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Thursday, 24 September, 2026
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AI नौकरियां छीनेगा लेकिन भारत के लिए बड़ी चुनौती सशक्तिकरण की लहर से चूकना है

IT सेक्टर में दबदबा बनाने के बाद, कम निवेश और दूरदर्शिता की कमी के कारण भारत AI के दौर में पिछड़ गया. अब पॉलिसी के ज़रिए इसे ठीक करना ज़रूरी है.

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अमेरिका लौटे मुझे करीब एक महीना हो गया है. मैं छह हफ्ते की भारत यात्रा के बाद अमेरिका वापस आया था. यहां खबरों का दौर एक तरफ नवंबर में होने वाले मिड-टर्म चुनावों पर टिका हुआ है और दूसरी तरफ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के तेजी से बढ़ते असर पर.

रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवारों के सामने बढ़ती मुश्किलें, उनकी हार की आशंका, चुनावी खबरों का लगातार हिस्सा बन रही हैं. वहीं, AI के संभावित गलत इस्तेमाल का खतरा भी चिंता पैदा कर रहा है.

बहुत सारे लोग इस बात पर भी नाराजगी जता रहे हैं कि AI डेटा सेंटर कितनी जमीन और कितनी ऊर्जा का इस्तेमाल करने लगे हैं या करने की तैयारी में हैं. अमेरिका के कुछ राज्यों ने तो नए डेटा सेंटरों की मंजूरी रोकना शुरू कर दिया है.

मेरे कॉलम बाद में मिड-टर्म चुनावों का विश्लेषण करेंगे. अभी AI पर ध्यान देना बेहतर है, खासकर इसलिए क्योंकि इसे लेकर चल रही बहस में कई बड़े सार्वजनिक चेहरे शामिल हैं और यह एक गंभीर भू-राजनीतिक मुद्दा भी बनता जा रहा है. आखिर AI का नेता कौन बनेगा – अमेरिका या चीन? दुनिया की दो सबसे बड़ी ताकतें व्यावसायिक और सुरक्षा, दोनों कारणों से एक-दूसरे के साथ प्रतिस्पर्धा में हैं.

आज की स्थिति में AI की दौड़

इस साल की शुरुआत में दिल्ली में हुए AI समिट के बावजूद भारत अभी इस दौड़ में शामिल नहीं है, कम से कम अभी तो नहीं. एक तरह से यह विडंबना है. पिछले दो दशकों में भारत सूचना तकनीक के क्षेत्र में दुनिया का एक बड़ा नेता जरूर बना, लेकिन AI की ओर बदलाव नहीं कर पाया.

भारत में हाल में हुई मेरी बातचीत से पता चला कि इसकी बड़ी वजह यह थी कि इसके लिए निवेश की जरूरत बहुत ज्यादा थी. यह रकम दसियों अरब डॉलर तक पहुंचती है, बल्कि सैकड़ों अरब डॉलर भी हो सकती है. हालांकि, कुछ लोग यह कहने को भी तैयार थे कि समस्या में सरकार और उद्यमियों, दोनों की ओर से एक तरह की कल्पना की कमी भी शामिल थी. भारत के नीति बनाने वाले लोग यह समझ ही नहीं पाए कि AI कितना बड़ा तकनीकी बदलाव लेकर आएगा. वे सूचना तकनीक के क्षेत्र में मिली अपनी सफलता से ही काफी खुश थे.

AI एक ऐसी तकनीक है जिसका इस्तेमाल लगभग जिंदगी के हर क्षेत्र में किया जा सकता है. यह हमारे जीने के तरीके को बदल देगा, ठीक उसी तरह जैसे कंप्यूटर ने पूरी दुनिया में हमारी जिंदगी को बदल दिया. लेकिन MIT की हाल की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि कंप्यूटर धीरे-धीरे विकसित हुआ, जबकि AI बहुत तेजी से आगे बढ़ रहा है.

रिपोर्ट में कहा गया,“जनरेटिव आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का जन्म 2022 के आखिर में ChatGPT के लॉन्च के साथ हुआ. इसलिए लोगों का जनरेटिव AI से जुड़ाव अभी चार साल से भी कम पुराना है. इतने कम समय में इसके एक अरब से ज्यादा यूजर हो गए हैं और AI तकनीक बेचने वाली कंपनियां खबरों, शेयर बाजार और लोगों की सोच पर हावी हो गई हैं.”

