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अखिल भारतीय किसान संघ समन्वय समिति के सदस्य और किसान ,नई दिल्ली । पीटीआई
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अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति (एआईकेएससीसी) के झंडे तले देश के कोने-कोने से हज़ारों हज़ार की तादाद में किसान दिल्ली आ डटे थे. एआईकेएससीसी 200 से ज़्यादा किसान-संगठनों का एक समवेत मंच है. ये पहला मौका था जब मीडिया ने सड़क-जाम या फिर कानून-व्यवस्था का मसला कहकर कन्नी नहीं काटी बल्कि किसान-रैली को सही में किसान-रैली कहकर ही लोगों को बताया-दिखाया. दोपहर बाद का सत्र राजनीतिक दलों के लिए रखा गया था और इस सत्र में मंच पर विपक्ष के कई जाने-माने नेता मौजूद थे. इन्हीं बातों के पेशेनजर जोश में मैं खुद से वो सवाल पूछ बैठा जो शायद कुछ महीने पहले तक नहीं पूछता.

याद कीजिए कि इससे तुरंत पहले देश की राजनीति के रंगमंच पर किसानों की ऐसी गूंजदार धमक कब सुनायी दी थी? मेरा ख्याल है- अब से अब से ठीक तीन दशक पहले, 1988 के अक्टूबर-नवंबर के महीने में. तब चौधरी महेन्द्र सिंह टिकैत की अगुवाई में एक लाख से ज़्यादा की तादाद में किसान दिल्ली पहुंचे थे, इनमें ज़्यादातर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के थे. टिकैत के भारतीय किसान यूनियन ने बोट क्लब और राजपथ पर अपना डेरा डाला था- राज-सिंहासन पूरे एक हफ्ते सकते में रहा. लेकिन राजनीति की कहानी अभी इस किसान-अंदोलन के इर्द-गिर्द घूमना शुरू ही हुई थी कि 1989 के साल का चुनाव चढ़ आया- किसानी के सवाल किनारे हो गये और मुख्य मुद्दा बोफोर्स का बन गया.

पिछले हफ्ते की किसान रैली इतनी बड़ी तो ना थी कि उसे टिकैत की अगुवाई वाली रैली की टक्कर का मान सकें तो भी इस बार की जुटान इतनी बड़ी ज़रूर थी कि देश की नज़र उस पर आ टिके. इस रैली में वो सारा कुछ था जो किसानों को राष्ट्रीय राजनीति के मुख्य रंगमंच पर ला खड़ा करे: एआईकेएससीसी के आह्वान पर देश के हर बड़े राज्य के किसान मुट्ठी तानकर उठ खड़े हुए. बड़े ज़मींदार, छोटे और सीमांत किसान, खेतिहर मजदूर, आदिवासी और महिला किसान- हर तरह के किसानों का एक इंद्रधनुषी जमावड़ा दिल्ली आ डटा जो शायद अब से पहले कभी नहीं हुआ था.

राजनीति और विचारधारा के अपने-अपने झंडे, नारे-मुहावरे और सोच के साथ मंच पर 200 से ज़्यादा किसान-संगठन मौजूद थे. टिकैत के भारतीय किसान यूनियन के वारिस अपने हरे बाने में मंच पर मौजूद थे तो शरद जोशी के शेतकरी संगठन और नंजुदास्वामी के कर्नाटक राज्य रैयत संघ के नुमाइंदे भी जिन्हें बड़े किसानों का झंडाबरदार माना जा सकता है.

इन संगठनों के किसानों के कंधे से कंधा मिलाकर खड़े थे हाथ में लाल झंडा उठाये राजनीति की वामधारा की नुमाइंदगी करने वाली किसान-सभाओं (एआईकेएस, एआईकेएम, एआईकेएमएस तथा पंजाब के कई किसान संगठन) के सदस्य जो ‘छोटे’ किसान और खेतिहर मज़दूरों की आवाज़ बुलंद कर रहे थे. रैली के झंडों पर और रंग भी लहर मार रहे थे-जैसे उजला और नीला रंग.

ये झंडे उन किसानों और संगठनों (एनएपीएम, एएसएचए, रैय्यतु स्वराज वेदिका) के थे जो प्रकृति-परिवेश के रक्षा-संरक्षा का हित चेतकर खेती-बाड़ी की बात कहते-सोचते हैं. इंद्रधनुषी रैली के रंगपट्टिका में अपना नूरो-आब जोड़ते हुए राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर के कई और किसान-संगठन शामिल थे (मिसाल के लिए स्वराज अभियान का जय किसान-आंदोलन पीले रंग में, महाराष्ट्र का लोकसंघर्ष मोर्चा, यूपी का गांधी ग्रामीण मंच और उत्तराखंड का तराई किसान यूनियन. यह फेहरिश्त और भी लंबी है लेकिन यहां के लिए इतना भर ही). किसानों ने समवेत संघर्ष का पहला सबक सीखा कि: एकता में बल है!


