ईरान में जारी संघर्ष कितने समय तक चलेगा? अभी या आगे चलकर भारत किस तरह प्रभावित या कमज़ोर पड़ सकता है? भारत के पास क्या विकल्प हैं?
युद्ध कब और कैसे खत्म होगा, यह कुछ हद तक उन देशों के उद्देश्यों पर निर्भर करता है जिन्होंने युद्ध शुरू किया—अमेरिका और इज़ारायल. यह कुछ हद तक ईरान की प्रतिक्रिया और उसकी सैन्य व राजनीतिक क्षमता पर भी निर्भर करता है.जहां इज़रायल के युद्ध के उद्देश्य साफ और लगातार एक जैसे रहे हैं, वहीं अमेरिका की स्थिति कई अलग-अलग कारणों में उलझी हुई है.
ईरान की क्रांतिकारी धार्मिक सरकार अपने नागरिकों के प्रति बहुत दमनकारी रही है और बाहरी तौर पर भी आक्रामक रही है, खासकर इज़रायल के खिलाफ. पहला मुद्दा इज़रायल की मुख्य चिंता नहीं है; दूसरा है. आदर्श रूप से इज़रायल चाहता है कि ईरान की राजनीतिक व्यवस्था खत्म हो जाए, या कम से कम उसकी सैन्य ताकत और उसके सहयोगी समूहों की ताकत बहुत कमज़ोर हो जाए—खासकर लेबनान में हिजबुल्लाह और गाज़ा में हमास.7 अक्टूबर 2023 के बाद इन दोनों सहयोगी समूहों को भारी नुकसान हुआ था और कुछ लोगों को लगा था कि वे फिर से खड़े नहीं हो पाएंगे, लेकिन अब साफ है कि लेबनान में हिज़्बुल्लाह कमजोर होने के बावजूद फिर सक्रिय हो गया है.
इज़रायल का रवैया ईरान के प्रति—जो कि एक अरब देश नहीं है, वैसा नहीं है जैसा वह फिलिस्तीनियों के प्रति रखता है. सिर्फ इज़रायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और दक्षिणपंथी नेताओं के लिए ही नहीं, बल्कि इज़रायली समाज के एक बड़े हिस्से के लिए भी 7 अक्टूबर 2023 के बाद गाजा के फिलिस्तीनी “मानव से कम” माने जाने लगे थे और इसलिए उनके हिंसक विनाश को सही समझा गया.इतिहास और सिद्धांत बताते हैं कि ऐसी सोच बड़े पैमाने पर हत्याओं और नरसंहार की स्थिति पैदा कर सकती है. ईरान के मामले में इज़रायल की चर्चा में अक्सर सरकार और समाज के बीच फर्क किया जाता है. जहां ईरान की सरकार को “बुरी” बताया जाता है और उसे खत्म करने की बात की जाती है, वहीं ईरानी समाज—जो 1979 की ईरानी क्रांति से पहले इज़रायल का दोस्त माना जाता था, को एक पुरानी सभ्यता का हिस्सा समझा जाता है.इसलिए गाज़ा में जो रणनीति अपनाई गई, वैसी रणनीति ईरान के लिए नहीं सोची जा सकती. ईरान में इज़रायल का मुख्य लक्ष्य समाज को नष्ट करना नहीं बल्कि सरकार को बदलना होगा.
अमेरिका ने ईरान पर हमले के कई कारण बताए हैं: राजनितिक व्यवस्था बदलना; ईरान की सैन्य क्षमता को खत्म करना, खासकर उसकी मिसाइल बनाने और लॉन्च करने की क्षमता को; हथियार स्तर के यूरेनियम संवर्धन और परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना; अरब दुनिया में ईरान के सहयोगी समूहों को खत्म करना; दमन झेल रहे नागरिकों को आज़ाद कराना; और अमेरिका या उसके क्षेत्रीय हितों पर हमले से पहले ईरान को कड़ी चोट पहुंचाना. इतने सारे कारणों के कारण कई लोग कहते हैं कि यह असल में इज़रायल का युद्ध है और अमेरिका इसमें साझेदार और सह-शुरुआत करने वाला है.
