Saturday, 28 May, 2022
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शमी पर हमला, बांग्लादेश हिंसा, कश्मीर पर निशाना, सभी का संदेश— गलत सूचना सबसे बड़ा ख़तरा

मोहम्मद शमी भारत के चहेते गेंदबाज हैं, तो उनके खिलाफ नफरत उगलना किसने शुरू किया? इसी तरह, बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ हिंसा कैसे शुरू हुई? गुस्से में आने से पहले जरा इस पर भी गौर कीजिए.

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वर्तमान दौर की विडंबना की शायद ही कल्पना की जा सकती है. एक पूरी कहानी, एक अभियान और लगभग एक राष्ट्रीय अपमान शून्य में से निर्मित कर दिया जाता है. दुनिया के एक हिस्से में हवा में से वारदात पैदा किए जाते हैं, जबकि दूसरे हिस्से में एक महिला के खिलाफ दी गई ऑनलाइन धमकी में उसे धर्मांध बताया जाता है, तो कहीं अल्पसंख्यकों पर बेमकसद हमले किए जाते हैं. उदाहरण कई हैं, लेकिन उनसे एक ‘सिलसिला’ उभर रहा है. समुदायों के बीच की दरारों को बढ़ाने और उनका फायदा उठाकर भारत को बांटने की साफ कोशिश की जा रही है. त्रासदी क्या है? यही कि समझदार और नेक-नीयत लोग जाल में फंस जाते हैं, मुद्दे को लेकर नाराज हो जाते हैं और इस तरह नफरत के घालमेल में इजाफा करते हैं. आज यही हो रहा है. सावधान हो जाइए, यह सबसे बड़ा खतरा साबित हो सकता है.

नफरत की जो घटना नहीं हुई

सोशल मीडिया पर एक दिलचस्प क्रमवार विवरण दिया गया है कि किस तरह संभवतः केरल के एक अज्ञात ट्विटर अकाउंट ने ‘भविष्यवाणी’ की थी कि चहेते भारतीय क्रिकेट खिलाड़ी मोहम्मद शमी के खिलाफ निंदा अभियान चलाया जाएगा. जाहिर है, वास्तविक निंदा 16 पोस्ट तक सीमित थी जिनमें से केवल आठ में धर्म के बहाने हमला किया गया था. फेसबुक ने इन पोस्टों को हटा दिया था लेकिन मूल पोस्ट को फहद शाह जैसे ‘प्रसारक’ ने शायद गैर-इरादतन उछाल दिया. फहद शाह एक समाचार स्रोत ‘द कश्मीर वाला’ के संपादक हैं, जो स्वतंत्र विचार रखने का दावा करते हैं. इस पोस्ट को मीडिया में चर्चित मोहम्मद जीशान जैसी आवाज़ों ने भी आगे बढ़ाया. जीशान एक लेखक हैं और भारत की नीतियों के खिलाफ अमेरिकी मीडिया में लिखते हैं. उनके 50 हजार फॉलोवर हैं. ‘वाशिंगटन पोस्ट’ में उनका पहला लेख कश्मीर पर आया था, जो कोई आश्चर्य की बात नहीं है. इस सूची में पाकिस्तान के सूचना व प्रसारण मंत्री फवाद हुसैन चौधरी भी शामिल हैं, जो इस और इस तरह के दूसरे मामलों के लिए उपयुक्त नाम भी हैं. इसके बाद ‘अल जज़ीरा’ की ओर से कई पोस्ट आए (जिनमें ‘भविष्यवाणियों’ के मूल स्क्रीनशॉट को इस्तेमाल किया गया था). इसके बाद पूरी कहानी ने ‘वे बनाम हम’ का रूप ले लिया, जिसमें भारतीय पक्ष एक बार फिर हमले के शिकार शमी के समर्थन में आ गया और यह इस बार अमेरिकी मीडिया में भी हुआ.

