Friday, 27 May, 2022
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महिला अधिकारों के लिए लड़ने वाली रमाबाई रानाडे को क्यों भुला दिया गया

19वीं सदी में रमाबाई रानाडे ने सामाजिक सुधार का जो रास्ता दिखाया गया, वो काबिले-गौर है और पीछे मुड़कर उसे देखने-समझने की जरूरत है.

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19वीं और 20वीं सदी में सामाजिक, आर्थिक कारणों से बहुत कम ही महिलाएं अपने अधिकारों के लिए लड़ पाईं. लेकिन उस दौर में भी पंडिता रमाबाई और सावित्री बाई फुले जैसी कुछ महिलाएं भारतीय समाज से निकलीं जिन्होंने रुढ़िवादी बेड़ियों को तोड़ते हुए नारीवादी आंदोलन, महिला अधिकारों और शिक्षा के क्षेत्र में बेहतरीन काम किया.

लेकिन इतिहास जिस तरह पंडिता रमाबाई और सावित्री बाई फुले को याद करता है उस तरह भारत की एक और अद्वितीय महिला रमाबाई रानाडे को याद नहीं करता.

रमाबाई रानाडे न केवल महिला अधिकार को लेकर लड़ने वाली पहली सामाजिक कार्यकर्ता थीं बल्कि उन्होंने महाराष्ट्र के बॉम्बे और पूना से बाहर निकलकर भी कई सामाजिक कार्यों में भागीदारी निभाई. उन्होंने 1904 में हुए पहले महिला कांफ्रेंस का नेतृत्व किया, फिजी और केन्या में भारतीय मजदूरों के अधिकारों के सवालों को उठाया, महिलाओं के मताधिकार देने की मांग की और सबसे खास सेवा सदन की शुरुआत की जिसने सामाजिक तौर पर महिलाओं की स्थिति को बेहतर बनाया.

रमाबाई रानाडे ने अपने कामों में पूरी दुनिया को राह दिखाई और यहां तक की विषम स्थितियों में किए गए उनके काम मौजूदा पीढ़ी को भी ताज्जुब में डालते हैं.

रानाडे संभवत: पहली मराठी महिला थीं जिन्होंने अपनी जीवनी लिखी जिसका शीर्षक है- आमच्या आयुष्यातील काही आठवणी. जीवनी में उन्होंने समाज के शोषित और वंचित महिलाओं के अधिकारों की कैसे पैरवी की, इसके बारे में विस्तार से लिखा है.

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समाज की रुढ़िवादी परंपराओं को तोड़ा

रमाबाई रानाडे ने समाज की कई पुरानी परंपराओं को तोड़ा. उस दौर में बाल विवाह, महिलाओं को शिक्षा से दूर रखा जाता था लेकिन बाल विवाह होने के बाद भी रमाबाई ने पढ़ाई नहीं छोड़ी और आगे चलकर अन्य महिलाओं को सुदृढ़ बनाया.

रमाबाई ने भी समाज के उन दंशों को झेला जो उस दौर की बाकी महिलाएं झेलती थीं लेकिन उस समय बंगाल और महाराष्ट्र में समाज सुधार के आंदोलन भी तेज थे. बंगाल में इन सुधारों का नेतृत्व राजा राममोहन रॉय कर चुके थे और महाराष्ट्र में इसे जस्टिस महादेव रानाडे कर रहे थे.

संयोग की ही बात है कि रमाबाई रानाडे की शादी सिर्फ 11 साल की उम्र में समाज सुधार के अग्रणी जस्टिस महादेव गोविंद रानाडे के साथ हुई जो उनसे 21 साल छोटी थीं.

जस्टिस रानाडे ने अपने परिवार की नाराज़गी को झेलते हुए भी रमाबाई को स्कूल भेजा और उनकी शिक्षा पर ध्यान दिया. जस्टिस रानाडे की कोशिशों से रमाबाई ने मराठी, अंग्रेज़ी और बांग्ला भाषा सीखी और सार्वजनिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेने लगी और शोषित महिलाओं को संगठित किया.


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प्रार्थना समाज- जिसने रमाबाई को महिला अधिकारों के लिए लड़ना सिखाया

जस्टिस रानाडे प्रार्थना समाज के संस्थापकों में से थे, जो संस्था उन दिनों महाराष्ट्र में समाज सुधार के लिए काम करती थी. 1880 के करीब रमाबाई रानाडे भी प्रार्थना समाज के कामों से जुड़ गईं जहां उन्हें उदारवादी सोच और विचारधारात्मक तौर पर मजबूती मिली.

प्रार्थना समाज में रहते हुए उन्होंने महिलाओं को जागरूक और संगठित करना शुरू किया और उनके बीच शिक्षा के महत्व, भाषाएं सिखाना और कई अन्य तरह की ट्रेनिंग देनी शुरू की.

अपने कामों से बहुत जल्द ही रमाबाई रानाडे को पहचान मिलनी शुरू हो गई. लेकिन इन सबके पीछे उनके पति और समाज सुधारक जस्टिस रानाडे की अहम भूमिका थी, जिन्होंने तमाम सामाजिक बाधाओं को तोड़ते हुए अपनी पत्नी को आगे बढ़ाया.

1893 से लेकर 1901 के बीच रमाबाई रानाडे अपनी लोकप्रियता के चरम पर थीं. उसी दौरान उन्होंने बॉम्बे में हिंदू लेडीज़ सोशल क्लब और लिटरेरी क्लब की शुरुआत की जिसके तहत महिलाओं को सार्वजनिक तौर पर बोलने की कला और सिलाई-बुनाई का काम सिखाया जाता. उनके इन कामों की वजह से समाज के रुढ़िवादी धड़ों की तरफ से उन्हें आलोचना और विरोध भी सहना पड़ा लेकिन रमाबाई ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा.

