जातिवाद गांवों और ‘पुराने ज़माने के भारत’ की समस्या है, यह बात मुझे इतनी बार बताई गई है कि अब गिनती याद नहीं. जैसे ही हम कांच की इमारतों, गेट वाली हाउसिंग सोसाइटियों, स्टार्ट-अप कंपनियों के ऑफिस और खुद को ‘प्रगतिशील’ कहने वाले शहरों में पहुंचते हैं, ऐसा माना जाता है कि समाज की पुरानी ऊंच-नीच खत्म हो जाती है.
असल में, शहरों में जातिवाद अपना रूप बदल लेता है. यह गिरगिट की तरह माहौल के हिसाब से रंग बदलता है. अब यह हमेशा हिंसा के रूप में नहीं दिखता, लेकिन हिंसा इसकी असली भाषा है. शहरी भारत में जातिवाद कोट-पैंट पहनता है, लैपटॉप रखता है और तेज़ अंग्रेज़ी बोलता है. यह ‘मेरिट’ यानी योग्यता के नाम पर आता है, यह नफासत के रूप में सामने आता है.
इसलिए अब यह और भी खतरनाक हो गया है क्योंकि इसे नकारना आसान हो गया है.
शहरों में अब कोई भी खुद को जातिवादी नहीं दिखाना चाहता. यह गलत माना जाता है. इसलिए भाषा बदल गई है. अब हम यह नहीं कहते कि कोई व्यक्ति अपनी जाति की वजह से आगे या पीछे है. हम कहते हैं कि वह ‘फिट’ नहीं है. हम यह नहीं कहते कि उसके पास सामाजिक पहचान या पहुंच नहीं है. हम कहते हैं कि उसे और ‘प्रेजेंटेबल’ बनने की ज़रूरत है. हम यह नहीं कहते कि उसे कुछ समूहों से बाहर रखा जाता है. हम कहते हैं कि माहौल ‘उसके लिए नहीं’ है.
कई बार कठोरता मीठे शब्दों में छिपी होती है.
मैंने देखा है कि बोलने का तरीका भी पहचान बन जाता है. एक सरनेम वही काम कर देता है जो पहले जनगणना करती थी. जो लोग खुद को ‘मॉडर्न’ और ‘उदार’ बताते हैं, वे भी नाम, भाषा या आत्मविश्वास देखकर तुरंत राय बना लेते हैं.
मैंने देखा है कि किसी प्रतिभाशाली व्यक्ति को इंटरव्यू में सिर्फ इसलिए रिजेक्ट कर दिया गया क्योंकि वह ‘कल्चर के लिए फिट’ नहीं था. ‘कल्चर के लिए फिट’ एक ऐसा शब्द है जिसके जरिए पहली या दूसरी पीढ़ी के लोगों को बाहर कर दिया जाता है. ‘कल्चर’ अक्सर वही लोग तय करते हैं जिनकी पहचान पहले से मजबूत होती है. कई शहरी जगहों पर जाति पूछने की ज़रूरत भी नहीं पड़ती, उसे समझ लिया जाता है.
अक्सर वही लोग यह तय करते हैं जो कहते हैं कि वे बिल्कुल भी जातिवादी नहीं हैं.
योग्यता पर बेईमान बहस
मैं ऐसी बैठकों में गया हूं जहां अंग्रेज़ी यह तय करती है कि किसे गंभीरता से लिया जाएगा. सिर्फ सही अंग्रेज़ी नहीं, बल्कि साफ, तेज़, शहरी और आत्मविश्वास वाली अंग्रेज़ी ऐसी अंग्रेज़ी जो सिर्फ विचार नहीं बताती बल्कि यह भी बताती है कि आप किस माहौल से आते हैं. वहां शालीनता की कमी को सामाजिक फर्क नहीं माना जाता बल्कि व्यक्तिगत कमी समझा जाता है. अगर आप उनके जैसे नहीं बोलते, उनके जैसे नहीं पहनते या उनके जैसे व्यवहार नहीं करते, तो आपको अलग माना जाता है.
यहीं शहरों में जातिवाद चुपचाप काम करता है. उसे खुलकर मना करने की ज़रूरत नहीं होती. वह बस इतना करता है कि कुछ लोग खुद को कम महसूस करने लगते हैं और जैसे ही किसी को शर्म महसूस होती है, ऊंच-नीच कायम हो जाती है.
