Wednesday, 7 December, 2022
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PFI पर पाबंदी काफी नहीं, सिमी पर बैन से इंडियन मुजाहिदीन बनने का उदाहरण है सामने

पीएफआई इस्लामवाद के जिस नफरती चेहरे को सामने लाता है, उससे साफ है कि गहराई से जड़ें जमाए राजनीतिक और सामाजिक समस्याओं ने कितना जटिल रूप ले लिया है. इससे निपटने के लिए सिर्फ पुलिसिया कार्रवाई ही नहीं, बल्कि राजनीतिक एक्शन की भी जरूरत है.

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2001 में फरवरी की एक देर शाम सादिक इसरार शेख को मुंबई के चीता कैंप क्षेत्र की गलियों में चलने वाले मदीना होटल में चाय का न्योता मिला. बाबरी मस्जिद ढहाए जाने से नाराज अपनी पीढ़ी के कई अन्य युवा मुसलमानों की तरह शेख भी स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया में शामिल हो चुका था.

हालांकि, एयर-कंडीशनर सुधारने वाला यह मैकेनिक कुछ ही महीनों में इस्लाम पर जोशीली तकरीरें सुन-सुनकर ऊब गया और फिर, सिमी से अलग होने के करीब एक साल बाद मदीना में यह बैठक हुई, जो अंतत: पूरे भारत में अपने गहरे निशान छोड़ गई.

9/11 हमले के दो हफ्ते बाद भारत ने सिमी पर पाबंदी की दिशा में कदम बढ़ाया और संगठन पर देशद्रोह के आरोप लगाए. भले सिमी के सैकड़ों गुर्गे गिरफ्तार किए गए और उनसे पूछताछ की गई लेकिन पुलिस बल और खुफिया एजेंसियां सच्चाई की तह तक पहुंचने से कहीं न कहीं चूक गईं.

मदीना होटल में बैठक के बाद शेख ने बांग्लादेश की सीमा पार की और दुबई होकर ढाका से कराची जाने वाली अमीरात की फ्लाइट में सवार हो गया. शेख ने पुलिस को दिए अपने इकबालिया बयान—जिसे भारतीय कानून के तहत मुकदमे के दौरान उसके खिलाफ बतौर साक्ष्य इस्तेमाल नहीं किया जा सकता—में बताया था कि कराची से वह बहावलपुर के पास स्थित लश्कर-ए-तैयबा के शिविर में चला गया. वहां, उसने सिमी के कुछ पूर्व सदस्यों के साथ ट्रेनिंग लेनी शुरू की, जो इंडियन मुजाहिदीन बना रहे थे.

सिमी की कहानी इसी हफ्ते पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) के खिलाफ सख्त कार्रवाई को लेकर आगे की संभावनाओं और खतरों के बारे में समझने में मददगार हो सकती है. सिमी पर पाबंदी ने ऊपरी तौर पर नजर आने वाली इस्लामी राजनीतिक लामबंदी को तो रोक दिया था लेकिन जिहादी समूहों पर नकेल कसने में नाकाम रही. इससे बदतर स्थिति तो यह कि जिहादी नेटवर्क और अधिक सतर्क हो गए, बड़े कायदे से एकदम गोपनीयता के साथ काम करने लगे और भारतीय सुरक्षा एजेंसियों की नजरों में आने से बचते रहे.

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नतीजा, 2005 से 2011 के बीच करीब छह सालों तक भारत की पुलिस और खुफिया सेवाओं को देश में सबसे घातक शहरी आतंकवादी घटनाओं का सामना करना पड़ा.


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पीएफआई का आतंकी कनेक्शन

2016 के बाद से पीएफआई को अक्सर अपने सदस्यों के इस्लामिक स्टेट जैसे अंतरराष्ट्रीय जिहादी समूहों में शामिल होने के आरोपों का सामना करना पड़ा है. केरल निवासी शाजीर मंगलस्सेरी अब्दुल्ला, जिस पर एनआईए ने अफगानिस्तान में इस्लामिक स्टेट के लिए भर्ती करने का आरोप लगाया था, भी पीएफआई की राजनीतिक शाखा सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (एसडीपीआई) का समर्थक था. पीएफआई के हाउस-जर्नल थेजस में बतौर ग्राफिक डिजाइनर काम करने वाला साफवान पुकटेल कथित तौर पर शाजीर के रंगरूटों में शामिल है. वहीं मनसीद बिन मोहम्मद भी है जिसने अब प्रतिबंधित किए जा चुके संगठन के लिए हिंदुत्व पर शोध किया था.

कन्नूर मूल का मुहम्मद समीर किसी समय वालपट्टनम में पीएफआई का सब-डिवीजनल कंवेनर हुआ करता है. बाद में वह अपनी पत्नी फौजिया और तीन बच्चों के साथ सीरिया में इस्लामिक स्टेट खिलाफत में चला गया था और माना जाता है कि उसकी मौत के बाद से उसकी पत्नी और बच्चे वहां एक जेल शिविर में कैद हैं.

