प्रयागराज, 22 जनवरी (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने चोरी के एक मामले में इसलिए आपराधिक मुकदमा रद्द कर दिया है क्योंकि संबंधित मजिस्ट्रेट द्वारा दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 468 के तहत निर्धारित तीन साल की अवधि के बाद इसका संज्ञान लिया गया।
न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार गिरि ने लखनऊ स्थित न्यायिक प्रशिक्षण एवं अनुसंधान संस्थान को प्रदेश में न्यायिक अधिकारियों को इस बात का प्रशिक्षण देने का भी निर्देश दिया कि “संज्ञान एक आपराधिक मामले का आधार होता है, इसलिए संज्ञान का आदेश कानून के मुताबिक पारित किया जाना आवश्यक है।”
इस टिप्पणी के साथ अदालत ने अवनीश कुमार नाम के एक व्यक्ति के खिलाफ दायर आपराधिक मामले को रद्द कर दिया। इससे पूर्व, अदालत ने संबंधित मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) से स्पष्टीकरण मांगा था कि सीमित अवधि से परे जाकर क्यों मामले का संज्ञान लिया गया।
अदालत ने 19 जनवरी को दिए अपने आदेश में तत्कालीन मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, फिरोजाबाद द्वारा दिए गए स्पष्टीकरण पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई थी। स्पष्टीकरण में सीजेएम ने कहा था कि सभी मजेस्ट्रियल अदालतों में प्रचलित सामान्य व्यवस्था के तहत संज्ञान लेने से पूर्व पुलिस रिपोर्ट पर गहन जांच नहीं की जाती है।
यह मामला एक मोटरसाइकिल की चोरी से जुड़ा है जिसमें जुलाई, 2019 में प्राथमिकी दर्ज की गई थी और पांच सह-आरोपियों के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया गया था और उसी वर्ष इसका संज्ञान लिया गया था।
हालांकि, याचिकाकर्ता (अवनीश कुमार) और एक अन्य आरोपी (सूरज ठाकुर) के खिलाफ जांच इस अदालत के समक्ष लंबित रही। इन दोनों आरोपियों के खिलाफ दूसरा आरोप-पत्र 26 जून, 2021 को तैयार किया गया, लेकिन यह क्षेत्राधिकारी के पास तीन वर्षों से अधिक समय तक पड़ा रहा।
अंततः नवंबर, 2024 में इसे अदालत में दाखिल किया गया। तीन वर्षों की समयबद्धता को नजरअंदाज करते हुए संबंधित सीजेएम ने घटना के पांच साल बाद और आरोप-पत्र दायर करने की तिथि के तीन साल बाद इसका संज्ञान लिया।
भाषा
सं, राजेंद्र रवि कांत
यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.
