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प्रतीकात्मक तस्वीर. (फोटो: पीटीआई)
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मध्य प्रदेश सरकार कृषि और किसानों को लेकर लगातार चमकदार आंकड़े पेश करती है. ऐसे में सवाल उठता है कि किसानों में असंतोष और आत्महत्याओं की क्या वजह है?

नई दिल्ली: मध्य प्रदेश ने पंजाब-हरियाणा को गेहूं उत्पादन में पीछे छोड़ दिया है. इस साल अप्रैल में राज्य को लगातार पांचवी बार भारत सरकार का प्रतिष्ठित कृषि कर्मण पुरस्कार मिला. ये पुरस्कार वर्ष 2015-16 के लिए गेहूं उत्पादन की श्रेणी में दिया गया.

मध्य प्रदेश में गेहूं उत्पादन में वर्ष 2014-15 के मुकाबले वर्ष 2015-16 में 7.64 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई. प्रदेश में गेहूं की उत्पादकता 2015-16 में बढ़कर 3,115 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर हो गई है जबकि पिछले साल यह 2,850 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर थी.

इससे पहले वर्ष 2013-14 में भी मध्य प्रदेश को यह पुरस्कार गेहूं उत्पादन के क्षेत्र में मिला था, जबकि वर्ष 2011-12, वर्ष 2012-13 एवं वर्ष 2014-15 में कुल खाद्यान्न उत्पादन में यह अवार्ड मिला. इतना ही नहीं 2016-17 में कुल खाद्यान्न उत्पादन के क्षेत्र में कृषि कर्मण पुरस्कार पाने के लिए मध्य प्रदेश सरकार ने दावा ठोंक दिया है. मध्य प्रदेश में किसानों को लेकर सरकार के दावे व आंकड़े और भी हैं.

मध्य प्रदेश के किसान कल्याण एवं कृषि विकास मंत्री गौरीशंकर बिसेन ने इस साल मार्च में विधानसभा में बताया कि मध्य प्रदेश देश में इकलौता राज्य है कि जिसकी पिछले चार वर्ष में औसत कृषि विकास दर 18 प्रतिशत प्रतिवर्ष से अधिक रही है.


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उन्होंने सदन का बताया कि दलहन, तिलहन, चना और मसूर के उत्पादन में मध्य प्रदेश पूरे देश में पहले स्थान और गेहूं, अरहर, सरसों और मटर के उत्पादन में दूसरे स्थान पर है. उनका दावा था कि वर्ष 2003-04 में कृषि उत्पादन 2.24 करोड़ मीट्रिक टन हुआ करता था, वह अब 5.42 करोड़ मीट्रिक टन हो गया है.

किसानों के लिए किए गए कार्यों का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि किसानों को 88 लाख नि:शुल्क सोइल हेल्थ कार्ड वितरित किए गए हैं. प्रदेश में 265 नई मृदा परीक्षण लैब का निर्माण 100 करोड़ रुपये की लागत से किया जा रहा है. मध्य प्रदेश पहला राज्य है, जहां प्रत्येक विकासखंड में सोइल टेस्टिंग लैब कार्य कर रही है. दो हज़ार कस्टम हायरिंग केंद्रों की स्थापना की गई है.

गौरीशंकर बिसेन ने जैविक खेती का उल्लेख करते हुए बताया कि एपीडा द्वारा प्रमाणीकृत देश की जैविक खेती 6.28 लाख हेक्टेयर में से प्रदेश में दो लाख हेक्टेयर में जैविक खेती हो रही है. प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में मध्य प्रदेश में 56 प्रतिशत क्षेत्रफल को कवर किया गया है, जबकि राष्ट्रीय औसत मात्र 30 प्रतिशत है.

इसके अलावा किसान कल्याण मंत्री ने भावांतर योजना की भी विशेषताएं बताईं जिसे मध्य प्रदेश सरकार बड़े जोर-शोर से प्रचारित कर रही है. इस योजना में फसल की कीमतें गिर जाने पर मध्य प्रदेश सरकार बाजार भाव और न्यूनतम सर्मथन मूल्य यानी एमएसपी के बीच के अंतर की राशि किसानों को देती है.

किसान आत्महत्या के मामले में मप्र का चौथा स्थान

मध्य प्रदेश में कृषि और किसानों की सिर्फ यही तस्वीर नहीं है. इसका एक दूसरा पहलू भी है. उस पर भी एक निगाह डाल लेते हैं. वो पहलू है किसान आत्महत्या का.

