scorecardresearch
Friday, 14 June, 2024
होममत-विमत4 साल बाद, कश्मीर बदल रहा है. यह सब मोदी की पहली पसंद मनोज सिन्हा के हीलिंग टच के कारण है

4 साल बाद, कश्मीर बदल रहा है. यह सब मोदी की पहली पसंद मनोज सिन्हा के हीलिंग टच के कारण है

प्रधानमंत्री की दी हुई जिम्मेदारियों को सिन्हा ने सराहनीय तरीके से निभाया है. उनका सबसे बड़ा योगदान दिल्ली को श्रीनगर के करीब लाना और लोगों को यह एहसास दिलाना है कि अनुच्छेद 370 एक काल्पनिक विशेषाधिकार था.

Text Size:

13 सितंबर को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) मुख्यालय में अपने सहयोगियों द्वारा भव्य स्वागत के लिए पंखुड़ियों से सजे वाहन से उतरने वाले प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीरों ने सोशल मीडिया पर हंगामा मचा दिया. यूजर्स ने G20 की सफलता के जश्न की तस्वीरें और वीडियो साझा किया – साथ ही दक्षिणी कश्मीर के अनंतनाग जिले के कोकेरनाग में आतंकवादियों द्वारा मारे गए तीन सेना और पुलिस अधिकारियों के दुखी परिवार के सदस्यों और सहकर्मियों की तस्वीरें भी साझा कीं. चुनावी राज्य मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में विपक्षी दलों के खिलाफ मोदी के उग्र भाषणों ने उनके विरोधियों को और अधिक हथियार दे दिए.

प्रधानमंत्री ने अनंतनाग हत्याओं पर निंदा या शोक का एक शब्द भी नहीं कहने का फैसला किया. संयोग से, जिस दिन इन अधिकारियों की हत्या हुई, प्रधान मंत्री कार्यालय ने चुनावी राज्य राजस्थान में एक सड़क दुर्घटना में मारे गए 11 तीर्थयात्रियों के परिवारों के प्रति संवेदना व्यक्त करने और अनुग्रह राशि देने के लिए तीन अलग-अलग भाषाओं में तीन ट्वीट पोस्ट किए.

मोदी को कोसने वालों और भाजपा के राजनीतिक विरोधियों ने इसके लिए पीएम पर निशाना साधा और फिर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने पूछा, “क्या आपको दुख महसूस नहीं होता?”

कोकेरनाग घटना पर प्रधानमंत्री की चुप्पी असंवेदनशील और अजीब जरूर लगी, लेकिन उनके स्पिन डॉक्टरों को चुप नहीं रहना था. वे इसे यह कहकर घुमा सकते थे कि उन्हें हर समय सार्वजनिक रूप से प्रतिक्रिया देने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि राष्ट्रीय सुरक्षा मामले पर उनका काम बोलता है. जब वो बोलते हैं तो आवाज बुलंद होती है. नौ साल की सत्ता ने जाहिर तौर पर उनके संचार प्रबंधकों में उदासीनता नहीं आत्मसंतुष्टि तो जरूर ला दी है.

बदल रहा है कश्मीर

हालांकि, 13 सितंबर को कश्मीर में घट रहीं कुछ दूसरे महत्वपूर्ण दृश्यों पर किसी का ध्यान नहीं गया – नागरिकों ने कोकेरनाग शहीदों को श्रद्धांजलि देने के लिए कश्मीर घाटी में कैंडललाइट मार्च निकाला. ग्रेटर कश्मीर ने कुपवाड़ा मार्च के बारे में रिपोर्ट किया: “प्रदर्शनकारी बड़ी संख्या में मिली जुली भीड़ को आकर्षित करते हुए कस्बों और गांवों से होकर आगे बढ़े. माहौल गमगीन था और चारों तरफ गहरी शांति थी क्योंकि टिमटिमाती मोमबत्तियां थामे प्रतिभागी एक स्वर में शहीद नायकों को सम्मान देते हुए चल रहे थे. कई लोगों ने शोक, देशभक्ति और भारतीय सेना और जम्मू-कश्मीर पुलिस की सराहना के संदेशों वाली तख्तियां पकड़ रखी थीं.”

अच्छी पत्रकारिता मायने रखती है, संकटकाल में तो और भी अधिक

दिप्रिंट आपके लिए ले कर आता है कहानियां जो आपको पढ़नी चाहिए, वो भी वहां से जहां वे हो रही हैं

हम इसे तभी जारी रख सकते हैं अगर आप हमारी रिपोर्टिंग, लेखन और तस्वीरों के लिए हमारा सहयोग करें.

