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Wednesday, 6 May, 2026
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बंगाल में BJP की जीत ने पुराने भद्रलोक सिस्टम को तोड़ा, जिसने दलितों और उनके मुद्दों को बाहर रखा

‘बंगाल में जाति नहीं है’—यह सोच भद्रलोक ने फैलाई. इसने दलितों के संघर्ष के अहम सवाल को पहले लाल और फिर नीले झंडे के नीचे दबा दिया.

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कल घोषित हुए पांच विधानसभा चुनावों के नतीजों में, बंगाल के नतीजे इतिहास में दर्ज होंगे. 4 मई 2026 एक खास दिन रहेगा—भारतीय जनता पार्टी के लिए नहीं, बल्कि राजबंशी, नामो शूद्र, मतुआ और कई अन्य दलित समुदायों के लाखों लोगों के लिए, जिनकी आज़ादी के बाद से अब तक राज्य की सरकार और शासन में कोई खास आवाज़ नहीं थी.

अक्सर कहा जाता है कि बंगाल आज जो सोचता है, भारत कल वही सोचता है, लेकिन यह बात दलितों पर लागू नहीं होती. समझदार और जागरूक माने जाने वाले बंगाल की एक बड़ी सच्चाई यह रही है कि दलितों को राजनीति में लगातार नज़रअंदाज़ किया गया. कांचा इलैया ने पत्रकार चंद्रिमा भट्टाचार्य से बातचीत में कहा था, “बंगालियों को जाति की समझ नहीं है.”

बंगाल की आबादी में दलितों की हिस्सेदारी 23.5 प्रतिशत है—जो कई राज्यों से ज्यादा है और कुल संख्या में यह उत्तर प्रदेश के बाद दूसरे नंबर पर है. फिर भी, आज़ादी के बाद से राज्य में एक भी बड़ा दलित नेता सामने नहीं आया. वजह साफ है: बंगाल के भद्रलोक जाति को मानते ही नहीं और लंबे समय तक कम्युनिस्ट शासन ने इस सोच को और मजबूत किया. यहां तक कि “मां, माटी, मानुष” जैसे नारे भी दलित मुद्दों को सामने नहीं ला पाए.

दलितों और उनके मुद्दों को मुख्यधारा की राजनीति से बाहर रखा गया और उनके सवालों को वर्ग (क्लास) और वामपंथी विचारधारा के बड़े ढांचे में शामिल कर दिया गया—यह मानकर कि बिना ऊंची जातियों के वर्चस्व को खत्म किए भी उनके मुद्दे सुलझ सकते हैं.

बंगाल में दलित मुद्दे छिपे रहे

बंगाल में राजनीति और विचारधारा समाज के हर हिस्से में गहरी है—चाहे लोकल स्पोर्ट्स क्लब हों या दुर्गा पूजा कमेटियां, हर जगह पार्टी राजनीति का असर है. इससे दलित समाज और ज्यादा बंट गया, लेकिन इस सबके बावजूद जाति के भेदभाव में कोई खास कमी नहीं आई. दलित अब भी दबे-कुचले रहे; छुआछूत और जाति आधारित हिंसा होती रही और मंदिरों में प्रवेश तक रोका गया—2025 में पूर्व बर्दवान के 300 साल पुराने गिरधेश्वर मंदिर में दलितों के प्रवेश पर रोक इसका ताज़ा उदाहरण है.

पार्टी राजनीति ने उनके संघर्ष को और छिपा दिया, जबकि भद्रलोक, जो ज्यादातर ऊंची जाति और ऊंचे वर्ग से हैं—यह बात फैलाते रहे कि बंगाल “जाति-रहित” है और इसलिए दूसरे राज्यों से बेहतर है, लेकिन असल में यह जाति के बड़े सवाल को पहले लाल और फिर नीले झंडे के नीचे दबाने जैसा ही रहा.

बंगाल में दलित अलग-अलग इलाकों में फैले हुए हैं और कई उप-जातियों और समुदायों में बंटे हैं. नामो शूद्र और मतुआ समुदाय दक्षिण बंगाल में, खासकर नॉर्थ 24 परगना और नादिया में रहते हैं. राजबंशी समुदाय उत्तर बंगाल—जैसे जलपाईगुड़ी, कूचबिहार और दार्जिलिंग में प्रभाव रखता है. इसके अलावा बागड़ी, बाउरी, मोची और चमार जैसे अन्य अनुसूचित जाति समुदाय जंगलमहल, मिदनापुर और राज्य के अर्ध-शहरी इलाकों में बड़ी संख्या में हैं. उनके मुद्दे भी उनकी पहचान की तरह अलग-अलग हैं.