मध्य प्रदेश के गृह मंत्री भूपेंद्र सिंह ने पिछले साल जुलाई महीने में एक सवाल के लिखित जवाब में विधानसभा में बताया था कि वर्ष 2004 से वर्ष 2016 के दौरान प्रदेश में 15,129 किसानों और खेतिहर मज़दूरों ने आत्महत्या की है. उन्होंने कहा कि मध्य प्रदेश अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो ने ये आंकडे़ दिए हैं. गौरतलब है कि दिसंबर 2003 में मध्य प्रदेश में भाजपा की सरकार सत्ता में आई और तब से लेकर अब तक प्रदेश में भाजपा की ही सरकार है.

यानी सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, इस सालों के दरम्यान लगभग तीन किसानों ने प्रतिदिन आत्महत्या की. इन किसानों के आत्महत्या के पीछे प्रमुख कारण कर्ज, फसल खराब होना और खेती में नुकसान उठाना आदि बताए गए.


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अगर हम राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के हालिया आंकड़े देखें तो 2015 में मध्य प्रदेश में 1,290 व 2016 में 1,321 किसानों और खेतिहर मज़दूरों ने आत्महत्या की है. इन सालों में किसान आत्महत्या के लिहाज से पूरे देश में मध्य प्रदेश चौथे स्थान पर रहा है. किसानों की आत्महत्या के बारे में वर्ष 2016 के बाद से कोई आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है क्योंकि गृह मंत्रालय ने अभी तक इसके बारे में रिपोर्ट प्रकाशित नहीं की है.

यही नहीं, बीते साल जून महीने से ही मध्य प्रदेश में छोटे बड़े किसान आंदोलन हो रहे हैं. किसान कर्जमाफी और न्यूनतम समर्थन मूल्य जैसे तमाम मुद्दों को लेकर आंदोलन कर रहे हैं. ऐसे ही एक आंदोलन का केंद्र प्रदेश का मंदसौर ज़िला बना था. जहां पिछले साल छह जून को आंदोलन के दौरान पुलिस फायरिंग हुई जिसमें छह किसानों की जान चली गई थी. इस घटना के बाद किसानों का आंदोलन हिंसक हो उठा था. इसके अलावा आए दिन खबरों में किसानों की आत्महत्या की खबरें छाई रहती हैं.

समस्या अर्थशास्त्रियों की सोच में

ऐसे में सवाल यह उठता है कि जहां एक तरफ मध्य प्रदेश में कृषि और किसानों को लेकर सरकार चमकदार आंकड़े जारी कर रही है तो दूसरी तरफ किसान आत्महत्याओं और किसान असंतोष में बढ़ावा क्यों हो रहा है?

कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा कहते हैं,‘मेरे ख्याल से सरकार के आंकड़ों में खराबी नहीं है. समस्या हमारे अर्थशास्त्रियों और कृषि निर्माताओं की सोच में हैं. हमारे नीति निर्माता कृषि उत्पादन और कृषि विकास दर से आगे सोचते नहीं हैं. और इन आंकड़ों से हमारे किसानों पर कोई फर्क नहीं पड़ता है. यही कारण है कि जहां कृषि विकास दर या उत्पादन दर ज्यादा भी होती है, किसानों में असंतोष बना रहता है.’


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वे आगे कहते हैं,‘इसके बजाय हमें यह बताया जाना चाहिए कि किसान की आय में कितना इजाफा हुआ है. सिर्फ मध्य प्रदेश का आंकड़ा तो मेरे पास नहीं है लेकिन पूरे देश का आंकड़ा है. नीति आयोग के अध्ययन के मुताबिक, 2011-12 से लेकर 2015-16 इन पांच सालों के बीच में किसानों की आय में जो बढ़ोतरी हुई है वह आधे (0.44) प्रतिशत से भी कम है. मध्य प्रदेश देश का ही हिस्सा है. ऐसे में उनकी आय में कितना इजाफा हुआ होगा यह बताने की जरूरत नहीं है. दरअसल सरकारों को विकास दर और उत्पादन के आंकड़ों के बजाय किसानों की आय में बढ़ोतरी, ग्रामीण मजदूरी में बढ़ोतरी और आत्महत्या में कितनी कमी हुई है, इसके आंकड़े जारी करने चाहिए.’

हालांकि विपक्षी दल समेत प्रदेश के तमाम किसान नेता सरकार के आंकड़ों पर ही सवाल उठाते हैं.