फिर भी, इतने अलग-अलग कारण होने की समस्या सैद्धांतिक रूप से हल की जा सकती है. यह कहा जा सकता है कि सरकार बदलना अमेरिका का मुख्य उद्देश्य है और बाकी लक्ष्य उससे जुड़े हुए हैं. अगर बड़ा लक्ष्य हासिल हो जाता है तो बाकी उद्देश्य अपने आप पूरे हो जाएंगे. दूसरे शब्दों में, अगर सरकार बदल जाती है तो परमाणु हथियारों की योजना शायद छोड़ दी जाएगी, मिसाइल निर्माण कम हो जाएगा, सहयोगी समूह कमजोर पड़ जाएंगे और नागरिकों पर दमन भी कम होगा, लेकिन समस्या यह है कि सरकार बदलना शायद संभव न हो, या इसमें बहुत लंबा समय लग सकता है. नेताओं को मार देना राजनितिक व्यवस्था बदलने के बराबर नहीं होता, खासकर ऐसे देश में जहां व्यवस्था बहुत मजबूत संस्थाओं पर टिकी हो.
1979 की क्रांति के बाद ईरान ने संविधान के जरिए एक धार्मिक शासन व्यवस्था बनाई, जिसमें धर्मगुरुओं के पास चुनी हुई सरकार से भी ज्यादा शक्ति है. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि क्रांति की रक्षा के लिए एक बड़ा संगठन बनाया गया—इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर्प्स. अगर मौजूदा नेतृत्व को बाहरी ताकत हटा भी दे, तो स्थापित प्रक्रियाओं के जरिए नया नेतृत्व उभर सकता है. कम से कम निकट भविष्य में बाहरी दबाव से पूरी व्यवस्था का गिरना संभव नहीं लगता.
युद्ध की कीमत
इसके अलावा, ईरान राजनीतिक व्यवस्था बदलने की कोशिश की कीमत आसानी से और काफी बढ़ा सकता है. यह प्रक्रिया अब शुरू भी हो चुकी है.
पहला, मिसाइलों को रोकने वाली एयर डिफेंस सिस्टम बहुत महंगी होती हैं. जितनी ज्यादा मिसाइलें दागी जाएंगी, मिसाइल डिफेंस की लागत उतनी ही बढ़ेगी और यह हमेशा तक नहीं चल सकता. अगर युद्ध लंबा चलता है, तो ये खर्च छोटे नहीं होंगे. कुछ मिसाइलें एयर डिफेंस को पार कर अपने लक्ष्य तक भी पहुंच जाएंगी, जैसे तेल डिपो, पानी को साफ करने वाले प्लांट, बिजली स्टेशन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस डेटा सेंटर और यहां तक कि होटल और मॉल.ईरान पहले से ही खाड़ी देशों में ऐसा कर रहा है, जिससे उनकी अर्थव्यवस्थाओं को नुकसान हो रहा है. यह नुकसान और भी बड़ा हो सकता है.
दूसरा, ड्रोन ने आधुनिक युद्ध की प्रकृति बदल दी है. मिसाइलों की तुलना में इन्हें बनाना और लॉन्च करना काफी सस्ता होता है और जैसा यूक्रेन ने दिखाया है, ड्रोन युद्ध को लंबे समय तक जारी रख सकते हैं, भले ही दोनों देशों की सैन्य ताकत में बड़ा फर्क क्यों न हो. अगर मिसाइल लॉन्चर और उत्पादन केंद्रों पर हमला किया जाता है—जैसा कि इज़रायल और अमेरिका की सैन्य कार्रवाई में दिख रहा है—तो अमेरिका के सहयोगी देशों जैसे यूएई और कतर पर ड्रोन हमले रक्षा के तौर पर इस्तेमाल किए जा सकते हैं. अभी तक कोई भी यह नहीं जानता कि ड्रोन बनाने की क्षमता को पूरी तरह कैसे खत्म किया जाए.
