Saturday, 4 December, 2021
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संयुक्त किसान मोर्चा में पड़ रही दरार, क्योंकि चुनाव पूर्व कुछ यूनियन बढ़ा रहे राजनीति की ओर कदम

गुरनाम सिंह चढूनी जैसे किसान नेताओं का कहना है, कि आंदोलन और राजनीतिक गतिविधियां साथ साथ चल सकती हैं, लेकिन बाक़ी संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) नेताओं ने कहा कि राजनीति कर रहे किसानों को ‘काले झंडे’ दिखाए जाएंगे.

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चंडीगढ़: मोदी सरकार द्वारा रद्द किए गए कृषि कानूनों की अगुवाई करने वाले किसान यूनियन की अंब्रेला बॉडी संयुक्त किसान मोर्चा में अब दरारें दिखने लगी हैं. क्योंकि पंजाब में अगले साल होने वाले चुनावों के पहले कुछ नेताओं ने सियासी चालें चलनी शुरू कर दी हैं.

जहां कुछ यूनियन नेता खुलकर प्रचार करने लगे हैं, वहीं कुछ दूसरों ने उन अलग-अलग राजनीतिक पार्टियों से बातचीत शुरू कर दी है, जो आगामी चुनावों के लिए किसान यूनियनों का समर्थन चाह रही हैं. इस घटनाक्रम ने बहुत से एसकेएम नेताओं को नाराज़ कर दिया है, जिनका मानना है कि राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने से पहले, यूनियनों को आंदोलन के औपचारिक रूप से ख़त्म होने का इंतज़ार करना चाहिए.

राजनीति, यहां तक कि प्रदर्शन स्थल पर राजनीतिक नेताओं को आने तक की अनुमति देने के प्रति भी एसकेएम की चिढ़ जग ज़ाहिर है, लेकिन कुछ किसान यूनियन नेताओं ने अराजनीतिक बने रहने के फरमान की अवहेलना की है. जुलाई में, किसानों ने अस्थाई तौर से अपने एक सबसे प्रमुख नेता, गुरनाम सिंह चढूनी को ये सुझाव देने पर निलंबित कर दिया, कि किसानों को 2022 के असेम्बली चुनाव लड़ने चाहिए. लेकिन भारतीय किसान यूनियन (बीकेयू) हरियाणा के 60 वर्षीय अध्यक्ष, अपने रुख़ पर अडिग हैं. उन्होंने पंजाब में अपने ‘मिशन 2022’ के लिए, प्रचार भी शुरू कर दिया है, और पूरे प्रांत में रैलियां और जनसभाएं करके किसानों को चुनावों में हिस्सा लेने के लिए प्रोत्साहित करने की कोशिश कर रहे हैं.


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SKM ने दी ‘काले झंडों’ की धमकी, लेकिन चढूनी अडिग

रविवार को, पंजाब के 32 किसान संगठनों की बैठक के बाद, वरिष्ठ एसकेएम नेता बलबीर सिंह राजेवाल ने पत्रकारों को बताया, कि किसान इकाई चढूनी के मिशन 2022 के खिलाफ है, और उनके साथ किसी भी दूसरे नेता की तरह बर्ताव किया जाएगा. राजेवाल ने कहा, ‘किसान चढूनी और उनके समर्थकों को काले झंडे दिखाएंगे’.

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राजेवाल ने बुधवार को दिप्रिंट से कहा, कि किसान संगठनों के राजनीति में हिस्सा लेने पर एसकेएम का रुख़ बहुत साफ है. उन्होंने कहा, ‘हमारी प्राथमिकता आंदोलन है. सभी मांगें नहीं मानी गईं हैं, और उस समय तक आंदोलन ऐसे ही चलता रहेगा. राजनीति इंतज़ार कर सकती है’.

उन्होंने आगे कहा, ‘चढूनी जो चाहें वो कहते घूम रहे हैं. हर कोई (दूसरे संगठन) उनसे बहुत नाराज़ है. अगर एक फैसला लिया गया है कि आंदोलन अराजनीतिक रहेगा, तो हर किसी को उस फैसले का पालन करना चाहिए’.

ये पूछने पर कि क्या वो चुनाव लड़ेंगे, राजेवाल ने कहा कि वो अपनी यूनियन के भविष्य के क़दमों पर टिप्पणी नहीं करना चाहते.

एसकेएम की नामंज़ूरी का चढूनी और उनके राजनीतिक मिशन पर कोई असर नहीं पड़ा है. उनकी बैठकों का ताज़ा दौर मंगलवार को संगरूर ज़िले में था, जहां उन्होंने भवानीगढ़, धुरी, और सुनाम में तीन राजनीतिक रैलियों को संबोधित किया. हर चुनाव क्षेत्र में वो एक ‘हलक़ा सेवादार’ का नाम भी घोषित कर रहे हैं- वो पदाधिकारी जिनके पास ब्लॉक और ज़िला स्तर के विंग्स संगठित करने का ज़िम्मा है.

चढूनी ने ऐलान किया है कि उन्हें अपनी गतिविधियों में कोई ग़लती नज़र नहीं आती. मंगलवार को भवानीगढ़ में उन्होंने पत्रकारों से कहा, ‘अगर मैं प्रचार कर रहा हूं तो उनके (राजेवाल और अन्य एसकेएम नेताओं) पेट में क्यों दर्द हो रहा है? मैं एसकेएम का नाम इस्तेमाल नहीं कर रहा हूं. मिशन 2022 के तहत मैं पंजाब के लोगों को एकजुट कर रहा हूं. आंदोलन चीजों को कराने का एक रास्ता है, और राजनीतिक ताक़त दूसरा रास्ता है’.