कृषि कर्मण अवार्ड आंकड़ों के फर्जीवाड़े का परिणाम

पूर्व समाजवादी पार्टी विधायक और किसान नेता डॉ सुनीलम कहते हैं, ‘मध्य प्रदेश को कृषि कर्मण अवार्ड मिलना आंकड़ों के फर्जीवाड़े का परिणाम है. प्रदेश में लगातार सूखा, अतिवृष्टि, मुआवजे और फसल बीमा की बात हो रही है. किसान आत्महत्या के आंकड़े इसकी पुष्टि कर रहे हैं. पूरे देश में आत्महत्या के मामले में मध्य प्रदेश का नंबर चौथा है. राज्य में भावांतर योजना पूरी तरह से असफल रही है. केंद्र की महत्वाकांक्षी प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना भी फ्लाप रही है. हमारा और दूसरे किसान संगठनों का दावा है कि प्रदेश में इन दोनों योजनाओं का लाभ दस प्रतिशत किसानों को भी नहीं मिला है.’

स्वराज पार्टी के अध्यक्ष और कृषि मामलों के जानकार योगेंद्र यादव कहते हैं, ‘कृषि कर्मण अवार्ड उत्पादन के बारे में हैं और यही हमारे देश की सबसे बड़ी विडंबना है कि हमारी सारी कृषि नीति उत्पादन केंद्रित है, उत्पादक केंद्रित नहीं है. पिछले 70 साल से सरकार, मंत्री सबका ध्यान इस ओर है कि उत्पादन बढ़ रहा है. हम यह मान लेते हैं कि उत्पादन बढ़ गया तो उत्पादक अपने आप खुशहाल हो जाएगा जबकि ऐसा दरअसल बिल्कुल नहीं है. अब तो ऐसा हो गया है कि उत्पादन बढ़े तो उत्पादक की हालत और खराब हो जाती है. जब बंपर फसल होती है तो उत्पाद के दाम मंडी में गिर जाते हैं और किसान बहुत ही परेशान हो जाता है. यानी उत्पादन किसान की खुशहाली का परिणाम नहीं है और हमें एक ऐसी कृषि नीति चाहिए जिसके केंद्र में किसान की खुशहाली हो.’

फिलहाल मध्य प्रदेश में कृषि और किसानों की समस्याओं को लेकर काम कर रहे लोग इसकी व्यवहारिक दिक्क्तों के बारे में बात करते हैं. उनका कहना है किसानों के असंतोष का कारण शायद सरकारें कभी समझना नहीं चाहती हैं. किसानों के सामने तमाम गंभीर समस्याएं हैं.

कृषि विकास दर सवालों के घेरे में  

पिछले 10-15 सालों से लगातार मध्य प्रदेश के 20 से 25 जिले सूखे, बाढ़ या ओलावृष्टि की चपेट में हैं. ऐसे में फसलों की बरबादी के बावजूद दिखाई जा रही कृषि विकास दर सवालों के घेरे में आती है. कई सामाजिक कार्यकर्ता आरोप लगाते हैं कि उनको माइक्रो लेवल पर आंकड़े नहीं दिए जाते हैं.

सरकार का दावा है कि हॉर्टिकल्चर में ग्रोथ हुई है. मान लीजिए यदि किसान ने लहसुन, प्याज या टमाटर का उत्पादन बढ़ाया तो सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उसे कम से कम इतना भाव मिले कि वह नुकसान में न रहे लेकिन होता इसका उल्टा है. जब भी उत्पादन ज्यादा होता है तभी बाजार में उसका भाव स्वाभाविक रूप से कम मिलना शुरू हो जाता है. इसका सीधा नुकसान किसानों को होता है लेकिन सरकार ने इसके लिए कभी कोई कदम नहीं उठाया.

किसानों के सामने बिजली, क्रेडिट, उर्वरक और नकली बीज की समस्या है. सरकार ने इसे लेकर बहुत सारे दावे किए हैं लेकिन जमीनी हालात बिल्कुल विपरीत है. अब जैसे नकली बीज बाज़ार में बिक रहे हैं और राज्य में नकली बीज के सबसे ज्यादा मामले कंज्यूमर फोरम में रजिस्टर हुए हैं लेकिन इसके लिए कोई उपाय सरकार के पास नहीं है.

एमएसपी का लाभ सिर्फ 9 प्रतिशत किसानों को 

सरकारी योजनाओं का फायदा बड़े किसानों को ही मिलता है. छोटे और मझोले किसान इससे बाहर हैं जबकि मध्य प्रदेश में खेती में लगे करीब 90 प्रतिशत किसान छोटे और मझोले क्षेत्र के हैं. मध्य प्रदेश के आंदोलन कर रहे किसान नेताओं ने दावा किया है कि सरकार द्वारा निर्धारित एमएसपी का लाभ मध्य प्रदेश में सिर्फ 9 प्रतिशत किसान ले रहे हैं. यानी करीब 90 प्रतिशत किसान बहुत ही कम दाम पर अपनी फसल बेच रहे हैं.