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किसानों ने कुछ और भी सीखा. पहली बार हुआ जब किसान-आंदोलनों का सुर और स्वर शिकायती और फरियादी भर ना था बल्कि किसान साफ-साफ समाधान भी सुझा रहे थे. पहली बार हुआ जब किसान-आंदोलनों ने अपनी मांग को बिल्कुल हथेली पर समेटते हुए उसे दो लकीर के घेरे में बांधकर पेश किया. मांग थी कि: उपज का लाभकारी मूल्य दो और किसानों को कर्ज़मुक्त करो. पहली बार हुआ कि किसानों ने कानून के दो मसौदे पेश किये , सियासी दलों को बुलाया कि इन मसौदों को तौलिए-परखिए और सदन के पटल पर पेश कीजिए. मीडिया किसानों की मांग पर अपने बोल-वचन चढ़ाकर बताती-दिखाती रही लेकिन कानून के इन दो मसौदों से ज़ाहिर हो चला था कि नीति-निर्माण की बारीकियों से किसान-आंदोलन भी अनजान नहीं. नीतिगत बारीकियों का यह पहलू शायद ही किसान-राजनीति में अब से पहले कभी देखने को मिला हो. यह खुद ही में एक दलील है कि किसान संसदीय लोकतंत्र में खेल को बिल्कुल नियमों के दायरे में रहकर खेलना सीख रहे हैं.

और, गौर कीजिए कि किस तरह किसान शहरों में दोस्त बनाने का हुनर सीख रहे हैं. इसकी शुरुआत हुई थी मुंबई में हुए लॉन्ग-मार्च से. उस वक्त मायानगरी मुंबई के बाशिन्दों ने जोश-ओ-खरोश में किसानों के लिए अपने दिल के दरवाज़े और बटुए का मुंह खोल दिया था. इस बार हमदर्द शहरातियों के एक मंच नेशन फॉर फार्मर्स ने किसानों की तरफदारी में मददगार माहौल बनाने की कामयाब कोशिश की. इस समूह की अगुवाई प्रसिद्ध पत्रकार पी. साईनाथ कर रहे थे
और सबको पता है कि देश के किसानों को लेकर साईनाथ की निष्ठा शक से एकदम परे है. नेशन फॉर फार्मर्स ने न्यू सोशल मीडिया, ट्वीटर-स्ट्रार्म और ऐसी तमाम युक्तियों का सहारा लिया और देश की राजधानी की फिज़ा में किसानों की जुटान का संदेश चहुंओर तैरने लगा. वे दिन हवा हुए जब मोर्चा इंडिया बनाम भारत के जुमले से खोला जाता था.

दरअसल किसानों ने इस बार पर्चे बांटे, पर्चे में दिल्लीवासियों से कहा कि माफ करना भाइयो, जो हमारे आने से आपको कोई परेशानी पहुंची हो, मगर क्या करें कि हम खुद ही बड़े हलकान हैं. और, इस पर्चे में किसानों ने शहर के बाशिन्दों से अपनी मांगें भी गिनायीं. तो फिर यों कहिए कि किसानों ने महफिल के रंग में बगैर भंग डाले अपनी दिल का दर्द सुनाने का शऊर सीख लिया है. और इस सिलसिले की आखिरी बात ये कि इस बार की रैली आज़ाद भारत के इतिहास के उन दुर्लभ अवसरों में एक थी जब किसानों ने सोच-समझ के अपने व्याकरण और भाषा के घेरे में राजनीतिक दलों को ला खींचा, राजनीतिक दल किसान की बात किसान की जबान में सुनने को मजबूर हुए. ना, अखबार के पहले पन्ने पर छपी उस तस्वीर को देखकर गुमराह होने की ज़रूरत नहीं जिसमें विपक्ष के नेता किसानों के मंच पर एक-दूसरे के हाथ से हाथ मिलाये खड़े दिखते हैं.

तस्वीर को देखकर यह मान लेने का कोई तुक नहीं कि किसान-आंदोलन बीजेपी-विरोधी महा-गठबंधन का हिस्सा बन गया है. इसमें तो खैर कोई शक ही नहीं कि मोदी सरकार का रिकॉर्ड किसान-विरोधी है और सरकार के किसान-विरोधी राह-रवैये को लेकर बड़ी नाराज़गी है लेकिन किसान, कांग्रेस या फिर दूसरे राजनीतिक दलों की अब और तब की उन सरकारों को भी नहीं भूले जो किसानों का हित साधने के वादे के साथ सत्ता में आयीं मगर किसान-विरोधी साबित हुईं. रैली में आये किसानों को याद है कि बीते चार सालों से वे विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं लेकिन रैली के मंच पर जुटे ज़्यादातर विपक्षी दल इन विरोध-प्रदर्शनों के कहीं आस-पास भी नहीं दिखे.

