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Monday, 2 February, 2026
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बजट 2026 में खेती के लिए फंडिंग को लेकर वही पुराना तरीका दिखता है

बजट में कृषि को एक अलग क्षेत्र के रूप में नहीं देखा गया है. इसके बजाय कृषि को सात प्राथमिकताओं में शामिल किया गया है.

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रविवार को अपना नौवां केंद्रीय बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने आने वाले साल में करीब 53.5 लाख करोड़ रुपये खर्च करने का प्रस्ताव रखा. करीब 1.48 अरब की आबादी के हिसाब से यह खर्च प्रति व्यक्ति लगभग 36,000 रुपये बैठता है. इस सालाना बजट में से करीब 2.6 फीसदी (1.4 लाख करोड़ रुपये) कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के लिए रखे गए हैं. हाल के वर्षों में यह हिस्सा लगातार घटता गया है. इस लेख में हम कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों से जुड़ी घोषणाओं की समीक्षा कर रहे हैं.

सबसे पहले, उन तीन सबसे बड़ी सब्सिडी पर नज़र डालते हैं, जो मिलकर राष्ट्रीय बजट का करीब 10 फीसदी हिस्सा बनाती हैं.

ग्राफिक: मनाली घोष/दिप्रिंट
ग्राफिक: मनाली घोष/दिप्रिंट

सीतारमण ने अपने भाषण में कहा कि पिछले एक दशक में करीब 25 करोड़ भारतीय बहुआयामी गरीबी से बाहर आए हैं. इसके बावजूद, बजट में खाद्य सब्सिडी के लिए 2.3 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान पहले जैसा ही रखा गया है. इसका मतलब है कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 के तहत चिन्हित 81.3 करोड़ लाभार्थियों को मुफ्त अनाज देने की व्यवस्था जारी रहेगी.

दिलचस्प बात यह है कि तीन दिन पहले जारी आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया था कि भारत की सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) को आधार सीडिंग, वन नेशन वन राशन कार्ड (ONORC) और ई-पॉस प्रमाणीकरण के जरिए तकनीकी रूप से मजबूत किया गया है. सर्वे का तर्क है कि इन सुधारों के बाद खाद्य सब्सिडी में डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (डीबीटी) की ओर बढ़ना अब संभव और ज़रूरी हो गया है, ताकि गड़बड़ियां कम हों और लोगों को ज्यादा विकल्प मिल सकें.

सर्वे में सुझाए गए सुधारों और बजट में किए गए प्रावधानों के बीच यह विरोधाभास दिखाता है कि सर्वेक्षण जिन सुधारों के आधार पर वितरण प्रणाली को बदलने की बात करता है, बजट उन्हीं सुधारों को आगे बढ़ाने से हिचकता नजर आता है.

उर्वरक (खाद) सब्सिडी के लिए कुल बजट 2025-26 (संशोधित अनुमान) में 1.9 लाख करोड़ रुपये से घटकर 2026-27 (बजट अनुमान) में करीब 1.7 लाख करोड़ रुपये रह गया है. वहीं, उर्वरक में डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (डीबीटी) के लिए अलग से कोई राशि नहीं रखी गई है. आर्थिक सर्वेक्षण में प्रति एकड़ डीबीटी मॉडल के जरिए खाद सब्सिडी को नए सिरे से तय करने की मजबूत पैरवी की गई थी, ताकि पोषक तत्वों के असंतुलन और वित्तीय गड़बड़ियों को दूर किया जा सके, लेकिन बजट से संकेत मिलता है कि इस सुधार प्रक्रिया को फिलहाल रोक दिया गया है या आगे के लिए टाल दिया गया है.

