Friday, 21 January, 2022
होममत-विमतBJP को कमजोर करने के लिए कांग्रेस को टूटना होगा, जो हिंदुत्व से जुड़ना चाहते हैं उन्हें बाहर निकलने दें

BJP को कमजोर करने के लिए कांग्रेस को टूटना होगा, जो हिंदुत्व से जुड़ना चाहते हैं उन्हें बाहर निकलने दें

कांग्रेस पार्टी के लिए सबसे अच्छा अवसर है कि वो हिंदुत्व पर अपनी स्थिति स्पष्ट करे. हिंदू राष्ट्रवाद के अलग-अलग रंगों से छेड़छाड़ जैसा कि कांग्रेस करती रहती है, बीजेपी को ही मज़बूत करेगी.

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जितिन प्रसाद का कांग्रेस छोड़कर जाना, वयोवृद्ध पार्टी के लिए एक संदेश है, कि खुद को बचाने के लिए, वो पहल करे और अपना विभाजन कर ले. प्रसाद ज्योतिरादित्य सिंधिया से जा मिले हैं, जो एक पूर्व राज घराने के वंशज हैं, और एक साल पहले कांग्रेस छोड़कर हिंदुत्व परिवार में शामिल हो गए थे. दोनों बधाई के पात्र हैं कि वो, अपने दिल की बात सामने रखते हुए, भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए. उन्होंने दूसरे व्यक्तियों, पारिवारिक फर्मों, और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के भीतर, कुछ बड़े गुटों को भी रास्ता दिखाया है.

हिंदुत्व आज भारत को परिभाषित करने वाला विभाजन है, और हर राजनीतिक अभिनेता को, ख़ासकर जो कांग्रेस के ख़ेमें हैं, इस प्रबल प्रश्न पर पूरी तरह ईमानदार होने की ज़रूरत है.

ये ताज़ा रवानगी छोड़ी गई कांग्रेस पार्टी के लिए सबसे अच्छा अवसर है, कि वो हिंदुत्व पर अपनी स्थिति स्पष्ट करे. हिंदू राष्ट्रवाद के अलग-अलग रंगों से छेड़छाड़, जैसा कि कांग्रेस करती रहती है, बीजेपी को ही मज़बूत करेगी. बीजेपी को कमज़ोर करने के लिए, कांग्रेस को टूटना होगा.

भ्रामक दिशाएं या चरमपंथ का दौर

दिशा पर पुनर्विचार और स्पष्टता, या लेफ्ट और राइट, या राजनीति का आत्मसंतुष्ट केंद्र भी, कांग्रेस के जीवित रहने के लिए आवश्यक है. अलग अलग स्तर पर, प्रधानमंत्री मोदी ने पूरे राजनीतिक स्पेक्ट्रम को, अपनी पकड़ में लेकर उसे एक आकार दिया है, जिससे विपक्ष के लिए दिशात्मक भ्रम, और अपनी पहचान तक का ख़तरा पैदा हो गया है. अपने मोटापे और शिथिलता को कम करने के दौरान, कांग्रेस को राजनीतिक स्थिति की कल्पना के, अपने पुराने तरीक़े भी त्यागने होंगे.

दक्षिण पंथ से जुड़ाव के साथ, हिंदुत्व और हिंदू राष्ट्रवाद हमेशा से रूढ़िवाद की एक बड़ी ताक़त रहे हैं. अंधराष्ट्रीयता और पहले हिंदू पहचान के इसके हिंसक मंचन ने, बीजेपी को मंदिर आंदोलन के ज़रिए, एक राष्ट्रीय पार्टी बना दिया. मोदी के अंतर्गत हिंदुत्व ने अब ख़ुद को, लोकवाद के साथ नई सहस्राब्दी की वैश्विक आसक्ति से जोड़ लिया है. लोकवाद ने, जिसका लोगों के साथ क़रीबी रिश्ता होता है, हाल के समय में दुनिया भर में लोकप्रिय प्रजातंत्रों को अपनी ओर खींचा है. लोकवाद, वाम और दक्षिण पंथ के बीच खिंची स्पष्ट लकीरों, और दिशाओं के बीच झगड़ा लगाते हुए, आगे बढ़ता रहता है. इसका एक स्पष्ट उदाहरण होगा, रूढ़िवादी या दक्षिण-पंथी सरकारों की ओर से, सार्वजनिक वस्तुओं पर बड़ा ख़र्च, एक ऐसा नीति निर्देश है, जिसे आमतौर से वाम-झुकाव वाली, या समाजवादी पार्टियों से जोड़कर देखा जाता है.

