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(प्रतीकात्मक तस्वीर : ब्लूमबर्ग )
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अगर रघुराम राजन ने किसानों की कर्जमाफी की मुखालफत की है तो फिर उनकी बात को गंभीरता से लिया जाना चाहिए.  वजह सिर्फ यही नहीं कि बैंकों के कामधाम की रीति-नीति गढ़ने के मामले में उनकी साख है और अकादमिक जगत में भी उनके लिखे-पढ़े की धाक है. और, वजह यह भी नहीं कि रघुराम राजन की बात पर बारह मशहूर अर्थशास्त्रियों ने अपनी सहमति की मुहर लगायी है. और, वजह यह भी नहीं कि रिजर्व बैंक के गवर्नर के रूप में उन्होंने कारपोरेट जगत को दी जा रही कर्जमाफी के बारे में बोलने का साहस किया.

रघुराम राजन की बातों को गंभीरता से सुना जाना चाहिए तो इसलिए कि उनके तर्क दमदार हैं: ऐसी कर्जमाफी का फायदा उन्हीं लोगों को होता है साथ-संपर्क के धनी हैं, राज्य सरकारों की वित्तीय सेहत पर भारी बोझ पड़ता है और निवेश में भी कमी आती है. बैंकों का अधिकारी-मंडल अक्सर ही ये दलील देता है कि कर्जमाफी से ऋण मुहैया कराने की मान-मूल्यों पर चोट पहुंचती है, ग्रामीण इलाके में होने वाली बैंकिंग को नुकसान होता है और कर्जमाफी आखिर को किसानों के भी हित के खिलाफ जाती है. कृषि-जगत के विशेषज्ञ अर्थशास्त्री बताते हैं कि कर्जमाफी से भारतीय कृषि के संकट का उबार नहीं हो सकता.

ये तर्क जायज हैं. यह बात तो बिल्कुल तय है कि अकेले कर्जमाफी भर से भारतीय किसानों की समस्याओं का समाधान नहीं होने वाला. दरअसल कर्जमाफी की राह कभी-कभार ही अपनायी जानी चाहिए और वह भी उस घड़ी जब कोई और चारा ना हो. लेकिन ये आपत्तियां बार-बार की बेदिमाग कर्जमाफियों पर लागू होती हैं- वैसी कर्जमाफी पर जिनका ऐलान सरकारें अक्सर चुनाव के तुरंत पहले किसानों का वोट बटोरने के ख्याल से करती हैं. किसान-आंदोलन ऐसी कर्जमाफी की मांग नहीं कर रहे. अफसोस कि किसान-आंदोलन ने अपनी मांगों की जो फेहरिश्त पेश की, जो प्रस्ताव सामने ऱखे उसपर ना तो मीडिया ने ध्यान दिया और ना ही अर्थशास्त्रियों ने. मैं यहां खास तौर से अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति (एआईकेएससीसी) की मांग और विधेयक का हवाला देना चाहता हूं. एआईकेएससीसी तकरीब 200 किसान-संगठनों का एक साझा मंच है और इसी ने पिछले महीने दिल्ली में देश के कोने-कोने से आये किसानों का ऐतिहासिक मुक्ति मार्च आयोजित किया था. (यहां एक बात स्पष्ट करना जरूरी है कि मैं एआईकेएससीसी की टोली में शुरुआत से ही शामिल रहा हूं.)

कर्जमाफी और कर्जमुक्ति में अन्तर करने की जरूरत है. राजनीतिक दल और सरकारें कर्जमाफी की बात करती हैं जबकि किसान-आंदोलन का प्रस्ताव कर्ज से मुक्ति का है. इन दोनों में एक सतही समानता नजर आ सकती है क्योंकि दोनों ही से झलकता है कि बात कर्जे से छुटकारा दिलाने की हो रही है. लेकिन समानता सिर्फ इतने ही भर तक है. कर्जमाफी (कृषि) शर्तों से बंधी होती है, उसमें कोई टिकाऊपन नहीं होता, वो आधा-अधूरा होती है और अक्सर दरियादिली के भेष में सामने आती है- माने कर्जमाफी हुई तो समझिए कि सरकार ने ऐसा करके किसानों पर बड़ी दरियादिली दिखायी. और गौर करें कि ऐसी कर्जमाफी का ऐलान किस वक्त होता है- एकदम उस घड़ी जब व्यवस्था की जकड़बंदी में फंसे किसानों की लगातार उपेक्षा कर रही राजनीतिक पार्टियों को लगता है कि अब वक्त बिल्कुल चेत जाने का है और किसानों के लिए कुछ करना एकदम ही जरूरी हो गया है.

