कुछ महीने पहले राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) खबरों में था क्योंकि उसने कक्षा 10 की विज्ञान की किताब से डार्विन के विकास के सिद्धांत को हटाने का फैसला लिया था. जैसा उम्मीद थी, इस पर बहस शुरू हो गई. इस फैसले का समर्थन करने वाले वैज्ञानिकों ने यह नहीं बताया कि अब कई जाने-माने वैज्ञानिकों का एक बड़ा समूह डार्विन के सिद्धांत में कुछ गंभीर समस्याएं देखता है और इस पर मजबूत तर्क भी दे रहा है.
लेकिन कोई गलतफहमी न हो, इसलिए मैं साफ कहना चाहता हूं कि इस लेख का उद्देश्य डार्विन के सिद्धांत से जुड़े कुछ असली सवालों पर ध्यान दिलाना है. मैं बुद्धिमान रचना का समर्थन नहीं कर रहा हूं. मेरा मकसद सिर्फ इतना है कि डार्विनवाद से जुड़े कुछ सवाल और चिंताएं सबके सामने आएं, क्योंकि इनमें कुछ दम नजर आता है.
पिछली सदी के दूसरे हिस्से में नव-डार्विनवाद को मेंडेलियन आनुवंशिकी और आणविक जीवविज्ञान की प्रगति से काफी फायदा मिला. इससे बना ढांचा लंबे समय तक वैज्ञानिकों के बड़े हिस्से को मजबूत और बिना चुनौती वाला लगा और पश्चिमी दुनिया इस सोच का मुख्य केंद्र रही, लेकिन पश्चिम के कई हिस्सों में अब कई सम्मानित वैज्ञानिक और बुद्धिजीवी नव-डार्विनवाद की कमियों पर मजबूत और सोच-समझकर तर्क दे रहे हैं.
‘एक धार्मिक संप्रदाय’
दुर्भाग्य से हमारे देश में नव-डार्विनवाद को बिना ज्यादा सवाल किए लगभग अंधविश्वास की तरह मान लिया गया है. मैं दूसरी तरफ के कुछ तार्किक तर्क सामने रखकर थोड़ा संतुलन लाना चाहता हूं. कुछ लोग नव-डार्विनवाद को बहुत पवित्र मानते हैं और डार्विन की किसी भी आलोचना को सृष्टिवाद लाने की कोशिश मानते हैं. मैं फिर साफ करना चाहता हूं कि मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं है. पिछले कुछ दशकों में कई गंभीर और भरोसेमंद विकासवादी वैज्ञानिक, गणितज्ञ, आणविक जीवविज्ञानी और अन्य विशेषज्ञ नव-डार्विनवाद से असहमति जता चुके हैं. वे नई सोच देने से ज्यादा यह कहते हैं कि नव-डार्विनवाद की मान्यताएं प्रयोग और तर्क दोनों में पूरी तरह सही साबित नहीं होतीं.
मैं कुछ प्रसिद्ध वैज्ञानिकों और विचारकों के तर्क बताना चाहता हूं. सबसे पहले नाम आता है प्रसिद्ध वैज्ञानिक लिन मार्गुलिस का. विकासवादी जीवविज्ञान में उनका योगदान बहुत बड़ा माना जाता है. वह अमेरिकी राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी की फेलो थीं और उन्हें राष्ट्रीय विज्ञान पदक भी मिला था, जो अमेरिका के राष्ट्रपति द्वारा दिया जाने वाला बड़ा सम्मान है.
मार्गुलिस ने उत्परिवर्तन, प्राकृतिक चयन और डार्विन के धीरे-धीरे होने वाले विकास की मुख्य भूमिका वाले विचार का विरोध किया. उन्होंने मजबूत सबूत देकर कहा कि विकास में बड़े बदलाव का मुख्य कारण उत्परिवर्तन नहीं, बल्कि सहजीवन (दो जीवों का साथ रहना) और जीनोम का मिलना है. उन्होंने बताया कि ऐसा तब होता है जब एक जीव दूसरे को अपने अंदर ले लेता है और एक नई तरह की कोशिका बनती है. यह सोच डार्विन के धीरे-धीरे बदलाव वाले विचार से अलग है. मार्गुलिस की आलोचना भी हुई, लेकिन उनके काम और उनके निष्कर्षों को काफी हद तक स्वीकार किया गया.