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तथाकथित ‘केंद्र’ पर क़ब्ज़ा किए हुए लोकवादी सरकारें, हानिकारक अफवाहें फैलाती हैं कि उनका कोई भी विरोध, वाम की ओर से ही आता है, जो समय और स्थान से हटा हुआ होता है, या सरल शब्दों में कहें तो उसका समय निकल चुका होता है. मोदी ने सभी लोकलुभावन चालें इस्तेमाल कर ली हैं: बड़ी शख़्सियत, सार्वजनिक वस्तुओं पर बड़े लक्षित ख़र्च, और एक प्रभावी प्रचार, जिसने कांग्रेस को एक चुकी हुई ताक़त, या भारत के पुराने बुरे समाजवादी दिनों की एक पार्टी बनाकर छोड़ दिया है, जिसके साथ केवल समृद्ध लोग ही, जुड़ना वहन कर सकते हैं. जिस तरह डोनाल्ड ट्रंप जैसे लोकवादी का आधार श्वेत वर्चस्व था, ठीक उसी तरह ये हिंदुत्व ही है जिससे वास्तव में, मोदी के लोकवाद को दांत मिलते हैं. न लेफ्ट, न राइट, और ना ही लोकवाद, भारत में देखा जा रहा है, कि चरमपंथी ताक़तों ने केंद्र, या तमाम संस्थागत शक्तिओं को, पूरी तरह अपनी गिरफ्त में जकड़ लिया है. इस चरमपंथ का नाम है हिंदुत्व.

लेफ्ट या राइट दिशा की, गतिहीन कर देने वाली उलझन की जगह, यक़ीनन अब चरमपंथ का स्पष्ट अनुमान लगाना होगा, जो भारत के राजनीतिक परिदृश्य के पीछे लगा हुआ है. हिंदुत्व का चरमपंथ, लोकसभा में अपने कठोर बहुमत के चलते, निगाह को धुंधला कर देता है, और प्रभावी रूप से विपक्ष को गुमराह कर देता है.

भूमिका में बदलाव

फिर भी, भारत की सबसे पुरानी पार्टी से दल बदलकर जाने वालों की लहर, भूमिका में एक ऐतिहासिक बदलाव का संकेत देती है. बीजेपी का वास्ता अब ऐसे पूर्व कांग्रेसी नेताओं से है, जो अपने विश्वास, निजी स्वार्थ, या निजी ताक़त की ज़रूरत के चलते, उसकी ओर आकर्षित हो रहे हैं. सौ साल पहले, बीजेपी की पूर्ववर्त्ती हिंदू महासभा के सदस्यों ने, चाहे वो केएम मुंशी हों, या मदनमोहन मालवीय, उस विस्तृत ख़ेमे के अंदर अपने राजनीतिक करियर को आगे बढ़ाया, जो कांग्रेस बन गई थी. पैमाना बढ़ने पर समझौते किए गए, और विवादास्पद रूप से कांग्रेस पार्टी, विचारों के मामले में अस्पष्ट हो गई.

नेहरू के वर्षों में, समाजवादी छवि के बावजूद, हिंदू कोड बिल और ज़मींदारी उन्मूलन बिल जैसे बड़े सुधारों के मामले में, रूढ़िवादियों का दबदबा रहता था. चरम विचारधारा को देखते हुए, इस बात की संभावना कम है, कि कोई सिंधिया या प्रसाद, बीजेपी के हिंदुत्वा-प्रेरित एजेण्डा को संयमित कर पाएंगे. जैसी स्थिति है उसमें बीजेपी ही एक पार्टी है, जो पूरी तरह हिंदुत्व से जुड़ी है, चूंकि सत्ता हासिल करने के लिए शिवसेना ने, ज़ाहिरा तौर पर अब एक व्यावहारिक दृष्टिकोण अपना लिया है. इसके विपरीत, क़रीब 50 दल ऐसे हैं जो हिंदुत्व में शामिल नहीं हुए हैं. कांग्रेस के पास मुठ्ठी भर सांसद हो सकते हैं, लेकिन बीजेपी को छोड़कर, वो अकेली पार्टी है जिसका कई प्रांतों में अच्छा ख़ासा जनाधार है, और जिसके पास देश भर के, एक तिहाई से अधिक विधायक हैं.

