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Wednesday, 29 May, 2024
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370 लागू होने के बाद और हटने पर भी, बदकिस्मती ‘जन्नत के शिल्पियों’ के ही हिस्से आई है

कश्मीर में हर तरह के मेहनतकश संकट से घिरे हैं. करीब 11 लाख हस्तशिल्प कारीगरों की आय 1980 के दशक से नहीं बढ़ी है. वे प्रतिदिन सिर्फ सौ-डेढ़ सौ रुपये की कमाई करते हैं.

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कश्मीर में अनुच्छेद 370 कैसे लागू हुई, क्या संशोधन हुए, किसने किए, ये मजबूरी थी, ये हालात थे, ये साजिश थी या निर्माण का कोई अनोखा नमूना, इस पर काफी लोगों का ज्ञान भरपूर है. भले ही वादे और इरादे कितने ही नेक क्यों न हों. बदकिस्मती फिलहाल यहां के मेहनतकशों के हिस्से में आई हैं.

उनके लिए अनुच्छेद 370 हटने का कोई अर्थ ही नहीं होगा. श्रमिक शेष भारत में तो अब श्रम कानून अब चार कोड बिल के जरिए बेमानी हो रहे हैं, कश्मीर में तो वे लागू ही नहीं हो पाए. अब, जब लागू होने चाहिए तो वहां के श्रमिक फिर वहीं खड़े हो जाएंगे.

बलि का बकरा हैं मजदूर किसान

जम्मू-कश्मीर राज्य में किसान-मजदूर बेहद कठिन दौर से गुजर रहे हैं. ये सवाल की न सरकार को चिंता है, न अलगाववादी नेताओं को. दोनों देशों की सरकार और आतंकवादियों के लिए कश्मीरी मजदूर-किसान बलि का बकरा हैं. कभी नीतियों तो कभी गोलियों का शिकार हो रहे हैं.

दुखद ये है, भारत की भीमकाय ट्रेड यूनियनों के नेता भी आगे नहीं आते. वे तब भी खामोश हैं, जब गोडबोले आयोग ने योजना आयोग की तरह, राज्य के अधिकांश सार्वजनिक उपक्रमों को बंद करने की सिफारिश की है.

श्रमिकों नहीं, अलगाववाद के साथ खड़े श्रमिक संघ

सरकारी नीतियों पर तमतमाने वाले वामपंथी श्रमिक महासंघों का आम पक्ष राष्ट्रीयता या राष्ट्रवाद के सवाल से आगे नहीं बढ़ता, जबकि दुनिया अब इस सवाल को कूड़ेदान में फेंक चुकी है और अब इसका कोई नतीजा भी हासिल नहीं होना है, खासतौर पर कश्मीर जैसे मामले में. इस सोच के चलते ही वे श्रमिक एकजुटता से ज्यादा अलगाववादियों के पक्ष में खड़े दिखाई देते हैं.

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क्या इन वामपंथी ट्रेड यूनियन महासंघों के नेताओं को नहीं पता कि जम्मू-कश्मीर के अधिकांश सेक्टर जिंदा रहने के लिए संघर्ष कर रहे हैं? हजारों श्रमिकों की आजीविका पर खतरा मंडराता रहता है. उन्होंने इसके लिए कब आवाज उठाई? आम उत्पीडऩ के मामलों में भले ही कुछ प्रेस वक्तव्य जारी किए हों.


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जैसे हाल ही में ‘एटक’ ने धारा 370 में हुए बदलाव पर वक्तव्य जारी किया या फिर कई अन्य वामपंथी दलों और उनके संगठनों ने विरोध दर्ज कराया. एटक की ओर से जारी हालिया वक्तव्य में सिर्फ इतना ऐतराज जताया गया कि जम्मू-कश्मीर के लोगों को विश्वास में नहीं लिया गया और कश्मीर को ‘कैद’ दिया गया है. जबकि ऐसे सभी संगठनों का दावा है कि वे किसानों को साथ लेकर मजदूर वर्ग की सत्ता लाने को संघर्षशील हैं.

बिकने की कगार पर सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयां

राज्य में लगभग 20 सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयां हैं. जम्मू और कश्मीर खनिज 1960 में खनिज संसाधनों का दोहन करने के लिए शुरू हुआ था. सरकार के अनुसार बीस में सिर्फ चार लाभ में हैं, बाकी नुकसान में हैं.

राज्य सरकार ने ‘बीमार’ घोषित करने के बाद दो पीएसयू, जेएंडके हिमालयन वूल कॉमर्स और इसकी सहायक जेएंडके हैंडलूम को बंद कर दिया. अन्य सार्वजनिक उपक्रमों में कर्मचारी एक हारी हुई लड़ाई लडऩे की कोशिश कर रहे हैं.

सहारा न मिलने पर भी संघर्ष जारी

उद्यमों की कम मौजूदगी या भारत के ट्रेड यूनियन आंदोलन का सहारा न होने का मतलब यह नहीं है कि यहां के श्रमिक अपने अधिकारों के लिए लड़ नहीं रहे हैं. जम्मू-कश्मीर में श्रमिक संघर्ष का एक लंबा इतिहास है.