हाल के हफ्तों में एंथ्रोपिक के सीईओ डारियो अमोदेई ने इस बहस को काफी तेज कर दिया. एंथ्रोपिक मूल्यांकन के हिसाब से दुनिया की दो सबसे बड़ी AI कंपनियों में से एक है, जबकि दूसरी OpenAI है. एक उद्यमी के तौर पर अमोदेई, जिनके पास प्रिंसटन से फिजिक्स में पीएचडी भी है, ने सरकार से AI को नियंत्रित करने के लिए नियम बनाने की जोरदार अपील की. उन्होंने कहा कि अगर AI को बिना किसी नियम के छोड़ दिया गया तो यह इंसानी जिंदगी के लिए खतरा पैदा कर सकता है. उन्हें OpenAI के CEO सैम ऑल्टमैन और SpaceX के CEO एलन मस्क का भी समर्थन मिला. प्रतिस्पर्धा करने वाली कंपनियों के CEO ज़्यादातर इस तरह साथ नहीं आते.

राजनीतिक क्षेत्र में भी दो बड़ी प्रतिक्रियाएं सामने आईं. अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने AI के नियमन के विचार को “धोखा” बताया, जबकि वरमोंट के वरिष्ठ सीनेटर और पूर्व राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार बर्नी सैंडर्स ने इसे “पूरी तरह जरूरी” बताया. उन्होंने कहा कि वह जल्द ही सीनेट में इस संबंध में कानून पेश करेंगे.

हाल के महीनों में इस बहस को सबसे ज्यादा तेज करने वाली घटना तथाकथित Hugging Face Episode थी. जुलाई 2026 में OpenAI ने बताया कि उसके कई AI एजेंट, जिन्हें आम तौर पर चैटबॉट कहा जाता है, एक साइबर सिक्योरिटी मॉडल में उन्हें दिए गए काम को पूरा करने के लिए आंतरिक नियंत्रण से बाहर निकलने और Hugging Face के सिस्टम में हैक कर रहे थे. Hugging Face एक ओपन-सोर्स AI प्लेटफॉर्म है. OpenAI ने अपनी प्रकाशित रिपोर्ट में इस समस्या को इस तरह बताया: “एजेंटों ने ज्यादा रिवॉर्ड पाने या उन रिवॉर्ड को हासिल करना आसान बनाने के लिए ऐसे तरीकों से काम पूरा किया, जिनका निर्देश नहीं दिया गया था.”

यह साइबर सिक्योरिटी (cyber security) का एक गंभीर उल्लंघन था. इससे यह डरावनी कल्पना भी सामने आई कि अगर रक्षा और सुरक्षा के क्षेत्र में AI एजेंटों का ऐसा अनियंत्रित व्यवहार हुआ—मान लीजिए, मिसाइलों (missiles) को गलत दिशा में भेज दिया गया—तो इससे इंसानी जिंदगी खतरे में पड़ सकती है.

इस महीने की शुरुआत में एक एंथ्रोपिक शोधकर्ता के इस्तीफे ने भी काफी सुर्खियां बटोरीं. उन्होंने चेतावनी दी कि “AI बनाने वाले लोग गंभीरता से मानते हैं कि दशक के अंत तक यह हम सभी को खत्म कर सकता है.” उनके एक सहयोगी ने 10 साल के भीतर इंसानों के खत्म होने के खतरे की संभावना 10 प्रतिशत से ज्यादा बताई. यह अब सिर्फ साइंस फिक्शन नहीं रह गया है.

अच्छा, बुरा और बेहद खराब

लेकिन खबर पूरी तरह बुरी नहीं है. AI असल में दोधारी तलवार है. यह इंसानों की काम करने की क्षमता बढ़ा सकता है, लेकिन इसके चलते काफी नुकसान भी हो सकता है.

मैं ब्राउन यूनिवर्सिटी में जिस सेमिनार का सह-निर्देशन करता हूं, उसमें हार्वर्ड केनेडी स्कूल के राजनीतिक विचारक आर्कन फंग (Archon Fung ) ने AI के इस दोहरे असर को अच्छी तरह समझाया. उन्होंने तीन क्षेत्रों में AI के असर की पड़ताल की: काम की जगह, सामाजिक जीवन और राजनीति. उनका कहना था कि AI इंसानों को सक्षम बना सकता है, उनकी जगह ले सकता है और उन्हें अपने अधीन भी कर सकता है.

