देहरादून, 27 मार्च (भाषा) उत्तराखंड के देहरादून में रसोई गैस सिलेंडरों की किल्लत ने ‘स्टूडेंट हब’ कहे जाने वाले करनपुर क्षेत्र में रहने वाले छात्रों और खाद्य पदार्थों के कारोबारियों को बुरी तरह प्रभावित किया है।
इस क्षेत्र में दो स्नातकोत्तर महाविद्यालय- डीएवी पीजी कॉलेज और डीबीएस पीजी कॉलेज स्थित हैं जहां देहरादून और आसपास के क्षेत्रों के अलावा पहाड़ के दूर-दराज के इलाकों से भी पढ़ाई करने के लिए छात्र आते हैं। इसके अलावा, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने के लिए भी छात्र यहां आकर रहते हैं।
किराये के कमरों में रहने वाले अधिकतर छात्र खाने के लिए आसपास के सस्ते ढाबों, रेस्तरां व टिफिन सेवाओं पर निर्भर रहते हैं जबकि खाद्य पदार्थों के कारोबारियों की रोजी रोटी भी इन्हीं छात्रों से चलती है।
आम तौर पर दिन भर छात्रों की चहल-पहल से गुलजार रहने वाला करनपुर इन दिनों शांत सा नजर आता है क्योंकि रसोई गैस (एलपीजी) सिलेंडरों खास तौर से वाणिज्यिक सिलेंडरों की किल्लत का इस इलाके पर काफी असर पड़ा है।
टिहरी के रहने वाले रोशन लाल ने करीब नौ महीने पहले यहां एक छोटा रेस्तरां और टिफिन सेवा शुरू की थी। कुछ समय पहले तक उनका काम अच्छा चल रहा था, लेकिन अब हालात ऐसे हैं कि दुकान बंद करने की नौबत आ गई है।
रोशन लाल ने कहा, ”गैस सिलेंडर मिल ही नहीं रहा है। जो कर्मचारी थे, वह भी ज्यादातर घर लौट गए हैं। हर महीने 20,000 रुपये किराया है, इसके अलावा बिजली-पानी का बिल अलग है। ऐसे में काम चलाना बेहद मुश्किल हो गया है।”
उनके मुताबिक, गैस सिलेंडर महंगा मिलने के कारण उन्हें खाने के टिफिन की कीमत भी 50 रुपये से बढ़ाकर 70 रुपये करनी पड़ी और सीमित बजट वाले छात्रों के लिए यह राशि देना भी काफी मुश्किल हो गया है।
लाल ने कहा, ” कई बच्चे सिर्फ इस वजह से घर लौट गए क्योंकि उन्हें नियमित और सस्ता खाना नहीं मिल पा रहा था।”
इसी क्षेत्र में मिठाई की दुकान चलाने वाले प्रशांत माहेश्वरी ने कहा, ”गैस नहीं मिल रही है, काम बुरी तरह प्रभावित है। अभी डीजल स्टोव से काम चला रहे हैं, लेकिन यह स्थायी समाधान नहीं है।”
वहीं ‘फास्ट फूड’ का रेस्तरां चलाने वाले प्रीतिंदर ने भी माना कि स्थिति चुनौतीपूर्ण हो गयी है।
प्रीतिंदर ने कहा, ”हम महीने में करीब 10 सिलेंडर इस्तेमाल करते थे। अब गैस मिलना मुश्किल है, तो इंडक्शन और तंदूर का सहारा लेना पड़ रहा है। लेकिन, इससे काम धीमा हो गया है और बिक्री 50-60 फीसदी तक गिर गई है।”
कुछ कारोबारियों ने अब पुराने तरीकों की ओर रुख करना शुरू कर दिया है। रेस्तरां संचालक अमृत सिंह अपनी गाड़ी में लकड़ियां लेकर आते हैं।
उन्होंने कहा, ”बच्चे रोज खाना खाने आते हैं, उनकी मांग पूरी करनी है। इसलिए हमने तंदूर बनाया है और लकड़ी से खाना बना रहे हैं।”
भाषा
दीप्ति रवि कांत
यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.