चढूनी ने ये भी कहा कि वो सभी 117 सीटों पर उम्मीदवार उतारने की उम्मीद कर रहे हैं, लेकिन वो स्वयं चुनावों में खड़े नहीं होंगे. उन्होंने कहा, ‘2022 से 2024 के बीच हम एक पंजाब मॉडल तैयार करना चाहते हैं, जिसे फिर राष्ट्रीय स्तर पर दोहराया जाएगा’.


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किसान संगठनों के बीच मतभेद

जहां चढूनी ने अपने पत्ते खोल कर रख दिए हैं, वहीं कुछ दूसरे किसान नेता अंदरख़ाने राजनीतिक पार्टियों के साथ बातचीत कर रहे हैं.

बीकेयू दकौंदा के महासचिव जगमोहन सिंह पटियाला ने कहा, ‘सभी प्रमुख पार्टियों की ओर से लगभग हर किसान नेता को, चुनाव लड़ने के लिए टिकट की पेशकश की गई है. कुछ सियासी पार्टियां शर्तें तय कर रही हैं, जिनके ऊपर चुनावों से पहले संगठनों के नेता उनके लिए समर्थन का ऐलान कर सकते हैं. लेकिन, जब तक आंदोलन औपचारिक रूप से समाप्त नहीं हो जाता, तब तक कोई भी किसान नेता खुले तौर पर कोई घोषणा नहीं करेगा’. जगमोहन का संगठन पंजाब की उन 32 किसान यूनियनों का हिस्सा है, जो आंदोलन की अगुवाई कर रही हैं.

उन्होंने आगे कहा, ‘ब्लॉक स्तर से ऊपर के किसी भी यूनियन पदाधिकारी को अपना पद छोड़ना होगा, जिसके बाद ही वो चुनाव लड़ सकते हैं’.

क्रांतिकारी किसान यूनियन (केकेयू) के अध्यक्ष और एसकेएम के एक वरिष्ठ नेता डॉ दर्शन पाल ने दिप्रिंट से कहा, कि भले ही यूनियन नेता राजनीतिक अवसरों पर चर्चा कर रहे हैं, लेकिन उनसे अपेक्षा की जाती है कि अभी वो खुले तौर पर कोई क़दम नहीं उठाएंगे. उन्होंने कहा, ‘अगर कोई यूनियन नेता हमारी जानकारी से बाहर सियासी पार्टियों से बातचीत कर रहा है, तो हम कुछ ज़्यादा कर नहीं सकते. लेकिन इनमें से किसी भी संगठन से ये अपेक्षा नहीं की जाती, कि जब तक आंदोलन समाप्त नहीं हो जाता, तब तक वो खुले तौर पर कोई क़दम उठाएंगे’.

ये पूछे जाने पर कि क्या वो चुनाव लड़ेंगे, पाल ने कहा, ‘नहीं, मैं नहीं लड़ूंगा’.

बीकेयू-उग्राहन, जो पंजाब के सबसे बड़े किसान संगठनों में से एक हैं और एसकेएम का हिस्सा है, (लेकिन उन 32 यूनियनों में नहीं है जिन्होंने रविवार को बैठक की), ने भी ऐलान किया है कि वो किसी भी रूप में चुनावों में हिस्सा नहीं लेंगे.

यूनियन के महासचिव सुखदेव सिंह कोकरीकलां ने बुधवार को दिप्रिंट से कहा, कि चुनावों से दूर रहना यूनियन के ‘लिखित संविधान’ का हिस्सा है.

कोकरीकलां ने आगे कहा, ‘अगर हम अपने नेताओं को चुनाव में भाग लेने दें, तो फिर बीकेयू-उग्राहन एक ऐसा संगठन बन जाएगी, जो किसानों को जोड़ने के बजाय तोड़ने का काम करेगी. हम जो इतनी बड़ी इकाई हैं उसका कारण यही है, कि हम कभी राजनीतिक ताक़त की होड़ में नहीं रहे हैं’. कोकरीकलां ने ये भी कहा कि अगर कोई किसान यूनियन चुनाव मैदान में उतरती है, तो किसी भी दूसरी सियासी पार्टी की तरह, उसे भी उन्हीं कड़े सवालों का सामना करना होगा.

उन्होंने कहा, ‘हम अपने समर्थकों से कहते हैं कि सभी राजनीतिक पार्टियों से पूछें, कि वो किसानों के लिए क्या करेंगी. इन चुनावों में भी हम यही करेंगे. अगर दूसरे किसान संगठन चुनाव मैदान में उतरते हैं, तो उन्हें भी हमारे सवालों का सामना करना होगा’. लेकिन कुछ दूसरी यूनियनें राजनीतिक गतिविधियों को लेकर ज़्यादा खुले विचार रखती हैं.

बीकेयू-लखोवाल के प्रेस सचिव गुरिंदर सिंह कूमकलां ने कहा कि यूनियन नेता किसी भी सियासी पार्टी को समर्थन दे सकते हैं, और चुनाव भी लड़ सकते हैं.

उन्होंने कहा, ‘पिछले वर्षों में हम अलग-अलग राजनीतिक पार्टियों के लिए समर्थन का ऐलान करते रहे हैं, जो इस पर निर्भर होता है कि वो किसानों के लिए क्या करते हैं. हर चुनाव से पहले हम ज़िला और ब्लॉक स्तर पर, अपने समर्थकों के साथ बैठकें करते हैं, और फिर फैसला किया जाता है कि क्या हमें किसी पार्टी का समर्थन करना है. फिर हम अलग अलग पार्टियों के साथ बैठकें करते हैं, और उनसे पूछते हैं कि वो किसानों के लिए क्या करने की मंशा रखते हैं. उसके बाद हम फैसला करते हैं.’

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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