अभी सब्सक्राइब करें

आतंकवादियों द्वारा हमारे सैनिकों के मारे जाने के बाद आपने आखिरी बार ऐसी खबर कब पढ़ी थी? हां, कश्मीर बदल रहा है. कोकेरनाग जैसी घटनाएं सीमा पार के लोगों में बढ़ती हताशा का संकेत देती हैं. जब 5 अगस्त 2019 को जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा रद्द किया गया, तो बहुत लोगों को लगा की पता नहीं उसके कितने दुष्परिणाम निकलेंगे. वे ग़लत साबित हुए हैं – और गृह मंत्रालय के आंकड़े इसका खुलासा कर रहे हैं. 2 अक्टूबर 2016 से 4 अगस्त 2019 तक 959 आतंकी वारदातों को अंजाम दिया गया. 5 अगस्त 2019 और 6 जून 2022 के बीच यह आंकड़ा घटकर 654 हो गया – 32 प्रतिशत की कमी. अनुच्छेद 370 के अमान्य होने से तीन साल पहले और उसके बाद की अवधि में महत्वपूर्ण सुधार दिखाई दिए, द इंडियन एक्सप्रेस रिपोर्ट की कि नागरिकों की मौतें और सुरक्षा कर्मियों में क्रमशः 14 प्रतिशत और 52 प्रतिशत की कमी आई.


यह भी पढे़ं: सुरजेवाला ने कहा- सनातन धर्म हमेशा रहा है और रहेगा, MP में महिलाओं को हर महीने ₹1500 समेत की कई घोषणाएं


उपराज्यपाल मनोज सिन्हा का हीलिंग टच

ये आंकड़े बताते हैं कि भारतीय सुरक्षा बलों ने क्षेत्र में समस्या पैदा करने की सीमा पार से की जा रही कोशिशों को कितनी सफलतापूर्वक नाकाम किया है. उपराज्यपाल मनोज सिन्हा के नेतृत्व में नागरिक प्रशासन ने बाहरी खतरों के प्रबंधन के लिए अनुकूल माहौल बनाने में सराहनीय काम किया है. आइए दूसरे डेटा सेट पर नजर डालें.

2022 में 1.88 करोड़ पर्यटकों ने केंद्र शासित प्रदेश  जम्मू और कश्मीर का दौरा किया. सिन्हा ने पिछले महीने एक समारोह में कहा था कि इस साल यह आंकड़ा 2.25 करोड़ तक जाने की उम्मीद है.

1.5 लाख करोड़ रुपये की राजमार्ग और सुरंग परियोजनाएं चल रही हैं.

2021 तक जम्मू-कश्मीर में 13,000-14,000 करोड़ रुपये का निवेश आया. आज, 26,000 करोड़ रुपये का निवेश “जमीन पर” है और अगले दो वर्षों में 75,000-80,000 करोड़ रुपये का निवेश होने की उम्मीद है.

दुबई स्थित एम्मार समूह द्वारा श्रीनगर में 10 लाख वर्ग फुट क्षेत्रफल वाले एक मेगा मॉल का निर्माण किया जा रहा है. यह उत्तर भारत का सबसे बड़ा शॉपिंग कॉम्प्लेक्स बनने जा रहा है.

जम्मू-कश्मीर प्रशासन प्रत्येक परिवार को 5 लाख रुपये की स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत कवर करने वाला देश का पहला प्रशासन है. इस पहल के तहत वह इलाज पर रोजाना 2 करोड़ रुपये खर्च कर रही है.

ये नंबर किसी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश प्रशासन द्वारा किसी अन्य विज्ञापन की तरह लग सकते हैं. लेकिन कश्मीर में इसे हासिल करने के लिए बहुत कुछ करना पड़ता है. सिन्हा ने पिछले महीने दिप्रिंट के साथ एक साक्षात्कार में कहा था कि एक समय था जब आतंकवादी कश्मीर में बंद का आह्वान करते थे – स्कूल बंद, कॉलेज बंद, व्यापार बंद और न जाने क्या-क्या. उन्होंने कहा,”वो दिन चला गया. अब लोगों को अपनी शर्तों पर जीने की आदत हो गई है. आप युवाओं को देर रात तक संगीत समारोह आयोजित करते देखेंगे, जैसा कि आप पश्चिमी देशों में देखते हैं. ” सितंबर 2022 में, एलजी ने श्रीनगर में एक आईनॉक्स मल्टीप्लेक्स का उद्घाटन किया था – तीन दशकों में पहली बार. रविवार शाम 4 बजे, मैंने शाहरुख खान के जवान के शाम 5 बजे के शो के लिए ऑनलाइन टिकट बुक करने की कोशिश की और मैंने पाया कि रॉयल और रॉयल क्लब की सभी सीटें बिक चुकी थीं. क्लब श्रेणी की 76 सीटों में से केवल दो ही उपलब्ध थीं. हालांकि, एक्ज़ीक्यूटिव क्लास में, 38 में से 28 टिकटें उपलब्ध थीं – सबसे सस्ती 350 रुपये की. शाम 450 बजे, कुल 178 सीटों में से तीन को छोड़कर बाकी सभी टिकटें बिक गईं थी.