1924 में पहली बार हड़ताल हुई थी, जब राज्य के रेशम मिल में पांच हजार श्रमिकों ने वेतन वृद्धि की मांग की. उस समय पिकेट लाइन पर श्रमिकों को बुरी तरह से पीटा गया और मुख्य नेता को पुलिस हिरासत में गिरफ्तार कर हड़ताल बेरहमी से तोड़ी गई. तब देसी रिसासत के दम पर अंग्रेज सत्ता में काबिज थे. वेतन और अन्य भत्तों का भुगतान नहीं होने पर 2001 में अधिकांश सार्वजनिक उपक्रमों को एकजुट किया गया और बड़े पैमाने पर हड़ताल की गई.

ढाल नहीं बन पा रहीं यूनियनें

असल शोषण-उत्पीडऩ निजी क्षेत्र में है. अलगाववादी संघर्ष के कारण निजी क्षेत्र के मालिक फायदा उठाते हैं. एक तरह की ब्लैकमेलिंग है. इस बुनियाद पर सरकारी रियायत मिलती है.

ऐसी हालत में यूनियनों की ढाल श्रमिकों के किसी काम नहीं आती. दिसंबर 2003 की घटना है. भीलवाड़ा समूह के स्वामित्व वाली जम्मू के बारी ब्राह्मण में 1200 कर्मचारियों वाली कपड़ा कंपनी मॉरल ओवरसीज ने 65 अस्थायी कामगारों को मंदी का हवाला देकर निकाल दिया.

कुछ रिपोर्ट ऐसा भी कहती है कि उन्हें यूनियन बनाने की कोशिश में बर्खास्त कर दिया गया. बर्खास्त कर्मचारियों ने कंपनी कार्यालय पर हमला किया, जिसके बाद प्लांट अस्थायी तौर पर बंद हो गया. प्रबंधन ने कहा कि कंपनी स्थानीय लोगों के लाभ के लिए काम कर रही थी, 65 श्रमिकों को बर्खास्त करना उनका अधिकार था.

प्रवासी मजदूरों की जान हथेली पर

मैन्युअल लेबर के तौर पर बड़ी तादाद में कश्मीरी दूसरे राज्यों या शहरों में काम करते हैं. हालांकि उन्हें हमेशा संदेह की नजर से देखा जाता है. अविभाजित भारत में वे लाहौर (पाकिस्तान) बंदरगाह पर भी काम को जाते रहे.

शिल्पकार शॉल, शिल्प, या केसर जैसे उत्पादों को बेचने के लिए मौसमी रूप से दूसरे राज्यों में पलायन करते हैं. इसका उल्टा भी होता है. दूसरे राज्यों से गरीब मजदूर कश्मीर में काम को आते हैं. इन स्वैच्छिक या मजबूर प्रवासी मजदूरों के पंजीकरण की कोई व्यवस्था नहीं है. ऐसे में उनके साथ कोई हादसा हो जाने पर पहचान भी मुश्किल ही होती है, कोई भी नाम दिया जा सकता है उस वक्त उनके लिए, आतंकवादी भी.


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काफी मजदूर तो आतंकवादियों ने मार दिए, जिनकी पहचान नहीं हुई. परिवार पालने के लिए वे रोजाना 300-350 रुपये रोज पर काम करने को ये खतरा मोल लेते हैं. अकेले कश्मीर घाटी में हर साल लगभग डेढ़ से दो लाख प्रवासी मजदूर काम करते हैं.

मेहनतकश आबादी की मुश्किलें

कश्मीर में हर तरह के मेहनतकश संकट से घिरे हैं. करीब 11 लाख हस्तशिल्प कारीगरों की आय 1980 के दशक से नहीं बढ़ी है. वे प्रतिदिन सिर्फ सौ-डेढ़ सौ रुपये की कमाई करते हैं. देश को 70 फीसद सेब (20 लाख मीट्रिक टन) मुहैया कराने वाले किसानों और मजदूरों का हाल भी ठीक नहीं है.

रेशम का उत्पादन करने वाले दुश्वारियों में जी रहे हैं. वर्ष 1980-81 में 38 हजार परिवार इस काम से जुड़े थे, जो 1999-2000 में 25 हजार के आसपास रह गए. झीलों के सहारे जी रहे हजारों परिवार बेहाल हैं. किसान तो अक्सर सुरक्षाबलों और आतंकवादियों के बीच लड़ाई में फंस जाते हैं और मारे जाते हैं.

फाइनेंशियल एक्सप्रेस की हालिया रिपोर्ट बताती है कि वित्त वर्ष 18 में जम्मू कश्मीर की प्रति व्यक्ति आय 65,615 रुपये रही, जो राष्ट्रीय औसत लगभग 98 हजार रुपये से नीचे है. 2018-19 के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, अकुशल श्रम के लिए न्यूनतम मजदूरी 225 रुपये प्रतिदिन है.

(आशीष सक्सेना स्वतंत्र पत्रकार हैं. यह उनका निजी विचार है.)

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