गुरुग्राम: एक महिला की अधिक भरण-पोषण की मांग खारिज करते हुए पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने उसे निर्देश दिया कि वह अपनी मौजूदा मासिक गुजारा भत्ता राशि का कम से कम 10 प्रतिशत अपनी व्यावसायिक कौशल सुधारने पर खर्च करे.
10 दिसंबर को दिए गए फैसले में जस्टिस आलोक जैन ने कहा कि भरण-पोषण मामलों में उद्देश्य केवल जीविका चलाना नहीं, बल्कि याचिकाकर्ता को गरिमा के साथ जीवन जीने में सक्षम बनाना भी है.
इसी आधार पर उन्होंने कहा कि भरण-पोषण की राशि का एक हिस्सा कौशल विकास और आत्म-विकास पर खर्च किया जाना चाहिए, ताकि आर्थिक स्वतंत्रता और दीर्घकालिक आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिले.
पारिवारिक अदालत द्वारा महिला का भरण-पोषण 7,500 रुपये से बढ़ाकर 15,000 रुपये यानी पति की शुद्ध सैलरी के एक-तिहाई किए जाने से संतुष्ट न होकर महिला ने हाई कोर्ट का रुख किया था.
महिला ने पति की कुल सैलरी 58,016 रुपये के एक-तिहाई की मांग की थी और दलील दी थी कि भविष्य निधि जैसे स्वैच्छिक कटौतियों को भरण-पोषण तय करते समय नहीं जोड़ा जाना चाहिए.
हालांकि हाई कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया.
अपने आदेश में जस्टिस जैन ने कहा कि याचिकाकर्ता अपने वास्तविक खर्चों में किसी वृद्धि या वित्तीय कठिनाई को साबित करने में असफल रही. आदेश में कहा गया कि पति भी एक इंसान है और इस देश का नागरिक है, जिसे गरिमा के साथ जीवन जीने का समान अधिकार है.
हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि पारिवारिक अदालत ने महिला के वास्तविक खर्चों से जुड़े किसी भी सबूत की जांच किए बिना भरण-पोषण बढ़ाने का आदेश एक तरह से यांत्रिक तरीके से पारित कर दिया था. केवल यह कहना कि बुनियादी जरूरतें महंगी हो गई हैं और 7,500 रुपये में गुजारा करना मुश्किल है, पर्याप्त नहीं है.
जज ने उस प्रवृत्ति का भी उल्लेख किया, जिसे उन्होंने मुकदमेबाजी की एक अजीब प्रवृत्ति बताया, जहां पत्नियां अलग रहने के लिए किसी ठोस या उचित कारण को साबित किए बिना भरण-पोषण की याचिकाएं दाखिल करती हैं और उन्हें आक्रामक तरीके से आगे बढ़ाती हैं.
हालांकि जस्टिस जैन ने माना कि भरण-पोषण केवल न्यूनतम गुजारे तक सीमित नहीं है, बल्कि गरिमा के साथ जीवन से जुड़ा है, लेकिन उन्होंने आत्मनिर्भरता पर जोर दिया.
उन्होंने कहा कि आर्थिक स्वतंत्रता और दीर्घकालिक आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने के लिए भरण-पोषण की राशि का एक हिस्सा कौशल सुधार और आत्म-विकास पर खर्च किया जाना चाहिए.
इसी के तहत अदालत ने आदेश दिया कि याचिकाकर्ता को हर महीने मिलने वाले 15,000 रुपये के भरण-पोषण में से कम से कम 10 प्रतिशत यानी 1,500 रुपये अपनी व्यावसायिक कौशल सुधारने पर खर्च करने होंगे.
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