Sunday, 26 June, 2022
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UP और बिहार में तेजी से बदलते मौसम, कड़ी धूप, बारिश की कमी ने आम की फसल को बर्बाद कर दिया

बदलते मौसम, बढ़ी धूप, बारिश न होने के कारण कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि आम के उत्पादन में 25 से 30 फीसदी की कमी आएगी. किसान बोले- पहले लग रहा था कि फसल कम होगी लेकिन फायदा होगा, अब लग रहा है ये नुकसान और बड़ा होगा.

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‘मुझसे पूछो तुम्हें खबर क्या है,
आम के आगे नेशकर क्या है.’

गर्मी का मौसम हो, आम की बात हो और गालिब का जिक्र न हो तो समझिए कि या तो आम बर्बाद या फिर हमें आम पसंद ही नहीं. मिर्जा गालिब को आम इतने पसंद कि उन्हें आम के आगे गन्ना (नेशकर) भी फीका ही लगता था.

देश इन दिनों जिस तरह मौसम की मार झेल रहा है इसका असर सिर्फ आम लोगों पर ही नहीं बल्कि खेती किसानी और फसलों पर भी खूब पड़ा है. किसानों का कहना है कि फरवरी में आम के पेड़ पर ‘फूल’ तो बहुत अच्छे आए थे, लेकिन 15 दिनों में ही सारी खुशियां काफुर हो गईं. क्योंकि तेजी से बदलते मौसम और मार्च के पहले सप्ताह में झुलसाती गर्मी ने फूलों को झुलसा (जला ) दिया.

वहीं बिहार के आम के बागीचा मालिकों का कहना है कि थोड़ी बहुत जो फसल बची थी वो अचानक रेड कैटर पिलर नामक कीड़े के प्रकोप से खराब हो गई.अब 15-20 फीसदी जो फसल बची है वह तभी बची रह सकती है जब बारिश हो जाए.क्योंकि पेड़ों को हाइड्रेट करने के लिए जो पानी हम जड़ों में डाल रहे हैं वो इस गर्मी के लिए नाकाफी हैं.


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हमलोग पिछले तीन साल में बर्बाद हो गए..साहब.

वैशाली जिले में आम बागीचा मालिक प्रेम किशोर कहते हैं, ‘पहले 2020 में कोरोना के दौरान लगे लॉकडाउन के कारण हमारी फसल पेड़ में ही लगी रह गई. थोड़ा बहुत तोड़ के लोकल बाजार में हमलोगों ने ही बेचा.पिछले साल फसल आने के बाद इतनी बारिश हुई की आम हो या लीची दोनों तोड़ने से पहले ही चू (गिर) गया.’

वह आगे कहते हैं, ‘इस बार तो पेड़ पर मंजर इतना अच्छा था की हमलोग सोच रहे थे दो साल का सारा गीला- सूखा  हरा- हरा हो जाएगा लेकिन इसबार भी हमारी फसल पर वज्रपात हो गया है.’

वहीं भागलपुर में करीब 12 एकड़ में 400 आम के पेड़ के मालिक अशोक चौधरी कहते हैं- ‘पहले धूप ने और फिर इसकी वजह से लगे कीड़े ने पूरी फसल को खराब कर दिया है. अगर एक हफ्ते और जोरदार बारिश नहीं हुई तो इस साल हमलोगों को ये कीड़ा बर्बाद कर देगा.’

अशोक चौधरी बिहार आम उत्पादक संघ के अध्यक्ष भी हैं.

अशोक कहते हैं, ‘कीड़े ने ऐसे समय में आम पर हमला बोला है जब फसल तोड़ी जानी है ऐसे में हमलोग कीटनाशक का उपयोग नहीं कर सकते हैं क्योंकि इससे खाने वाले बीमार हो जाएंगे.’

उत्तर प्रदेश के मलीहाबाद के सबसे बड़े किसान पद्मश्री कलिमुल्लाह खान जिन्हें ‘मैंगो मैन’ के नाम से जाना जाता है वो कहते हैं इतनी उम्र हो गई हमारी लेकिन इतनी खराब फसल कभी नहीं देखी. इतना अच्छा फूल था बागों में मन खुश था लेकिन अब बाग में महज 15-20 फीसदी आम ही बचे हैं. वो समझाते हुए कहते हैं कि बागीचे में आम के 100 पेड़ हैं तो उसमें महज 10-12 में ही आम नजर आ रहा है.

