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Saturday, 28 February, 2026
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मिशन लिबरटेरियनिज्म: मार्क्सवादी सामूहिकतावाद के बीच व्यक्तिवाद की नई चुनौती—एमए वेंकट राव

एमए वेंकट राव ने 1 अक्टूबर 1958 को लिखे इस लेख में मार्क्सवाद और राज्य विस्तार की आलोचना करते हुए व्यक्तिवादी स्वतंत्रता और आर्थिक संतुलन की वकालत की.

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यह मानवता का दुर्भाग्य ही है कि कार्ल मार्क्स के हिंसक और वर्ग-संघर्ष पर आधारित विचार ही समाजवाद का असली रूप मान लिए गए. इन्हें दुनिया भर में मजदूरों का एकमात्र वैज्ञानिक और उद्धार करने वाला सिद्धांत समझा गया. लेनिन व रूसी क्रांतिकारियों, और लसाल के नेतृत्व में जर्मन सोशल डेमोक्रेट्स ने, मार्क्सवादी साम्यवाद को अपना कर इसे विस्तारित करने और मजबूत बनाने का काम किया. 1917 की रूसी क्रांति और उसके बाद विश्व शक्ति बनने तक की उसकी सफल यात्रा ने पूरे स्वतंत्र विश्व को चुनौती दी. इससे इस सामूहिक, साजिशपूर्ण और हिंसक प्रकार के साम्यवाद का प्रभाव और भी ज्यादा बढ़ गया.

अधिकांश देशों में आज का वातावरण साम्यवादी विचारधारा के अनुकूल बन गया है. कुछ पढ़े-लिखे लोग जो इस विचारधारा से अलग राय रखते हैं, वे भी किसी न किसी हद तक उससे प्रभावित हो ही जाते हैं. इस कारण आजादी के पक्षधर लोग भी रक्षात्मक स्थिति में आ गए हैं. अब सरकार की शक्ति और विस्तार को सही ठहराने की ज़रूरत नहीं समझी जाती, बल्कि उल्टा व्यक्तिगत आज़ादी और इंसान की अलग पहचान (व्यक्तित्व) को ही खुद को साबित करना पड़ता है.

पूंजीपति रॉबर्ट ओवेन फ्रांसीसी समाजवादियों के संपर्क में आए और पिछली शताब्दी के शुरुआती दशकों में इंग्लैंड, स्कॉटलैंड और यहां तक कि संयुक्त राज्य अमेरिका में भी मज़दूरों की सामूहिक बस्तियां (कम्यून) स्थापित कीं. जोसायाह वॉरेन नामक एक अमेरिकी चिंतक ओवेन की समाजवादी बस्तियों से जुड़े और उनसे प्रेरित होकर व्यक्तिगत तौर पर अपनी अलग गांव-बस्तियां शुरू कीं. उन्होंने अपने तरीके से समय और श्रम पर आधारित मूल्य का सिद्धांत विकसित किया. कार्ल मार्क्स के हाथों में यह सिद्धांत बदलकर “अधिशेष मूल्य सिद्धांत” बन गया, ताकि यह साबित किया जा सके कि सारी पूंजी, श्रम द्वारा पैदा किए गए मूल्य की लूट है. लेकिन वॉरेन के हाथों में यही सिद्धांत एक नए समानतावादी व्यक्तिवाद की नींव बना, जो यह दावा करता था कि हर व्यक्ति को अपने श्रम का पूरा फल पाने का अधिकार है, और इसे उस वस्तु को बनाने में लगे समय के आधार पर मापा जाना चाहिए. श्रम के योगदान को मापना एक बहुत ही जटिल और परेशान करने वाली गणना बन गई, जो इन बस्तियों के सदस्यों के बीच विवाद और समस्याओं का कारण बनी.

