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Thursday, 10 September, 2026
होमदेशNSA और गुंडा एक्ट के तहत UP के मामले इलाहाबाद HC में बार-बार क्यों रद्द हो रहे हैं?

NSA और गुंडा एक्ट के तहत UP के मामले इलाहाबाद HC में बार-बार क्यों रद्द हो रहे हैं?

पिछले दो सालों में इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेशों की समीक्षा से पता चलता है कि उत्तर प्रदेश में NSA और गुंडा एक्ट के इस्तेमाल का एक ही पैटर्न बार-बार देखने को मिलता है.

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नई दिल्ली: “पहले से टाइप किया हुआ” नजरबंदी आदेश, “तय प्रिंटेड प्रोफॉर्मा”, ऐसे मामलों की बहुत कम संख्या जिनसे किसी असाधारण रोकथाम कानून को लागू करने का आधार नहीं बनता, और फिर अदालत का यह कहना कि कानूनी शर्तें पूरी नहीं हुई थीं. 2024 से 2026 के बीच इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेशों की समीक्षा से पता चलता है कि उत्तर प्रदेश में दो कानूनों, राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) और राज्य के गुंडा एक्ट, के तहत रोकथाम की शक्तियों के इस्तेमाल में यह बार-बार देखने को मिला है.

दोनों कानूनों में से एक केंद्रीय कानून है और दूसरा राज्य का कानून. दोनों के तहत सरकार इस आधार पर किसी व्यक्ति की आजादी पर रोक लगा सकती है कि वह सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा पैदा कर सकता है.

हाल ही में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने नोएडा की जिला मजिस्ट्रेट (DM) मेधा रूपम की ओर से छात्र कार्यकर्ता आकृति चौधरी के खिलाफ जारी NSA के आदेश को रद्द कर दिया. यह कोई अकेला मामला नहीं था. कई मामलों में हाई कोर्ट ने उन तरीकों की पहचान की है, जिनके जरिए DM ने ऐसे कड़े कानूनों को लागू किया. बाद में अदालत ने उन आदेशों को रद्द कर याचिकाकर्ताओं को रिहा करने का आदेश दिया.

पिछले हफ्ते जस्टिस अतुल श्रीधरन और अचल सचदेव की पीठ ने नोएडा में मजदूरों के विरोध प्रदर्शन के बाद चौधरी पर NSA लगाने के लिए गौतम बुद्ध नगर की DM मेधा रूपम को कड़ी फटकार लगाई. हाई कोर्ट ने 25 वर्षीय चौधरी को मुआवजा देने का आदेश दिया. साथ ही DM और उन सभी अधिकारियों की सैलरी से 5 लाख रुपये वसूलने का निर्देश दिया, जो इस कार्रवाई के लिए जिम्मेदार हो सकते हैं. इनमें वह थाना प्रभारी (SHO) भी शामिल था, जिसने NSA के तहत उसकी नजरबंदी की सिफारिश वाली शुरुआती रिपोर्ट तैयार की थी.

बुधवार को सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि उत्तर प्रदेश सरकार इलाहाबाद हाई कोर्ट के इस आदेश को चुनौती देगी.

राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA), 1980 के तहत सरकार किसी व्यक्ति को बिना औपचारिक आरोप या मुकदमे के 12 महीने तक हिरासत में रख सकती है. इसका मकसद ऐसे व्यक्ति को किसी ऐसे काम से रोकना है, जिससे राष्ट्रीय सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था को नुकसान पहुंचने की आशंका हो.

उत्तर प्रदेश गुंडा नियंत्रण अधिनियम, 1970 के तहत जिला मजिस्ट्रेट किसी व्यक्ति की आवाजाही पर रोक लगा सकता है, उसे किसी तय स्थानीय इलाके में जाने से रोक सकता है या उसे इलाके से बाहर कर सकता है. इसे एक्सटर्नमेंट कहा जाता है. इसके अलावा, उसे नियमित रूप से पुलिस थाने में रिपोर्ट करने के लिए भी कहा जा सकता है, अगर उसे सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा माना जाता है. इस कानून को लागू करने के लिए यह साबित होना जरूरी है कि व्यक्ति आदतन अपराध करता है, समुदाय के लिए खतरा है या उसके व्यवहार से लोगों या संपत्ति को डर, खतरा या नुकसान हो रहा है.

मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने भी सवाल उठाया कि क्या किसी आरोपी का कबूलनामा NSA के तहत नजरबंदी का आधार बन सकता है. जस्टिस दीपांकर दत्ता और शील नागू की पीठ 2024 के संभल हिंसा मामले के कथित मास्टरमाइंड आरोपी की NSA के तहत नजरबंदी की वैधता पर सुनवाई कर रही थी.

