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Monday, 16 February, 2026
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तथाकथित ‘समाजवादी ढांचा’ और लोकतंत्र लंबे समय तक साथ नहीं चल सकते: मीनू मसानी

1989 में मीनू मसानी ने लिखा था कि ज़मीनी स्तर पर सतर्क लोकतंत्र के सबसे बड़े दुश्मन व्यक्तित्व पूजा, पार्टी के ‘हाई कमांड’ के प्रति अंधी वफादारी, चापलूसी और ऐसी नियंत्रित अर्थव्यवस्था हैं, जहां आर्थिक रूप से टिके रहने के लिए परमिट-लाइसेंस ज़रूरी शर्त बन जाता है.

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बहुमत का शासन

कुछ लोग कहेंगे कि लोकतंत्र का अर्थ बहुमत का शासन है. वे कितने गलत हैं! स्टालिन और हिटलर सत्ता में आने के बाद बार-बार भारी बहुमत से चुनाव जीतते रहे, जो संभवतः छलपूर्वक कराए गए थे, और उसके बाद उन्होंने निर्दयतापूर्वक दमनकारी और तानाशाही शासन चलाया. काले अफ्रीकी देशों के तानाशाह, जो अक्सर क्रूर निरंकुश शासक होते हैं, वे भी यह दावा करते हैं कि वे बहुमत से चुने गए हैं. इसके बारे में मानवविज्ञानी एल्सपथ हक्सले ने कहा है: “एक व्यक्ति, एक वोट — केवल एक बार.”

श्री आर. वेंकटरमण, हमारे गणराज्य के राष्ट्रपति, ने 25 जुलाई 1987 को राष्ट्रपति के रूप में अपने उद्घाटन भाषण में यह उल्लेख किया था कि ‘अधिकांश नव-स्वतंत्र देश, जिन्होंने लोकतांत्रिक शासन-प्रणाली को अपनाया था, वे तानाशाही में बदल गए हैं.’ श्री वेंकटरमण के इस कथन में एशिया और लैटिन अमेरिका के वे देश भी शामिल हैं, जो अफ्रीका के साथ इस श्रेणी में आते हैं.

बहुमत के शासन की अवधारणा उन देशों में विशेष रूप से घातक है, जो नस्ल, भाषा या धर्म के आधार पर समरूप नहीं हैं. ऐसे देशों के उदाहरण हैं—दक्षिण अफ्रीका संघ, फिजी, श्रीलंका और निस्संदेह हमारा अपना देश. इन देशों में नस्ल, भाषा या धर्म के आधार पर एक स्थायी बहुमत पहले से ही मौजूद रहता है. ऐसी स्थिति में बहुमत का शासन अल्पसंख्यक समुदाय या समुदायों पर बहुसंख्यक समुदाय के अत्याचार के समान होगा. दक्षिण अफ्रीका में “एक व्यक्ति, एक वोट” के आधार पर बहुमत के शासन का परिणाम यह होगा कि अश्वेतों का श्वेतों तथा रंगभेद वाले लोगों (जिनमें भारतीय भी शामिल हैं), जो सभी अल्पसंख्यक हैं, पर प्रभुत्व स्थापित हो जाएगा. फिजी में इसका अर्थ वहां के मूल निवासियों पर भारतीय प्रवासियों का प्रभुत्व होगा. श्रीलंका में इसका अर्थ तमिलों पर सिंहलियों का प्रभुत्व होगा और भारत में इसका अर्थ मुसलमानों, सिखों, ईसाइयों और अन्य अल्पसंख्यकों पर हिंदुओं का प्रभुत्व होगा. इसलिए यह बिल्कुल स्पष्ट है कि बहुमत का शासन ही लोकतंत्र नहीं है और यह अक्सर अलोकतांत्रिक भी हो सकता है.

इस मिथक को दूर करने के बाद, अब हम उन विभिन्न तत्वों की ओर ध्यान दें जो एक सच्चे लोकतंत्र का निर्माण करते हैं.

सीमित सरकार

यह बिल्कुल स्पष्ट है कि जो सरकार केवल आवश्यक उद्देश्यों तक सीमित न रहकर देश के आर्थिक, शैक्षिक, साहित्यिक और कलात्मक जीवन पर प्रभुत्व स्थापित कर लेती है, वह लोकतांत्रिक नहीं हो सकती. जहाँ ऐसा होता है, वहां प्रभावी विपक्ष का अस्तित्व समाप्त हो जाता है और श्री डर्बिन की कसौटी पूरी नहीं की जा सकती.

हमारे समय में सोवियत संघ, साम्यवादी चीन और अन्य देशों के उदाहरणों ने इसे सिद्ध कर दिया है.