कलीमुल्लाह के बेटे लजीमुल्लाह कहते हैं, ‘साल 20-21 में आम कोरोना की भेंट चढ़ा. 21-22 में कुछ आमदनी होती तो तेजी से बदलते मौसम की भेंट ही चढ़ गया.’

इंडियन मैंगो एसोसिएशन के अध्यक्ष इसराम अली कहते हैं, ‘इस बार यूपी में 15 फीसदी आम की खेती हुई है. पिछले साल 40 लाख मिट्रिक टन पैदावार हुई थी लेकिन इस बार 10-12 लाख मिट्रिक टन की भी उम्मीद नहीं है.’

अली कहते हैं, ’50-60 साल बाद इतना बड़ा लॉस हमलोगों को हुआ है.’

अली आगे कहते हैं, ‘यूपी में 13-14 मैंगो बेल्ट है और हमारा राज्य देश के बड़े उत्पादकों में से एक है लेकिन सरकार हमारी तरफ ध्यान नहीं दे रही है.’

उन्होंने फसल खराब होने की वजह गिनाते हुए दिप्रिंट को बताया कि ‘दवा डुप्लीकेट बहुत आ रही हैं..मैंगो फर्टीलिटी टेस्टिंग के लिए लैब भी नहीं है..वहीं किसानों को साइंटिस्ट भी कुछ नहीं बता रहे हैं.’

अली बताते हैं कि फसल खराब होने की एक वजह ये भी है कि हमारे यहां कई -कई पेड़ सौ साल पुराने हैं.लेकिन फॉरेस्ट डिपार्टमेंट पेड़ काटने नहीं दे रहा है.अब पुराने पेड़ों में भी फल नहीं आ रहे हैं.

बिहार के वैशाली जिले के जन्दाहा गांव में प्रेम किशोर के आम का बागीचा/ फोटो: पूजा मेहरोत्रा/ दिप्रिंट

तेजी से बदलते क्लाइमेट से फीकी हुई आम की मिठास

बदलते मौसम (क्लाइमेट) बढ़ी धूप, बारिश न होने के कारण कृषि वैज्ञानिकों और किसानों का अनुमान है कि आम के उत्पादन में 25 से 30 फीसदी की कमी आएगी. किसानों का कहना है कि पहले लग रहा था कि फसल कम होगी तो भी फायदा होगा लेकिन अब लग रहा है ये नुकसान और बड़ा होगा.

पिछले साल बिहार का मालदह और जर्दालू आम जो बिहार का प्रीमियम आम भी माना जाता है थोक बाजार में 20 से 30 रुपये प्रति किलो बिका था जो इस साल 30 से 40 रुपये बिकने का अनुमान है. य़ानी ग्राहकों के मुंह तक पहुंचते पहुंचते ये उनके मुंह का स्वाद भले ही बढ़ा दे लेकिन जेब ढीली कर देगा, क्योंकि आम लोगों तक पहुंचते पहुंचते आम की कीमत 100 से 120 रुपये किलो तक पहुंच जाएगी.

बिहार कृषि विश्वविद्यालय सुबौर भागलपुर के कृषि वैज्ञानिक डॉ फिजा अहमद ने दिप्रिंट से विशेष बातचीत में कहा कि इस बार क्लाइमेट चेंज का असर एक्सट्रीम लेवल पर है. उन्होंने कहा, ‘जब मंजर (पेड़ों में फूल) आ रहा था तब बहुत ठंड थी और जब फल लगने का समय आया तो लगभग दो हफ्ते तक मौसम में उतार चढ़ाव जारी रहा. और अचानक मौसम बहुत ज्यादा गर्म हो गया और टिकोले पीले पड़ गए, और गिरने लगे.’ ‘जिससे फसल के उत्पादन पर असर पड़ा और यह 30 फीसदी तक कम हो गया.’

