नई दिल्ली: पिछले पांच साल में कम से कम आधा दर्जन मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के आर्टिकल-142 के तहत मिली अपनी असाधारण शक्ति का इस्तेमाल ‘पूरा न्याय’ करने के लिए किया है. इनमें वैवाहिक विवादों को सुलझाने से लेकर POCSO या SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत आपराधिक मामलों को रद्द करना, राज्यपाल को विधेयकों पर कार्रवाई करने के लिए समयसीमा तय करना और अपने ही फैसले को पलटना तक शामिल है.
इस हफ्ते की शुरुआत में शीर्ष अदालत ने आर्टिकल-142 का इस्तेमाल करते हुए 20 से 25 जुलाई के बीच कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शनों के दौरान दर्ज 14 एफआईआर रद्द कर दीं. इसके अलावा, अदालत ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि 2026 नीट (यूजी) के प्रश्नपत्र लीक होने और बाद में परीक्षा रद्द किए जाने के बाद आत्महत्या करने वाले नीट एस्पिरेंट्स के परिवार के लोगों को तीन महीने के भीतर मुआवजा दिया जाए.
आर्टिकल-142 का खंड (1) सुप्रीम कोर्ट को अपने सामने आए किसी भी मामले में ‘पूरा न्याय’ करने के लिए कोई भी आदेश देने की शक्ति देता है. खंड (2) के तहत अदालत को किसी भी व्यक्ति की उपस्थिति सुनिश्चित करने, किसी दस्तावेज़ को खोजने/पेश करने को सुनिश्चित करने या अपनी अवमानना की जांच या सजा के लिए कोई भी आदेश देने की शक्ति मिलती है.
सीजेपी प्रदर्शनों में हिस्सा लेने वाले लोगों के खिलाफ दर्ज मामले सरकार की ओर से इस संबंध में आवेदन दायर किए जाने के बाद रद्द किए गए. इसी बैकग्राउंड में दिप्रिंट आर्टिकल-142 के तहत शीर्ष अदालत द्वारा अपनी शक्ति का इस्तेमाल किए जाने के कुछ मामलों के बारे में बता रहा है.
POCSO मामले में सज़ा रद्द
अपनी खास शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने जून में तमिलनाडु के एक निवासी की POCSO (बच्चों को यौन अपराधों से संरक्षण) एक्ट के तहत सुनाई गई सज़ा को रद्द कर दिया. कोर्ट ने पाया कि शिकायतकर्ता, जो घटना के समय नाबालिग थी, ने 18 साल की उम्र में उस व्यक्ति से शादी कर ली. अपने फैसले में कोर्ट ने पाया कि शिकायतकर्ता और उस व्यक्ति के बीच तब करीबी रिश्ते थे जब वह 12वीं कक्षा की छात्रा थी और उसने तब शिकायत दर्ज कराई जब उसने उससे शादी करने से इनकार कर दिया.
शिकायतकर्ता के हलफनामे को ध्यान में रखते हुए, जिसमें कहा गया था कि वे पिछले चार साल से साथ रह रहे थे और उनके बीच हुए समझौते की पुष्टि (जिसमें उसकी सुरक्षा के लिए 10 लाख रुपये का भुगतान भी शामिल था) के आधार पर, कोर्ट ने उस व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया. हालांकि, जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और अतुल एस. चंडुरकर की बेंच ने साफ किया कि इस आदेश को मिसाल (precedent) नहीं माना जाएगा क्योंकि उनका फैसला “मामले के खास तथ्यों” पर आधारित था.
शादी का अंत
अप्रैल में कोर्ट ने एक वैवाहिक विवाद को “अनुच्छेद 142(1) के तहत शक्तियों का इस्तेमाल करके तलाक देने के लिए उपयुक्त मामला” माना क्योंकि “शादी पूरी तरह से टूट चुकी थी”.
कोर्ट के सामने एक शादीशुदा जोड़े के बीच समझौते की शर्तों को लेकर विवाद था, जिसके तहत पति ने पत्नी को कुल 1.5 करोड़ रुपये देने का वादा किया था, साथ ही कार खरीदने के लिए पैसे और शादी के समय उसके द्वारा लाए गए गहने वापस करने का भी वादा किया था.