इटली के विचारक बेनेडेट्टो क्रोचे ने उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम चरण में ही इसकी पूर्वकल्पना कर ली थी. उन्होंने लिखा था कि जहां सरकार या राज्य ही एकमात्र रोजगार प्रदाता और एकमात्र भूमि स्वामी बनने की ओर अग्रसर होता है, वहां समाज लोकतांत्रिक नहीं रह सकता, क्योंकि विरोध करने वाला कोई नहीं बचेगा—सिवाय किसी बड़ी आपदा के. इसलिए उन्होंने तर्क दिया कि एक स्वतंत्र समाज में “स्वायत्त सामाजिक शक्तियां” होनी चाहिए—जैसे अपनी भूमि का स्वामी किसान, अपनी फैक्ट्री या व्यवसाय का स्वामी उद्योगपति, अपनी दुकान का मालिक दुकानदार और अपने लिए कार्य करने वाला पेशेवर व्यक्ति, जैसे वकील, डॉक्टर या सलाहकार. बाद की घटनाओं ने सिद्ध कर दिया कि क्रोचे कितने सही थे.

मेरे विचार में, अत्यधिक नियंत्रण, मिश्रित अर्थव्यवस्था वाले संतुलन की बर्बादी, विशाल औद्योगिक इकाइयों के माध्यम से अर्थव्यवस्था के “प्रभुत्वशाली क्षेत्रों” (जैसा कि जवाहरलाल नेहरू ने भव्य शब्दों में वर्णन किया था) पर नियंत्रण, विश्वविद्यालयों पर राज्य का नियंत्रण, आर्थिक स्वतंत्रता का अभाव, साहित्य अकादमियों तथा अन्य सरकारी संस्थानों की स्थापना, जिन्होंने लेखकों, कलाकारों और बुद्धिजीवियों की स्वतंत्रता को कमजोर किया है—इन सब कारणों से भारत सीमित सरकार और सर्वसत्तावादी सरकार के बीच की सीमा-रेखा पर खड़ा है. 5 जनवरी 1969 को टाइम्स ऑफ इंडिया में लिखते हुए श्री निराद चौधरी ने पूछा: “इन आदर्शों के हिसाब से समकालीन भारतीय लेखक कहां खड़े हैं? मैं यह नहीं कह सकता कि वे वर्तमान घटनाओं में संलग्न नहीं हैं. इसके विपरीत, मैं कहूंगा कि वे उनमें अत्यधिक रूप से संलग्न हैं—जिसका अर्थ है कि वे गलत तरीके से संलग्न हैं. उनमें से अधिकांश स्वतंत्रता के बाद से सार्वजनिक धन की लूट वाले काम में जो कि उच्च मध्यवर्ग का व्यवसाय बन चुका है, में हिस्सा पाने का पूरा प्रयास कर रहे हैं. वे सभी उस पिंडारी समूह में शामिल हो रहे हैं या होने का प्रयास कर रहे हैं, जो वर्तमान भारतीय शासक व्यवस्था का स्वरूप बन गया है. इस सेना के लेखक अमीर खान या चित्तू तो नहीं होंगे, पर वे समृद्ध ठग बनने की आकांक्षा अवश्य रखते हैं.”

प्रेस की स्वतंत्रता को नष्ट करने के बार-बार प्रयास किए गए हैं. इन सबने भारत को ऐसी स्थिति में ला खड़ा किया है जहां यह कहा जा सकता है कि तथाकथित ‘समाजवादी ढांचा’ और लोकतंत्र लंबे समय तक साथ-साथ नहीं चल सकते. ऐसा 1975 के बाद दो वर्षों की एक संक्षिप्त अवधि में हो चुका है और यह फिर से लंबे समय के लिए भी हो सकता है. इसलिए उदारवादी यह आग्रह करता है कि जब तक सरकार सीमित न रहे और अपनी उचित सीमाओं में न रखी जाए, उसे लोकतांत्रिक नहीं कहा जा सकता. महात्मा गांधी ने कहा था: “वही सरकार सर्वोत्तम है, जो सबसे कम शासन करती है.”

सत्ता का साझाकरण

लोकतंत्र को “जनता का, जनता के लिए और जनता द्वारा शासन” के रूप में परिभाषित किया गया है, जिनमें से अंतिम तत्व सबसे अधिक महत्वपूर्ण है. सत्ता का बंटवारा या साझाकरण क्षैतिज और ऊर्ध्वाधर दोनों प्रकार से होना चाहिए. यह क्षैतिज अर्थ में इस प्रकार होना चाहिए कि अल्पसंख्यक समुदायों को भी बहुसंख्यकों के साथ-साथ सरकार में भाग लेने का अधिकार हो. केवल इतना पर्याप्त नहीं है कि अल्पसंख्यक समुदाय के सदस्यों को कृपापूर्वक मंत्रिमंडल में शामिल कर लिया जाए, जैसे भारत में मुसलमानों, सिखों और अन्य समुदायों को, तथा श्रीलंका में तमिलों और मुसलमानों को बहुसंख्यकों की ‘मेहरबानी’ पर शामिल किया जाता है; या फिर उन श्वेत ‘अंकल टॉम’ लोगों को, जिन्हें साम्यवादी प्रभाव वाली अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस संभवतः अपनी नई सरकार में शामिल करे, यदि कभी उन्हें सत्ता में आने दिया जाए. आवश्यक यह है कि श्रीलंका के तमिल और मुसलमान अपने द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों के माध्यम से प्रतिनिधित्व प्राप्त करें. इसी प्रकार भारत में मुसलमानों और सिखों को भी अपने मंत्रिमंडल के सदस्यों को स्वयं चुनने का अधिकार होना चाहिए, और किसी अश्वेत-बहुल देश में श्वेत समुदाय को भी अपने चुने हुए मंत्रियों का अधिकार मिलना चाहिए. यह व्यवस्था केवल स्विस संविधान द्वारा सुनिश्चित की गई है, जिसका उल्लेख मैं आगे करूंगा.

