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Friday, 29 May, 2026
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उत्तराखंड, गुजरात और अब असम: शादी से उत्तराधिकार तक, तीनों राज्यों के UCC मॉडल में क्या फर्क है

असम UCC लागू करने वाला भारत का तीसरा राज्य बनने जा रहा है. इसे संविधान के अनुच्छेद 44 में बताए गए राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांतों को लागू करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है.

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नई दिल्ली: असम विधानसभा ने बुधवार को यूनिफॉर्म सिविल कोड यानी यूसीसी बिल 2026 पास कर दिया. यह कानून धर्म से अलग एक समान कानूनी व्यवस्था बनाएगा, जो शादी, तलाक, उत्तराधिकार और लिव-इन रिलेशनशिप को नियंत्रित करेगा.

असम अब उत्तराखंड और गुजरात के बाद भारत का तीसरा राज्य बनने जा रहा है, जहां यूसीसी लागू होगा. इसे संविधान के अनुच्छेद 44 में दिए गए राज्य नीति के निदेशक सिद्धांत को लागू करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है.

यूसीसी का मतलब ऐसे समान नागरिक कानूनों से है जो शादी, तलाक, संपत्ति, उत्तराधिकार और गोद लेने जैसे व्यक्तिगत मामलों को सभी नागरिकों के लिए एक समान नियमों के तहत लाते हैं. इससे धर्म आधारित व्यक्तिगत कानूनों की जगह एक समान कानूनी ढांचा लागू होता है.

कानून के दायरे और बुनियादी ढांचे की बात करें तो तीनों राज्यों में काफी समानता दिखाई देती है.

शादी

शादी के कानूनों में तीनों राज्यों में लगभग पूरी समानता है. उत्तराखंड, गुजरात और असम में पुरुषों के लिए शादी की न्यूनतम उम्र 21 साल और महिलाओं के लिए 18 साल तय की गई है. तीनों राज्यों में बहुविवाह यानी एक से ज्यादा शादी पर रोक है.

तीनों कानून शादी का पंजीकरण अनिवार्य बनाते हैं. इससे सिर्फ धार्मिक रस्मों से आगे बढ़कर शादी को कानूनी रूप से दर्ज करना जरूरी हो गया है.

इससे कानूनी स्पष्टता और सरकारी निगरानी मजबूत होगी और सभी शादियां एक समान ढांचे के तहत दर्ज और नियंत्रित होंगी.

इसके अलावा तीनों राज्यों ने आदिवासी समुदायों की शादियों को यूसीसी के दायरे से बाहर रखा है. ऐसा संवैधानिक सुरक्षा और उनकी परंपराओं को बचाने के लिए किया गया है.

लिव-इन रिलेशनशिप

एक बड़ा बदलाव लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर किया गया है. यह पारंपरिक पारिवारिक कानूनों से आगे बढ़ने वाला कदम माना जा रहा है.

कानून के तहत लिव-इन रिलेशनशिप का पंजीकरण जरूरी होगा, खासकर तब जब जोड़ा एक तय समय तक साथ रह रहा हो. इसका उद्देश्य कानूनी पहचान और जवाबदेही सुनिश्चित करना है.

इन कानूनों का मकसद ऐसे रिश्तों से जुड़े महिलाओं और बच्चों के अधिकारों की रक्षा करना है. बच्चों को शादीशुदा या बिना शादी वाले रिश्ते से जन्म लेने पर बराबर उत्तराधिकार अधिकार दिए जाएंगे और महिलाओं को छोड़े जाने से सुरक्षा मिलेगी.

इन प्रावधानों का बड़ा उद्देश्य बिना शादी साथ रहने वाले रिश्तों को कानूनी ढांचे में लाना, गलत इस्तेमाल कम करना और उत्तराधिकार, भरण-पोषण और शोषण से सुरक्षा के कानूनों में शामिल करना है. हालांकि आलोचकों का कहना है कि अनिवार्य पंजीकरण निजता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन कर सकता है.

उत्तराखंड पहला राज्य था जिसने लिव-इन रिलेशनशिप को कानूनी मान्यता दी और उनका पंजीकरण अनिवार्य किया. इसमें पार्टनर के भरण-पोषण और ऐसे रिश्तों से पैदा हुए बच्चों की वैधता से जुड़े प्रावधान भी हैं.