जगह की कमी को देखते हुए, मैं यहां काम की जगह पर ध्यान दूंगा, खासकर इंसानों की जगह लेने और उन्हें सक्षम बनाने वाले उदाहरणों पर.

फंग ने कहा कि अब उन्हें छात्रों को रिसर्च असिस्टेंट (Research Assistant) के तौर पर रखने की जरूरत नहीं पड़ती, क्योंकि AI यह काम आसानी से कर सकता है. मेरे अपने रिसर्च के काम में भी ऐसा होना शुरू हो गया है. अब मुझे अपनी लिखाई के लिए बैकग्राउंड रिसर्च करने के लिए कम असिस्टेंट की जरूरत पड़ती है. AI एक बेहद कुशल रिसर्च असिस्टेंट है. पत्रकारिता में भी मैनेजिंग एडिटर भी जल्द ही यह महसूस कर सकते हैं कि सब-एडिटर की जरूरत नहीं रह गई है. AI जल्दी और अच्छी तरह से कॉपी की सबिंग कर सकता है.

इसके अलावा, AI टर्म पेपर लिख सकता है, प्रॉब्लम सेट कर सकता है और गणित के सवाल हल कर सकता है. घर ले जाकर देने वाली परीक्षाओं की जगह अब धीरे-धीरे पुराने तरीके से क्लास में बैठकर हाथ से लिखी जाने वाली परीक्षाएं ली जा रही हैं. संगीतकार भी अब कहने लगे हैं कि अगर AI को सही तरीके से निर्देश दिए जाएं, तो वह संगीत गा और संगीत बजा भी सकता है.

ये सभी उदाहरण इंसानों की जगह लेने के हैं, पूरी तरह या कुछ हद तक. लेकिन इंसानों को सक्षम बनाने के मामले में क्या होगा?

कोड लिखना AI के सबसे ज्यादा सशक्त बनाने वाले कामों में से एक माना गया है. हालांकि, हर कोई कोड लिख नहीं सकता या लिखना नहीं चाहेगा. तो क्या AI रोजमर्रा की जिंदगी को आसान बनाने के उदाहरण भी दे सकता है?

फंग लिखते हैं: “AI ने लाखों लोगों को सीखने और खोजने, अपने सबसे जरूरी आने वाले ईमेल का जवाब देने और अपने शेड्यूल को व्यवस्थित करने, खाना बनाने या घर की देखभाल जैसे कामों को बेहतर करने, काम या छुट्टी के लिए यात्रा बुक करने और ऐसे ही अनगिनत दूसरे कामों में सक्षम बनाया है.”

इससे साफ है कि आम आदमी की जिंदगी आसान हो रही है.

इन सबका भारत के लिए क्या मतलब है? AI की जिंदगी आसान बनाने की क्षमता से बच पाना मुश्किल होगा, और इसका काफी हिस्सा जल्द ही मध्यम वर्ग के घरों में देखने को मिलेगा. एक मुश्किल मुद्दा यह होगा कि इंसानों की जगह लेने वाले AI से कैसे निपटा जाए. बड़े शहरों में डिलीवरी करने वाले लोगों का काम आसानी से खत्म हो सकता है. AI के ऐसे काम, जो इंसानों की जगह ले सकते हैं, ग्रामीण भारत में खेती पर भी असर डाल सकते हैं.

लेकिन ऐसा होना तय नहीं है.

संभावित फायदे और नुकसान को देखते हुए सरकार की नीतियां यह तय करने में बड़ी भूमिका निभा सकती हैं कि AI का इस्तेमाल किस स्तर तक किया जाए. यही बात रक्षा और सुरक्षा के क्षेत्र पर भी लागू होगी. इसमें यह तय करना शामिल है कि हथियारों और युद्ध के मैदान से जुड़े फैसलों में AI का इस्तेमाल कितनी हद तक किया जाए. संक्षेप में, भारत AI को किस तरह आगे बढ़ाता है, इसमें राजनीतिक फैसलों की भूमिका महत्वपूर्ण बनी रहेगी.

आशुतोष वार्ष्णेय इंटरनेशनल स्टडीज़ और सोशल साइंसेज़ के सोल गोल्डमैन प्रोफेसर और ब्राउन यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल साइंस के प्रोफेसर हैं. विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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