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प्रतीकात्मक तस्वीर : ब्लूमबर्ग
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कृषि प्रधान भारत का सबसे प्रमुख व्यवसाय कृषि – घाटे का सौदा है. आज़ादी के बाद तो देश पर समाजवाद का भूत सवार हो गया, तब से कृषि की और भी दुर्दशा हो गई. वह हाशिये पर चली गई, देश के नेताओं का सारा ध्यान उद्योग धंधों पर केंद्रित हो गया. तब से कृषि की हालत खस्ता ही होती जा रही है. सरकारें लाख उपाय कर रही हैं मगर संकट गहराता जा रहा है.

अन्नदाता कहलाने वाले किसान आत्महत्या करने लगे, वे कृषि से तौबा करने की सोचने लगे. जो अब भी कृषि के पेशे में लगे हैं, आंदोलन कर रहे हैं. सरकारें अब पहले से ज़्यादा किसानों पर ध्यान दे रही हैं. समर्थन मूल्य दे रहीं, कर्ज़माफी कर रही हैं, बिजली के बिल माफ किए जा रहे हैं मगर कृषि का संकट बढ़ता ही जा रहा है. लगता है इस कृषि संकट का कोई हल ही नहीं है.

मगर जिनके पास हल था उन्हें हम भूल गए. वह थे किसान नेता शरद जोशी. मैं उनकी बातों से यही निचोड़ निकाल पाया कि देश का कृषि संकट समाजवाद और राज्य हस्तक्षेप की देन है. सरकारी हस्तक्षेप से मुक्ति पाना किसान के लिए अच्छा होगा और भारत की कृषि की मुक्ति का रास्ता है आर्थिक सुधार और बाज़ार.

एक लेख में उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा – ‘कृषि के साथ कोई समस्या नहीं है. जैसा कि मैं हमेशा कहता हूं सरकार किसी समस्या का समाधान नहीं है, बल्कि सरकार स्वयं समस्या है. इसे हमारे पीठ पर से उतार दो, किसान ठीक हो जाएंगे.’ यह सिर्फ जुमलेबाज़ी नहीं थी, इसके पीछे कृषि की की समस्याओं की गहरी समझ और व्यावहारिक अनुभव था. वे कहते हैं आज़ादी के इतने सालों बाद भी किसान बदहाल क्यों बना हुआ है? क्योंकि उसे जान-बूझकर बदहाल रखा गया है. नेहरू का समाजवाद विचित्र था. गांव के लघु उद्योग धंधे बढ़ाने के नहीं बड़े-भारी उद्योग लगाए जाने के वे समर्थक थे. किसान बदहाल रहा, फायदा हुआ बंबई का, कलकत्ता का. सरकारें चाहती हैं कि कृषि से उत्पन्न होने वाला कच्चा माल सस्ता हो और मज़दूरों के लिए अनाज भी सस्ता हो. सरकारों द्वारा कृषि उत्पादों की कीमतों को जबरन सस्ता रखने की नीति ही किसानों को गरीब और कर्जदार बनाए रखती है.


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कृषि में सरकारी दखलंदाज़ी के वे सख्त खिलाफ थे. कहते थे कि सरकार भस्मासुर होती है, इसलिए सरकार खेती में हाथ डालना बंद करे. किसानों को जो तकनीक लेनी हो, उनको करने दो. वैसे भी 90 प्रतिशत तो किसान खुद ही करता है. 10 प्रतिशत जो सरकार करती है, उससे खराबी ही लाती है. शासन जो मिसचिफ करती है, वो करना बंद कर दे तो खेती का भला हो जाएगा.

जोशी अक्सर कहते कि 1996-97 तक की देश की सारी नीतियां नेगेटीव सब्सिडी पर आधारित थी. किसानों को भारत में अपने उत्पादों के लिए इतना भी भाव नहीं मिलता कि उनकी लागत निकल सके. विश्व बाज़ार में कपास का भाव 210 रुपये हो तो उस समय कॉटन कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया 100 रुपये भाव देता है और महाराष्ट्र के विदर्भ जैसे क्षेत्रों में एकाधिकार खरीद के तहत आने वाले क्षेत्रों में 60 रुपये भाव भी नहीं मिल पाता. इस तरह किसान को लागत से 110 रुपये कम मिल रहे हैं.

यही कारण है कि खुदकुशी करने वाले ज़्यादातर कपास के ही किसान हैं. क्योंकि कपास के ऊपर जितनी निगेटिव सब्सिडी है, इतनी किसी भी दूसरी फसल पर नहीं है. अभी देखिए न? किसानों के हाथ में बीटी आ गया. बीटी के साथ उत्पादन बढ़ा. जब कपास की फसल आ रही है, सरकार ने उसके निर्यात पर पाबंदी लगा दी. इस तरह सरकारी नीतियां किसानों पर कहर ढाती हैं. 1998 में जब जोशी को टास्क फोर्स का अध्यक्ष बनाया गया तब उन्होंने एक आकलन किया था कि पिछले 20 सालों में किसानों को सरकारी नीतियों की वजह से तीन लाख करोड़ रूपये का नुक्सान हुआ.

