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Thursday, 18 July, 2024
होममत-विमतअरुणाचल का काहो भारत का पहला वाइब्रेंट विलेज बनने वाला है लेकिन चीन इस मामले में हमसे मीलों आगे है

अरुणाचल का काहो भारत का पहला वाइब्रेंट विलेज बनने वाला है लेकिन चीन इस मामले में हमसे मीलों आगे है

बीजिंग ने 624 मॉड्यूलर सीमावर्ती गांवों का निर्माण पूरा कर लिया है, जबकि भारत ने अभी पहले पर काम शुरू कर दिया है.

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पूर्वी सेना के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल राणा प्रताप कलिता ने पिछले हफ्ते कहा था कि बजट 2022-2023 में घोषित वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम के तहत अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम में 130 गांवों को मॉडल गांवों के रूप में विकसित करने का प्रस्ताव है. कलिता ने आगे कहा, “विशेष रूप से दो-तीन गांवों, काहो (पूर्वी अरुणाचल प्रदेश में) में काम शुरू हो गया है.” एक साल पहले, दिसंबर 2021 में, मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने ‘आदर्श गांव’ विकसित करने के लिए एक योजना शुरू की थी और तीन बस्तियों – कहो, मुसाई और किबिथू का चयन किया था. दिलचस्प बात यह है कि मुसई-जिसे मेशाई-गांव के रूप में भी जाना जाता है, में एक उद्घाटन पत्थर पर लिखा है कि इसे 1 अगस्त 2018 को एक आदर्श गांव में बदल दिया गया था. जाहिर है, कुछ गड़बड़ है. या तो काम स्तर से कम था या ऐसा लगता है कि बहुत कुछ नहीं किया गया था.

यह बात सामान्य रूप से बॉर्डर इन्फ्रास्ट्रक्चर और विशेष रूप से वाइब्रेंट/मॉडल गांवों के बुनियादी ढांचे को विकसित करने में चीनियों का अनुसरण करने के भारत के दृष्टिकोण को खराब तरीके से दर्शाता है. सेंटर फॉर चाइना एनालिसिस के अध्यक्ष और रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) के पूर्व अतिरिक्त सचिव जयदेव रानाडे के अनुसार, बीजिंग ने 624 ‘शियाओकांग‘ (अच्छी परिस्थिति में) सीमावर्ती गांवों पर निर्माण कार्य पूरा कर लिया है. चीन ने यह प्रोजेक्ट 2017 में शुरू किया था और 2021 के अंत तक इसे पूरा कर लिया. दरअसल, अरुणाचल के काहो गांव के ठीक सामने, वास्तविक नियंत्रण रेखा से 9 किमी दूर, दो ऐसे चीनी गांव गूगल मैप्स पर दिखाई दे रहे हैं.

चीन के सीमावर्ती क्षेत्र का विकास

सुरक्षा जरूरतों के अलावा, विवादित क्षेत्रों पर दावा करना, अशांत आबादी का दिल जीतना और आर्थिक प्रगति दिखाने का सबसे अच्छा तरीका बॉर्डर इन्फ्रास्ट्रक्चर विकसित करने का है. तिब्बत और झिंजियांग- सीमावर्ती क्षेत्रों का उदाहरण लीजिए जहां विद्रोह की काफी संभावनाएं रहती हैं और जो विस्तारवादी चीन की कमजोर नस है – वहां बीजिंग आधुनिक शियाओकांग गांवों और सड़क/रेलवे नेटवर्क का निर्माण कर रहा है. चीन अपने सीमावर्ती क्षेत्रों का प्रबंधन और विकास करके और इस प्रक्रिया में पर्यटन और आर्थिक विकास को बढ़ावा देकर अपनी संप्रभुता पर जोर दे रहा है.

2015 में, चीनी राष्ट्रपति के रूप में पदभार ग्रहण करने के तीन साल बाद, शी जिनपिंग ने बॉर्डर एरिया के विषय पर अपनी नीतियों की घोषणा की: “सीमा क्षेत्रों को नियंत्रित करना किसी देश पर शासन करने और तिब्बत को स्थिर करने का मंत्र है.” उन्होंने 28-29 अगस्त 2020 को आयोजित तिब्बत वर्क फोरम की सातवीं बैठक के दौरान इस नीति को दोहराया. इस पॉलिसी को अक्टूबर 2021 में एक लैंड बॉर्डर लॉ के रूप में औपचारिक रूप दिया गया था, ताकि उन क्षेत्रों पर चीन के दावों को मजबूत किया जा सके, जो गैर-कानूनी रूप से कब्जे वाले, विवादित या गैर-हान लोगों द्वारा उग्रवाद की चपेट में थे.