इस साल के शुरू में असम पुलिस ने बारपेटा के पूर्व पीएफआई जिला प्रमुख मकीबुल हुसैन पर अंसारुल्लाह बांग्ला टीम—बांग्लादेश में अल-कायदा का एक सहयोगी संगठन—के लिए भर्ती करने का आरोप लगाया था. यह संगठन वामपंथी धर्मनिरपेक्षतावादियों और हिंदू धार्मिक अल्पसंख्यकों को निशाना बनाकर कई हमले कर चुका है.

तेलंगाना पुलिस ने सैकड़ों युवकों को कुंग-फू कॉम्बैट की ट्रेनिंग देने के आरोप में पीएफआई कार्यकर्ता अब्दुल कादिर को गिरफ्तार किया, हालांकि बाद में स्थानीय मीडिया रिपोर्ट में कहा गया कि इस मामले में ‘कागजों के तीन ढेर, तीन हैंडबुक, एक नोटबुक और बस व ट्रेन की कुछ टिकटों’ से ज्यादा खतरनाक कुछ भी बरामद नहीं किया गया था.

कर्नाटक और केरल में हत्या की हालिया घटनाओं से बहुत पहले पीएफआई कैडर पर मजहबी हिंसा में शामिल होने का आरोप लगा था. नेशनल डेवलपमेंट फ्रंट (एनडीएफ)—जो कर्नाटक फोरम फॉर डिग्निटी और तमिलनाडु के मनिथा नीथी पासराय के साथ मिलकर पीएफआई का गठन करने वाले तीन संगठनों में शामिल था—के दो सदस्यों पर 2003 में माराड में आठ हिंदुओं की पीट-पीटकर हत्या किए जाने के मामले में शामिल होने का आरोप लगा था. हालांकि, बड़ी संख्या में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) और इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) के कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी की भी जानकारी सामने आई थी.

फिर, 2011 में पीएफआई सदस्यों ने बीकॉम द्वितीय वर्ष के छात्रों की आंतरिक परीक्षा के लिए सेट किए गए प्रश्नपत्र के एक सवाल को लेकर इडुक्की कॉलेज के प्रोफेसर टी.जे. जोसेफ का हाथ काट दिया था. 2013 में केरल पुलिस को कन्नूर के पास नारथ में एक कैंप का पता लगा जहां पीएफआई सदस्य बम बनाने और तलवार चलाने की ट्रेनिंग ले रहे थे.

जैसे सिमी के मामले में संगठन और इस्लामिक स्टेट जैसे जिहादी समूहों के बीच कोई लिंक स्पष्ट नहीं है. ज्यादातर मामलों में, इस्लामिक स्टेट के रंगरूट भी सक्रिय कैडर के बजाये पीएफआई के पूर्व सदस्य रहे हैं. सादिक शेख का मामला एक उदाहरण के तौर पर सामने है कि कैसे सिमी के साथ रहते जिहाद का कोई मौका न मिलने पर शेख सही लिंक तलाशने के लिए दूर के रिश्तेदार सलीम आजमी—जो कि बाद में एक विवादित पुलिस मुठभेड़ में मारा गया—के संपर्क में आया. आजमी ने ही कथित तौर पर उसे गिरोह के सरगना अमीर रज़ा खान से मिलवाया जो इंडियन मुजाहिदीन के प्रमुख सदस्यों की ट्रेनिंग के लिए फंडिंग करता था.

समीर जैसे पूर्व पीएफआई सदस्यों की इस्लामिक स्टेट में भर्ती ने प्रवासियों पर भी काफी असर डाला है. इसके अलावा, इस्लामिक स्टेट के लिए भर्ती करने वालों ने कई ऐसे भारतीयों को रिक्रूट किया है जिनका पीएफआई से कोई लिंक नहीं है—जो व्यक्तिगत संबंधों और ऑनलाइन दुष्प्रचार के प्रभाव को रेखांकित करता है.

मजहब से जुड़ी राजनीति

बाबरी मस्जिद ढहने के बाद सिमी की भाषा स्पष्ट तौर पर जिहादी समर्थक हो गई. 1999 में कानपुर में सम्मेलन के दौरान सात वर्षीय गुलरेज सिद्दीकी ने तकरीबन 20,000 सिमी सदस्यों के सामने खड़े होकर कहा, ‘इस्लाम का गाज़ी, बुतशिकन, मेरा शेर, ओसामा बिन लादेन.’ सिमी ने यह कहते हुए एक खिलाफत की हुंकार भर दी थी कि भारत के मुसलमानों के मामले में लोकतंत्र विफल हो गया है. यहां तक कि अल्लाह से यह दुआ भी कि वह मंदिरों पर हमले करने वाले ग्यारहवीं शताब्दी के आंक्राता महमूद गजनी का कोई अवतार भेजें.

