैंडल @sheela2010 है. व्यक्त विचार निजी हैं.)

(संपादन: फाल्गुनी शर्मा)

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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