मार्गुलिस अपने विचारों पर खुलकर बोलती थीं. उन्होंने यहां तक कहा कि नव-डार्विनवाद “20वीं सदी का एक छोटा धार्मिक संप्रदाय” जैसा है. उन्होंने यह भी कहा कि नव-डार्विनवाद के समर्थक अब तक ऐसा साफ उदाहरण नहीं दे पाए कि सिर्फ उत्परिवर्तनों के जमा होने से कोई नई प्रजाति बनी हो. कुल मिलाकर मार्गुलिस सृष्टिवाद का समर्थन नहीं करती थीं. वह विकास पर विश्वास करती थीं, लेकिन ऐसे विकास पर जिसमें क्षैतिज जीन स्थानांतरण और सहजीवी विलय की अहम भूमिका हो.
नव-डार्विनवाद की कमियों पर चर्चा में डेनिस नोबल का नाम भी जरूरी है. वह ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में हृदय संबंधी शरीर क्रिया विज्ञान के एमेरिटस प्रोफेसर हैं और रॉयल सोसाइटी के फेलो हैं. उनका मुख्य तर्क यह है कि नव-डार्विनवाद का यह मानना कि सभी जैविक कारण सिर्फ जीन से आते हैं, सही नहीं है. जीन-केंद्रित विकास का विचार रिचर्ड डॉकिंस और उनकी प्रसिद्ध किताब द सेल्फिश जीन से काफी लोकप्रिय हुआ. नोबल कहते हैं कि यह सोच अनुभव आधारित पद्धति के गलत इस्तेमाल पर आधारित है.
अपनी 2016 की किताब डांस टू द ट्यून ऑफ लाइफ और कई शोध पत्रों में नोबल ने नव-डार्विनवाद के उस विचार को चुनौती दी है जिसमें जीन को विकास का केंद्र माना जाता है और जीव को सिर्फ जीन का वाहन बताया जाता है. नोबल के अनुसार शोध से पता चलता है कि जीन को कोशिका, ऊतक, जीव और पर्यावरण नियंत्रित करते हैं — यानी जीन कैसे पढ़े जाएंगे, कैसे काम करेंगे या बंद होंगे, यह सिर्फ जीन तय नहीं करता. जीनोम किसी जीव का पूरा नक्शा नहीं होता, बल्कि यह एक डाटाबेस की तरह है जिसे जीव पढ़ता, बदलता और समझता है.
तर्क और आपत्तियां
डार्विनवाद के समर्थकों और उसके आलोचकों के बीच आमने-सामने की बहस का एक परेशान करने वाला पहलू यह है कि कई बार बहस गाली-गलौज तक पहुंच जाती है. लेकिन मैं नव-डार्विनवाद से असहमति रखने वाले दो बहुत सम्मानित विद्वानों का नाम लेना चाहता हूं, जो बहुत शालीन तरीके से अपनी असहमति रखते हैं. ये हैं येल विश्वविद्यालय के कंप्यूटर साइंस प्रोफेसर डेविड गेलर्न्टर और गणितज्ञ व दार्शनिक डेविड बर्लिंस्की. दोनों के विचार काफी हद तक एक जैसे हैं. ये दोनों बहुत छोटे स्तर पर होने वाली विकास प्रक्रिया के पीछे के गणित को देख रहे हैं.
इस चर्चा से पहले विकास प्रक्रिया में अमीनो अम्ल और प्रोटीन की भूमिका के बारे में थोड़ी सामान्य जानकारी जरूरी है. प्रोटीन विकास के लिए बहुत महत्वपूर्ण होते हैं. ये मुख्य अणु हैं जो कोशिका के काम को चलाते हैं, यानी प्रोटीन में बदलाव सीधे किसी जीव के गुणों को प्रभावित करते हैं. विकास में बदलाव अक्सर आनुवंशिक उत्परिवर्तन से होता है. जब ये उत्परिवर्तन प्रोटीन के अमीनो अम्ल के क्रम को बदल देते हैं, तो इससे नए काम करने की क्षमता बन सकती है या पुराने काम बदल सकते हैं. यही विविधता प्राकृतिक चयन के लिए आधार बनती है, जिससे जीव बदलते वातावरण के अनुसार ढलते हैं और विकसित होते हैं. गेलर्न्टर के अनुसार प्रोटीन कोई “निर्माण का हिस्सा” नहीं है, बल्कि वे इसे सॉफ्टवेयर की तरह देखते हैं.