हालांकि, पत्नी तलाक की कार्यवाही से पीछे हट गई. उसने तर्क दिया कि उसने समझौते और उसके बाद तलाक के लिए सहमति तभी दी थी जब पति ने उसे भरोसा दिलाया था कि वह उसके 120 करोड़ रुपये के गहने और 50 करोड़ रुपये के सोने के बिस्कुट वापस कर देगा—एक ऐसा दावा जिसे पति ने कोर्ट के सामने नकार दिया.
पति ने ऊपरी अदालत में अवमानना याचिका दायर की थी, जिसमें पत्नी पर समझौते की तय शर्तों का पालन न करने का आरोप लगाया गया था. इसके जवाब में पत्नी ने पति और उसकी मां के खिलाफ ‘घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005’ के तहत मामला दर्ज कराया. दिल्ली हाई कोर्ट ने मामले को रद्द करने से इनकार कर दिया, लेकिन पत्नी से समझौते के तौर पर मिली 89 लाख रुपये की राशि वापस करने को कहा, जिसके बाद पति सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. अप्रैल में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह जोड़ा पहले से ही 2022-23 से अलग रह रहा था और घरेलू हिंसा कानून के तहत कार्यवाही पति और ससुराल वालों के खिलाफ मामले बनाए रखने के लिए “पहले से सोची-समझी” लग रही थी.
जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस विजय बिश्नोई की बेंच ने पति की उस अर्जी पर विचार किया जिसमें आर्टिकल 142 के तहत तलाक की मंज़ूरी मांगी गई थी.
बेंच ने कहा, “ऐसे मामले में, जब दोनों पक्षों के शांतिपूर्वक साथ रहने की कोई गुंजाइश न हो, तो हमें वैवाहिक कलह से पैदा हुए किसी भी तरह के कानूनी विवाद को जारी रखने का कोई मतलब नहीं दिखता.”
SC/ST एक्ट के तहत मामला रद्द करना
अक्टूबर 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने ‘अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989’ (SC/ST एक्ट) के तहत दर्ज आपराधिक मामले को रद्द करने की याचिका पर सुनवाई करते हुए अनुच्छेद-142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल किया.
जस्टिस एन.वी. रमना, सूर्य कांत और हिमा कोहली की तीन जजों वाली बेंच मध्य प्रदेश के पन्ना ज़िले के रामावतार की अपील पर सुनवाई कर रही थी. रामावतार को जून 1994 में निर्माण कार्य को लेकर अपने पड़ोसी के साथ हुए झगड़े के बाद SC/ST एक्ट के तहत दोषी ठहराया गया था. यह विवाद तब शुरू हुआ जब रामावतार और उसके भाई कटुलाल ने पड़ोसी प्रेमबाई के घर की ओर खुलने वाला दरवाज़ा बनाने के लिए एक दीवार तोड़ दी. इससे हाथापाई हुई और रामावतार ने प्रेमबाई पर ईंट फेंकी. दोनों भाइयों को दोषी ठहराया गया और छह महीने की कठोर कैद की सज़ा सुनाई गई. हालांकि, बाद में दोनों पक्षों के बीच समझौता हो गया.
अपने और अपने भाई के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने का अनुरोध करते हुए रामावतार ने कोर्ट के सामने तर्क दिया कि वे एक ही गांव के रहने वाले हैं और अच्छे संबंध बनाए रखना चाहते हैं. इस बात ने बेंच को अपनी विशेष शक्तियों के दायरे पर गहराई से विचार करने के लिए प्रेरित किया.
कोर्ट के सामने दो सवाल थे: क्या ‘गैर-समझौता योग्य अपराध’ (non-compoundable offence) में आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने के लिए अनुच्छेद-142 के तहत शक्ति का इस्तेमाल किया जा सकता है; और यदि हां, तो क्या ऐसी शक्ति का विस्तार SC/ST एक्ट जैसे विशेष कानूनों के तहत होने वाले अपराधों तक किया जा सकता है?
तत्कालीन सीजेआई एन.वी. रमना और मौजूदा मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने उसी साल सितंबर में अनुच्छेद 142 के तहत तय किए गए एक अन्य मामले में की गई टिप्पणियों का हवाला दिया और दोनों सवालों का जवाब ‘हां’ में देते हुए आपराधिक मामले को रद्द कर दिया.