इसलिए आज ‘मेरिट’ यानी योग्यता पर जो बहस हो रही है, वह मुझे ईमानदार नहीं लगती. ‘मेरिट’ को साफ और निष्पक्ष माना जाता है, लेकिन कई बार यह छिपा हुआ पक्षपात होता है. इसके नाम पर तय किया जाता है कि किसे नौकरी मिलेगी, किसे प्रमोशन मिलेगा, किसकी बात सुनी जाएगी, किसे दोबारा बुलाया जाएगा, किसे ‘टैलेंटेड’ कहा जाएगा और किसे कहा जाएगा कि खुद को और बेहतर बनाओ.
अक्सर ‘मेरिट’ का मतलब होता है अपने जैसे लोगों को चुनना.
‘कल्चर के लिए फिट’ भी एक नरम झूठ है. यह प्रोफेशनल लगता है, लेकिन असल में इसका मतलब होता है कि क्या आप हमारे जैसे दिखते हैं, बोलते हैं, हमारे जैसे मज़ाक करते हैं, हमारे जैसे माहौल से आते हैं या नहीं.
‘नफासत’ भी एक गहरा शब्द है. कौन तय करता है कि क्या शालीन है? कॉरपोरेट भारत में शालीनता अक्सर ऊंची जातियों की आदतों से जुड़ी होती है. ये आदतें तटस्थ नहीं होतीं, बल्कि परिवार और माहौल से सीखी जाती हैं और क्योंकि ये सहज लगती हैं, इन्हें उत्कृष्टता समझ लिया जाता है.
इसका नतीजा यह है कि शहरों में समानता की बात होती है, लेकिन पुरानी ऊंच-नीच बनी रहती है.
कॉरपोरेट भारत में आंबेडकर अदृश्य
शहरों में जातिवाद हमेशा सीधे सज़ा नहीं देता, बल्कि वह भरोसा और सहजता छीन लेता है. कुछ लोगों को आसानी से योग्य मान लिया जाता है, जबकि दूसरों को बार-बार खुद को साबित करना पड़ता है कि वे बहुत ज्यादा भावुक, बहुत ज्यादा राजनीतिक या बहुत ज्यादा अलग नहीं हैं.
यहीं मानसिक दबाव बढ़ता है. शहर कहता है कि जाति भूल जाओ, लेकिन उसके असर को झेलना पड़ता है. आपसे कहा जाता है महत्वाकांक्षी बनो, लेकिन ज्यादा सवाल मत पूछो. बोलो, लेकिन आक्रामक मत बनो. शुक्रगुज़ार रहो, लेकिन मांग मत करो. जैसे ही आप भेदभाव की बात करते हैं, कहा जाता है कि आपको हर जगह जातिवाद दिखता है.
लेकिन जाति कोई कल्पना नहीं है, यह एक व्यवस्था है. व्यवस्था सिर्फ इसलिए खत्म नहीं होती क्योंकि लोग उसे मानना बंद कर दें.
सबसे चिंता की बात यह है कि शहरों में जातिवाद प्रगति की भाषा बोलकर ज़िंदा रहता है. बैठकों में समावेश की बात होती है, लेकिन असली नेटवर्क वही पुराने रहते हैं. कागज़ पर विविधता की बात होती है, लेकिन नौकरी वही लोगों को मिलती है.
इसीलिए डॉ. बी.आर. आंबेडकर को सिर्फ फोटो या पोस्टर तक सीमित नहीं करना चाहिए. उन्होंने सिर्फ बराबरी की बात नहीं की थी, बल्कि समाज की पूरी संरचना बदलने की बात की थी. उन्होंने समझा था कि जाति सिर्फ परंपरा नहीं बल्कि सम्मान, अवसर, शिक्षा, भाषा और सत्ता से जुड़ा मुद्दा है.
फिर भी कॉरपोरेट दुनिया में आंबेडकर लगभग नज़र नहीं आते.
करवा चौथ बनाम आंबेडकर जयंती
हम उन त्योहारों पर आसानी से छुट्टी लेते हैं जो मुख्यधारा को आरामदायक लगते हैं, लेकिन आंबेडकर जयंती को उतना महत्व नहीं देते. कई दफ्तरों में पारंपरिक त्योहार मनाए जाते हैं, लेकिन उस व्यक्ति के लिए बहुत कम किया जाता है जिसने देश को न्याय का मजबूत आधार दिया.
हम उन परंपराओं को मनाते हैं जो ऊंच-नीच को मजबूत करती हैं, लेकिन उस विचारक को जगह देने में हिचकते हैं जिसने पूरी ज़िंदगी ऊंच-नीच खत्म करने में लगा दी.
इसलिए चुप रहना भी मायने रखता है.