उनके उदाहरण ने कई चिंतकों को व्यक्तिगत स्वतंत्रता के सामाजिक पहलुओं पर विचार करने के लिए प्रेरित किया. स्टीफ़न पर्ल एंड्रयूज़ ने समाज-विज्ञान की रूपरेखा तैयार की. कुछ अन्य लोगों ने बैंकिंग और आर्थिक उत्पादन तथा विनिमय के अन्य रूपों में सहयोग और पारस्परिक सहायता के पहलुओं को विकसित किया. कुछ ने मुद्रा और मुद्रास्फीति (महगाई) की समस्याओं पर विशेष अध्ययन किया. और कुछ ने बैंकिंग, मुद्रा और समग्र अर्थव्यवस्था में राज्य के हस्तक्षेप के प्रभावों की जांच की. अमेरिका के इस स्वतंत्रतावादी विचारधारा के चिंतकों ने संपत्ति की भूमिका — उसके अर्थ, कार्य और सीमाओं — तथा सामाजिक मामलों और व्यक्तिगत जीवन में राज्य की भूमिका — दोनों पर गहराई से विचार किया.

इन दोनों पहलुओं के संबंध में सामान्य विचारधारा यह समझने से जुड़ी थी कि संपत्ति के असामाजिक उपयोग — जैसे एकाधिकार (मोनोपॉली) और कार्टेल द्वारा किए जाने वाले दुरुपयोग, राज्य का अपने वैध क्षेत्र (कानून और न्याय) से आगे बढ़ जाना, तथा कल्याणकारी नीतियों के तहत एक से छीनकर दूसरे को देने की प्रवृत्ति — में कितनी बर्बादी, निराशा और जटिलता शामिल होती है. व्यक्ति और राज्य की ये अति-क्रियाएँ उत्पादन की लागत को लगातार बढ़ाती हैं, विभिन्न आर्थिक समूहों द्वारा बिना मेहनत कुछ पाने के लिए राज्य पर अत्यधिक दबाव डालने की प्रवृत्ति को बढ़ावा देती हैं, महंगाई और मूल्यों की अव्यवस्था को जन्म देती हैं, और अंततः मुद्रा तथा समग्र आर्थिक उत्पादन पर से विश्वास को कमजोर कर देती हैं. इसके परिणामस्वरूप अनावश्यक आर्थिक संकट पैदा होते हैं, जिनमें अधिक उत्पादन या कम उत्पादन और बेरोज़गारी जैसी समस्याएं शामिल होती हैं.

समाधान उस व्यक्तिवादी अर्थव्यवस्था की ओर लौटने में है, जहां एकाधिकार को विरुद्ध प्रावधानों द्वारा नियंत्रित किया जाए, ताकि सभी की समान स्वतंत्रता सुरक्षित रह सके. स्वतंत्रतावादियों के अनुसार, कानून के दायरे में रहकर मुक्त उद्यम करने की सबको समान स्वतंत्रता का यह सिद्धांत (जिससे धोखाधड़ी और बिना कमाए हुए लाभ हासिल करने पर रोक लगाई जा सके) उन लोगों पर नियंत्रण लगाने के लिए पर्याप्त है, जो दी गई स्वतंत्रता का अनुचित लाभ उठाते हैं.

उनका तर्क है कि यदि इन सिद्धांतों का समझदारी से पालन किया जाए, तो राज्य और समाज वर्तमान में सामूहिकतावादी विचारों के प्रभाव से जो अत्यधिक बोझ झेल रहे हैं, उससे मुक्त हो सकते हैं. वे वर्तमान सार्वजनिक ऋण के भारी बोझ से भी काफी हद तक मुक्त हो जाएंगे. व्यक्तिवादी नागरिक राज्य को अपनी आय-व्यय की सीमा में रहने के लिए बाध्य करेंगे. राज्य को कृत्रिम धन सृजित करने के लिए ऋण जारी करने से रोका जाएगा और वर्तमान पीढ़ी पर सार्वजनिक ऋण के बढ़ते ब्याज का बोझ नहीं डाला जाएगा. यद्यपि मूलधन भविष्य की पीढ़ियों द्वारा चुकाया जाना माना जाता है, पर वास्तव में भारी ब्याज तो वर्तमान पीढ़ी को ही देना पड़ता है. यह ब्याज एक विशेष वर्ग — यानी बांड धारकों — को दिया जाता है, जिससे उन्हें समाज के अन्य लोगों की तुलना में अधिक क्रय-शक्ति मिल जाती है. इससे अर्थव्यवस्था में असंतुलन पैदा होता है, क्योंकि बिना कमाई वाली आय को अधिक बढ़ावा मिलता है और समुदाय के पूंजी संसाधनों का बड़ा हिस्सा कुछ लोगों की संतुष्टि में लग जाता है, जबकि विशाल बहुमत की आवश्यकताएं अधूरी या कम पूरी रह जाती हैं.

