लखनऊ, 12 जनवरी (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने देश के विभिन्न हिस्सों में रोहिंग्याओं और अवैध बांग्लादेशियों को बसाने में मदद करने के आरोपी को अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया है।
न्यायमूर्ति राजेश सिंह चौहान और न्यायमूर्ति पी. के. श्रीवास्तव की पीठ ने यह भी निर्देश दिया कि आरोपी को पूछताछ के लिए गिरफ्तार किया जाए। पीठ ने जांच एजेंसी के ‘‘लापरवाह रवैये’’ पर गंभीर नाराजगी जताई कि उसने आरोपी को पकड़ने के लिए उचित कदम नहीं उठाए गए।
अदालत ने अपीलकर्ता अब्दुल गफ्फार की अपील को खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया। गफ्फार ने एनआईए की एक विशेष अदालत के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें नवंबर 2025 में उसकी अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी गई थी।
सरकारी वकील ने उच्च न्यायालय में दलील दी कि आरोपी को कथित रूप से अवैध प्रवासियों के लिए घर और झोपड़ियां बनाने हेतु विदेश से धन मिल रहा था।
अदालत ने नौ जनवरी के अपने आदेश में इस बात का जिक्र किया कि जांच अक्टूबर 2023 से जारी है।
अदालत ने कहा कि कथित अपराध देश की ‘‘सुरक्षा, संरक्षा, शांति और सद्भाव’’ को खतरे में डालते हैं, जिन्हें जानकारी और उचित कार्रवाई के लिए मुख्य सचिव, अपर मुख्य सचिव (गृह), प्रमुख सचिव, मुख्यमंत्री के सचिव और पुलिस महानिदेशक के संज्ञान में लाया जाना चाहिए।
पीठ ने विशेष एनआईए अदालत के आदेश में हस्तक्षेप से इनकार कर दिया और अपीलकर्ता से कहा कि वह अपनी समस्त सामग्री एक सप्ताह के भीतर जांच एजेंसी को उपलब्ध कराए और एनआईए को अनुमति दी कि यदि जांच अधिकारियों को उसकी गिरफ्तारी आवश्यक लगे तो वे उसे गिरफ्तार कर सकते हैं।
गफ्फार और नौ अन्य आरोपियों को 11 अक्टूबर 2023 को गोमती नगर, लखनऊ स्थित आतंकवाद रोधी दस्ते (एटीएस) थाने में दर्ज प्राथमिकी में नामजद किया गया है।
भाषा सं राजेंद्र सिम्मी
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