ऐसी कर्जमाफी ज्यादातर किसानों और उनके अधिकांश कर्जे को कर्ज-राहत के दायरे से बाहर रखती है, ऐसी कर्जमाफी को अमूमन केंद्र सरकार की भी सरपरस्ती हासिल नहीं होती, यह भी सुनिश्चित नहीं होता कि किसानों को आगे नये कर्ज मिलना जारी रहेगा और ना ही ऐसी कर्जमाफियों के संग-साथ कुछ ऐसे उपाय किये जाते हैं कि किसानों के लिए नियमित आमदनी सुनिश्चित की जा सके. यह कर्जमाफी हद से हद मरहम-पट्टी का काम करती है और बड़ी आसानी से एक हथकंडे में तब्दील हो सकती है- ऐसा हथकंडा जिसे सरकारें जब-तब जरूरत के हिसाब से अपनाती रहें. नीति-निर्माताओं का ऐसे हथकंडे को लेकर चिन्तित होना एकदम जायज है.


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किसान दरअसल कर्जमुक्ति की मांग कर रहे हैं और याद रहे कि कर्जमुक्ति का दायरा व्यापक है, वह सांस्थानिक होती है, उसका साथ वैधानिक प्रावधान जुड़े रहते हैं और कर्जमुक्ति से यह भी सुनिश्चित होता है कि किसानों को नियमित आमदनी होती रहे. कर्जमुक्ति के दायरे में हर तरह का ऋण (वह कर्जा जो संस्थाओं से लिया गया और वह भी जो महाजनों से लिया गया) शामिल है, हर तरह के बैंक (व्यावसायिक भी और सहकारी बैंक भी) तथा हर श्रेणी के किसान (भूस्वामी, पट्टेदार, बंटाईदार और काश्तकार) शामिल हैं.

इसके लिए एक स्थायी ऋण राहत आयोग की स्थापना जरूरी होगी. इस आयोग को वैधानिक शक्ति देनी होगी कि वह कर्जों का बंदोबस्त, अदला-बदली और कर्जमाफी कर सके और ऐसे कर्जों के दायरे में वह कर्जा भी आयेगा जो महाजनों से लिया गया है. इस रीत पर होने वाली व्यवस्था का अंतिम चरण होगा सांस्थानिक ऋण तक किसानो की सार्विक पहुंच सुनिश्चित करना. कर्जमुक्ति की धारणा में यह बात बद्धमूल है कि किसानों को जीवन में एक दफे कर्जों से पूरी तरह छुटकारा दिलाया जायेगा, यह कर्जमुक्ति बिला शर्त होगी और इसे राज्य सरकार तथा केंद्र सरकार का समर्थन हासिल होगा ताकि जब-तब और बार-बार की कर्जमाफी की सांसत से किसान छूट सकें.

मेरा ख्याल है कि किसानों को कर्जमुक्त करने का ऐसा कानून बनाने के पर्याप्त कारण है- कर्जमुक्ति की यह धारणा नैतिक रुप से ठोस जमीन पर खड़ी है और आर्थिक पक्ष भी दमदार है. कर्जमाफी के पीछे मुख्य विचार क्या है? यही कि जिसने कर्जा लिया वो इस हालत में नहीं कि कर्ज चुकता कर सके. भारत में कर्जदार किसान परिवारों की तादाद तेजी से बढ़ी है. साल 1992 में ऐसे परिवारों की तादाद 25 फीसद थी जो 2016 में बढ़कर 52 प्रतिशत तक जा पहुंची है (कुछ राज्यों में तो ऐसे परिवारों की तादाद 89 प्रतिशत और 93 प्रतिशत तक है).

भारत के हर किसान परिवार पर औसतन 47,000 रुपये का कर्ज है यानि कोई किसान-परिवार खेती-बाड़ी से सालाना जितनी रकम कमाता है, उससे कहीं ज्यादा है यह कर्ज. कोई औसत किसान परिवार इस हालत में नहीं कि वह इतना बड़ा कर्जा चुका सके. तकरीबन 68 प्रतिशत किसान-परिवारों की आमदनी नकारात्मक है यानि खेती इनके लिए घाटे का सौदा साबित हो रही है. परिवार के भरण-पोषण पर होने वाला जरुरी खर्चा कुल आमदनी से ज्यादा है. देश के किसान परिवारों पर कर्ज का भारी बोझ तो है ही, वे कर्ज के दुष्चक्र में भी जा फंसे हैं. अगर उनपर कर्ज अदायगी का और दबाव पड़ा तो वे बेचारगी के एकदम आखिरी छोर पर आ जायेंगे. याद रहे, कर्जदारी किसान-आत्महत्याओं तथा कृषि-संकट की सबसे नजदीकी वजह है.