असम ने भी लगभग इसी मॉडल को अपनाया है और कुछ छोटे प्रक्रियात्मक बदलाव किए हैं.

वहीं गुजरात ने ज्यादा सख्त तरीका अपनाया है. वहां पंजीकरण न कराने और नियम तोड़ने पर कड़ी सजा और जुर्माने का प्रावधान किया गया है.

इस तरह तीनों राज्यों ने लिव-इन रिलेशनशिप को मान्यता दी है, लेकिन नियम लागू करने के स्तर पर अंतर है. गुजरात ज्यादा सख्त पालन वाले ढांचे की तरफ बढ़ा है.

उत्तराधिकार

यूसीसी लागू होने से पहले इन राज्यों में संपत्ति और उत्तराधिकार धर्म आधारित व्यक्तिगत कानूनों से तय होते थे.

हिंदू, बौद्ध, जैन और सिख हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 के तहत आते थे. मुसलमान कुरान से जुड़े व्यक्तिगत कानूनों का पालन करते थे. ईसाई और पारसी भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम 1925 के तहत आते थे.

इन व्यवस्थाओं में वारिसों के अधिकार, हिस्सेदारी और महिलाओं के अधिकारों में काफी अंतर था.

यूसीसी इन अलग-अलग व्यवस्थाओं की जगह एक समान धर्मनिरपेक्ष कानून लाता है, जो सभी निवासियों पर लागू होगा, सिवाय अनुसूचित जनजातियों के.

असम, गुजरात और उत्तराखंड के यूसीसी ढांचे में पारंपरिक हिंदू वारिस व्यवस्था से हटकर नियम बनाए गए हैं. क्लास 1 वारिसों में पति-पत्नी, बेटे, बेटियां और मां जैसे करीबी परिवार शामिल होते हैं. क्लास 2 में पिता और भाई-बहन आते हैं. क्लास 2 को संपत्ति तभी मिलेगी जब क्लास 1 वारिस न हों.

यूसीसी उत्तराधिकार को आसान बनाता है. पति-पत्नी, बच्चे और माता-पिता को बराबर अधिकार मिलेंगे.

बेटों और बेटियों को बराबर हिस्सा मिलेगा. इससे पुराने लैंगिक भेदभाव खत्म होंगे, जैसे मुस्लिम बेटियों को बेटों से आधा हिस्सा मिलना या हिंदू विधवाओं को पहले सीमित अधिकार मिलना.

कोपार्सनरी एक हिंदू संयुक्त परिवार का समूह होता है जिसमें सदस्य जन्म से पैतृक संपत्ति में अधिकार हासिल करते हैं और बंटवारे तक उसे साझा रूप से रखते हैं.

अगर किसी व्यक्ति ने वैध वसीयत बनाई है तो यूसीसी उसमें दखल नहीं देगा. यह सिर्फ उन मामलों में लागू होगा जहां व्यक्ति बिना वसीयत के मरता है.

दंड प्रावधान

सबसे बड़ा अंतर सजा और नियम लागू करने के तरीकों में दिखाई देता है.

उत्तराखंड ने अपेक्षाकृत संतुलित तरीका अपनाया है. वहां मुख्य ध्यान नियम बनाने और पंजीकरण जैसी प्रशासनिक व्यवस्थाओं के जरिए पालन सुनिश्चित करने पर है. साथ ही नियम न मानने पर सजा का प्रावधान भी है.

गुजरात ने इसे और सख्त बनाया है. वहां शादी या लिव-इन रिश्ते का पंजीकरण न कराने पर जुर्माने जैसे कड़े प्रावधान हैं.

असम ने भी लगभग इसी ढांचे को अपनाया है, लेकिन कुछ मामलों में जुर्माने के साथ जेल की सजा का प्रावधान भी रखा है, खासकर लिव-इन रिलेशनशिप के पंजीकरण न कराने पर.

इस मामले में असम और उत्तराखंड नियम लागू करने पर ज्यादा जोर देते हैं, जबकि गुजरात का दंड ढांचा भी काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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