हाल के वर्षों में कृषि ऋण की कुल उपलब्धता ज़रूर बढ़ी है, लेकिन इसकी पहुंच अब भी बहुत असमान है. स्टडीज़ के मुताबिक, भारत में केवल करीब 30 से 33 फीसदी किसान ही औपचारिक संस्थागत ऋण का लाभ ले पा रहे हैं. बाकी किसान या तो अनौपचारिक स्रोतों पर निर्भर हैं या फिर पूरी तरह बाहर हैं. छोटे और सीमांत किसानों में भी यह कवरेज आमतौर पर 40 फीसदी से ज्यादा नहीं है.

इस स्थिति को देखते हुए, बजट में कृषि ऋण के लिए आवंटन को लगभग पहले जैसा ही रखना यह दिखाता है कि खेती के लिए फंडिंग में ‘जैसा चल रहा है वैसा ही’ वाला रवैया अपनाया गया है. इससे किसानों तक ऋण पहुंच में मौजूद गहरी खाइयों को दूर करने की कोई ठोस कोशिश नहीं दिखती.

कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों में प्रमुख पहल

फसलों से हटकर सहायक क्षेत्रों पर जोर, आय के नए साधन: कृषि क्षेत्र से जुड़ी ज्यादातर घोषणाएं फसलों के बजाय मत्स्य पालन और पशुपालन के लिए हैं. मत्स्य पालन में समुद्री मछली पकड़ने के लिए निर्यात और ड्यूटी से जुड़ी राहत के साथ-साथ, 500 जलाशयों और अमृत सरोवरों को विकसित कर अंतर्देशीय मत्स्य पालन बढ़ाने पर जोर दिया गया है. इसके अलावा, तटीय मत्स्य पालन की पूरी वैल्यू चेन को मजबूत करने के लिए निवेश का प्रस्ताव है. बजट में बेहतर मार्केटिंग के लिए स्टार्टअप्स, महिला-नेतृत्व वाले समूहों और फिश फार्मर्स प्रोड्यूसर ऑर्गनाइजेशन को जोड़ने की बात कही गई है.

पशुपालन के लिए बजट में आधुनिक ढांचे के विकास, वैल्यू चेन बनाने और पशुपालक उत्पादक संगठनों के जरिए बेहतर मार्केटिंग में निवेश की योजना है. ग्रामीण आय की रणनीति अब अनाज से हटकर पशुपालन, मत्स्य पालन, डेयरी और पोल्ट्री की ओर जाती दिख रही है.

सामान्य खेती नहीं, क्षेत्र के हिसाब से फसल रणनीति: वित्त मंत्री ने 2026-27 के लिए सात फसलों पर खास ध्यान देने की बात कही है—नारियल, कोको, काजू, बादाम, अखरोट, पाइन नट्स और चंदन. ये फसलें खास इलाकों से जुड़ी हैं, जैसे तटीय क्षेत्र, पहाड़ी इलाके, पूर्वोत्तर और बागान क्षेत्र. नारियल प्रोत्साहन योजना के जरिए उत्पादन बढ़ाने और उत्पादकता सुधारने का लक्ष्य रखा गया है. इसके अलावा, भारतीय काजू और कोको के लिए अलग से एक कार्यक्रम प्रस्तावित है, ताकि उत्पादन बढ़े और निर्यात में प्रतिस्पर्धा मजबूत हो. यह स्पष्ट रूप से क्षेत्रीय ताकतों पर आधारित खेती की नई रणनीति का संकेत है.

उत्पादन से ज्यादा बाजार तक पहुंच पर ध्यान: बजट में यह ज्यादा बताया गया है कि कौन बेचेगा, न कि कौन उगाएगा. मछली और पशुपालन से जुड़े एफपीओ बनाने के साथ-साथ, मौजूदा स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) योजनाओं का इस्तेमाल कर समुदाय के स्वामित्व वाले सेल्फ-हेल्प एंटरप्रेन्योर (SHE) मार्ट बनाने की योजना है. इसके अलावा, सहकारी संस्थाओं को मजबूत करने के लिए लक्षित टैक्स राहत दी गई है. इसमें सदस्य-उत्पादित इनपुट सप्लाई करने वाली प्राथमिक समितियों के लिए कटौती और सहकारी संस्थाओं के बीच दिए जाने वाले डिविडेंड पर छूट शामिल है. साथ ही, राष्ट्रीय सहकारी महासंघों को डिविडेंड आय पर अस्थायी टैक्स छूट भी दी गई है, बशर्ते इसका लाभ सदस्य सहकारी संस्थाओं तक पहुंचाया जाए.