अमेरिका जैसे उन्नत लोकतांत्रिक देशों में मुख्य विचारधारा उदार लोकतंत्र (लिबरल डेमोक्रेसी) की रही है, जिसे उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभ और मध्य काल में रूप दिया गया था. आज तकनीकी उद्योग का विकास, जनसंख्या की वृद्धि और संचार माध्यमों की प्रगति — जैसे रेडियो, समाचारपत्र, वायरलेस, यात्रियों और माल के लिए हवाई जहाज़ आदि — इन सबने मिलकर राज्य को नागरिकों के बीच उत्पन्न होने वाले असंख्य नए संबंधों को नियंत्रित करने के लिए अधिक से अधिक शक्तियां दे दी हैं. संगठन पहले से कहीं अधिक जटिल और परस्पर जुड़े हुए हो गए हैं.

इस कारण सामूहिकतावाद की बढ़ती प्रवृत्ति और राज्य की शक्ति के विस्तार को लेकर एक प्रकार की अनिवार्यता (अपरिहार्यता) की भावना पैदा हो गई है. आज के युग में सामूहिकतावाद एक प्रकार का भ्रम (मिथ्या धारणा) बन गया है, जिसमें स्वयं निर्णय लेने और आत्म-विकास करने वाले व्यक्ति के रूप में नागरिक के अधिकार और कर्तव्य दृष्टि से ओझल हो गए हैं. व्यक्ति और छोटे समूह विशाल राष्ट्र-राज्यों की भीड़ में अपने आपको खोया हुआ महसूस करते हैं. यहां तक कि छोटे राष्ट्र भी बाहर से आने वाले भारी प्रभावों और दबावों के सामने अपने आपको असुरक्षित महसूस करते हैं.

इतिहास का चक्र जैसे पूरा घूम गया है. जॉन स्टुअर्ट मिल और उनके अनुयायियों की व्यक्तिवादी दर्शन, जिसने उदार लोकतंत्र का मार्गदर्शन किया था, आज विशेषकर अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में कार्ल मार्क्स के प्रभावशाली सामूहिकतावाद से ढक गई है. एडम स्मिथ और मिल दोनों ही अब पीछे छूट गए प्रतीत होते हैं. वे मानो “असफल सिद्ध हुए देवता” बन गए हैं.

लेकिन आज कई क्षेत्रों में यह संदेह और आशंका प्रकट की जा रही है कि हमने बीमारी से भी बदतर इलाज को अपना लिया है. आखिरकार, ज्ञात वास्तविकता तो मानव जीवन ही है — अनुभव, विचार, भावना, कर्म और सहभागिता का केंद्र व्यक्ति ही है — अर्थात् व्यक्तिवादी पुरुष और महिलाएं.

समाजशास्त्री प्राथमिक और द्वितीयक समूहों के बीच सही संबंध स्थापित करने के सिद्धांत बना रहे हैं. प्राथमिक समूह — जैसे घर, पड़ोस और धार्मिक या शैक्षिक समुदाय — मानव जीवन को आकार देने में मूल भूमिका निभाते हैं. वे व्यक्ति को एक पूर्ण व्यक्तित्व के रूप में देखते हैं, न कि केवल किसी हिस्से के रूप में — जैसे सिर्फ हाथ, सदस्य, ग्राहक, मजदूर, नियोक्ता, अधिकारी या भीड़ में गुम साधारण व्यक्ति.