जस्टिस दत्ता ने मौखिक रूप से कहा कि रोकथाम के तहत हिरासत न्यायिक काम नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक विवेक का मामला है. इसका इस्तेमाल लागू दिशानिर्देशों के अनुसार किया जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि अगर ऐसे दिशानिर्देश नहीं हैं, तो अधिकारी को “तर्कसंगत और निष्पक्ष” तरीके से काम करना चाहिए.

दिप्रिंट ने उन कारणों का ब्योरा दिया है, जिनका हवाला DM ने इन कड़े कानूनों को लागू करने के लिए दिया. साथ ही उन आधारों को भी देखा है, जिन पर अदालतों ने इन आदेशों को रद्द किया. इनमें आदेशों का “पहले से टाइप” होना और किसी व्यक्ति को ‘गुंडा’ बताए जाने के सामाजिक असर जैसे मामले शामिल हैं.

पहले से टाइप आदेश और सामान्य अपराध को NSA के स्तर तक ले जाना

इस साल जुलाई में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने जालौन के DM की ओर से दो लोगों के खिलाफ NSA के तहत जारी आदेश को रद्द कर दिया. इन दोनों पर जबरन वसूली, लूट, शरारत और आपराधिक धमकी देने के आरोप थे.

अदालत ने कहा कि आदेश से साफ था कि “यह पहले से टाइप किया हुआ नजरबंदी आदेश है, जिसे नजरबंदी का आदेश देने वाले अधिकारी के सामने रखा गया और उन्होंने उस पर सिर्फ अपने हस्ताक्षर किए. तारीख भी उनके कार्यालय में काम करने वाले किसी अधिकारी की लिखावट में भरी गई थी.” आरोपियों शादाब खान और माजिद खान ने हाई कोर्ट में NSA के आदेश को चुनौती दी थी.

अदालत ने प्रक्रिया में हुई कमियों को भी बताया. उसने कहा कि याचिकाकर्ता की शिकायत पर केंद्र सरकार ने “बहुत धीमी गति से” विचार किया और फैसला करीब 17 दिन बाद लिया गया. इस वजह से रोकथाम के तहत हिरासत गैरकानूनी हो गई.

अदालत ने कहा कि “केंद्र या राज्य सरकार किसी व्यक्ति को सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए हिरासत में ले सकती थी. लेकिन सार्वजनिक व्यवस्था और कानून-व्यवस्था की समस्या में अंतर है. अगर सार्वजनिक व्यवस्था में गड़बड़ी होती, तो पूरे समुदाय की सामान्य जिंदगी प्रभावित होती. जबकि इस मामले में ऐसी कोई स्थिति पैदा नहीं हुई.”

इसलिए अदालत ने कहा, “इसे सार्वजनिक व्यवस्था में गड़बड़ी नहीं कहा जा सकता. ज्यादा से ज्यादा यह कानून-व्यवस्था की समस्या हो सकती है. ऐसी स्थिति से निपटने के लिए सामान्य आपराधिक कानून पर्याप्त है.” हालांकि, अदालत ने कहा कि “जालौन के DM ने केवल पुलिस की रिपोर्ट के आधार पर नजरबंदी का आदेश पारित कर दिया.”

इसी महीने हाई कोर्ट ने अमेठी के DM की ओर से गुंडा एक्ट के तहत जारी एक आदेश को भी रद्द कर दिया. अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता की दो आपराधिक मामलों में संलिप्तता, एक 2021 का और दूसरा 2025 का, उसे आदतन अपराधी साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं थी. आदतन अपराधी होना ऐसी कार्रवाई के लिए जरूरी आधार है. अदालत ने यह भी कहा कि ऐसा कोई आरोप नहीं था कि वह सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा है या इस मामले से सामान्य आपराधिक कानून के तहत निपटा नहीं जा सकता.

इससे पहले मई में हाई कोर्ट ने वाराणसी के कमिश्नर की ओर से गुंडा एक्ट के तहत एक व्यक्ति के खिलाफ जारी दो आदेशों को रद्द कर दिया था. इस व्यक्ति के खिलाफ दो मामले थे. एक में दंगा और आपराधिक धमकी देने का आरोप था, जबकि दूसरे में अपहरण, आपराधिक धमकी और नाबालिग के यौन उत्पीड़न का आरोप था.