किसान खूब समझते हैं कि इस महाजुटान में विपक्षी पार्टियां पहुंचीं तो इसलिए कि चुनाव सर पर चढ़ आया है. इन बातों के बावजूद एआईकेएससीसी ने सभी पार्टियों को न्यौता भेजा था और इन दलों के सामने शर्त रखी थी कि आपको समिति (एआईकेएससीसी) के दो विधेयकों का संसद में समर्थन करना होगा और विधेयक पास नहीं हो पाता तो फिर चुनाव के मेनिफेस्टो में विधेयक में आये मुद्दों को शामिल करना पड़ेगा. गौर कीजिए कि राजनीतिक दलों और किसानों के बीच
साथ-सहयोग का समीकरण यहां किस तरह बदला हुआ दिखता है- यहां साथ-सहयोग का व्याकरण बड़े राजनीतिक दल तय नहीं कर रहे बल्कि उन्हें किसान-संगठनों के बताये रास्ते पर चलने की हिदायत गांठ बांधनी पड़ रही है. ज़ाहिर है, किसान अब राजनीति करना सीख रहे हैं.

तो क्या मान लें कि किसान-आंदोलन राजनीति के रंगमंच पर सबसे बड़ा कथानक बनकर नमूदार हुआ है? क्या एकबारगी हम मान लें कि लोकसभा का चुनाव किसानी के संकट के मुद्दे पर लड़ा जायेगा? क्या हम उम्मीद पालें कि संकट से जूझ रहे खेत-खलिहान, खेती-बाड़ी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के हित के लिए कुछ ठोस कदम उठाये जायेंगे?

हां, लेकिन इस ‘हां’ के साथ एक आशंका भी लगी हुई है कि शायद ऐसा ना भी हो. यहां दर्ज तीन सवालों के जवाब मैं इसी अंदाज़ में दर्ज करूंगा. देश की राजनीति के राष्ट्रीय रंगमंच पर किसान ही अकेला किरदार नहीं (ऐसा बनने की ज़रूरत भी नहीं), लेकिन राष्ट्रीय राजनीति के रंगमंच पर अब वे मौजूद ज़रूर हैं. अब सरकार, विपक्षी पार्टियों और जनमत तैयार करने वालों को यह मानकर चलना होगा कि किसान ठीक उनकी आंखों के आगे मौजूद हैं.

अगर तीन दशक पहले का इतिहास अपने को ना दोहराये- किसान-आंदोलन का नेतृत्व इस बार मुट्ठी बांधकर एकजुट रहे तो फिर वह आने वाले कुछ वक्त तक देश की राजनीति का एजेंडा तय करने की स्थिति में है.


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अगर ऐसा हुआ तो 2019 का लोकसभा चुनाव मुख्य रूप से किसानी के मुद्दे पर लड़ा जायेगा. राजस्थान के अलावे अगर बीजेपी मध्य प्रदेश तथा छत्तीसगढ़ में भी हारती है तो ऐसा होने की संभावना और भी ज़्यादा है. बीजेपी हिन्दीपट्टी के इन राज्यों के चुनाव में कुल मिलाकर किसी तरह अपनी नैया पार लगा ले जाती है लेकिन ग्रामीण इलाकों में उसे सीटों के मामले में ज़ोर का झटका लगता है- तब भी 2019 के लोकसभा के चुनावों में किसानी के मुद्दों के हावी रहने की संभावना बनी रहेगी. बीजेपी हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठेगी, वो अपने खिलाफ जाते हालात को पलटने के लिए हाथ-पांव मारेगी. उसकी हरचंद कोशिश रहेगी कि लोगों का ध्यान जवान-किसान के मोर्चे से हटकर हिन्दू-मुसलमान के मोर्चे पर आ जमे. सारा कुछ इस बात पर निर्भर करता है अपने-अपने एजेंडे का खूंटा गाड़ने के खेल में बाजी किसके हाथ में रहती है.

अगर किसानी के मुद्दे हावी होते हैं तो बातचीत का माहौल किसानों के पक्ष में बनेगा, चुनावी घोषणापत्रों में किसानों के मसले ज़्यादा दिखायी देंगे और उनपर दिल खोलकर खर्च करने के वादे सामने आयेंगे. लेकिन यह मान लेना कि किसान का हित ध्यान में रखते हुए कुछ बड़े नीतिगत बदलाव होंगे या फिर राजनीतिक इच्छा-शक्ति अब किसानों का पक्षधर होकर कदम बढ़ायेगी- जल्दबाज़ी का फैसला होगा. किसान-आंदोलनों को अभी संघर्ष का लंबा रास्ता तय करना है. किसान सिर्फ अपने विरोध में खड़ी एक सरकार के खिलाफ ही नहीं उठ खड़े हुए, उन्हें अपने खिलाफ जाती इतिहास-धारा का रुख भी मोड़ना है. किसान-आंदोलन ने बहुत कुछ सीखा है लेकिन उसे अभी और बहुत कुछ सीखने की ज़रूरत है.

(योगेंद्र यादव स्वराज इंडिया पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं.)

(इस लेख का अंग्रेजी से अनुवाद किया गया है. मूल लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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