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Saturday, 9 December, 2023
होममत-विमत‘दक्षिण चलो’ की नीति के साथ भाजपा की नज़र अब तमिलनाडु पर, द्रमुक के लिए खतरे की घंटी

‘दक्षिण चलो’ की नीति के साथ भाजपा की नज़र अब तमिलनाडु पर, द्रमुक के लिए खतरे की घंटी

जयललिता, करुणानिधि सरीखे दिग्गजों की हमेशा के लिए विदाई, आध्यात्मिक राजनीति से रजनीकांत के संन्यास लेने, कमल हासन के राजनीतिक केरियर के परवान न चढ़ने कारण बने शून्य को भरने के लिए भाजपा तैयार दिख रही है.

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महीने भर चलने वाला काशी तमिल संगम, जिसका प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को वाराणसी में उद्घाटन किया, मकसद तमिलनाडु में भाजपा की पैठ बनाना है. इस आयोजन का वाराणसी से हजारों किमी दूर तमिलनाडु में निश्चित ही बड़ा प्रभाव पड़ेगा. भाजपा तमिलनाडु की सांस्कृतिक विरासत का आक्रामक रूप उपयोग कर रही है और इसने राज्य के शासक दल द्रविड़ मुनेत्र कझगम (द्रमुक) और उसके सहयोगियों को परेशानी में डाल दिया है.

इस समारोह में मोदी ने अपने भाषण में जिस तरह तमिल ग्रंथों से उद्धरण दिए वह हिंदुत्ववादियों का हौसला बढ़ाएगा, लेकिन उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जिस तरह दावा किया कि ‘संस्कृत और तमिल, दोनों के उदगम स्रोत भगवान शिव थे’ उसने तमिलनाडु में विवाद को जन्म दे दिया है.

मोदी और योगी, दोनों ने मंच पर बैठे तमिल धर्मगुरुओं के सामने सिर नवाए. उनके वीडियो और फोटो राज्य में खूब प्रचारित किए जा रहे हैं. इसके अलावा, तमिलनाडु के सभी जिलों से करीब 2500 स्कूली और कॉलेज छात्र इस आयोजन में भाग लेने के लिए विशेष ट्रेन से वाराणसी आएंगे, जो कि चेन्नई की आइआइटी और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के संयुक्त प्रयासों से संभाव हो रहा है. प्रसिद्ध संगीतकार इल्लैराजा ने ऑर्केस्ट्रा के संगीत पर रुद्रम मंत्र का गायन किया. तमिल टीवी चैनलों ने वाराणसी के समारोह और मोदी के भाषण का सीधा प्रसारण किया.

महत्वपूर्ण बात यह है कि काशी तमिल संगमम के साथ भाजपा की ‘दक्षिण चलो’ नीति का भी उद्घाटन किया गया है. भाजपा अलग-अलग राज्य में अलग-अलग तरीका अपना रही है. उत्तर प्रदेश में वह ‘बुलडोजर’ राजनीति कर रही है. महाराष्ट्र, दिल्ली, और पश्चिम बंगाल में वह प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) का इस्तेमाल कर रही है. और झारखंड तथा तेलंगाना में उसने उनके मुख्यमंत्रियों, हेमंत सोरेन और के. चंद्रशेखर राव पर हमला बोल दिया है.

लेकिन तमिलनाडु में पैठ बनाने के लिए भाजपा और उसके नेता तमिल संस्कृति का सहारा ले रहे हैं और इसका फायदा भी उन्हें मिल रहा है. भाजपा की ‘दक्षिण चलो’ नीति का ज़ोर आक्रामकता पर है, जिसका फैसला हैदराबाद में हुई राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में किया गया.