रक्षाबंधन को सांस्कृतिक परंपरा माना जाता है, जबकि इसमें भाई को रक्षक और बहन को सुरक्षित रहने वाली माना जाता है. करवा चौथ भी शहरों में खुले तौर पर मनाया जाता है और सामाजिक रूप से स्वीकार किया जाता है. हमारे कैलेंडर बताते हैं कि हम किसे ज्यादा महत्व देते हैं.
महिलाओं को खास परंपराएं अपनाने के लिए प्रेरित किया जाता है, जबकि कई महिलाएं आज बड़े पदों पर हैं, लेकिन जागरूकता के बिना आगे बढ़ना भी कई बार पुराने ढांचे को मजबूत करता है.
करवा चौथ इसका उदाहरण है. पति की लंबी उम्र के लिए व्रत रखने वाली महिला को समर्पण और प्रेम का प्रतीक बताया जाता है, लेकिन सवाल यह है कि त्याग हमेशा महिलाओं से ही क्यों जुड़ा होता है? पुरुषों के लिए महिलाओं से ही बलिदान क्यों अपेक्षित होता है? आज्ञाकारिता को रोमांस क्यों माना जाता है?
डॉ. आंबेडकर ने हिंदू कोड बिल के जरिए महिलाओं को कानूनी अधिकार दिलाने की कोशिश की, फिर भी उन्हें अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है. यह विडंबना है कि महिलाओं के अधिकारों के लिए लड़ने वाले व्यक्ति को कम याद किया जाता है, जबकि पितृसत्ता को मजबूत करने वाली परंपराएं खुले तौर पर मनाई जाती हैं.
जब दिखावा हटता है
शहरी भारत प्रगति का दिखावा पसंद करता है. उसे आधुनिक शब्द, पैनल चर्चा, समावेश के कार्यक्रम और सशक्तीकरण के हैशटैग पसंद हैं, लेकिन प्रगति सिर्फ शब्द नहीं है. प्रगति का मतलब है सच का सामना करना कि जातिवाद खत्म नहीं हुआ है. उसने बस आधुनिक रूप ले लिया है.
यह नौकरी देने वाले कमरों में दिखता है जहां पैनल विविध होते हैं, लेकिन फैसले नहीं. यह उन अपार्टमेंट में दिखता है जहां लोग खुलकर कुछ नहीं कहते, लेकिन चयन अलग तरीके से करते हैं. यह स्कूलों में दिखता है जहां अनुशासन की बात होती है, लेकिन फर्क बनाए रखे जाते हैं.
यह दोस्ती में भी दिखता है, जहां किसी के दर्द को नाम देने पर उसे ‘बहुत राजनीतिक’ कहा जाता है. कई संस्थाएं दलितों की मौजूदगी तो चाहती हैं, लेकिन उनकी आवाज़ नहीं.
शहरों में जातिवाद खत्म नहीं हुआ है.
शहरी भारत आज जातिवाद खत्म होने के दौर में नहीं है, बल्कि ऐसा दौर है जहां लोग जातिवाद स्वीकार नहीं करना चाहते. वे ऊंच-नीच का फायदा तो चाहते हैं, लेकिन उसे मानना नहीं चाहते. फिर भी शहर एक मौका देता है, जहां विरोधाभास दिखता है. जो लोग बराबरी की बात करते हैं, कई बार वही लोग छिपे रूप में भेदभाव को बनाए रखते हैं.
अगर जातिवाद को मानना मुश्किल हो गया है, तो जरूरी है कि उसे बनाए रखने वाली सोच को भी खत्म किया जाए. अंग्रेज़ी को चरित्र मत समझिए. नफासत को सिद्धांत मत मानिए. सिर्फ दिखावे को न्याय मत समझिए.
और यह दिखावा करना बंद कीजिए कि शहर सिर्फ इसलिए बेहतर हैं क्योंकि वहां ज्यादा रोशनी है.
जातिवाद खत्म नहीं हुआ है. उसने बस साफ कपड़े पहन लिए हैं, ऑफिस का व्यवहार सीख लिया है और व्यवस्थित जगहों में फिट हो गया है. यह खुलकर अपमान करने वाला नहीं, बल्कि चालाक जातिवाद है.
यह वही जातिवाद है जो ‘मेरिट’ और ‘कल्चर के लिए फिट’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करता है. यह तय करता है कि कौन अपना है और किसे बार-बार खुद को साबित करना है. जातिवाद खत्म नहीं हुआ, बस उसे पहचानना मुश्किल हो गया है क्योंकि अब वह शहरों की भाषा बोलता है.
वैभव वानखेड़े एक क्रिएटिव मार्केटर और लेखक हैं. यहां व्यक्त विचार उनके निजी हैं.
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