नयी दिल्ली, 29 अप्रैल (भाषा) विश्व हिंदू परिषद (विहिप) ने बुधवार को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश की उन टिप्पणियों पर चिंता जताई, जिनमें उन्होंने मुस्लिम समुदाय के सदस्यों पर हुए हमलों से जुड़े मामलों को संभालने के तरीके को लेकर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) की आलोचना की थी।
आयोग ने संयम बरतने की अपील करते हुए कहा कि संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को ऐसे बयान देने से बचना चाहिए, जिनसे सांप्रदायिक सौहार्द बिगड़ सकता हो।
विहिप के अध्यक्ष आलोक कुमार ने एक बयान के माध्यम से न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन की टिप्पणियों पर आपत्ति जताते हुए कहा कि उन्होंने चुनिंदा तौर पर केवल एक समुदाय से जुड़ी घटनाओं का जिक्र किया है, जबकि अपराध तो व्यक्ति करते हैं, चाहे उनका धर्म कोई भी हो।
उन्होंने कहा, “हमारा मानना है कि किसी भी व्यक्ति की पीट-पीटकर हत्या चाहे उसका धर्म कोई भी हो…निंदनीय, गैर-कानूनी और दंडनीय है। हमारा यह भी मानना है कि जो लोग अपराधों में लिप्त होते हैं, उन्हें उनके अंजाम भुगतने चाहिए, चाहे वे किसी भी धर्म के हों। अपराधियों का कोई धर्म नहीं होता और उनके कृत्य पूरे सभ्य समाज के खिलाफ होते हैं।”
कुमार ने ऐसे मुद्दों के “चुनिंदा तरीके से जिक्र करने” पर भी सवाल उठाया और उन टिप्पणियों को अनुचित करार दिया।
उन्होंने इस बात का संज्ञान लिया कि पीठ में मौजूद दूसरे न्यायाधीश ने भी इससे असहमति जताई थी।
आलोक कुमार ने कहा, “तो फिर, ऐसे मुद्दों को चुनिंदा तरीके से क्यों उठाया जा रहा है? क्या इसका मतलब यह है कि हिंदुओं की पीट-पीटकर हत्या करना गलत नहीं है? मेरा मानना है कि ऐसी टिप्पणियां अनावश्यक और अनुचित हैं। यहां तक कि उसी पीठ के दूसरे न्यायाधीश ने भी कहा कि इन टिप्पणियों की कोई आवश्यकता नहीं थी और उन्होंने इससे असहमति व्यक्त की।”
यह मामला ‘टीचर्स एसोसिएशन मदरिस अरेबिया’ द्वारा दायर एक याचिका से संबंधित है, जिसमें मानवाधिकार आयोग के आदेश के बाद लखनऊ में ‘आर्थिक अपराध शाखा’ द्वारा 558 मदरसों के खिलाफ की जा रही जांच को चुनौती दी गई है।
एनएचआरसी ने एक शिकायत पर कार्रवाई की थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि मदरसे अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के अधिकारियों की मिलीभगत से चल रहे थे और निर्धारित मानकों को पूरा किए बिना सरकारी अनुदान प्राप्त कर रहे थे।
शिकायत में शिक्षकों की भर्ती में भी अनियमितताओं का आरोप लगाया गया था।
उच्च न्यायालय में दायर याचिका में यह तर्क दिया गया कि एनएचआरसी के पास घटना की तारीख से एक वर्ष से अधिक समय बाद हुए कथित उल्लंघनों की जांच का आदेश देने का अधिकार नहीं है।
यह मामला 558 मदरसों के खिलाफ जांच के एनएचआरसी के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका से जुड़ा है।
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन ने आयोग की आलोचना की थी, जबकि न्यायमूर्ति विवेक सारन ने इससे असहमति जताई।
भाषा राखी वैभव
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