टूटकर बचिए

कांग्रेस का फैलाव भले ही पूरे देश में हो, लेकिन वो आज सत्ता का एक बड़ा ख़ेमा नहीं है. आज वो कोई समझौता नहीं कर सकती, इसलिए नहीं कि उसके अंदर सौदेबाज़ी के लिए कुछ बचा नहीं है, बल्कि बुनियादी तौर पर इसलिए, कि चरम हिंदुत्व की धार को हल्का नहीं किया जा सकता. ज़रूरत इस बात की है कि कांग्रेस, अपने वैचारिक रुख़ को समय के हिसाब से ढाले, और उसमें स्पष्टता लाए. ऐसा करने के लिए, सबसे पहले उसे फिर से जी उठीं, अपनी उन आदतों को त्यागना होगा, जिन्हें पहले राजीव गांधी दौर में सान चढ़ाया गया, और उसके बाद नरसिम्हा राव के दौर में और कुशल बनाया गया. ये आदत थी हिंदू राष्ट्रवाद के एक ‘नरम’ और ‘हल्के’ रूप से छेड़छाड़. इनकी वजह से ही बीजेपी को, एक राष्ट्रीय पार्टी बनने में मदद मिली. ये सबसे ख़राब व्यवहारवाद था, चूंकि ये उसके लिए बहुत महंगा साबित हुआ है.

दूसरे, कांग्रेस को भारत के बहु-संस्कृतिवाद को आक्रामकता के साथ, एक नई ताक़तवर शब्दावली और प्रचार में जगह देनी होगी. हो सकता है कि सेक्युलरिज़्म (धर्मनिर्पेक्षवाद) अब ‘सिकुलरिज़म’ (बीमारवाद) बन गया हो, लेकिन सभी धर्मों के बीच भाईचारे और दोस्ती के पाठ का संदेश, अब ऐसी भाषा में देने की ज़रूरत है, जो नेहरू के दौर की बारीकियों से अलग हो, और जो भारत के जीवित रहने के लिए, तत्काल रूप से आवश्यक है. अपनी गांधीवादी विरासत को फिर से जीवित करने में, इस बात को मानना चाहिए, कि हिंदुत्व ही एकमात्र राजनीतिक मुद्दा है. दांव पर जो लगा है वो न तो लेफ्ट है, न राइट है, न केंद्र है, और न ही मोदी हैं.

अंत में, पीढ़ियों के बीच या अन्यथा गुटीय संघर्ष, ग्रुप 23, और अन्य बातों को, दिमाग़ सुन्न करने वाले विकर्षण के तौर पर लेना चाहिए. संघर्ष से ग्रस्त पार्टी इकाइयों के पास दूत भेजना, एक ऐसी विस्थापन गतिविधि है, जो दृढ़ विश्वास की राजनीति, या सत्ता के लक्ष्य, किसी को शोभा नहीं देती. बल्कि, ऐसे लोगों के लिए दरवाज़ा खुला रखना चाहिए, जो निजी आकांक्षा, अथवा बहु-सांस्कृतिक भारत की वास्तविकता से राजनीतिक असहमति के चलते, बाहर निकलना चाहते हैं.

टूटने का फैसला लेने की क्षमता, और फिर उस फैसले पर अमल ही, जिसके नतीजे में संसद या विधान सभाओं में संख्या भले कम हो जाए, कांग्रेस के पुनर्निर्माण और सत्ता में संभावित वापसी की गारंटी होगा.


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समय निकल रहा है. एक नई राष्ट्रीयता को सक्रियता के साथ तराशा जा रहा है. 2025 में, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूरे होने का जश्न मनाएगा. मोदी सरकार के सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट को, देश में कोविड-19 महामारी में हुईं बेशुमार मौतों, और तबाही के ऊपर तरजीह देने को, इसी शताब्दी के परिप्रेक्ष्य में देखना होगा. हिंदुत्व परिवार की सबसे पुरानी सदस्य होने के नाते, अपने अधिकांश जीवन में ताक़तवर, लेकिन काफी हद तक हाशिए पर रही ये संस्था, मोदी के अंतर्गत ही एक मुख्य धारा की राजनीतिक शक्ति बन पाई है. एक नए वास्तु प्रतीकवाद के साथ मिलकर महत्वपूर्ण नए क़ानून, हिंदुत्व को भारत का पर्याय बना देना चाहते हैं.

यही कारण है कि जिस नेता में अकेले हिंदुत्व के सवाल पर, कांग्रेस को तोड़ने का साहस होगा, वही उसका अस्ली लीडर होगा.

(श्रुति कपिला कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में आधुनिक भारतीय इतिहास, और वैश्विक राजनीतिक विचार पढ़ाती हैं. ट्विटर: @श्रुतिकपिला. व्यक्त विचार निजी हैं.)

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