डॉ फिजा अहमद ने आगे कहा, ‘ मार्च महीने के बीच में अचानक तापमान बहुत ज्यादा बढ़ गया और आम पर रेड वंडर केटर पिलर नामक कीड़े ने हमला बोल दिया जिससे रही सही फसल पर असर पड़ा और फल गिरने लगे’

प्रेम किशोर बताते हैं कि बारिश हुई नहीं हमलोग किसी तरह मशीन चला कर पेड़ों में पानी डाल रहे हैं और सिंचाई कर रहे हैं जो एक आखिरी उपाय फसल को बचाने का. क्योंकि अभी तापमान काफी गर्म है जो फसल को बर्बाद कर रहा है.

गुजरात में कम केसर की पैदावार

गुजरात में आम (केसर) पट्टी को भी नहीं बख्शा है. आम के बाग के मालिक और राज्य के व्यापारी विमल कानाबर का दावा है कि यह सीजन दो दशकों में सबसे खराब रहा है. वे कहते हैं, ‘स्थानीय मंडियों में आम की नीलामी 26 अप्रैल से शुरू हुई. सीजन की शुरुआत आम तौर पर प्रति दिन लगभग 40,000-60,000 पेटी आमों के आने के साथ होती है, लेकिन इस साल भीषण गर्मी में भी हमें केवल 5,000 बक्से ही मिल रहे हैं.’

नीलामी के पहले दिन उन्हें बमुश्किल 3,850 आम के डिब्बे मिले. प्रत्येक बॉक्स का वजन 10 किलोग्राम है और इसकी कीमत 1,100-14,50 रुपये के बीच है. विमल कहते हैं, ‘पिछले साल तक एक डिब्बा 400-600 रुपये में बेचा जाता था.

किसान कम केसर की पैदावार को मंजर के कम समय तक रहने का कारण बताते हैं जो तापमान में अप्रत्याशित परिवर्तन और मई 2021 में गुजरात में आए चक्रवात तौकता से प्रभावित रहा.

गुजरात के एक दूसरे किसान ने कहा, ‘हमने गिर बेल्ट के लगभग 70 प्रतिशत आम के पेड़ खो दिए. बचे हुए पेड़ों में भी फल कम ही आए.’

देश में अन्य राज्यों की तुलना में महाराष्ट्र में आम की पैदावार अच्छी रही, लेकिन इसका सीजन कम रहा. क्योंकि बेमौसम बारिश ने सीजन के अंत में आम की फसल को बर्बाद कर दिया. व्यापारियों के मुताबिक पिछले साल के 15 फीसदी की तुलना में इसबार करीब 20 से 30 फीसदी आम सड़े हुए निकल रहे हैं.

बिहार के वैशाली जिले के जन्दाहा गांव में प्रेम किशोर के आम का बागीचा/ फोटो: पूजा मेहरोत्रा/ दिप्रिंट

दुनिया में सबसे बड़ा आम उत्पादक देश है भारत

आम और लीची के लिए प्रसिद्ध बिहार में लगभग सभी जिलों में आम के छोटे- बड़े बाग हैं. लेकिन मुजफ्फरपुर, वैशाली, पूर्वी चंपारण, दरभंगा, भागलपुर, पटना, सारण और कटिहार जिले प्रमुख हैं.

आम की लगभग 1,000 किस्में यहां उगाई जाती हैं, लेकिन व्यावसायिक रूप से केवल 30 का ही उपयोग किया जाता है. विदेश मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, भारत से आमों का निर्यात 1987-88 में 20,302 टन था जो अब बढ़कर 2019-20 में 46,789.60 टन हो गया.

आम के प्रमुख उत्पादक राज्य आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, बिहार, गुजरात और तमिलनाडु हैं. उत्तर प्रदेश आम उत्पादन में 23.47% की हिस्सेदारी और उच्चतम उत्पादकता के साथ पहले स्थान पर है.

भारत दुनियाभर में आमों का प्रमुख निर्यातक है. एपीडा के आंकड़ों के मुताबिक 2020-21 में देश ने दुनिया को 21,033.58 मीट्रिक टन ताजे आमों का निर्यात किया है, जिसकी कीमत 271.84 करोड़ / 36.23 मिलियन अमरीकी डालर थी. आंकड़ों पर नजर डालें तो 2020-21 में अरब अमीरात, यूके, कतर, ओमान और कुवैत में सबसे अधिक एक्सपोर्ट होता है.


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