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Sunday, 24 May, 2026
होममत-विमतCJP ने कार्यकर्ता मॉडल की जगह ‘अटेंशन कैपिटल’ को दी अहमियत, यह हर जगह है और कहीं भी नहीं

CJP ने कार्यकर्ता मॉडल की जगह ‘अटेंशन कैपिटल’ को दी अहमियत, यह हर जगह है और कहीं भी नहीं

'कॉकरोच जनता पार्टी' को लेकर मोदी सरकार की घबराहट साफ़ नज़र आती है, क्योंकि उसे ऐसे दुश्मनों से लड़ने की आदत है जिन्हें वह देख-छू सकती है—यानी ऐसे लोग जिन्हें वह गिरफ़्तार कर सकती है या खरीद सकती है. लेकिन, आप किसी एल्गोरिदम को सलाखों के पीछे कैसे डाल सकते हैं?

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नई दिल्ली के पारंपरिक न्यूज़रूम्स को शायद ही अंदाजा हो कि इस समय महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर और देश के कई दूसरे शहरों में कैसी राजनीतिक आंधी चल रही है. वे ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के उभार को सिर्फ “ Gen Z का शोर” या सोशल मीडिया का बुखार मानकर खारिज कर रहे हैं. यह बहुत बड़ी गलती है. छत्रपति संभाजीनगर के किसी भी कैफे में जाइए, युवाओं को अपनी कैपेचीनो के साथ चर्चा करते सुनिए, और हमारे राजनीतिक वर्ग व विश्लेषकों की नाकामी साफ दिखाई देती है. हम 1991 के बाद भारतीय राजनीति के सबसे बड़े संरचनात्मक बदलाव को देख रहे हैं. यह सिर्फ डिजिटल बगावत नहीं है, बल्कि भारतीय राजनीति का एक अहम मोड़ है. अब 18वीं सदी की जन-आंदोलन वाली राजनीति खत्म होकर एल्गोरिदम की सत्ता का दौर शुरू हो चुका है.

आंकड़ों पर नजर डालिए. 22 मई 2026 तक CJP ने इंस्टाग्राम पर आधिकारिक तौर पर BJP को पीछे छोड़ दिया है. उसके 2 करोड़ से ज्यादा फॉलोअर्स हो चुके हैं और संख्या लगातार बढ़ रही है. BJP की डिजिटल मशीनरी अब भी पुराने “मैसेज बार-बार दोहराने” वाले तरीके पर चल रही है. पत्रकार स्वाति चतुर्वेदी ने अपनी किताब I Am a Troll में लिखा है कि यह तरीका ताकत, भारी बजट और ऊपर से नीचे तक चलने वाले प्रचार मॉडल पर आधारित है, जो लोगों की फीड भर देता है. दूसरी तरफ CJP ने बहुत कम पोस्ट के बावजूद पुराने जमाने के फिजिकल कार्यकर्ता की जगह लोगों का ध्यान अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लिया है.

20वीं सदी में सत्ता का मतलब था कि कितने लोग सड़कों पर उतर सकते हैं. आज सत्ता का मतलब है लोगों के स्क्रीन टाइम पर कब्जा करना. CJP ने साबित कर दिया है कि लोगों का ध्यान बहुत तेजी से एक प्लेटफॉर्म से दूसरे प्लेटफॉर्म पर जा सकता है. पारंपरिक “आईटी सेल” इसका मुकाबला नहीं कर सकते, क्योंकि यहां कोई मुख्यालय नहीं है जिस पर छापा मारा जा सके और न ही कोई तय नेतृत्व है जिसे खरीदा जा सके. यह एक भूत जैसी पार्टी है. एक विकेंद्रीकृत और स्वायत्त संगठन, जो हर जगह भी है और कहीं भी नहीं.

बचे रहने का प्रतीक

इस आग को भड़काने वाली चिंगारी भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत का एक बयान था. जब उन्होंने बेरोजगार और मुखर युवाओं की तुलना “कॉकरोच” से की, तो उन्होंने सिर्फ उनका अपमान नहीं किया. उन्होंने उन्हें एक नई पहचान दे दी. जैसे 2016 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में हिलेरी क्लिंटन द्वारा ट्रंप समर्थकों के लिए इस्तेमाल किया गया शब्द “डिपलोरेबल” (घृणित लोग) बाद में नारा बन गया था, वैसे ही भारत में कॉकरोच अब जिंदा रहने का प्रतीक बन गया है.

इस कीड़े को अपनाकर युवा यह कह रहे हैं कि वे मूल रूप से “एंटी-फ्रैजाइल” हैं, जैसा कि लेखक नासिम निकोलस तालेब कहते हैं. एंटी-फ्रैजाइल का मतलब ऐसे लोग या सिस्टम हैं जो मुश्किल हालात, तनाव और अस्थिरता से सिर्फ बचते नहीं, बल्कि उनसे और मजबूत हो जाते हैं.

