गुरुग्राम: मानहानि केस से अपना नाम हटवाने की अक्षय कुमार की कोशिश नाकाम हो गई है. दिल्ली हाईकोर्ट की रजिस्ट्री ने अभिनेता अक्षय कुमार और सिनेमा चेन पीवीआर व आइनोक्स के नाम बाटा इंडिया की ओर से दायर मानहानि याचिका से हटाने की मांग खारिज कर दी है. यह केस 2017 की फिल्म जॉली एलएलबी-2 के एक सीन को लेकर है, जिसमें जूते-चप्पल ब्रांड बाटा का कथित तौर पर मज़ाक उड़ाया गया था.
संयुक्त रजिस्ट्रार (न्यायिक) डॉ. अजय गुलाटी ने कहा कि केस के सही और निष्पक्ष निपटारे के लिए तीनों—अक्षय कुमार, पीवीआर और आइनोक्स —का पक्षकार बने रहना ज़रूरी है. इसलिए 2017 से चल रहे इस मामले से खुद को अलग करने की उनकी अर्जी खारिज कर दी गई. हालांकि, पीवीआर और आइनोक्स का विलय 2023 में हुआ, लेकिन केस विलय से पहले दायर हुआ था, इसलिए दोनों के नाम अलग-अलग हैं.
रजिस्ट्री के आदेश का मतलब है कि अक्षय कुमार और थिएटर चेन के मालिकों को बाटा की छवि को नुकसान पहुंचाने के आरोप में मुकदमे का सामना करना होगा. यह मामला 2017 का है, जब जॉली एलएलबी-2 के ट्रेलर में दिखाए गए एक सीन पर बाटा ने आपत्ति जताई थी. उस सीन में अन्नू कपूर का किरदार, अक्षय कुमार के किरदार का मज़ाक उड़ाते हुए उसकी “Bata की चप्पल” को सस्ता बताता है.
हिंदी डायलॉग में “बाटा” नाम सीधे तौर पर लिया गया था.
जूता बनाने वाली कंपनी का कहना था कि इस डायलॉग से यह संदेश गया कि “बाटा सिर्फ समाज के निचले तबके के लोग पहनते हैं और बाटा पहनने पर इंसान को शर्मिंदा होना चाहिए.” फिल्म की रिलीज़ से पहले कोर्ट ने बाटा नाम के इस्तेमाल पर स्थायी रोक लगा दी थी. फिल्म निर्माताओं ने थिएटर में रिलीज़ से पहले डायलॉग बदलने पर सहमति दी और “बाटा” की जगह “फटा” शब्द इस्तेमाल किया.
लेकिन तब तक नुकसान हो चुका था. ट्रेलर सिनेमाघरों और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर चल चुका था और उसे लाखों लोग देख चुके थे. बाटा का कहना था कि यह असर वापस नहीं लिया जा सकता और उसकी साख को जो नुकसान हुआ है, उसके लिए मुआवज़ा चाहिए.
अक्षय कुमार केस में क्यों बने रहेंगे
हाईकोर्ट रजिस्ट्री ने अर्जी पर फैसला करते हुए कई वजहें बताईं, जिनके आधार पर मुख्य अभिनेता अक्षय कुमार को केस में बनाए रखना ज़रूरी बताया गया, भले ही उन्होंने वह आपत्तिजनक डायलॉग खुद न बोला हो. रजिस्ट्री ने नोट किया कि अक्षय कुमार प्रतिद्वंदी फुटवियर कंपनी रिलेक्सो/स्पार्क्स के ब्रांड एंबेसडर हैं, जिससे बाटा के व्यावसायिक हितों को नुकसान पहुंचाने की साजिश की आशंका पैदा होती है.
आदेश में कहा गया है कि कुमार के एंडोर्समेंट और ‘खिलाड़ी’ नाम को फुटवियर कैटेगरी में ट्रेडमार्क के तौर पर रजिस्टर कराने को देखते हुए “साजिश का आरोप और मजबूत होता है.” रजिस्ट्री ने यह भी अजीब बताया कि जब सीन में अक्षय कुमार के किरदार ने बाटा के जूते पहने ही नहीं थे, तो फिर बाटा का ही नाम क्यों लिया गया.