ऊर्ध्वाधर सहभागिता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है. लोकतंत्र की आधारभूत संरचना जमीनी स्तर की सतर्कता और पहल पर आधारित होती है, जो राजनीतिक दलों और सरकारों को सही मार्ग पर बनाए रखती है. जहां ऐसी ज़मीनी सतर्कता और पहल कमजोर होती है, जैसा कि आज भारत में है, वहां राजनीतिक दल बिना किसी ठोस आधार के ऊपर-ऊपर तैरते रहते हैं—न आंतरिक लोकतंत्र होता है और न ही सुदृढ़ संरचना. वहां तथाकथित “कंगारू अदालतें” होती हैं, जो सदस्यों को कारण बताने का अवसर दिए बिना ही ‘निष्कासित’ कर देती हैं.

जमीनी सतर्कता वाला मसला ऐसा नहीं है जिसे कानून द्वारा उत्पन्न किया जा सके. यह मुख्यतः घर और विद्यालय की शिक्षा पर निर्भर करता है, जहां युवाओं को स्वयं सोचने का अधिकार सिखाया जाए, और जब अंतरात्मा की आवाज़ मांग करे, तब वे घरेलू, औद्योगिक या राजनीतिक—किसी भी प्रकार की सत्ता के विरुद्ध खड़े होने का साहस सीखें. महात्मा गांधी ने एक सच्चे सत्याग्रही को उस व्यक्ति के रूप में परिभाषित किया जो किसी ऐसे कानून का उल्लंघन करता है जिसे वह अनैतिक मानता है—भले ही वह अकेला ही क्यों न हो—बशर्ते वह अपने कार्य की कीमत चुकाने के लिए तैयार हो. दूसरे शब्दों में, लोकतंत्र स्वतंत्र, जागरूक और साहसी नागरिकों के अस्तित्व पर निर्भर करता है, जो अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठाने को तैयार हों और हर समय केवल लागत-हानि का हिसाब न लगाते रहें. जैसा कि कवि ने कहा है:

“वे लोग गुलाम हैं जो सही होने पर भी दो या तीन लोगों के साथ खड़े होने का साहस नहीं करते.”

ऐसी पहल के मुख्य शत्रु हैं—व्यक्तिपूजा की प्रवृत्ति, पार्टी के “हाई कमान” के प्रति भ्रामक निष्ठा, चाटुकारिता जो राजधानी और भारत के अन्य भागों में प्रचुर मात्रा में पाई जाती है, तथा नियंत्रित अर्थव्यवस्था की वह स्थिति जहां परमिट-लाइसेंस या कोटा आर्थिक अस्तित्व की पूर्व-शर्त बन जाता है.

इस संदर्भ में हम बहुत कमजोर स्थिति में हैं. भारत में अच्छे और सक्रिय नागरिकता की अवधारणा को अच्छी तरह समझा नहीं गया है. परिणामस्वरूप स्थिति यह है कि “राजनीति बहुत अधिक है, नागरिकता बहुत कम.” हमें जमीनी स्तर पर कहीं अधिक सतर्कता और सक्रियता की आवश्यकता है. लोकतंत्र की गुणवत्ता केवल पांच-पांच वर्ष में होने वाले चुनावों से निर्धारित नहीं होती, बल्कि राज्य के कार्यों में सामान्य नागरिक के दैनिक हस्तक्षेप से तय होती है. इस मामले में हम बहुत कमजोर हैं, और जब तक हमारी नागरिकता की गुणवत्ता और सक्रियता में सुधार नहीं होगा तथा वह अधिक लोकतांत्रिक नहीं बनेगी, तब तक हमारे राजनीतिक दल ऊपर-ऊपर तैरते रहेंगे और आज की तरह पूरी तरह गैर-जिम्मेदार बने रहेंगे.

यह अत्यंत आवश्यक है कि भारत के लोगों को इस विषय पर शिक्षित किया जाए.

यह लेख सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी की इंडियन लिबरल्स परियोजना नामक इंडियन लिबरल्स आर्काइव की सीरीज़ का हिस्सा है. इस लेख का प्रकाशन मूलरूप से 24 मार्च, 1989 को अहमदाबाद के “हैरॉल्ड लास्की इंस्टिट्यूट ऑफ पॉलिटिकल साइंस” पत्रिका में हुआ था. मूल संस्करण को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.

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