पहचान का सवाल इन समुदायों के लिए सबसे बड़ा संघर्ष है. मतुआ और नामो शूद्र समुदाय अपने मूल को अविभाजित बंगाल से जोड़ते हैं और उनके लिए नागरिकता और शरणार्थी का दर्जा आज भी बड़ा मुद्दा है. उत्तर बंगाल के राजबंशी लंबे समय से अलग राज्य की मांग कर रहे हैं. बाकी दलित समुदाय ज्यादातर खेती से जुड़े हैं और उनके मुख्य मुद्दे शिक्षा, रोज़गार और बराबरी हैं—जो आज़ादी के बाद से अब तक अनदेखे ही रहे हैं.

कई रिपोर्ट्स बताती हैं कि भले ही बंगाल को “जाति-रहित” कहा जाता है, लेकिन स्कूलों में अलग बैठाना, पानी के स्रोतों पर भेदभाव और जाति व लिंग आधारित हिंसा आज भी आम है, जितना कि यह दावा कि बंगाल में जाति नहीं है.

दलितों ने बंगाल में अपनी ताकत से सत्ता में जगह बनाई

बीजेपी ने इन समुदायों को सिर्फ आवाज़ ही नहीं दी, बल्कि उनकी लंबे समय से चली आ रही मांगों को भी सुना. बंगाल जैसे विविध समाज की जातीय हकीकत को समझना और समुदायों की मांगों से जुड़ना इस चुनाव अभियान की बड़ी खास बात रही. नामो शूद्र और मतुआ समुदायों को पहले से लागू नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के जरिए जल्दी नागरिकता देने का वादा किया गया, जबकि राजबंशी समुदाय को उनके सम्मान में एक बटालियन बनाने का वादा किया गया, जो मुगलों के खिलाफ उनके ऐतिहासिक संघर्ष को मान्यता देता है.

लेकिन सबसे अहम कारण था दलित समुदायों की अलग-अलग पहचान और उम्मीदों को एक साथ जोड़ना, जिसने इस चुनाव में इतना बड़ा और साफ नतीजा दिया. शहर और गांव के दलितों की अलग-अलग उम्मीदें होती हैं और उनमें वर्ग (क्लास) का फर्क भी होता है. शहरी दलितों के हित गांव के दलितों से अलग होते हैं और भारतीय समाज में गहरी जड़ें जमा चुकी वर्ग व्यवस्था के कारण इन सबको एक साथ जोड़ना आसान नहीं था, जिसे बीजेपी ने पार किया.

यह जीत सिर्फ बीजेपी की चुनावी रणनीति का एक बार का नतीजा नहीं है, बल्कि पिछले दस सालों से लगातार बातचीत और लोगों तक पहुंच बनाने का परिणाम है, जिसने वो कर दिखाया जो एक दशक पहले असंभव लगता था—जाति की राजनीति में लगभग अदृश्य रहे दलित वोट को एकजुट करना. यह मोदी सरकार के उस लगातार प्रयास का भी सबूत है, जिसमें समुदाय को सिर्फ दाखिले और नौकरियों में ही नहीं, बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में सम्मान और बराबरी दिलाने की कोशिश की गई. इसकी शुरुआत पार्टी के अंदर से हुई, जहां बीजेपी ने अपने संगठन में दलित नेताओं को आगे बढ़ाया, उन्हें मंच दिया और उनकी आवाज़ को मजबूत किया.

विकसित भारत की नींव जिन GYAN स्तंभों पर रखी जानी है, उसकी कीमत उस व्यवस्था को चुकानी पड़ रही है, जिसने आज़ादी के बाद से संविधान और उसके निर्माताओं द्वारा सुरक्षित की गई आवाज़ों को बांटने का काम किया. पश्चिम बंगाल में बीजेपी की जीत पुरानी व्यवस्था के खत्म होने का संकेत है. यह चुनाव भी पिछले चुनावों की तरह इस बात को साबित करता है कि मोदी सरकार का मकसद सबसे हाशिये पर खड़े लोगों को राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक रूप से सशक्त बनाना है.

अदिति नारायणी, डॉ. आंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर में एसोसिएट प्रोफेसर हैं. उनका एक्स हैंडल @AditiNarayani है. ये उनके निजी विचार हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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