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मई 2022 के बाद से मोदी तमिलनाडु के चार दौरे कर चुके हैं. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने नियम बना लिया है कि जब भी वे किसी दक्षिणी राज्य का दौरा करेंगे तो तमिलनाडु के किसी एक जिले में जरूर जाएंगे. इस सबका क्या संकेत है? केंद्र के 45 मंत्रियों ने जिस तरह तमिलनाडु की चांदमारी करने, एक जिले से दूसरे जिले का दौरा करने का फैसला किया है, वह 2019 की भाजपा की ‘पूरब चलो’ नीति लोकसभा चुनाव की याद दिलाता है जिसके कारण किसी तरह त्रिपुरा को और पश्चिम बंगाल की कुछ सीटों को जीतने में सफल हुई थी. लोकसभा में उसे पूरब से जीते 25 सांसदों की बदौलत काफी ताकत मिली थी. अब 2024 में, भाजपा ऐसी ही कामयाबी ‘दक्षिण चलो’ की नीति से हासिल करने की कोशिश में है.


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विपक्ष भी मददगार

दूसरे पक्ष की तस्वीर उसे संकटग्रस्त बताती है.

मुख्यमंत्री और द्रमुक अध्यक्ष एम.के. स्टालिन ने पिछले महीने कहा था की उनकी अपनी पार्टी के कुछ नेताओं की हरकतें उनकी ‘नींद खराब कर रही हैं.’ उनका कथित बयान यह है— ‘हर सुबह मन यह उम्मीद लेकर जागता है कि हमारे लोगों ने कोई मुश्किल नहीं खड़ी की होगी. कभी-कभी तो मैं सो नहीं पाता. आप मेरी सेहत और मेरे शरीर को देखकर समझ सकते हैं.’

यह द्रमुक की आंतरिक कलह पर की गई टिप्पणी है. एक-दूसरे की घोर आलोचना की जा रही है, जिसकी एक मिसाल हाल में दिखी. तमिलनाडु के वित्त मंत्री पालनिवेल त्यागराज ने कहा कि सहकारिता विभाग में पारदर्शिता की कमी है, और वे उसके कामकाज से संतुष्ट नहीं हैं. सहकारिता मंत्री आइ. पेरियासामी ने जवाबी तीर छोड़ा कि तमिलनाडू की जनता संतुष्ट है.

द्रमुक को वंशवाद के मसले का भी सामना करना पड़ रहा है. बताया जाता है कि द्रमुक के युवा मंत्रियों पर स्टालिन के पुत्र उदयनिधि का खासा दबदबा है. खबरें हैं कि स्टालिन जल्द ही अपने इस पुत्र को सरकार में शामिल कर सकते हैं. इससे पार्टी के पुराने नेताओं में असंतोष फैल सकता है. 2024 का लोकसभा चुनाव और 2026 का विधानसभा चुनाव द्रमुक के लिए अग्निपरीक्षा साबित होने वाली है.

अन्नाद्रमुक भी गहरे संकट में है. जयललिता के निधन के बाद पार्टी कई टुकड़ों में टूट चुकी है. उसकी हालत शिवसेना की हालत जैसी ही है, जहां दो खेमी पार्टी के चुनाव चिन्ह ‘तीर-धनुष’ के लिए आपस में लड़ रहे हैं. शिवसेना और अन्नाद्रमुक, दोनों चुनाव आयोग से राहत मिलने की आस लगाए हैं. जाहिर है, भाजपा अगर इन दोनों पार्टियों के साथ बुरा बरताव करती है तो उसकी अनदेखी नहीं की जा सकती.

द्रमुक महासचिव दुरै मुरुगन ने एक जनसभा में कहा कि तमिलनाडु में भाजपा की मजबूती द्रविड़ राजनीति के लिए अच्छा नहीं हो सकता. जाहिर है, तमिलनाडु की राजनीति दिलचस्प मोड़ ले रही है. इसमें से जयललिता, करुणानिधि सरीखे दिग्गजों की हमेशा के लिए विदाई, आध्यात्मिक राजनीति से रजनीकांत के संन्यास लेने, कमल हासन के राजनीतिक केरियर के परवान न चढ़ने कारण बने शून्य को भरने के लिए भाजपा तैयार दिख रही है. ऐसा लगता है कि भाजपा के लिए हवा अनुकूल है और उसकी ‘दक्षिण चलो’ नीति सही पटरी पर चल रही है.

(अनुवाद: अशोक कुमार )

(इस खबर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

(व्यक्त विचार निजी हैं. लेखक का ट्विटर हैंडल @RAJAGOPALAN1951. है)


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