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Thursday, 25 April, 2024
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बॉक्सिंग चैंपिनयन निख़त जरीन बोलीं- महिलाओं को ‘हिजाब पहनने और उतारने’ के लिए नहीं कह सकते’

एक सम्मान समारोह के लिए दिल्ली आईं निख़त ज़रीन, जिन्होंने पिछले सप्ताह ही विश्व मुक्केबाजी चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीता था, ने दिप्रिंट को अपने अब तक के सफर और सलमान खान के साथ 'शादी करने की अपनी योजना' के बारे में बताया.

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नई दिल्ली: तीन साल पहले भारतीय मुक्केबाजी (बॉक्सिंग) की दिग्गज मैरी कॉम के खिलाफ टोक्यो ओलंपिक में चयन के लिए हुआ ट्रायल हारने के बाद निख़त ज़रीन का मनोबल सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया था. मगर आसानी से हार न मानने वाली तेलंगाना की इस मुक्केबाज ने सुनिश्चित किया कि वह एक बार फिर से मजबूत होकर वापस आए, और पिछले ही हफ्ते उन्होंने इस्तांबुल में आयोजित विश्व मुक्केबाजी चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीता.

जरीन ने थाईलैंड की जितपोंग जुतामास को हराकर फ्लाईवेट वर्ग (50-52 किग्रा) में यह जीत हासिल की.

इस उपलब्धि ने न केवल उन्हें देश भर में एक सेलिब्रिटी (जानी मानी हस्ती ) बना दिया है, बल्कि मैरी कॉम – जिन्हें ज़रीन अपना ‘आदर्श ‘ कहती हैं – ने भी इस युवा मुक्केबाज को बधाई देने के लिए ट्विटर का सहारा लिया.

अपने ट्विटर संदश में कॉम ने लिखा, ‘स्वर्ण पदक जीतने के लिए निकहत को बधाई. आपके ऐतिहासिक प्रदर्शन पर बहुत गर्व है और आपके भविष्य के प्रयासों के लिए शुभकामनाएं देती हूं. ‘

तेलंगाना के निजामाबाद शहर में जन्मी, 25 वर्षीय ज़रीन ने बुधवार को दिप्रिंट को दिए गए एक साक्षात्कार में बताया कि वह हमेशा से लैंगिक रूढ़िवादिता को तोड़ना चाहती थीं और यही कारण था कि उन्होंने मुक्केबाजी को अपनाया. वे एक सम्मान समारोह के सिलसिले में राष्ट्रीय राजधानी में थीं.

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हालांकि, बॉक्सिंग अपनाने से लेकर वर्ल्ड चैंपियनशिप जीतने तक का उनका सफर आसान नहीं रहा है. इसके रास्ते में, उन्होंने पितृसत्ता (पैट्रिआर्की), सामाजिक दबाव, चोट समेत बहुत कुछ झेला है. और जब हिजाब विवाद – जिसने पिछले कुछ महीनों में देश को हिलाकर रख दिया है – की बात आती है तो वे ‘पसंद की आजादी’ में यकीन रखती हैं. यह युवा मुक्केबाज पुरे देश में ‘शांति और सद्भाव’ पर भी जोर देती हैं.

जरीन ने याद करते हुए कहा, ‘मैं 10 साल की उम्र से ही एक एथलीट हूं . मेरे पिता भी एक खिलाडी (स्पोर्ट्स पर्सन) थे, इसलिए वही मुझे प्रशिक्षण देते थे. एक बार वह मुझे पास के एक स्टेडियम में ले गए और मैंने महसूस किया कि बॉक्सिंग के अलावा सभी खेलों में महिला खिलाड़ी होती हैं. मैंने अपने पिता से पूछा कि क्या महिलाएं बॉक्सिंग नहीं कर सकतीं?’

उन्होंने आगे कहा: ‘उन्होंने (मेरे पिता ने) कहा कि महिलाएं कुछ भी कर सकती हैं, लेकिन यह दुनिया सोचती है कि महिलाएं मुक्केबाजी जैसा कठिन खेल नहीं खेल सकती हैं. उनके उस वाक्य ने ही मुझे बॉक्सिंग चुनने के लिए प्रेरित किया. और आज मैं बहुत खुश हूं कि मैंने बॉक्सिंग को चुना, क्योंकि मुझे लगता है कि मुझे ऐसा ही करना था. आज अगर मैं एक भी महिला को बॉक्सिंग के क्षेत्र में आने के लिए प्रेरित कर पाती हूं, तो मुझे लगेगा कि मैंने अपना वास्तविक पदक जीत लिया है.’

ज़रीन, जो बैंक ऑफ़ इंडिया, मुंबई में सहायक प्रबंधक के रूप में भी काम करती हैं, ने संगीत, शायरी, खरीदारी और सलमान खान के बारे में अपनी रुचि के बारे में बातें की . यह ‘धाकड़ मुक्केबाज न केवल एक दिन इस अभिनेता से मिलने की उम्मीद करती हैं, बल्कि अगर वह राजी हों तो उनसे शादी भी कर सकती हैं.’