जब पीएम मोदी ने अगस्त 2020 में सिन्हा को एलजी के रूप में श्रीनगर भेजा, तो वह एक संदेश भेज रहे थे: वह एक ऐसा राजनेता चाहते थे जो वहां हीलिंग टच दे सके, न कि एक सेवानिवृत्त नौकरशाह या सेवानिवृत्त जनरल जो प्रशासन के पहियों को संभाल सके. कर्ण सिंह द्वारा राज्यपाल का पद छोड़ने के तिरेपन साल बाद, सिन्हा इस पर (अब एलजी के रूप में) कब्जा करने वाले केवल दूसरे राजनेता बन गए. उनके पूर्ववर्ती सत्यपाल मलिक का 14 महीने का कार्यकाल काफी हद तक रसम भर था.

सिन्हा ने प्रधानमंत्री की बातों को सराहनीय ढंग से निभाया है. उनका सबसे बड़ा योगदान दिल्ली को श्रीनगर के करीब लाना और लोगों को यह एहसास दिलाना था कि अनुच्छेद 370 एक काल्पनिक विशेषाधिकार था. कई लोग आश्चर्यचकित रह गए जब उन्होंने जुलाई 2023 में श्रीनगर में 10वें मुहर्रम जुलूस में उपराज्यपाल को भाग लेते देखा. एल-जी ने मुझसे कहा, “राज्य के प्रमुख के रूप में यह मेरी जिम्मेदारी है कि मैं सभी धर्मों के लोगों के मामलों में भाग लूं. अगर मैं अमरनाथ यात्रा के लिए जाता हूं, तो मुझे मुहर्रम जुलूस के लिए भी जाना होगा. ”हालांकि उनके ये सारे कदम काम कर गए हैं. घाटी में कोई भी इतने सारे मंदिरों के जीर्णोद्धार की प्रशासन की पहल के बारे में शिकायत नहीं कर रहा है क्योंकि सिन्हा मस्जिदों और गुरुद्वारों का भी पुनरुद्धार कर रहे हैं.

ऐसा कोई दिन नहीं है जब उपराज्यपाल जोखिमों के बावजूद सड़क मार्ग से दूर-दूर तक यात्रा नहीं कर रहे हों. मनोज सिन्हा ने मुझे कहा, “मेरे भाग्य में जो लिखा है वही होगा. मोदी जी ने मुझे जो काम सौंपा है, उसे पूरा करना होगा.” खेल प्रतियोगिताओं के लिए उनके प्रोत्साहन ने यूटी में लाखों उत्साही युवाओं को आकर्षित किया है. उद्यमिता के लिए वित्तीय प्रोत्साहन देने वाली योजनाओं का लाभ उठाने के लिए हजारों लोग सामने आते हैं. वह युवाओं से जुड़ने में सक्षम हैं, यह तब स्पष्ट हुआ जब हाल ही में एक मुस्लिम लड़की ने उनसे मिलकर शिकायत की कि कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में भारतीय दर्शन नहीं पढ़ाया जा रहा है.

अनुच्छेद 35ए के निष्प्रभावी होने से जम्मू-कश्मीर में ‘बाहरी लोगों’ द्वारा घाटी की जनसांख्यिकी को बदलने की आशंका पैदा हो गई थी. तब से चार साल बाद, वे आशंकाएं कम हो गई हैं. सिन्हा ने कहा,“यह एक दुष्प्रचार से ज्यादा कुछ नहीं था. जब खेती की जमीन की बात आती है, तो हिमाचल और उत्तराखंड के लोगों को विशेष अधिकार प्राप्त हैं. जम्मू-कश्मीर के लोगों का भी यही हाल है. ज़मीन केवल उद्योगों, स्कूलों, कॉलेजों और अस्पतालों के लिए दी जाती है, ”

आज कश्मीर में घूमें. 2019, 2020 और 2021 में कश्मीरियों के स्वर में जो कड़वाहट महसूस हुई थी, वह अब नरम हो रही है. बहुत कुछ बदल चुका है  अब समय आ गया है कि चुनाव करवाया जाए और कश्मीरियों को राजनीतिक प्रतिनिधियों से समान प्रतिबद्धता और जवाबदेही की मांग करने का मौका दिया जाए. अगले मुख्यमंत्री, अब्दुल्ला या मुफ्ती को यह साबित करने दें कि उन्हें परवाह है और वे बेहतर कर सकते हैं.

(अनुवाद: पूजा मेहरोत्रा)

(डीके सिंह दिप्रिंट में पॉलिटिकल एडिटर हैं और यहां व्यक्त विचार निजी हैं.)

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


यह भी पढ़ें: संसद के विशेष सत्र में आपको सुनाई जाएंगी 3 कहानियां, लेकिन तीनों झूठी होंगी


 

share & View comments