किसान कर्ज चुकता नहीं कर पा रहे तो उसके पीछे उनकी मजबूरी है, ऐसा वे जानते-बूझ कर नहीं करते. कर्जमुक्ति के लिए यह दूसरा बड़ा आधार है. किसान आज कर्ज के चंगुल में फंसे हैं तो इसलिए कि कुछ चीजें उनके वश से बाहर हैं: फसल मारी जाती है, बाजार में कीमतें एकदम ही नीचे चली आती हैं, खेती-बाड़ी पर लागत बढ़ती जा रही है, कभी सूखा पड़ता है तो कभी पाला मार जाता है और सिंचाई के स्रोत सूखते जा रहे हैं. दरअसल, दोष का जिम्मा सरकार की उन नीतियों का भी बनता है जो उपभोक्ताओं और व्यापारियों के हित को ध्यान में रखकर बनायी जाती हैं और किसान के लिए अपने उत्पाद को लाभकर मूल्य पर बेच पाना मुश्किल हो जाता है, वह कर्ज के फंदे में फंसते चला जाता है.


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और, कर्जमुक्ति के पीछे एक तर्क बराबरी के बरताव का भी है. केंद्र सरकार ने अर्थव्यवस्था के अन्य दायरों को कर्ज में छूट दी है, कर्जमाफी की है: साल 2009 में उद्योग जगत को संकट से उबारने के लिए 3 लाख करोड़ रुपये का बेलआऊट पैकेज दिया गया था, बैंकों के कर्जों को समायोजित करने के कार्यक्रम चलाये गये हैं, बैंकों का प्रतिपूंजीकरण (रिकैपिटलाइजेशन) हुआ है, हर बजट में नजर आता है कि कारपोरेट जगत के कुछ कर्जे माफ कर दिये गये, उन्हें दिये गये कर्जे में एक ना एक तरीके से कमी लायी गई. सरकार ने समाज के अन्य तबकों की भी झोली भरने का काम किया है- कहीं वन रैंक वन पेंशन का नुस्खा आजमाया गया तो कहीं सांतवें वेतन आयोग को अमल में लाया गया.

और, इस सिलसिले का आखिर तर्क हिसाब रखने वाली खाता-बही या यों कहें कि मुंशीगिरी से भी निकलता है: किसानों पर जितना बैंकों का बकाया है उससे कहीं ज्यादा बकाया किसानों का सरकार के ऊपर है. सरकार ने राष्ट्रीय किसान आयोग की एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) के बाबत 2007 की सिफारिशें लागू नहीं की.  इसका एक मतलब यह भी होता है कि बीते ग्यारह सालों में सरकार ने किसानों को उनके हिस्से के 22 लाख करोड़ रुपये नहीं दिये. किसानों पर अभी तमाम तरह के बैंकों का कुल कर्जा 14 लाख करोड़ रुपये का है. जाहिर है, सरकार पर किसानों का बकाया इससे कहीं ज्यादा है.

अगर किसानों के लिए किसी नयी शुरुआत का मौका है तो वो मौका बिल्कुल अभी आन खड़ा है. कई दशकों के बाद खेती-किसानी का मुद्दा राष्ट्रीय रंगमंच पर मुख्य किरदार बनकर उभरा है. राजनीतिक दलों के आगे मजबूरी आन खड़ी है- उन्हें दिख रहा है कि लोकसभा के चुनाव सिर पर हैं और किसानी के मोर्चे पर हमेशा ही ढुलमुल रवैया अपनाने वाले राजनीतिक दल फिलहाल चुनाव की मजबूरी में जरूरी राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखा सकते हैं. यह वक्त कुछ बड़ा सोचने का है, ग्रामीण संकट को दूर करने के लिए एक व्यापक पैकेज पर सोच-विचार और कदम बढ़ाने का वक्त है यह. इस पैकेज की सबसे जरूरी चीज कर्जमुक्ति नहीं- लेकिन किसानों की नियमित आमदनी सुनिश्चित करने वाले इस पैकेज की कुछ अहम फुटकल चीजों में जरूर शामिल है. जैसा कि ऊपर जिक्र आया है- कृषि-संकट से उबार में कर्जमुक्ति रामबाण तो नहीं लेकिन अनिवार्य जरूर है.


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