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‘हिजाब है एक निजी पसंद’

जहां ज़रीन खुद को बहुत अधिक मजहबी शख्श बताती हैं, वहीं उनके लिए बॉक्सिंग ‘मजहब से भी ऊपर’ है.

जरीन ने कहा, ‘मैं एक मजहबी शख्श हूं, लेकिन कई बार मैं अपने प्रशिक्षण सत्रों के दौरान नमाज पढ़ने से भी चूक जाती हूं. मेरा मानना है कि अगर आप किसी चीज के लिए अपनी पूरी मेहनत लगा रहे हैं, तो खुदा आपको इसके लिए इनाम जरूर देंगें. यदि आप अच्छा करते हैं, तो अच्छा ही आपके पास वापस आएगा. में दुआओं से बढ़कर एक अच्छा इंसान होने और दूसरों के लिए अच्छा चाहने में विश्वास करती हूं, यही खुदा को खुश करने का एकमात्र तरीका है.’

शैक्षणिक संस्थानों में हिजाब पर लगी रोक को लेकर कर्नाटक में उपजे हाल के विवाद के बारे में पूछे जाने पर, ज़रीन ने कहा, ‘कोई भी महिलाओं को हिजाब पहनने के लिए नहीं कह सकता है या उसे ऐसा नहीं करना चाहिए, पर किसी को भी उन्हें इसे हटाने अथवा उतारने के लिए भी नहीं कहना चाहिए. साथ ही, हिजाब को महिलाओं को कुछ भी करने की राह में रूकावट नहीं बनना चाहिए.’

अपने खुद के क्षेत्र के बारे में बात करते हुए, इस मुक्केबाज ने कहा, ‘यहां तक कि मुक्केबाजी (के नियम) भी महिलाओं को रिंग के अंदर हिजाब पहनने की अनुमति देती है . मुझे अपने परिवार द्वारा कभी भी इसे पहनने के लिए नहीं कहा गया. लेकिन अगर महिलाएं ऐसा करना चाहती हैं और अगर वे हिजाब में ज्यादा सहज महसूस करती हैं तो उन्हें रोका भी नहीं जाना चाहिए.’

‘मुझे मेरे समुदाय से विपरीत प्रतिक्रिया का सामना करना पड़ा’

ज़रीन ने बॉक्सिंग का चुनाव करने को लेकर अपने आस-पास के ‘रूढ़िवादी मुस्लिम समुदाय’ की प्रतिक्रिया को याद करते हुए कहा, ‘जब मैंने पेशेवर रूप से बॉक्सिंग करने का फैसला किया, तो मेरे पिता ने मेरे इस फैसले का समर्थन किया, लेकिन मेरी मां बहुत डरी हुई थी. उन्हें बस एक ही चिंता सता रही थी कि बॉक्सिंग से मेरे चेहरे और शरीर पर चोट लग सकती है. लेकिन मेरे रिश्तेदारों और समुदाय के लोगों ने वास्तव में मुझे हतोत्साहित किया.‘

इस 25 वर्षीय बॉक्सर ने कहा: ‘वे हमेशा एक मुस्लिम महिला होने के बावजूद मेरे द्वारा शॉर्ट्स पहनने के लिए मेरी आलोचना करते थे. उनकी एक बहुत ही रूढ़िवादी मानसिकता थी कि महिलाओं को घर के अंदर ही रहना चाहिए और घर के काम ही करने चाहिए. लेकिन मेरे पिता सभी बाधाओं के खिलाफ मेरे साथ खड़े रहे. शुरू में जब मैंने बॉक्सिंग शुरू की तो कुछ लड़कों ने मुझे बहुत बुरी तरह से चोट पहुंचाई जिससे मेरी आंखों और नाक पर चोट के निशान पड़ गए और जब मैं घर पहुंची तो मेरी मां रोने लगी और कहने लगी कि बॉक्सिंग में अपना चेहरा खराब कर लोगी तो तुमसे शादी कौन करेगा? मैंने उनसे वादा किया था कि एक दिन मैं इतना बड़ा नाम कमा लूंगीं कि लड़के मुझसे शादी करने के लिए मेरे घर के बाहर कतार में लग जाएंगे. आज मेरी मां बहुत ‘बिंदास’ हो गई है, दरअसल, वे तो मेरी हाफ-कोच (आधी प्रशिक्षक) बन गई हैं. मुझे खुशी है कि मैं दूसरों के साथ-साथ अपनी मां की मानसिकता को भी बदल सकी.‘

‘मेरी हिंदू दोस्त और मैं एक साथ प्रार्थना करते हैं’

मध्य प्रदेश में एक व्यक्ति को मुस्लिम होने के संदेह में पीटे जाने – बाद में उसे मृत पाया गया था – की कथित घटना पर दिप्रिंट के एक सवाल का जवाब देते हुए ज़रीन ने कहा,’एक एथलीट के रूप में, हमने कभी भी किसी व्यक्ति के मजहब पर ध्यान नहीं दिया क्योंकि यही वह खेल भावना जो हमें सिखाई गई है. लेकिन जब मैं अपने आसपास साम्प्रदायिक घटनाओं को होते देखती हूं तो मुझे बहुत बुरा लगता है.’