कोर्ट ने कहा कि मामले को रद्द करने का आधार बनाने से पहले समझौते की प्रकृति और तरीके की सावधानीपूर्वक जांच की जानी चाहिए क्योंकि बेईमान अपराधी ज़बरदस्ती, धमकी, रिश्वत या अन्य अनैतिक और गैर-कानूनी तरीकों से समझौता करके आपराधिक दायित्वों से बचने की कोशिश कर सकते हैं. इसलिए, कोर्ट ने यह शर्त जोड़ी कि आर्टिकल 142 के तहत खास शक्तियों का इस्तेमाल सिर्फ सज़ा सुनाए जाने के बाद की कार्यवाही में ही किया जाना चाहिए, जब किसी न्यायिक मंच के सामने अपील लंबित हो और सभी कानूनी रास्ते आज़माने के बाद हुआ कोई भी समझौता मान्य नहीं होगा.
बेंच ने कहा, “यह इस आधार पर है कि सज़ा का आदेश तब तक अंतिम नहीं माना जाता जब तक आरोपी अपने सभी कानूनी विकल्पों का इस्तेमाल न कर ले और अंतिम फैसला अपीलीय अदालत के विचाराधीन न हो. पूरी तरह से न्याय करने के लिए उच्च अदालत की व्यापक शक्तियों का इस्तेमाल करने के लिए कानूनी कार्यवाही का लंबित होना-चाहे वह अंतिम अदालत के समक्ष ही क्यों न हो-एक ज़रूरी शर्त है. इसके विपरीत, जहां सभी कानूनी विकल्पों के इस्तेमाल के बाद समझौता हुआ हो, वहां समझौते के आधार पर कार्यवाही को रद्द करना मान्य नहीं होगा.”
इसमें आगे कहा गया, “ऐसी रोक इसलिए ज़रूरी है ताकि आरोपी को अनिश्चितकालीन लाभ न मिल सके क्योंकि ऐसे समझौते पर हमेशा उसकी ईमानदारी को लेकर संदेह बना रहेगा. हमने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि इन खास शक्तियों का मकसद आरोपी और पीड़ित के बीच किसी खोखले समझौते को बढ़ावा देना नहीं है, बल्कि वास्तविक समझौते के ज़रिए पूरा न्याय करना है.”
दूसरे सवाल पर, कोर्ट ने कहा कि आर्टिकल 142 के तहत खास शक्तियां “व्यापक और दूरगामी” होने के बावजूद, इनका इस्तेमाल “शून्य में” (बिना किसी आधार के) नहीं किया जा सकता.
कोर्ट ने कहा, “यह सच है कि सामान्य कानूनों या उनमें शामिल किसी भी प्रतिबंध को ‘पूरा न्याय’ करने की अदालत की शक्ति पर सीमा के रूप में नहीं देखा जा सकता. हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि यह अदालत कानूनी प्रावधानों या कानून में स्पष्ट रूप से मना की गई बातों को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ कर सकती है. असल में, अदालत संबंधित कानूनों पर ध्यान देने के लिए बाध्य है और उसे अपनी शक्ति और विवेक के इस्तेमाल को उसी के अनुसार विनियमित करना होगा.”
गवर्नर के लिए समय-सीमा
उस समय डीएमके के नेतृत्व वाली तमिलनाडु सरकार की याचिका पर फैसला सुनाते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल अप्रैल में एक समय-सीमा तय की थी, जिसके अंदर राज्य के गवर्नर को राज्य विधानसभा से पास हुए बिलों पर फैसला लेना होता है.
कोर्ट ने तत्कालीन गवर्नर आर.एन. रवि के उस कदम को “गैर-कानूनी और गलत” बताया, जिसमें उन्होंने 10 बिलों को मंज़ूरी देने से रोक दिया था, जिनमें से सबसे पुराना जनवरी 2020 से लंबित था और राज्य विधानसभा द्वारा दोबारा पास किए जाने के बाद उन्हें राष्ट्रपति के पास भेज दिया था.
इस मामले में भी, कोर्ट ने अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए कहा कि गवर्नर के पास राज्य विधानसभा से पास बिलों को रोके रखने का कोई वीटो या पूर्ण अधिकार नहीं है. यह शक्ति संविधान के अनुच्छेद 200 से मिलती है, जिसमें गवर्नर के लिए केवल तीन विकल्प होते हैं जब उन्हें राज्य विधानसभा से मंज़ूरी के लिए कोई बिल मिलता है.