जनवरी 2021 में, भारतीय मीडिया ने ऊपरी सुबानसिरी जिले में – जो कि 1959 में चीन द्वारा हड़प लिया गया था – त्सारी चू नदी पर एक ज़ियाओकांग गांव की खोज को सनसनीखेज बना दिया. लेकिन जब मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलजी में चीन के एक प्रतिष्ठित विद्वान एम. टेलर फ्रावेल ने बताया कि गांव अपने सीमावर्ती क्षेत्रों को पुनर्जीवित करने के लिए 4.6 बिलियन डॉलर की चीनी परियोजना का हिस्सा था, यह भारत के लिए आंखे खोल देने वाली किसी घटना से कम नहीं था.

रानाडे के अनुसार, शियाओकांग गांवों का उद्देश्य सीमा के साथ एक बफर ज़ोन बनाना है, जो चीन और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) के प्रति वफादार लोगों का रिहायशी इलाका है. इन आधुनिक गांवों पर वाई-फाई-सक्षम उपकरणों के माध्यम से निगरानी करना आसान है और यह उन क्षेत्रों में संचालन के लिए सैन्य चौकियों के रूप में कार्य करेगा जहां तिब्बती आबादी संभावित रूप से शत्रुतापूर्ण हो सकती है.

चीन अपनी सीमा सड़कों और रेल बुनियादी ढांचे को भी बढ़ा रहा है. वह एलएसी से करीब 20-50 किमी दूर एक नए हाईवे G695 का निर्माण कर रहा है. मौजूदा G219 के विपरीत, जो इस दूरी से तीन से चार गुना है, G695 भारतीय सीमा के नजदीक होकर साथ-साथ चलता है. इसकी मौजूदा या नई लैटरल रोड्स के माध्यम से एलएसी और G219 से जुड़ने की संभावना है. इसके बाद सिचुआन से तिब्बत तक चीन की रणनीतिक रेल लाइन आती है, जो तीन खंडों में विभाजित है और प्रमुख चीनी प्रांतों को तिब्बती प्रांतों से जोड़ती है. इनमें से एक खंड, ल्हासा-न्यिंगची रेलवे लाइन पर काम पहले ही पूरा हो चुका है. चीन, नेपाल तक रेलवे लाइन भी बना रहा है.


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बॉर्डर डेवलेपमेंट के लिए होलिस्टिक एप्रोच की ज़रूरत

2014 के बाद से, भारत सरकार का अपनी उत्तरी सीमाओं को विकसित करते समय प्राथमिक ध्यान सड़क, रक्षा प्रतिष्ठानों और सैनिकों के आवास जैसे सैन्य बुनियादी ढांचे पर रहा है. इसने देश की उत्तरी सीमाओं को जोड़ने के लिए कई रणनीतिक रेल परियोजनाओं की भी शुरुआत की है. हालांकि, सीमावर्ती क्षेत्रों के नागरिकों और आर्थिक विकास की उपेक्षा की गई है. नागरिकों और सेना के बीच मेलजोल बहुत कम है, जबकि इनर-लाइन परमिट अभी भी चलन में हैं और जिसकी वजह से पर्यटन में रुकावट आती है. इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि जो थोड़ा सा सिविल और आर्थिक विकास हुआ है वह सैन्य बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के कारण हुआ है.

भारत में अपनी सीमावर्ती आबादी की सुरक्षा और भलाई के लिए 1986-87 से केंद्रीय वित्त पोषित सीमा क्षेत्र विकास कार्यक्रम (बीएडीपी) है. हालांकि, अपर्याप्त बजट आवंटन और लागू करने की प्रक्रिया के सुस्त होने की वजह से विकास प्रभावित हुआ है. एक के लिए, बीएडीपी फंड वित्तीय वर्ष 2017-18 में 1,100 करोड़ रुपये से घटाकर वित्त वर्ष 2022-23 में 565.72 करोड़ रुपये कर दिया गया था और उसके बाद उसे 221.61 करोड़ रुपये तक घटा दिया गया था. संसद में सरकार द्वारा एक तारांकित प्रश्न के दिए गए जवाब के मुताबिक, वित्त वर्ष 2018-19 से वित्त वर्ष 2021-22 के लिए आवंटित वास्तविक धनराशि 770 करोड़ रुपये, 824 करोड़ रुपये, 63.97 करोड़ रुपये और 190.98 करोड़ रुपये थी.