तीसरा, और शायद सबसे महत्वपूर्ण, होर्मुज जलडमरूमध्य को ईरान प्रभावी रूप से बंद कर सकता है. ऐसा पहले भी हो चुका है. ईरान सीधे तौर पर दुनिया के कुल तेल का सिर्फ लगभग 5 प्रतिशत ही पैदा करता है, लेकिन दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल और करीब 20 प्रतिशत गैस की सप्लाई इसी स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ से होकर गुजरती है. तेल की कीमत पहले ही 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जा चुकी है. ऊर्जा विशेषज्ञ डैनियल येरगिन के अनुसार, “दुनिया तेल उत्पादन में इतिहास के सबसे बड़े व्यवधान और वैश्विक गैस बाज़ारों में बड़े झटके का सामना कर रही है. अब वैश्विक ऊर्जा बाजारों के लिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि यह विस्फोटक युद्ध कितने समय तक चलेगा.”
यह साफ है कि ईरान के हित में है कि वह ड्रोन के इस्तेमाल और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ जैसे “समुद्री चोकपॉइंट” पर अपने नियंत्रण के जरिए युद्ध की कीमत बढ़ाए—और उसके पास ऐसा करने की क्षमता भी है. वेनेजुएला जैसी कोई सस्ती जीत यहां संभव नहीं है. अमेरिकी राजनीतिक वैज्ञानिक रॉबर्ट पेप अपनी किताब Bombing to Win: Air Power and Coercion in War में बताते हैं कि सिर्फ हवाई हमलों से कभी भी सरकार नहीं बदली गई है. इसके लिए अमेरिका को जमीन पर सेना उतारनी पड़ सकती है, लेकिन इस विकल्प का विरोध राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रं के MAGA समर्थक करेंगे. इस तरह ईरान का यह संघर्ष एक जटिल उलझन और दलदल बनने की पूरी संभावना रखता है, जिससे शीघ्रता से बाहर निकलना आसान नहीं होगा.
भारत कहां खड़ा है?
भारत के पास क्या विकल्प हैं?
अगर तेल की कीमतों में बहुत बड़ा उछाल आता है और रूस से तेल आयात, जो फिलहाल अस्थायी रूप से अनुमति है—अमेरिका के साथ व्यापार वार्ताओं के कारण अनिश्चित बना रहता है, तो भारत की अर्थव्यवस्था को निश्चित रूप से नुकसान होगा. खाड़ी क्षेत्र में काम करने वाले भारतीयों से आने वाली रेमिटेंस में गिरावट से भी भारत को दोहरा झटका लगेगा. इसलिए युद्ध का जल्दी खत्म होना भारत के हित में है.
लेकिन क्या भारत ऐसा कर सकता है?
नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत का अमेरिका पर कोई प्रभाव नहीं है और भले ही भारत इज़रायल के काफी करीब आ गया है, फिर भी यह पूरी तरह साफ नहीं है कि भारत इज़रायल को प्रभावित कर सकता है या नहीं. रक्षा तकनीक और हथियारों के लिए भारत की इज़रायल पर निर्भरता बहुत बढ़ गई है. प्रधानमंत्री मोदी संभवतः ईरान के बजाय इज़रायल को प्राथमिकता देंगे, जो भारतीय विदेश नीति की पारंपरिक सोच से अलग होगा. वह अभी तक इस युद्ध पर टिप्पणी करने में भी असमर्थ रहे हैं, आलोचना करना तो दूर की बात है.
अंत में, फिलहाल विश्व राजनीति में भारत एक फैसले लेने वाला नहीं बल्कि फैसले स्वीकार करने वाला देश है. एक बार फिर उसे यह सच स्वीकार करना होगा कि वह अभी एक मिडिल पावर है, न कि “विश्वगुरु”. आने वाले 10–15 वर्षों में भारत एक बड़ी सैन्य और आर्थिक ताकत बन सकता है, लेकिन अभी वह उस स्तर तक नहीं पहुंचा है.
आशुतोष वार्ष्णेय इंटरनेशनल स्टडीज़ और सोशल साइंसेज़ के सोल गोल्डमैन प्रोफेसर और ब्राउन यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल साइंस के प्रोफेसर हैं. व्यक्त विचार निजी हैं.
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