2019 में Claremont Review of Books में प्रकाशित अपने चर्चित लेख Giving Up Darwin में उन्होंने कहा कि अमीनो अम्लों के क्रम से किसी काम करने वाले प्रोटीन का सिर्फ संयोग से बन जाना लगभग असंभव जैसा है. यानी ऐसे प्रोटीन के बनने की संभावना लगभग शून्य के बराबर है.
बर्लिंस्की ने अपनी किताबों The Deniable Darwin (2009) और Science After Babel (2023) में लगभग वही आपत्तियां उठाई हैं जो गेलर्न्टर ने उठाई हैं. इन दोनों की एक और बड़ी आपत्ति Cambrian explosion से जुड़ी है, जो लगभग 54 करोड़ साल पहले हुआ था. उस समय बहुत कम समय में लगभग सभी जानवरों के जीवाश्म अचानक दिखाई देने लगे. बर्लिंस्की के अनुसार Cambrian explosion सिर्फ जीवाश्म का रहस्य नहीं है, बल्कि यह इतना बड़ा डेटा है जिसे डार्विनवाद आसानी से समझा नहीं पाता. बर्लिंस्की को आम तौर पर अज्ञेयवादी माना जाता है. उनका और गेलर्न्टर का मुख्य तर्क यह है कि नव-डार्विनवाद 19वीं सदी का विचार है, जो आज की आणविक जीवविज्ञान से मेल नहीं खाता. उनका कहना है कि वे ऐसे सवाल उठा रहे हैं जिनके साफ जवाब अभी नहीं हैं.
मैंने असहमति रखने वाले वैज्ञानिकों के बहुत छोटे हिस्से के विचार उदाहरण के रूप में बताए हैं, जबकि ऐसे लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही है. वैसे भी विज्ञान के क्षेत्र में पहले भी कई बड़े वैज्ञानिक डार्विनवाद से असहमत रहे हैं. उदाहरण के लिए, नोबेल पुरस्कार विजेता अर्न्स्ट चेन, जिन्होंने पेनिसिलिन को एक सुरक्षित और असरदार दवा बनाया, नव-डार्विनवाद के मजबूत विरोधी थे. उनके तर्क भी आणविक जीवविज्ञान की प्रगति पर आधारित थे. असहमति रखने वाले वैज्ञानिकों की सूची लगातार बढ़ रही है, हालांकि कई बार उन्हें नजरअंदाज किया जाता है या किनारे कर दिया जाता है.
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह असहमति अब Dissent From Darwin नाम की सूची के रूप में सामने आ रही है. यह सूची Discovery Institute संभालता है, जो सृष्टिवाद का समर्थन करता है, लेकिन इस सूची में कई प्रसिद्ध वैज्ञानिक भी शामिल हैं जो बुद्धिमान रचना में विश्वास नहीं करते. इन वैज्ञानिकों की मांग सिर्फ इतनी है कि जिस तरह विज्ञान के दूसरे क्षेत्रों में कड़ी जांच और प्रमाण मांगे जाते हैं, उसी तरह यहां भी सवाल पूछे जाएं. इस सूची में MIT, Smithsonian, अमेरिका की National Academy of Sciences और Russian Academy of Sciences जैसे संस्थानों के शोधकर्ता शामिल हैं, साथ ही दुनिया के कई अन्य हिस्सों के वैज्ञानिक भी इसमें जुड़े हैं. एक और महत्वपूर्ण बदलाव The Third Way of Evolution नाम के समूह में दिखाई दे रहा है.
यह समूह डेनिस नोबल, ईवा याब्लोंका और जेम्स शापिरो जैसे सम्मानित विकासवादी जीवविज्ञानियों का है. ये यह नहीं कह रहे कि सभी जीवों का कोई साझा पूर्वज नहीं था, बल्कि ये सवाल उठा रहे हैं कि क्या पुराना Modern Synthesis सच में यह समझा सकता है कि विकास कैसे हुआ. यहां तक कि प्रतिष्ठित वैज्ञानिक संस्था The Royal Society ने 2016 में एक बड़ी बैठक की, जिसमें यह सवाल उठाया गया कि क्या अब नई सोच की जरूरत है. इससे साफ है कि यह बहस अभी खत्म नहीं हुई है. मेरी चिंता यह है कि हमारे देश में इन मुद्दों पर संतुलित और सही वैज्ञानिक बहस लगभग नहीं के बराबर है.
(दिनेश सिंह, दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति और अमेरिका के टेक्सास स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ ह्यूस्टन में गणित के एडजंक्ट प्रोफेसर हैं. उनका एक्स हैंडल @DineshSinghEDU है. ये उनके निजी विचार हैं.)
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