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उन्होंने आगे कहा: ‘मैं एक मुस्लिम हूं, लेकिन मेरी सबसे अच्छी दोस्त एक हिंदू है. एक ही कमरे में बहुत खुशी से मैं नमाज पढ़ता हूं और साथ-साथ वह पूजा भी करती है. मुझे तो यहां कोई समस्या नहीं दिखती. भारतीयों को कभी भी धर्म के आधार पर नहीं लड़ना चाहिए. हम एक हैं, हम एक समान हैं, हमें शांति और सद्भाव के साथ रहना चाहिए.’

‘मानसिक स्वास्थ्य से जुडी समस्याओं का किया सामना’

साल 2019 में विश्व चैंपियनशिप की तैयारी के दौरान, ज़रीन को पता चला था कि भारतीय मुक्केबाजी महासंघ (बॉक्सिंग फेडरेशन ऑफ़ इंडिया-बीएफआई) इस आयोजन के लिए प्रतिभागियों को चुनने के लिए ‘ट्रायल’ आयोजित नहीं करेगा, और उसने पहले ही मैरी कॉम को देश का प्रतिनिधित्व करने के लिए चुन लिया है. जब कॉम ने इस विश्व चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीता, तो वह स्वतः ही 2020 के टोक्यो ओलंपिक में देश का प्रतिनिधित्व करने हेतु पहली पसंद बन गईं.

ज़रीन ने तब तत्कालीन खेल मंत्री किरेन रिजिजू को ‘ट्रायल’ और ‘उचित मौका’ देने के लिए लिखा था. इस बात से उत्तेजित मैरी कॉम को तब कथित तौर पर यह कहते हुए उद्धृत किया गया था, ‘यह निख़त ज़रीन है कौन?’

हालांकि खेल मंत्री ने इस मामले में खुद को शामिल नहीं करने का फैसला किया, लेकिन आखिरकार इस आयोजन के लिए एक ट्रायल आयोजित किया गया. इस मुकाबले में मैरी कॉम ने जरीन को 9-1 से हरा दिया. मुकाबले के बाद, कॉम ने कथित तौर पर दोनों प्रतिद्वन्दियों के बीच हाथ मिलाने की औपचारिक परंपरा में भी भाग नहीं लिया.

इस घटना के बारे में दिप्रिंट से बात करते हुए ज़रीन ने कहा, ‘मैं मैरी कॉम के खिलाफ इस तरह हारने से बहुत परेशान थी. और इससे भी ज्यादा मैं उसके बाद जो कुछ हुआ उस बात से मैं परेशान थी. मैं मानसिक रूप से सबसे निचले स्तर पर आ गयी थी, क्योंकि मैं बहुत अकेला महसूस करती थी.’

उन्होंने कहा: ‘कोई भी चीज मुझे खुश नहीं कर पाती थी. लेकिन खुदा के पास मेरे लिए एक योजना भी थी. मुझे लगता है कि खुदा यह भी जानते थे कि मुझे उस डार्क जोन (अंधकारपूर्ण क्षेत्र) में खुद को प्रशिक्षित नहीं करना चाहिए, मुझे इससे बाहर आना चाहिए और फिर खुद को सकारात्मक मानसिकता के साथ प्रशिक्षित करना चाहिए, जिसे मैं ट्रायल्स के बाद हासिल नहीं कर सकी थी. मैं कुछ समय की छुट्टी लेने के लिए अपने घर चली गयी. उसके तुरंत बाद कोविड (महामारी) का समय आ गया. इसलिए संयोग से मुझे खुद को समय दे सकी और मैंने मजबूत होकर वापसी की.’

जरीन ने अपने मानसिक संकट से उबरने के लिए पेशेवर मदद लेने के बारे में भी बात कही.

उन्होंने कहा, ‘मेरे मनोवैज्ञानिक ने भी मुझे उस बुरे समय से उबरने में मदद की. आपको बस इतना चाहिए कि कोई आपकी बात सुने और आपको समझे. खुशकिस्मती से मेरे पास मेरा परिवार और करीबी दोस्त थे जिन्होंने वास्तव में मेरा खूब समर्थन किया. लेकिन मैं हमेशा सबको यही सलाह दूंगीं कि किसी से भी बात करें, चाहे जिस किसी से, लेकिन बात करें, क्योंकि चीजों को अंदर रखने से नुकसान ही ज्यादा होता है. मैं अपनी सभी युवा साथियों से कहूंगीं कि जब भी वे परेशान हों तो थोड़ा सा ब्रेक लें या इस बारे में बात करें, वरना आपका मन आपको कठिनाई भरी चीजों की ओर धकेल सकता है.’

( इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें )


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