उनका यह भी मानना था कि उदारीकरण और आर्थिक सुधारों का लाभ कृषि क्षेत्र को नहीं मिला. वह मुख्यरूप से उद्योगों और सेवाओं तक ही सीमित रह गई,अनाज की मार्केटिंग पर जो पाबंदियां थी उनमें से एक को भीं नहीं हटाया गया. किसान को मंडी की आज़ादी आज तक नहीं मिली. किसी को यह बात स्वीकार नहीं है कि बाज़ार को मुक्त रखा जाना चाहिए. उसमें सरकारी हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए. इस बाज़ार में जो भी भाव तय होंगे उन दामों से किसानों को न्याय मिलता है.

यदि कृषि उत्पाद बाज़ार समितियां ने बिचौलियों की संस्था को फार्मलाइज़ न किया होता तो आज तस्वीर एकदम अलग होती. अब यह हो गया है कि माल को बेचने के लिए बाजा़र समिति में ले जाया जाता है और वहां जाने पर जो मिले वही भाव. उस भाव पर ही माल निकाल देना है. नहीं तो माल फिर से लाना पड़ता नहीं खाता.


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आज देश कृषि संकट के दौर से गुजर रहा है. हालांकि आज सरकारों ने मोटे समर्थन मूल्य घोषित कर दिये हैं. सरकारों का कहना है कि ये लागत से डेढ गुना है. मगर सरकार किसानों से सारा अनाज खरीद नहीं सकती. बाज़ार में समर्थन मूल्य मिलता नहीं है. इसलिए किसानों में भारी आक्रोश है. नतीजतन सरकारों को कई लोकलुभावन योजनाएं शुरू करनी पड़ रही हैं. कहीं भावांतर योजना तो कहीं रैयत बंधु योजना. जिसमें किसान को प्रति एकड पांच हज़ार रूपये सरकार देती है. इन लोकलुभावन योजनाओं से तत्कालिक लाभ भले ही हो जाए मगर यह उनकी समस्याओं का समाधान नहीं हैं. इसके लिए शरद जोशी ने आर्थिक सुधार और बाज़ार पर आधारित अपना समाधान पेश किया था जिसे वे मार्शल प्लान कहते थे. वह आज भी कृषि के सब मर्ज़ो की एक दवा है. जो उन्हें कर्ज़बाज़ारी,गरीबी और आशाहीनता से निजात दिला सकता है.

बाज़ार पर आधारित समाधान

1.बैंक और बिजली कंपनियों के सभी कर्ज़ो से माफी नहीं मुक्ति क्योंकि ये कर्ज़ में डूबे परिवारों के शोषण के कारण इकट्ठा हुए हैं. किसान विरोधी नीतियां ,जैसे लेवी ,मार्केट पर लागाई पाबंदियां,आयात निर्यात पर लगाई पाबंदियां वैकल्पिक पूंजी निवेश पर रोक लगाती है.

2. सभी किसान विरोधी कानूनों को खत्म किया जाए खासकर ईसी (एसेंशियल कमोडिटी एक्ट) और एलसीए (लैंड सीलिंग एक्ट).संपति के अधिकार की पुनर्स्तापना जिसे शिड्यूल 11 बनाकर खत्म कर दिया गया.

3.स्थानीय और राष्ट्रीय बाज़ारों को खोलना,खुली प्रतियोगिता की छूट देना, एकाधिकार कानून हटाना, फ्यूचर मार्केट खोलना.

4. इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश- सड़के, परिवहन, बिजली, लैब्स, स्टोरेज, कूलिंग और प्रोसेसिंग में पूंजी बढ़ाकर यह निवेश निजी और सरकारी दोनों तरह का हो सकता है. विभिन्न कानूनों और – व्यापार पर लगाई गई समाजवादी पाबंदियों के कारण कृषि में निवेश खत्म हो चुका है.

5. लगातार बिजली सप्लाई

6. कृषि तकनीक की खुली उपलब्धता, जीएम बीजों सहित. अभी उन पर स्वदेशी और वाम समूहो का नियंत्रण है. जब तक नई तकनीक उपलब्ध नहीं होगी तब तक किसान घरेलू और ग्लोबल मार्केट में प्रतियोगी नहीं बन पाएंगे.

7. रिटेल, फार्मिंग आदि बुनियादी ढांचे में बाहरी निवेश बढे.अ भी तो विभिन्न पाबंदिया लगानेवाले कानूनों, लाभ विरोधी तरीकों के कारण घरेलू निवेश को भी हतोत्साहित किया जा रहा है.

8. खाद्य निगम को खत्म किया जाए और उसकी नकद सब्सिडी गरीब किसानों को दी जाए. इससे अनाज बाज़ार विकसित होगा.

9. जो किसान कृषि छोड़ना चाहते हैं उनके लिए एक्ज़िट पॉलिसी हो ताकि उनको बेहतर संभावनाएं मिले. अभी कानून भूमि की बिक्री और आसान पूंजीकरण को रोकनेवाले हैं.

10.अभी तक कृषि नीति अव्यवस्थित रही है. अब किसान कल्याण की नीति को कृषि उद्योगों से जोड़ा जाना चाहिए.

(लेखक दैनिक जनसत्ता मुंबई में समाचार संपादक और दिल्ली जनसत्ता में डिप्टी ब्यूरो चीफ रह चुके हैं. पुस्तक आईएसआईएस और इस्लाम में सिविल वॉर के लेखक भी हैं.)


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