इस ‘सिलसिले’ के मुताबिक, भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान को सबसे खराब गालियां और फटकार दी गईं. वहां कोई ‘सपोर्ट’ नहीं था. इसके बाद पाकिस्तानी मीडिया में छोटा प्रयास किया गया, उसने उन्हीं कहानियों को दोहराया जिन्हें ऊपर वालों ने पेश किया था और कुछ इंस्टाग्राम पोस्ट जोड़ दिए. उसने यह नहीं दिखाया कि शमी भारत के सबसे चहेते खिलाड़ियों में हैं. संक्षेप में, यह एक ‘निंदा अभियान’ था जिसका कोई अस्तित्व नहीं था. यहां तक कि कश्मीरी नेता भी शमी का समर्थन कर रहे थे. अंतिम नतीजा क्या निकला? भारत की ऐसी छवि बनी कि वह मुसलमानों से घोर नफरत करने वाला देश है, जो अपने ही खिलाड़ियों को गालियां देता है.


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बांग्लादेश में रची गई हिंसा

हिंदू देवता के चरणों पर कुरान रखे जाने का पोस्ट सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद भीषण हिंसा और खूनखराबा होते आपने देखा है. जिस आदमी ने यह किया था उसे और इस पोस्ट को प्रसारित करने वालों को गिरफ्तार कर लिया गया है. उनमें तीन तो जमात-ए-इस्लामी के सदस्य थे, जो घोर पाकिस्तान-समर्थक पार्टी है. वैसे, शेख हसीना की सरकार ने इसके पर काफी कतर दिए हैं. वास्तव में कमिला और चांदपुर जैसे जिन जिलों में हिंसा हुई उन्हें जमात का गढ़ माना जाता है. और भी गिरफ्तारियां की गईं लेकिन नुकसान तो किया जा चुका था. 66 घरों को जला दिया गया, 13 मंदिरों को तोड़ दिया गया और हिंदुओं के कई व्यावसायिक ठिकानों पर हमले किए गए. इसके बाद ‘बांग्लादेश हिंदू काउंसिल’ नामक एक सत्यापित हैंडल (जिसे ट्विटर ने बाद में हटा दिया) ने कथित रूप से रंगपुर में जलाए गए घरों के वीडियो जारी कर दिए. असल में वह त्रिपुरा में आग लगने के एक हादसे का वीडियो था. इस वीडियो को लगभग सभी बड़े टीवी चैनलों ने प्रसारित किया, जिससे हालात और बिगड़े.

इसके बाद त्रिपुरा में मुस्लिम विरोधी हिंसा हुई, जिसमें विश्व हिंदू परिषद निश्चित रूप से विरोध प्रदर्शनों के आयोजन में शामिल थी. इसके ठीक बाद सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो सामने आए जिनमें हिंसा को ‘सरकारी संरक्षण’ देने के आरोप उस हैंडल की ओर से लगाए गए जो न केवल भारत विरोधी के रूप में कुख्यात है बल्कि चीनी कहानी का जोरदार समर्थन करने के लिए जाना जाता है. सार यह कि सोशल मीडिया पर एक जुनूनी पोस्ट और फिर उसके अनजाने में प्रसार के कारण भारी आंतरिक हिंसा हुई, जो दोस्ताना पड़ोसी देश तक फैल गई.

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कश्मीर, अफगानिस्तान में हिंदुओं और सिखों पर हमले