लॉजिस्टिक्स और व्यापार ढांचा भी कृषि नीति का हिस्सा: बजट में अप्रैल 2026 तक खाद्य, पौधों, पशु और वन्य उत्पादों के कार्गो के लिए सिंगल विंडो क्लीयरेंस लागू करने का सुझाव दिया गया है. इसके अलावा, एआई आधारित कंटेनर स्कैनिंग, गोदामों के डिजिटलीकरण और समर्पित फ्रेट कॉरिडोर (जलमार्गों सहित) में निवेश की बात कही गई है. ये सुधार खेत से बंदरगाह या खेत से बाजार तक की व्यवस्था को बेहतर बनाने से जुड़े हैं.

डिजिटल शासन और बायो-इकोनॉमी का हिस्सा बनी कृषि: बजट में भारत-विस्तार (Bharat-VISTAAR) नाम से एक एआई आधारित डिजिटल सलाह मंच शुरू करने का प्रस्ताव है. वहीं, कचरे से मूल्य बनाने की दिशा में, संपीड़ित बायोगैस (सीबीजी) पर लगने वाली एक्साइज ड्यूटी हटाने का प्रस्ताव भी बजट में किया गया है.

मुख्य सहायता योजनाओं में बजट लगातार जारी रहने का संकेत देता है, लेकिन फसल बीमा और प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) जैसी योजनाओं पर खर्च 2025-26 के मुकाबले कम नजर आता है. कृषि अनुसंधान और शिक्षा विभाग (DARE) और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय के लिए किए गए आवंटन में भी कटौती हुई है.

महंगाई को ध्यान में रखने पर, पीएम-किसान, फसल बीमा, कृषि अनुसंधान और सिंचाई पर खर्च वास्तविक रूप से कम हो जाता है. DARE के लिए कम आवंटन यह दिखाता है कि भले ही नीति में उत्पादकता और नवाचार पर जोर दिया गया हो, लेकिन अनुसंधान और लंबे समय की क्षमता निर्माण के लिए वित्तीय समर्थन अब भी सीमित है.

कुल मिलाकर, बजट में कृषि को एक अलग क्षेत्र के रूप में नहीं देखा गया है. इसके बजाय, कृषि को सात प्राथमिकताओं में शामिल किया गया है—जैसे क्षेत्र के हिसाब से फसल चयन, सहायक क्षेत्रों को बढ़ावा देना, महिलाओं के नेतृत्व वाले उद्यम, डिजिटल सलाह प्रणाली, लॉजिस्टिक्स सुधार और बायोएनर्जी को व्यवहार्य बनाना.

नतीजा यह है कि बजट में एक सिस्टम आधारित नजरिया दिखता है, जहां वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सीधे तौर पर यह नहीं बताया कि वह कृषि क्षेत्र के लिए क्या करेंगी, बल्कि यह संकेत दिया है कि वह ऐसे सिस्टम बनाने में निवेश करेंगी, जिनसे कृषि और उससे जुड़े क्षेत्र बेहतर तरीके से काम कर सकें.

श्वेता सैनी एक कृषि अर्थशास्त्री और आर्कस पॉलिसी रिसर्च की को-फाउंडर हैं, जहां पुलकित खत्री सीनियर कंसल्टेंट हैं. उनका एक्स हैंडल @pulkit7khatri है. व्यक्त किए गए विचार लेखकों के निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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