किसान नेता बीएम सिंह कहते हैं, ‘मध्य प्रदेश सरकार को अवार्ड उत्पादन पर मिल रहा है. वह उत्पादन किसान कर रहा है लेकिन किसान मार खा रहा है, इसलिए कि उसे उत्पादन का उचित मूल्य नहीं मिलता है. दरअसल यह सरकार की जिम्मेदारी किसानों को उनकी उपज का मूल्य किसी भी हालत में न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम न मिले. लेकिन वास्तविकता है किसान को न्यूनतम समर्थन मूल्य से भी कम कीमत मिल रही है. जब तक इसका समाधान नहीं होगा तब तक किसान परेशान रहेगा.’


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सामाजिक कार्यकर्ता और अशोका फेलो सचिन कुमार जैन एक दूसरे पहलू पर भी ध्यान खींचते हैं. वे कहते हैं,‘मध्य प्रदेश में पूरा कृषि क्षेत्र बाजार के हाथों में हैं. मध्य प्रदेश के कृषि विभाग में 68 प्रतिशत पद खाली हैं. इन लोगों का काम किसानों को जागरूक करना, मृदा परीक्षण, उर्वरक, फसल चक्र समेत दूसरी जानकारी देना है. अब ये जगहें खाली हैं तो इनकी जगह बाजार ने ले ली है. उर्वरक, बीज और पेस्टीसाइड की दुकान खोलकर बैठा व्यक्ति ही किसानों को जागरूक करने का काम कर रहा है. सीधी सी बात है वो बाजार में बैठा व्यक्ति पहले अपने फायदे के बारे में ही सोचेगा. इसका सीधा नुकसान छोटे और मझोले किसानों को उठाना पड़ता है. किसानों को बाजार में सरकार की तरफ से कोई प्रोटेक्शन और सपोर्ट नहीं मिला. जिससे उसकी पूंजी का सबसे ज्यादा नुकसान हुआ. इसके अलावा नीतियों का निर्माण करने वाले बड़े किसानों को ध्यान में रखकर योजनाएं बना रहे हैं. छोटे और मझोले किसानों को फायदा पहुंचाने और उनका संरक्षण करने की कोई मशीनरी सरकार ने नहीं बनाई है.’

किसानों को उपज के सही दाम नहीं मिलते

वहीं इसके अलावा बिचौलियों की वजह से भी किसानों को उनकी उपज के सही दाम नहीं मिलते. अभी किसान को सीधे मंडी तक जोड़ने का जो काम होना था, नहीं हुआ है. साथ ही भावांतर या फसल बीमा योजना का भी फायदा किसानों को नहीं मिल रहा है. उसमें कई व्यवहारिक दिक्कतें सामने आ रही हैं. जैसे बीमा के लिए आपको तीन महीने पहले यह बताना पड़ता है कि आप कौन की फसल उगाने जा रहे हैं. मतलब अगर आपने तीन महीने पहले बता दिया कि आप सरसों की खेती कर रहे हैं लेकिन जब बोने का वक्त आया तो किसी कारणवश आपको गेहूं की फसल लगानी पड़ी. तो अब अगर आपकी गेहूं की फसल खराब हो गई तो आपको बीमा का फायदा नहीं मिलेगा.


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नीति निर्माताओं को लगता है कि सिर्फ अनाज का समर्थन मूल्य बढ़ाने से गांवों में खुशहाली आ जाएगी. लेकिन दूसरे कई कारकों के चलते ग्रामीण अर्थव्यवस्था मंदी की चपेट में हैं. दरअसल पहले सूखे, बाढ़ और ओलावृष्टि की मार झेल रहे किसानों की मदद मनरेगा, भवन निर्माण, बालू खनन, बुनियादी ढांचा निर्माण, डेयरी, पोल्ट्री आदि गैर कृषि आय ने के क्षेत्रों से होती थी लेकिन नोटबंदी और शहरों में आई मंदी ने इस पर भी पानी फेर दिया है. किसानों में असंतोष इससे भी बढ़ा है.

किसान नेता बीएम सिंह सरकार की नीतियों पर नहीं नीयत पर सवाल उठाते हैं. वे कहते हैं कि अगर सही नीयत से काम किया जाय तो नीतियां अपने आप बन जाती हैं.


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