कांग्रेस और BJP जैसी पार्टियों की संरचना केंद्रीकृत आदेश और संरक्षण नेटवर्क पर आधारित है. जबकि CJP अव्यवस्था से ताकत हासिल करती है. वह सिस्टम के बाहर खुद को खड़ा करती है. सरकार ने जब उसका X अकाउंट रोका, तो उसने दिखा दिया कि वह डिजिटल ढांचे को समझ ही नहीं पाई है.

यह जीवविज्ञान के एक आसान नियम की तरह है. अगर किसी कॉकरोच कॉलोनी पर जहर छिड़का जाए और कुछ कॉकरोच बच जाएं, तो उनमें उस जहर के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो जाती है. अभी भारत में यही हो रहा है. इन “कॉकरोचों” को सेंसर करने की कोशिश करके राज्य ने उनकी ताकत को और तेज कर दिया है.

डिजिटल बगावत

इटली के फाइव-स्टार मूवमेंट से इससे जुड़े सबक लिए जा सकते हैं. इसकी शुरुआत 2005 में कॉमेडियन बेपे ग्रिलो के एक ब्लॉग के रूप में हुई थी. बाद में 2018 में यह संसद की सबसे बड़ी पार्टी बन गई.

ग्रिलो के पास जमीन पर कार्यकर्ताओं की बड़ी फौज नहीं थी. उन्होंने सिर्फ उस वायरल लहर का फायदा उठाया, जिसने इटली के राजनीतिक अभिजात वर्ग को पीछे छोड़ दिया.

CJP भारत का वही मॉडल है, लेकिन इसमें अलग तरह का जुगाड़ वाला रंग है. यह छत्रपति संभाजीनगर के किसी युवा को बिना किसी पारंपरिक रैली में गए भी राष्ट्रीय आंदोलन का हिस्सा बनने का मौका देता है. महाराष्ट्र में, जहां राजनीति बूढ़े राजनीतिक परिवारों और मौके के हिसाब से बने गठबंधनों के बीच ताश के खेल जैसी बन चुकी है, वहां CJP एक पूरी नई शुरुआत है. युवा किसी नए नेता की पूजा नहीं करना चाहते. वे एक नई राजनीतिक व्यवस्था चाहते हैं, जिसमें वे खुद शामिल हो सकें.

सबसे अहम बात यह है कि CJP समाजशास्त्री रॉबर्ट माइकल्स के “आयरन लॉ ऑफ ऑलिगार्की” को चुनौती देने वाला पहला आंदोलन है. माइकल्स ने कहा था कि हर लोकतांत्रिक संगठन आखिर में सामंती ढांचे में बदल जाता है. लेकिन CJP कोई संगठन नहीं, बल्कि एक तरीका है. कोई भी इसका लोगो इस्तेमाल कर सकता है. कोई भी इसके लिए कंटेंट बना सकता है. बिना किसी तय नेता और पूरी तरह डिजिटल रहने की वजह से यह उन भ्रष्टाचारों से बच निकलता है, जिन्होंने भारत के बाकी “वैकल्पिक” आंदोलनों को खत्म कर दिया.

यह बदलाव बहुत तेजी से हुआ है. CJP भारत का पहला राजनीतिक यूनिकॉर्न बन गया है, जो सालों की जमीनी मेहनत से नहीं, बल्कि वायरल ब्रांडिंग से खड़ा हुआ है. यह वोटर को सिर्फ मतदाता नहीं, बल्कि एक ऐसे यूजर की तरह देखता है, जिससे लगातार जुड़कर रखा जाए.

सरकार की घबराहट साफ दिखाई देती है. उसे ऐसे दुश्मनों से लड़ने की ट्रेनिंग मिली है, जिन्हें गिरफ्तार किया जा सके या खरीदा जा सके. लेकिन किसी एल्गोरिदम को जेल में कैसे डाला जाएगा? उस भावना को कैसे खरीदा जाएगा, जो लाखों स्क्रीन पर मौजूद है? डिजिटल बगावत आ चुकी है, और यह उन नियमों से खेल रही है जिन्हें सत्ता में बैठे लोगों ने अभी ठीक से पढ़ा भी नहीं है.

मुख्यधारा की मीडिया अभी तक यह समझने में लगी है कि हवा किस तरफ बह रही है, लेकिन तूफान पहले ही आ चुका है. CJP ने साबित कर दिया है कि अगर आपके पास लोगों की स्क्रीन पर कब्जा है, तो आपको पार्टी मुख्यालय की जरूरत नहीं है. ये “कीड़े” अब सिर्फ कमरे में मौजूद नहीं हैं, बल्कि उन्होंने पूरे घर के नियम बदल दिए हैं. और वे अब यहीं रहने वाले हैं.

निखिल संजय-रेखा अडसुले कॉन्स्टिट्यूशनल लॉ के एक्सपर्ट और IIT दिल्ली में सीनियर रिसर्च स्कॉलर हैं. वे @Surajya_Raje_ पर ट्वीट करते हैं. विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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