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और आर. महादेवन की बेंच ने कहा, “हम अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल हल्के-फुल्के ढंग से या बिना सोचे-समझे नहीं कर रहे हैं. इसके विपरीत, बहुत गहरी सोच-विचार और इस पक्के नतीजे पर पहुंचने के बाद कि गवर्नर के कदम—पहले बिलों पर लंबे समय तक कोई कार्रवाई न करना; दूसरे, बिना किसी संदेश के मंज़ूरी रोकने और बिलों को वापस करने की घोषणा करना और तीसरे, दूसरे दौर में बिलों को राष्ट्रपति के लिए सुरक्षित रखना—संविधान में तय प्रक्रिया का साफ उल्लंघन थे, हमने इन दस बिलों को मंज़ूरी मिल गई मान लेने का फैसला किया है, क्योंकि हम इसे अपना संवैधानिक कर्तव्य मानते हैं.”
400 से ज़्यादा पन्नों के फैसले में कहा गया, “हमारी नज़र में, यही एकमात्र तरीका है जिससे यह पक्का किया जा सके कि बिना किसी देरी के सभी पक्षों को पूरा न्याय मिले, और गवर्नर की तरफ से किसी कार्रवाई न करने या इस फैसले का सम्मान न करने के कारण आगे कोई देरी न हो.”
अपने ही फैसले को पलटना
अप्रैल 2024 में सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने आर्टिकल 142 के तहत अपनी खास शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए, दो जजों की बेंच के फैसले को पलट दिया.
दो जजों की बेंच ने आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल के उस आदेश को पलट दिया था जिसमें दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन (DMRC) को एयरपोर्ट एक्सप्रेस लाइन से जुड़े विवाद के लिए दिल्ली एयरपोर्ट मेट्रो एक्सप्रेस प्राइवेट लिमिटेड (DAMEPL), जो रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड की सब्सिडियरी है – को लगभग 3,500 करोड़ रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया गया था.
DMRC की चुनौती पर सुनवाई करते हुए, दिल्ली हाई कोर्ट ने 2009 में ट्रिब्यूनल के आदेश को रद्द कर दिया, जिसके बाद DAMEPL सुप्रीम कोर्ट गई. 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के आदेश को पलट दिया और DAMEPL को भुगतान करने के फैसले को सही ठहराया.
इसके बाद DMRC ने फैसले पर पुनर्विचार के लिए क्यूरेटिव याचिका दायर की.
तत्कालीन CJI डी.वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच ने पिछले आदेश को रद्द करते हुए और DMRC को राहत देते हुए कहा कि दो जजों की बेंच के फ़ैसले से “न्याय में गड़बड़ी” (miscarriage of justice) हुई.
फैसले में कहा गया, “डिविजन बेंच के निष्कर्ष रिकॉर्ड पर आधारित थे और कानून या तथ्यों की गलत समझ पर आधारित नहीं थे. आर्टिकल 136 के तहत स्पेशल लीव पिटिशन पर सुनवाई करते समय, यह कोर्ट हाई कोर्ट की डिविजन बेंच के सोच-समझकर लिए गए फ़ैसले में दखल देने को सही नहीं ठहरा पाया. इस कोर्ट का फैसला आर्बिट्रेशन एक्ट की धारा 37 के तहत डिविजन बेंच द्वारा अधिकार क्षेत्र के इस्तेमाल के तरीके में किसी भी कमी के लिए कोई ठोस कारण नहीं बता पाया.”
आगे कहा गया, “डिविजन बेंच के फ़ैसले को रद्द करके, इस कोर्ट ने एक स्पष्ट रूप से गैर-कानूनी अवॉर्ड को बहाल कर दिया, जिससे एक पब्लिक यूटिलिटी (जन-सेवा वाली संस्था) पर भारी देनदारी का बोझ पड़ गया. इससे न्याय में गंभीर गड़बड़ी हुई है, जिसके लिए क्यूरेटिव याचिका में आर्टिकल 142 के तहत शक्तियों का इस्तेमाल करना ज़रूरी हो गया है.”
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