आरोपी ने इन आदेशों को चुनौती देते हुए कहा था कि ये सिर्फ दो मामलों के आधार पर जारी किए गए थे और किसी भी मामले में उसे दोषी नहीं ठहराया गया था. जस्टिस संदीप जैन ने याचिका मंजूर करते हुए कहा कि “सिर्फ एक या दो आपराधिक मामलों के आधार पर किसी व्यक्ति को ‘गुंडा’ नहीं कहा जा सकता.”

अदालत ने कहा, “राज्य की ऐसी दंडात्मक कार्रवाई से ऐसे व्यक्ति और उसके परिवार की प्रतिष्ठा को अपूरणीय नुकसान होता है.”

मई के एक और मामले में हाई कोर्ट ने संभल के DM की ओर से दो लोगों के खिलाफ जारी NSA के आदेश को रद्द कर दिया. इन दोनों पर गाय काटने और उन्हें ले जाने का आरोप था. उन पर हिंदू समुदाय की भावनाओं को “भड़काने” और सार्वजनिक कानून-व्यवस्था को बिगाड़ने का आरोप लगाया गया था.

हाई कोर्ट ने कहा कि राज्य में गाय काटना अपराध है. लेकिन यह भी साफ था कि कथित घटना किसी सार्वजनिक जगह पर नहीं, बल्कि एक घर की चारदीवारी के अंदर हुई थी. किसी अपराध के लिए सार्वजनिक जगह पर घटना होना जरूरी तत्व था. अदालत ने कहा कि इस मामले में हिंसा, सार्वजनिक शांति और व्यवस्था में गड़बड़ी या सांप्रदायिक तनाव नहीं हुआ था. साथ ही सिर्फ एक गाय काटे जाने का मामला था. इसलिए अदालत ने कहा कि नजरबंदी का आदेश “कानून या तथ्य, किसी भी आधार पर” टिक नहीं सकता.

‘बड़े पैमाने पर दुरुपयोग’

जुलाई 2024 के एक आदेश में हाई कोर्ट ने मऊ के DM की ओर से गुंडा एक्ट के तहत जारी आदेश को रद्द कर दिया था. अदालत ने रोकथाम वाले इस कानून के “बड़े पैमाने पर दुरुपयोग” पर कड़ी नाराजगी जताई.

याचिकाकर्ता चंदन राणा दो पक्षों के बीच मंदिर की जमीन को लेकर विवाद में फंसा था. इसी संपत्ति से जुड़ा एक और आपराधिक मामला भी उसके खिलाफ था. चूंकि उसके खिलाफ सिर्फ दो मामले दर्ज थे, अदालत ने आदेश को कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं माना.

आदेश रद्द करते हुए जस्टिस सिद्धार्थ ने कहा कि DM को ऐसी असाधारण और असामान्य शक्तियों का इस्तेमाल करने से पहले “पूरी सावधानी और ध्यान” रखना चाहिए. उन्होंने कहा, “लेकिन हम देख रहे हैं कि इस कानून के प्रावधानों का बड़े पैमाने पर दुरुपयोग हो रहा है.”

उन्होंने आगे कहा, “कार्यकारी अधिकारी बाहरी कारणों से इन असाधारण शक्तियों का मनमाने और अपनी इच्छा के मुताबिक इस्तेमाल कर रहे हैं और सिर्फ एक मामले या कुछ बीट रिपोर्ट के आधार पर नोटिस जारी कर रहे हैं.” उन्होंने कहा कि इससे इस कड़े कानून का असर “कमजोर” हो रहा है.

उन्होंने कहा, “गुंडा एक्ट के प्रावधानों का बिना सोचे-समझे इस्तेमाल और लोगों को नोटिस भेजना कार्यकारी अधिकारियों की इच्छा या पसंद पर निर्भर नहीं हो सकता. सिर्फ एक मामले के आधार पर नोटिस जारी करना काफी परेशान करने वाला और अनावश्यक है. इससे मुकदमों का बोझ बढ़ रहा है.”

अदालत ने कहा कि मामले में नोटिस “तय प्रिंटेड प्रोफॉर्मा” पर जारी किए गए थे और कार्यकारी अधिकारियों ने इस पर अपना दिमाग नहीं लगाया था.

हाई कोर्ट ने कहा, “इतना ही नहीं, लंबित एक मामले और एक बीट रिपोर्ट को गिनाने के अलावा, याचिकाकर्ता के खिलाफ लगाए गए आरोपों की सामान्य प्रकृति बताने वाली कोई ठोस सामग्री नहीं थी. इससे पूरा नोटिस पहली नजर में ही दोषपूर्ण हो जाता है और इस पर आगे कार्रवाई नहीं की जा सकती.”