इसके बाद कश्मीर में तथाकथित ‘टेररिस्ट रेजिस्टेंस फ्रंट’ नाम के एक समूह ने हिंदुओं पर हमले अचानक बढ़ा दिए. इस समूह को ‘लश्कर-ए-तय्यबा’ का पर्याय माना जाता है. निशाना बनाकर की गई हत्याओं की खबरें दूसरी जगहों पर जारी की गईं, जिसके बाद प्रतिबंधित जमात के लोगों की गिरफ्तारी हुई. लेकिन सोशल मीडिया के जरिए एक और तरह का खतरा है, जिसके तहत हाल में एक युवा हिंदू मेडिकल छात्रा को अब्दुल्ला ग़ाज़ी के हैंडल से धमकी दी गई, जिसे अब हटा लिया गया है. ग़ाज़ी को ‘आरएसएस इन्फ़ॉर्मर’ के रूप में जाना जाता है. यह भी कहा गया कि पाकिस्तान समर्थक नारे लगाने वालों के खिलाफ एफआईआर दायर कराने में उस छात्रा का भी हाथ था (उसका हाथ नहीं था). ‘इन्फॉर्मरों’ की सार्वजनिक पहचान करने के इन तरीकों का इस्तेमाल पहले भी पत्रकारों आदि के खिलाफ किया गया है, लेकिन अब इसका हिंदुओं के खिलाफ प्रयोग किया जा रहा है.

इस्लामिक स्टेट ऑफ खोरासन का दावा है कि इससे कोई 100 किमी दूर अफगानिस्तान में सिखों पर हमला किया गया, जिसके पीछे लश्कर के एक पूर्व काडर का हाथ पाया गया. यह दावा इस समूह के प्रचार स्रोत ‘अल-नाबा’ ने किया जिसका स्वामित्व सवालों के घेरे में है.

उच्च स्तर पर, कश्मीर मसले को फिलस्तीन मसले के साथ नत्थी कर दिया गया है जिसमें एक है ‘बीडीएस आंदोलन’ (बॉयकॉट, डाइवेस्टमेंट सैंक्शंस), जिसका हैंडल ‘भारतीय चीजों का बहिष्कार करो’ का नारा दे रहा है. इस अभियान को ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ का समर्थन मिल रहा है. ‘डिसइन्फो लैब’ के एक ट्वीट में बताया गया है कि हिंसा की किसी पुरानी या नयी घटना को किस तरह भारत में मुसलमानों पर हमले के रूप में प्रचारित किया जाता है. इस छवि को ‘टीआरटी वर्ल्ड’ और ‘अल-जज़ीरा’ जैसे टीवी चैनलों ने शायद अनजाने में बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया.

ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं कि सोशल मीडिया पर पोस्ट का इस्तेमाल सांप्रदायिक भावना भड़काने के लिए किया गया, कभी-कभी तो बिलकुल निराधार. यह हिंदुओं पर हमले के साथ होता है, जिसके जवाब में बदला लेने के लिए हमले किए जाते हैं. यह आंतरिक सुरक्षा का बिलकुल नया मसला है जो सूचनाओं को न केवल तोड़ता-मरोड़ता है बल्कि हवा में से सूचनाएं पैदा करता है और उन्हें हथियार बनाता है.

सोशल मीडिया का दुरुपयोग कोई नयी बात नहीं है, लेकिन तथ्य यह है कि तीन देशों में एक साथ घटने वाली इस तरह की घटनाएं चिंताजनक प्रवृत्ति को उजागर करती हैं. और इसके साथ मसला यह भी है कि जाने-माने पत्रकार से लेकर अंतरराष्ट्रीय मीडिया समूह तक इन विकृत ‘सच्चाइयों’ पर आसानी से विश्वास कर लेते हैं. इस तरह की चाल के साथ ‘दुश्मन’ हमारे दरवाजों के बाहर नहीं बल्कि हमारे अवचेतन में बैठ गया है और अपने दायरे में वायरस की तरह बढ़ता जा रहा है. इसलिए, गुस्से में आकर ‘आरटी’ (री-ट्वीट) करने से पहले जांच लें. यह आपकी सेहत के लिए खतरनाक हो सकता है.

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

(लेखिका इन्स्टीट्यूट ऑफ पीस एंड कॉन्फ्लिक्ट स्टडीज़, नई दिल्ली में एक प्रतिष्ठित फेलो हैं. उनका ट्विटर हैंडल @kartha_tara है. व्यक्त विचार निजी हैं)


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