इन सबके पीछे रमाबाई के पति जस्टिस रानाडे थे जिन्होंने सभी सामाजिक रुढ़ियों के इतर अपनी पत्नी को आगे बढ़ाया. लेकिन जब 21वीं सदी के भारत में महिलाओं के आगे बढ़ने पर विवाद खड़े हो जाते हैं तब उस दौर की तो कल्पना की ही जा सकती है. रमाबाई को भी समाज के कुछ वर्गों की आलोचना और विरोध को झेलना पड़ा लेकिन उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा.


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सेवा सदन- एक विरासत जो आज तक जिंदा है

1901 में जस्टिस रानाडे डे की मृत्यु के बाद 38 वर्षीय रमाबाई ने बॉम्बे (आज का मुंबई) छोड़कर पूना आने का फैसला किया और फुले बाजार स्थित अपने पैतृक घर में रहने लगीं. जस्टिस रानाडे की मौत के बाद एक साल तक रमाबाई सार्वजनिक कार्यों से दूर रहीं लेकिन उसके बाद उन्होंने भारत महिला परिषद की शुरुआत की.

रमाबाई ने 1908 में मुंबई में और 1909 में पूना में सेवा सदन की स्थापना की. सेवा सदन महिलाओं के लिए एक ऐसी जगह बन गया जहां वो स्वतंत्र होकर काम कर सकती थीं.

रमाबाई रानाडे द्वारा स्थापित सेवा सदन आज भी काम कर रहा है और उनकी वेबसाइट पर लिखा संदेश ही इस संगठन के बारे में सब कुछ बता देता है. संदेश में लिखा है, ‘लड़कियों को अक्सर नज़रअंदाज और सामान्य बचपन से वंचित किया जाता है, जिसमें शिक्षा का अधिकार और समान अवसर का जीवन शामिल है.’

सेवा सदन में रमाबाई के प्रयासों से समाज की वंचित और शोषित महिलाओं का जुड़ना शुरू हो गया जहां वे बुनाई-सिलाई समेत कई तरह के काम कर के अपना जीवन गुजर-बसर करती थीं.


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‘तुम्हारे घर में पिता या भाई नहीं है क्या?’

सेवा सदन का विस्तार करते हुए रमाबाई ने सेवा सदन नर्सिंग एंड मेडिकल एसोसिएशन की भी स्थापना की जिसके तहत नर्सिंग जैसी गतिविधियों में महिलाओं को शामिल किया जाने लगा. हालांकि उस वक्त इस पेशे में महिलाओं की उपस्थिति का विरोध किया जाता था और महिलाओं को भी इस पेशे से जुड़ने में झिझक रहती थी.

इस पर रमाबाई उन्हें कहतीं, ‘तुम्हारे घर में पिता या भाई नहीं है क्या? बीमार होने पर तुम उनकी सेवा-सुश्रूषा नहीं करतीं क्या? फिर पुरुष मरीजों में तुमको पिता या भाई क्यों नहीं दिखते?’

इन बातों ने महिलाओं को खासा प्रभावित किया. कहा जा सकता है कि रमाबाई ने भारत के लोगों को नर्सिंग को अच्छी निगाह से देखना सिखाया.

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने 1924 में 61 वर्ष की उम्र में रमाबाई रानाडे के निधन पर उन्हें इस तरह याद किया, ‘रमाबाई रानाडे का निधन एक बड़ी राष्ट्रीय क्षति है. वह अपने जीवनकाल में अपने पति की सच्ची मित्र और सहायक थीं.’


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वर्तमान पीढ़ी ने रमाबाई रानाडे को भुला दिया

वर्तमान पीढ़ी में बहुत कम ही लोग होंगे जो रमाबाई रानाडे के बारे में और 19वीं सदी में महिलाओं के लिए किए गए उनके कामों को जानते होंगे.

भारत के पोस्ट एंड टेलीग्राफ डिपार्टमेंट ने 15 अगस्त 1962 को उनके जन्म शताब्दी वर्ष के मौके पर एक डाक टिकट जारी किया था. उसके बाद सार्वजनिक तौर पर 2012 में ज़ी मराठी पर आए एक सीरीज़ ऊंचा माज़ा ज़ोका में रमाबाई के जीवन को विस्तार से छोटे पर्दे पर दिखाया गया. इस सीरीज़ की काफी प्रशंसा की गई.

लेकिन आज के वक्त में भी जब भारत समेत विश्व भर की महिलाओं की बड़ी आबादी रुढ़िवादी सोच के चंगुल में फंसी है और उससे निकलने की लगातार जद्दोजहद कर रही है, वैसे में 19वीं सदी में एक भारतीय महिला द्वारा सामाजिक सुधार का जो रास्ता दिखाया गया, वो काबिले-गौर है और पीछे मुड़कर उसे देखने-समझने की जरूरत है.

लेकिन बदलाव और रुढ़िवादी विचारों से आगे बढ़ने के क्रम में एक विडंबना यह भी है कि महाराष्ट्र के जिस सांगली जिले से निकलकर रमाबाई रानाडे ने समाज सुधार और महिलाओं के अधिकारों की बात की वहीं 21वीं सदी में अंतर्जातीय विवाह करने पर 150 परिवारों को समाज से बेदखल कर दिया गया.


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