अदालत ने गुंडा एक्ट और उत्तर प्रदेश गैंगस्टर्स एंड एंटी-सोशल एक्टिविटीज (प्रिवेंशन) एक्ट, 1986 के प्रावधानों को “बिना सोचे-समझे और लापरवाही से” लगाने के इस तरह के “रूटीन तरीके से प्रावधान चिपकाने” पर अपनी “कड़ी नाराजगी” दर्ज की.

हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को गुंडा एक्ट लागू करने को लेकर एक समान दिशानिर्देश बनाने का निर्देश दिया.

सितंबर 2024 में हाई कोर्ट ने गाजियाबाद के DM की ओर से दंगा और हत्या के आरोपी एक व्यक्ति के खिलाफ जारी NSA के आदेश को रद्द कर दिया. उसे 15 दिनों के भीतर कम से कम चार आदेश जारी किए गए थे, जिनके तहत उसे एक साल के लिए रोकथाम वाली हिरासत में रखने का निर्देश दिया गया था.

हालांकि, अदालत ने कहा कि उसका नाम FIR में नहीं था. उसका नाम बाद में दर्ज एक अतिरिक्त बयान में सामने आया था, जिसमें उसे पहले अज्ञात बताए गए हमलावरों में से एक के रूप में पहचाना गया था. अदालत ने कहा कि उसके खिलाफ कोई स्पष्ट आपराधिक भूमिका भी नहीं बताई गई थी.

जस्टिस अरविंद सिंह सांगवान और जस्टिस मोहम्मद अजहर हुसैन इदरीसी की पीठ ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता ने DM के सामने 30 आधारों पर आपत्ति और अपना पक्ष रखा था. इनमें मुख्य रूप से यह कहा गया था कि उसे सुनवाई का उचित मौका नहीं दिया गया, उसकी हिरासत का आधार बनी रिपोर्ट उसे नहीं दी गई और सही प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया. उसने यह भी बताया था कि मामले में आधार बनाए गए दो अन्य FIR हरियाणा में दर्ज थे, उत्तर प्रदेश में नहीं.

उत्तर प्रदेश सरकार के वकील की इस दलील पर कि आरोपी ने NSA वाले मामले को छोड़कर कई मामलों में जमानत हासिल कर ली थी, अदालत ने इस तय सिद्धांत पर जोर दिया कि NSA का इस्तेमाल “सिर्फ किसी व्यक्ति को अदालत में जमानत के लिए आवेदन करने के अपने अधिकार का इस्तेमाल करने से रोकने के लिए नहीं किया जा सकता.”

अप्रैल 2024 के एक आदेश में हाई कोर्ट ने मुरादाबाद जिला प्रशासन की ओर से मोहम्मद उमैर के खिलाफ जारी कारण बताओ नोटिस को रद्द करते हुए कहा था कि पहले के एक आदेश के बावजूद, “राज्य सरकार ने जिला मजिस्ट्रेटों को कानून लागू करने के बारे में कोई दिशानिर्देश जारी करने की जहमत नहीं उठाई है और जिला मजिस्ट्रेट तथा उनके अधीन अधिकारी लगातार गुंडा एक्ट के तहत गैरकानूनी नोटिस जारी कर रहे हैं.”

अदालत ने कहा कि महिलाओं या लड़कियों के अपहरण के आरोपी उमैर को आदतन अपराधी नहीं माना जा सकता और उसके खिलाफ “सिर्फ एक मामला दर्ज था.”

जस्टिस सुरेंद्र सिंह और सिद्धार्थ की डिविजन बेंच ने कहा कि मुरादाबाद के DM ने कारण बताओ नोटिस “कानून से मिली शक्ति का दुरुपयोग करते हुए जारी किया और अपने आधिकारिक कर्तव्यों को निभाते समय निष्पक्षता की उम्मीद के खिलाफ काम किया.” अदालत ने नोटिस रद्द कर दिया और उत्तर प्रदेश सरकार को याचिकाकर्ता को 1 लाख रुपये देने का निर्देश दिया.

इनमें से लगभग सभी आदेश 2023 के ऐतिहासिक गोवर्धन बनाम उत्तर प्रदेश मामले पर आधारित हैं. इस मामले में हाई कोर्ट ने कहा था कि “यह ‘गुंडा’ शब्द अपने आप में बदनामी का बड़ा बोझ लेकर आता है. जब कार्यकारी अधिकारी किसी व्यक्ति को लापरवाही और गैर-जिम्मेदारी से गुंडा बताते हैं, तो इससे उसका पूरा भविष्य और प्रतिष्ठा बर्बाद हो सकती है और उसके नाम तथा उसके परिवार की प्रतिष्ठा को अपूरणीय नुकसान हो सकता है.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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