वित्त वर्ष 2020-21 के लिए लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश के उत्तरी सीमावर्ती क्षेत्रों को आवंटित धनराशि 162 करोड़ रुपये, 30 करोड़ रुपये, 32 करोड़ रुपये और 31 करोड़ रुपये थी. अब इसकी तुलना 4.6 अरब डॉलर या 3.76 लाख करोड़ रुपये से करें, जो तीन साल में 624 शियाओकांग गांवों के निर्माण के लिए आवंटित किया गया है. भारत ने इन विकासों के जवाब में पिछले बजट में वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम की घोषणा की थी.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले साल इस योजना के महत्व पर जोर देते हुए कहा था, “हमने फैसला किया है कि हम भारत की सीमाओं पर गांवों का विकास करेंगे. इसके लिए हम होलिस्टिक अप्रोच के साथ आगे बढ़ रहे हैं. ऐसे गांवों में सभी सुविधाएं होंगी- बिजली, पानी और अन्य- और इसके लिए बजट में एक विशेष प्रावधान किया गया है.”

लेकिन पिछले साल के बजट के बाद वीवीपी की कोई खबर नहीं आई. रिकॉर्ड में ऐसा कुछ भी नहीं है जो दिखाता हो कि इस पहल के लिए विशिष्ट धन आवंटित किया गया था या बीएडीपी और राज्य सरकार को एक साथ वास्तव में लाया गया. इससे पहले कि 27 जनवरी को पूर्वी सेना के कमांडर द्वारा फिर से इस पर फोकस किया गया इस प्रोजेक्ट से ध्यान हट गया. लेफ्टिनेंट जनरल कलिता ने कहा था, “हम एलएसी से 100 किमी के भीतर आने वाले किसी भी बुनियादी ढांचे के लिए सिंगल विंडो क्लीयरेंस की एक पद्धति विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं.” वीवीपी, इस प्रकार, लॉन्च होने के एक साल बाद भी अभी तक शुरू नहीं हुआ है.

भारत को एक समग्र दृष्टिकोण अपनाना चाहिए और चीन की बराबरी करने के लिए उत्तरी सीमाओं पर 500-600 वाइब्रेंट यानी जीवंत गांवों का निर्माण करना चाहिए. चीन ने प्रति गांव 60 करोड़ रुपए खर्च किए हैं. हमारी कम आबादी और कम निर्माण लागत को देखते हुए, हम इसे चीन के आधे बजट के साथ पूरा कर सकते हैं. इस तरह पूरे प्रोजेक्ट के लिए 15,000-18,000 करोड़ रुपये के बजट की जरूरत होगी. सिविल-मिलिट्री और केंद्र-राज्य को एक साथ आने की जरूरत है. हमारा वर्तमान प्रशासन इस प्रकार की परियोजना को क्रियान्वित करने में असमर्थ है. मैं केवल सेना या सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) के बारे में सोच सकता हूं, जो सीमाओं के साथ 10-20 किलोमीटर के क्षेत्र को विकसित करने वाली प्रमुख एजेंसियां हैं. परियोजना केंद्रीय रूप से वित्त पोषित होनी चाहिए. पर्यटन की पर्याप्त गुंजाइश को देखते हुए सार्वजनिक-निजी भागीदारी को प्रोत्साहित किया जा सकता है. कारपोरेट घरानों को ऐसे गांवों को गोद लेने के लिए प्रेरित करना चाहिए. प्रत्येक वाइब्रेंट विलेज का विकास स्थानीय संस्कृति को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना चाहिए.

12 जुलाई 2018 को, तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने सीमावर्ती क्षेत्रों में उन्ही सुविधाओं के साथ 61 मॉडल गांवों के विकास की घोषणा की थी, जिन्हें अब वाइब्रेंट गांव कहा जा रहा है. कोई केवल यह उम्मीद कर सकता है कि वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम को वांछित प्रोत्साहन और फंडिंग मिले और सेना यह सुनिश्चित करे कि काहो भारत का पहला वाइब्रेंट विलेज बन जाए.

(लेफ्टिनेंट जनरल एच एस पनाग पीवीएसएम, एवीएसएम (आर) ने 40 वर्षों तक भारतीय सेना में सेवा दी है. वह सी उत्तरी कमान और मध्य कमान में जीओसी थे. सेवानिवृत्ति के बाद, वह सशस्त्र बल न्यायाधिकरण के सदस्य थे. उनका ट्विटर हैंडल @rwac48 है. व्यक्त विचार निजी हैं)

(संपादनः शिव पाण्डेय)
(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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