रजिस्ट्री ने यह भी कहा कि ट्रेलर को ट्वीट करना अपने आप में “मानहानि का अलग अपराध” है. अरविंद केजरीवाल बनाम राज्य केस का हवाला देते हुए कहा गया कि सोशल मीडिया पर मानहानिकारक कंटेंट शेयर या रीट्वीट करने वालों को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है, खासकर तब जब शेयर करने वाला अक्षय कुमार जैसा बड़ा सितारा हो, जिसके करोड़ों फॉलोअर्स हैं.
रजिस्ट्री ने फिल्म के निर्माण में अक्षय कुमार की भूमिका से जुड़े सबूतों पर भी गौर किया. आदेश में कहा गया है कि एक टीवी इंटरव्यू में अक्षय कुमार खुद कह चुके हैं कि वह जिन फिल्मों में काम करते हैं, उनमें से 90 प्रतिशत को वह प्रोड्यूस भी करते हैं. मीडिया रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया कि जॉली एलएलबी-2 में उन्होंने मुनाफा साझा करने वाला समझौता किया था.
हालांकि, अक्षय कुमार ने कहा कि वह फिल्म के प्रोडक्शन में शामिल नहीं थे, लेकिन रजिस्ट्री के मुताबिक ये बातें पूरी सुनवाई के लिए काफी सवाल खड़े करती हैं.
सिनेमा चेन क्यों बनी रहेंगी पार्टी
पीवीआर और आइनोक्स दोनों ने अपने नाम हटाने की मांग करते हुए कहा कि उन्होंने सिर्फ सर्टिफाइड फिल्म दिखाई और ट्रेलर चलाना उनकी कॉन्ट्रैक्ट की मजबूरी थी.
रजिस्ट्री ने यह दलील खारिज कर दी कि सेंसर बोर्ड (सीबीएफसी) की मंजूरी मिलने से उनकी जिम्मेदारी खत्म हो जाती है. आदेश में कहा गया कि “सर्टिफिकेट की प्रमाणिकता को सीधे स्वीकार नहीं किया जा सकता और यह ट्रायल का विषय होगा.”
रजिस्ट्री ने यह भी नोट किया कि बाटा से कानूनी नोटिस मिलने के बाद भी दोनों सिनेमा चेन ने ट्रेलर दिखाना जारी रखा, जब तक कि कोर्ट ने रोक नहीं लगा दी. इस दौरान “लाखों दर्शकों ने ट्रेलर देखा.”
पीवीआर का मामला इसलिए और कमजोर माना गया क्योंकि उसने वह वितरण समझौता पेश नहीं किया, जिसके आधार पर उसने ट्रेलर दिखाने की मजबूरी बताई थी. जज ने लिखा कि “बिना समझौते के कोर्ट यह नहीं तय कर सकता कि इस दलील में कितनी सच्चाई है.”
कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी भी चेन ने न तो बाटा के नोटिस का जवाब दिया और न ही फिल्म के प्रोड्यूसरों से संपर्क कर यह जानने की कोशिश की कि क्या किया जाए. लगातार ट्रेलर दिखाने और चुप्पी साधे रखने से यह साफ होता है कि वे सिर्फ सेंसर बोर्ड को जिम्मेदार ठहराकर बच नहीं सकते.
आदेश में कहा गया कि “अगर समझौता रिकॉर्ड पर नहीं भी रखा गया, तब भी नोटिस मिलने पर कम से कम वादी से बात करनी चाहिए थी” और यह भी बताया गया कि ट्रेलर रोकने को लेकर प्रोड्यूसर या डिस्ट्रीब्यूटर से कोई बातचीत नहीं हुई.
आइनोक्स के मामले में, जिसने कहा कि उसने अंग्रेज़ी सबटाइटल नहीं दिखाए थे, जिनमें “बाटा” का मतलब “सस्ता जूता” बताया गया था, रजिस्ट्री ने कहा कि यह तथ्यात्मक मुद्दा है और इसकी सुनवाई ट्रायल में होगी, क्योंकि बाटा का कहना है कि हिंदी डायलॉग अपने आप में ही मानहानिकारक था.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