द्वितीयक समूह — जैसे व्यवसाय, मनोरंजन या होटल और रेलगाड़ियों में बनने वाले अस्थायी समूह — आवश्यक तो हैं, लेकिन यदि वे जीवन के अधिकांश क्षेत्र और गतिविधियों पर छा जाएँ, तो मनुष्य अलग-थलग और भीतर से कमजोर हो जाता है. मानसिक विकार बढ़ने लगते हैं. आत्महत्याएं, मानसिक असंतुलन, किशोर अपराध, तलाक के मामले, वेश्यावृत्ति, जुआ, मद्यपान तथा आर्थिक और राजनीतिक जीवन में भ्रष्टाचार — ये सब चिंताजनक स्तर पर बढ़ने लगते हैं. स्वतंत्रतावादी संस्थाओं को सरल बनाने, संपत्ति के उपयोग में सुधार लाने और सामाजिक जीवन में राज्य की सीमित भूमिका की ओर लौटने का आह्वान करते हैं, ताकि दबा हुआ व्यक्ति फिर से उद्देश्यपूर्ण और स्वस्थ जीवन की नई दिशा में आगे बढ़ सके. इसमें विज्ञान और आधुनिक युग की उपलब्धियों का उपयोग अधिक स्वस्थ तरीके से किया जा सके, ताकि पुरुष और महिलाएँ अपनी क्षमता और सामर्थ्य के अनुसार स्वयं को विकसित कर सकें.

स्वतंत्रतावादी भूमि के साथ एक नए संबंध की भी बात करते हैं, ताकि बिना परिश्रम की आय उन लोगों के हाथों में जमा न हो जो उत्पादन में योगदान नहीं देते. चूंकि भूमि अन्य औद्योगिक या व्यापारिक संपत्तियों की तरह असीमित नहीं है, इसलिए उसे उन लोगों के हाथों में रहना चाहिए जो वास्तव में उसका उत्पादन के लिए उपयोग करते हैं, और निष्क्रिय या परजीवी स्वामियों को हटाया जाना चाहिए.

स्वतंत्रतावादी शिक्षा में भी रुचि रखते हैं. वे ऐसे मार्ग खोज रहे हैं जिनसे व्यक्ति स्वयं सोचने और जांच-पड़ताल करने के माध्यम से व्यक्ति और समाज के बीच सही संबंध समझ सके. नया लक्ष्य यह है कि शिक्षा की प्रक्रिया में सहयोग की भावना और व्यक्तिगत आत्मनिर्भरता को मजबूत किया जाए. साथ ही, औजारों के उपयोग का आनंद और कौशल सिखाकर वर्ग-विरोध की जड़ों को मिटाना आवश्यक है, ताकि प्राचीन श्रमिक और शासक वर्ग का भेद लोगों के मन से समाप्त हो सके. कार्य और संस्कृति को एकीकृत किया जाना चाहिए.

आर्थिक और राजनीतिक जीवन में स्वतंत्रता को सहयोग और सृजनात्मक जीवन की नई मनोवृत्ति का सहारा मिलना चाहिए. ऐसी मनोवृत्ति रचनात्मक शिक्षा द्वारा विकसित की जानी चाहिए, जो मानव एकता और मुक्त तथा आनंदपूर्ण सहयोग की भावना से प्रेरित मानव प्रगति के दृष्टिकोण से जुड़ी हो.

यह लेख सेंटर फ़ॉर सिविल सोसाइटी की इंडियन लिबरल्स परियोजना नामक इंडियन लिबरल्स आर्काइव की सीरीज़ का हिस्सा है. इस लेख को ‘द इंडियन लिबरटेरियन’ से लिया गया है, जिसका प्रकाशन 1 अक्टूबर 1958 में हुआ था. मूल संस्करण को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.


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