सिमी की गलतियों से सबक लेते हुए ही पीएफआई हमेशा भड़काऊ भाषा से परहेज करता रहा है. शोधकर्ता मोहम्मद सिनान सियेच के मुताबिक, संगठन का संविधान इस बात पर जोर देता है कि वह ‘देश की लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था बनाए रखने, शांति कायम रखने, (और) अल्पसंख्यकों के मुद्दों को आगे बढ़ाने’ के लिए प्रतिबद्ध है.

सामाजिक संगठनों के एक व्यापक नेटवर्क के माध्यम से पीएफआई बड़े पैमाने पर कल्याणकारी गतिविधियों में भी लगा रहा है. उदाहरण के तौर पर, संगठन के कैडर ने असम में हाशिये पर रहने वाले बंगाली भाषी मुस्लिम समुदायों के लिए स्कूल खोले. केरल में नशीली पदार्थों के खिलाफ जागरूकता कार्यक्रमों चलाए, और उत्तर भारतीय राज्यों में चिकित्सा सेवा मुहैया कराता रहा. इस तरह के कार्यक्रमों के लिए धन के इंतजाम के बारे में पीएफआई का दावा है, उसके करीब 500,000 सदस्य 10 रुपये प्रति माह का चंदा देते हैं. इसके अलावा पूरे भारत और पश्चिम एशिया के समृद्ध दानदाता भी हैं.

सिमी ने भी अपने शुरुआती दौर में इसी तरह की रणनीति अपनाई थी. उदाहरणस्वरूप, 1982 में इसने एक ‘अनैतिकता-विरोधी’ सप्ताह मनाया, जिसमें कथित तौर पर अश्लील किताबें जलाई गईं. इसने युवाओं को ड्रग्स और अल्कोहल से दूर करने जैसे कार्यक्रमों के जरिये समुदाय के बीच अपनी एक जगह सुनिश्चित कर ली.

इतिहासकार इरफ़ान हबीब, इक़्तिदार आलम ख़ान और केपी सिंह ने 1976 के एक निबंध में लिखा कि सिमी की समाज सेवा परोपकार के लिए नहीं थी, इसका असली मकसद ‘मुस्लिम अलगाववाद को बढ़ावा देना था, न कि मुस्लिम पिछड़ेपन को दूर करना,’

आगे क्या हो सकते हैं खतरे

स्कॉलर योगिंदर सिकंद का गहन आकलन बताता है कि पीएफआई, सिमी जैसे संगठन फले-फूले क्योंकि इसने अपने समर्थक मुस्लिम युवाओं को ‘एक ऐसी ताकत और सांगठनिक क्षमता का अहसास कराया जिसका उन्हें अपने वास्तविक जीवन में अभाव लगता है.’ संगठन ऐसे राजनीतिक परिदृश्य की वजह से भी अपनी पैठ बना पाया क्योंकि मुख्यधारा की बड़ी पार्टियों के भीतर मुस्लिम राजनीतिक प्रतिनिधित्व लगातर घटता रहा है. इसकी वजह से एक खालीपन उपजा, जिसकी भरपाई सिमी जैसे इस्लामी संगठन ही कर सकते थे. इनकी बयानबाजियों ने मुस्लिमों के सामने आने वाली चुनौतियों के समाधान का एक भ्रमजाल पैदा कर दिया.

सिमी पर बैन ने इस्लामवाद के उस जहर को तो मिटाया जिसे संगठन ने फैलाया था और जिसकी वजह से बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक हिंसा की आशंका थी. हालांकि, इसकी एक बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है. सिमी सदस्य होने के आरोप में तमाम युवा मुस्लिमों की बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां हुई, हालांकि, इसमें से अधिकांश को बाद में बरी कर दिया गया लेकिन उनमें इसकी वजह से एक गहरी कड़वाहट घर कर गई. विडंबना ही कहेंगे कि सिमी के पूर्व अध्यक्ष शाहिद बद्र फलाही—जो उन राजनीतिक इस्लामवादियों के एक समूह का हिस्सा थे जिन्होंने जिहाद के मौजूदा स्वरूप का विरोध किया—को दीवार पर एक पोस्टर लगाने के आरोप में चौदह साल विचाराधीन कैदी के तौर पर गुजारने पड़े.

यही नहीं, 2005 में इंडियन मुजाहिदीन की तरफ से किए जाने वाले बम धमाकों के सिलसिले में धरपकड़ के लिए स्थानीय पुलिस को सिमी के कार्यकर्ता ही आसान लक्ष्य लगे. इसकी वजह से असली अपराधियों को कई सालों तक बेलगाम हमले जारी रखने का मौका मिलता रहा.

पीएफआई इस्लामवाद के जिस नफरती चेहरे को सामने लाता है, उससे साफ है कि गहराई से जड़ें जमाए राजनीतिक और सामाजिक समस्याओं ने कितना जटिल रूप ले लिया है. इससे निपटने के लिए सिर्फ पुलिसिया कार्रवाई ही नहीं, बल्कि राजनीतिक एक्शन की भी जरूरत है.

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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